Life Transforming Articles in Hindi

 

“यदि आप अपने स्वयं के जीवन की योजना नहीं बनाते हैं, तो इस बात की सम्भावना अधिक है कि आप किसी दूसरे की योजना में खड़े होंगे। और अनुमान लगाइये कि उन्होंने आपके लिये क्या सोच रखा है? कुछ ज्यादा नहीं।”
– जिम रौन

 

जीवनसूत्र के इस खंड में हम जीवन को आनंदमय, रसपूर्ण और संतोषप्रद बनाने वाले उन सूत्रों की चर्चा करेंगे जिनका समावेश ऊपर के दोनों खंडो में नहीं किया जा सका है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के बिना उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपवाद स्वरुप उन व्यक्तियों की बात अलग है जो चेतना के बहुत उच्च स्तर पर क्रियाशील हैं, और जो इसके अच्छे-बुरे प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हैं।

अन्यथा प्रायः सभी व्यक्तियों को अपनी समस्त आवश्यकताएँ और उद्देश्य समाज के बीच रहकर ही हासिल करने पड़ते हैं। सामाजिक सम्बन्ध, रिश्ते-नाते वे कड़ियाँ हैं, जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से बांधे हुए हैं और जिनसे उसका संपूर्ण जीवन बहुत गहराई से प्रभावित होता है। जिस दिन व्यक्ति जन्म लेता है, उसी दिन से वह संबंधों के बंधन में बंधता चला जाता है।

जीवन के सुख-दुःख का निर्धारण करने में ये सम्बन्ध बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो सामाजिक सम्बन्ध व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। संबंधों में सफलता-असफलता कितने ही लोगों का जीवन के प्रति द्रष्टिकोण पूरी तरह से बदल देती हैं। उनका अस्तित्व, उनकी इच्छाएँ, उनका उद्देश्य सभी इसके परिणामों से अविश्वसनीय स्तर तक प्रभावित होते हैं।

दूसरे देशों की तुलना में हमारे भारतीय समाज में रिश्तों का महत्व, उनका गौरव, उनकी मर्यादा आज भी सबसे अधिक है। फिर चाहे वह माता-पिता और संतान के बीच का सम्बन्ध हो, पति और पत्नी का पवित्र नाता हो या फिर दूसरे सम्बन्ध हों। आज भले ही संबंधों के टूटने की, उनके असफल होने की दर, कितनी ही अधिक क्यों न हो, हम अभी भी उनकी विश्वसनीयता को, उनके सम्मान को बचाये हुए हैं।

यह केवल हमारा व्यक्तिगत विचार नहीं है, बल्कि भारत आने वाले उन विदेशी सैलानियों के भी उद्गार हैं जो आज भी भारत को संसार का सबसे अधिक बौद्धिक और आध्यात्मिक प्रतिभासंपन्न देश मानते हैं। पर आज आधुनिकता की इस नंगी दौड़ में हम अपने जीवन मूल्यों का स्वयं ही विनाश करते जा रहे हैं।

हमारी अज्ञानता और दुष्प्रवृत्तियाँ हम पर इस तरह हावी हो चुकी हैं कि हम अपने उस गौरव को बिल्कुल भूल चुके हैं, जो आज भी हमारी सबसे बड़ी विरासत हैं। हमारे शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन स्तर में तो वृद्धि हुई है, पर नैतिक रूप से हमारा उतना ही पतन हुआ है। बौद्धिक स्तर पर भले ही हम संसार को पूरी तरह से जान लेने का दावा करते हों, पर भावनात्मक स्तर पर हम एक पशु से भी ज्यादा निचले स्तर पर आ गये हैं।

समाज में दिनोदिन सुरसा की तरह बढती जा रही इन प्रबल कुरीतियों को दूर करने के लिये आवश्यक जागृति को पैदा करना हमारा मूल ध्येय है। हमें पूर्ण विश्वास है जीवनसूत्र के विवेकशील और प्रखर मेधा सम्पन्न पाठकगणों के सहयोग से इस कार्य में भी आशातीत सफलता मिल सकेगी। नीचे दिये जा रहे लेख हमारे सामाजिक संबंधों में उपजी समस्याओं और उनके समाधान पर केन्द्रित हैं। आशा है यह आपके लिये किसी न किसी प्रकार से लाभदायक सिद्ध होंगे। –

 

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FOR A BLESSED HEALTHY LIFE :

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