Best Inspiring Hindi Story on True Winner

 

“शक्ति दो तरह की होती है – एक जो दंड के भय से उत्पन्न होती है और दूसरी प्रेम की शक्ति। प्रेम पर आधारित शक्ति, भय से उपजी शक्ति की तुलना में हजार गुनी ज्यादा शक्तिशाली और प्रभावी होती है।”
– महात्मा गाँधी

 

Winner and Victor Quotes and Story in Hindi
संसार नहीं बल्कि स्वयं को जीतना ही एक सच्चे विजेता के लिये सबसे बड़ी विजय है

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान् महावीर का जीवन, अदम्य संकल्प, तितिक्षा और मनुष्य जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य की प्राप्ति के लिये किये गये दुर्धुर्ष पुरुषार्थ की बेजोड़ कहानी है। ईसा से 350-400 वर्ष पूर्व इस भारतवर्ष में अवतरित हुए इन महापुरुष का जीवन सभी के लिये वरेण्य है। यह बात उस समय की है जब उन्होंने राजपाट त्यागकर एक संन्यासी का जीवन जीना स्वीकार किया था।

सत्य को जानने की जिज्ञासा लिये वह एक श्रमण का जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक बार भगवान् महावीर भ्रमण पर थे। जिस राह से वे गये थे, उसी मार्ग पर पुष्य नाम का एक प्रसिद्द सामुद्रिक शास्त्री भी चला आ रहा था। चलते-चलते अचानक उसकी नजर मार्ग में छपे चरणचिन्हों पर पड़ी। उन पदचिन्हों को देखकर वह सोचने लगा कि जिस व्यक्ति के यह चरणचिन्ह हैं, वह कोई सामान्य मनुष्य नहीं हो सकता।

अवश्य ही वह व्यक्ति कोई चक्रवर्ती सम्राट होगा। अपने मत की पुष्टि के लिये जब उसने उसी मार्ग से गुजरने वाले दूसरे लोगों से पूछा, तो वे उसकी बातें सुनकर आश्चर्य में पड गये। वे हँसते हुए कहने लगे – “भाई! लगता है तुम्हारी सामुद्रिक विद्या गलत है। भला इस तपती जमीन पर नंगे पैर घूमने वाला व्यक्ति चक्रवर्ती सम्राट कैसे हो सकता है?”

उनकी बात सुनकर पुष्य हक्का-बक्का रह गया। उसने कहा, “यदि ऐसा हुआ, तो संपूर्ण सामुद्रिक शास्त्र झूठा है।” इतना कहकर वह उनके कथन की सत्यता की परीक्षा करने के लिये उन पदचिन्हों का पीछा करने लगा। थोड़ी ही दूर जाने पर एक वटवृक्ष के नीचे वे चरणचिन्ह समाप्त हो गये। भगवान् महावीर उस वृक्ष की शीतल छाया में ध्यानमग्न बैठे हुए थे।

पुष्य भी एक ओर बैठकर उनके ध्यान से विरत होने की प्रतीक्षा करने लगा। जैसे ही भगवान् ध्यान से विरत हुए, पुष्य ने उन्हें प्रणाम किया और उनसे प्रश्न पूछा, “प्रभु! आपके साथ कोई दूसरा व्यक्ति नहीं दिखाई देता। क्या आप यहाँ अकेले ही हैं?” भगवान् महावीर ने उत्तर दिया, “वत्स! इस दुनिया में जो भी आता है वह अकेले ही आता है और अकेले ही जाता है, दूसरा कोई प्राणी उसका साथ नहीं देता।”

“क्षमा कीजिये प्रभु! मै तत्व की नहीं व्यवहार की बात कर रहा हूँ।” – पुष्य ने कहा। “व्यवहार के धरातल पर भी मै कहाँ अकेला हूँ?” – भगवान् ने कहा। उनकी बात सुनकर पुष्य ने कहा – “प्रभु! आपके साथ तो कोई भी दिखाई नहीं देता, फिर परिवारहीन होकर भी आप अकेले कैसे नहीं हैं? “मेरा परिवार सतत मेरे साथ है” – भगवान् ने कहा।

पुष्य उनके रहस्यपूर्ण वचन सुनकर घोर आश्चर्य में डूब गया, पर अभी उसकी जिज्ञासा का शमन नहीं हुआ था। इसलिये उसने पुनः पूछा, “आपका परिवार कहाँ है प्रभु! मुझे तो वह कहीं भी दिखाई नहीं देता।”

आगे पढिये इस कहानी का अगला भाग Hindi Story of Lord Mahavira: भगवान महावीर का प्रेरक जीवन

“स्थायी महत्व का काम करना जीवन का सबसे उत्तम उपयोग है।”
– विलियम जेम्स

 

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