Best Hindi Story on Generosity of President

 

“जब आप अपने अधिकार में से किसी को कुछ देते हैं, तो आप देते तो हैं, लेकिन कम। देने की सच्ची उदारता, तो तब है, जब आप स्वयं को ही दे देते हैं।”
– खलील जिब्रान

 

Generosity Quotes and Story in Hindi
उदार बनिये, जीवन स्वार्थी होने के लिये बहुत छोटा है

अमेरिकन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर (Herbert Clark Hoover) एक लोहार के पुत्र थे। जिनका जन्म 10 अगस्त सन 1874 को हुआ था। जब इनकी आयु केवल 6 वर्ष की थी, तभी इनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। विधवा माँ कपडे सींकर अपने परिवार का पेट पालती थी। कुछ दिनों के बाद जब वह भी मर गयी, तब हूवर का पालन-पोषण इनके चाचा ने किया। कहने की जरूरत नहीं, कि इनका प्रारंभिक जीवन बड़ी ही गरीबी में बीता।

लेकिन अपने कठोर परिश्रम और आगे बढ़ने की प्रबल जिज्ञासा के बल पर वे अमेरिका के 31वें राष्ट्रपति(1929-1933) बने। जब ये California University में पढ़ते थे, तो अखबार आदि बेचकर अपनी पढाई का खर्च निकालते थे। उन्ही दिनों पोलैंड के विश्वविख्यात संगीतकार, इग्नास पेडेरेवस्की (Ignace Jan Paderewski) अपने Music Concert के लिए कैलिफ़ोर्निया पधारे।

हूवर को पैसों की सख्त जरूरत थी और उन्होंने उस अवसर का लाभ उठाने का निश्चय किया। हूवर ने पेडेरेवस्की के साथ 2000 डॉलर में यह करार कर लिया कि आपको अपने प्रदर्शन का 2000 डॉलर मिलेगा और टिकटों की बिक्री से जो कमाई होगी, वह सब हमारी। पेडेरेवस्की और उनकी टीम इस बात पर सहमत हो गयी।

पेडेरेवस्की के संगीत प्रदर्शन में बहुत भीड़ जुटने की उम्मीद थी, लेकिन दुर्भाग्य ने हूवर का यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा और बहुत कम टिकिट ही बिक पाये। कहाँ तो अच्छा लाभ होने की आशा थी और कहाँ 2000 डॉलर चुकाना भी मुश्किल हो गया। जब हूवर को पैसा जुटाने का कोई दूसरा उपाय न सूझा, तो उन्होंने पेडेरेवस्की से ही मिलने का निश्चय किया।

हूवर ने पेडेरेवस्की को डरते-डरते सारी वास्तविक स्थिति सच-सच बता दी। वे तो यह सोच रहे थे कि पेडेरेवस्की उन्हें बहुत बुरा-भला कहेंगे और शायद किसी तरह कम पैसों पर राज़ी न हों। लेकिन उदारह्रदय पेडेरेवस्की ने जवाब दिया, “लड़के! मै तुम्हे क्षमा करता हूँ। आगे से फिर कभी ऐसी भूल मत करना। टिकिटों की बिक्री से जो आय हुई हो, उससे हाल आदि के किराए समेत सभी खर्च चुकाओ और जो कुछ बचे, वह हमें दे दो।

ऐसे अप्रत्याशित व्यवहार से हूवर की आँखे नम हो गयी और जैसा पेडेरेवस्की ने कहा, वैसे ही किया। जाते हुए पेडेरेवस्की ने हूवर को अपने पास बुलाया और उन्हें कुछ डॉलर दिये। हूवर ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, “महाशय यह क्या? मै तो आपको निर्धारित रकम भी नहीं चुका सका, मै यह पैसे नहीं ले सकता।”

पेडेरेवस्की ने हूवर की पीठ थपथपाते हुए कहा, “बच्चे, तुमने इस कार्यक्रम के आयोजन में बहुत मेहनत की है, फिर यह कैसे संभव है, कि जिसने सबसे ज्यादा परिश्रम किया हो, उसे कुछ भी न मिले। मै नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति मेरे पास से निराश होकर जाये। तुम अभी बच्चे हो और इस आयु में अक्सर भूल हो जाया करती है।

हूवर ने डॉलर ले लिए, पर इस घटना से उनका ह्रदय कृतज्ञता से भर गया और उन्होंने भी यह निश्चय किया कि भविष्य में वह भी दूसरों की हरसंभव मदद करेंगे। आगे चलकर हूवर एक बड़े व्यवसायी बने और उन्होंने करोड़ों रूपया कमाया। प्रथम विश्वयुद्ध(1914-1918) के समाप्त होने पर, पूरे यूरोप की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो चुकी थी। पोलिश सरकार की ओर से पेडेरेवस्की ने, जो उस समय पोलैंड के प्रधानमंती थे, अमेरिका से सहायता मांगी।

हूवर उस समय U.S. Food Administration के President थे। हर्बर्ट हूवर ने 10 करोड़ डॉलर की सहायता और पर्याप्त अनाज पोलैंड के निवासियों के लिए भिजवाया। जब पेडेरेवस्की ने उनकी इस उदारता के लिए उनकी सराहना की, तो हूवर ने जवाब दिया, “महाशय मैंने कोई विशेष कार्य नहीं किया है, बल्कि उस उदारता का सम्मान करने का ही एक तुच्छ प्रयास किया है, जो आपने आज से कई वर्ष पूर्व एक college student के प्रति दिखायी थी।

यह पेडेरेवस्की की उदारता का ही फल था कि हूवर ऋणग्रस्तों से कभी भी कठोर व्यवहार नहीं करते थे। जब वह अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब सन 1930 में यूरोप एक बार फिर मंदी की चपेट में आ गया। उस समय यूरोप के सभी देशों ने अमेरिका का क़र्ज़ चुकाने में अपनी असमर्थता जता दी थी, लेकिन हूवर ने उनसे अत्यंत उदारतापूर्वक व्यवहार किया।

पेडेरेवस्की की हूवर के प्रति दिखायी गयी उदारता ने न केवल हूवर का व्यक्तित्व बदलकर रख दिया, बल्कि संसार के कई देशों के लोगों ने उनकी इस उदारता से लाभ उठाया। उदारता, हमारे व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाने वाला एक दिव्य सदगुण(divine quality) है। दूसरों को अच्छी शिक्षाओं का उपदेश देने से अधिक प्रभाव तब पड़ता है, जब वह कार्य स्वयं किया जाता है और उनके सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया जाता है।

अगर पेडेरेवस्की चाहते, तो हूवर को अपमानित और दंडित कर सकते थे। लेकिन वह यह बात जानते थे कि किसी व्यक्ति का सुधार उपहास से नहीं, बल्कि उसे नए सिरे से सोचने और बदलने का अवसर देने से होता है। अच्छाई और बुराई, दोनों संक्रमण के जरिये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती हैं और इस तरह एक दिन वे सारे समाज में फ़ैल जाती हैं।

“सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है, जो वाणी से नहीं; अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है।”
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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