Best Hindi Story on King Vikramaditya

 

“आइये हम प्रतिज्ञा करें कि हम अपने दिन की प्रत्येक सुबह की शुरुआत इन क्रियाकलापों से करेंगे – मै धरती पर किसी से नहीं डरूंगा। मै केवल भगवान से ही डरूंगा। मै किसी के भी प्रति दुर्भावना नहीं रखूँगा। मै किसी के भी अन्याय के सामने नहीं झुकूँगा। मै असत्य को सत्य से जीतूँगा और असत्य का विरोध करने के लिए, मै सारे दुःख उठाऊंगा।”
– महात्मा गाँधी

 

Hindi Quotes and Story on Justice of King Vikramaditya
ह्रदय की पवित्रता और प्रज्ञा ही न्यायाधीश की सबसे बड़ी शक्ति है

बरसों पुरानी बात है। उज्जैन के समीप एक गाँव में किशोरवय के कुछ बालक अपने जानवर चरा रहे थे। इधर बालक खेल में व्यस्त थे और उधर जानवर घास चरते-चरते जंगल में दूर निकल गये। बालक भी उन्हें ढूंढते-ढूंढते उनके पीछे चल दिये। आगे एक बहुत विस्तृत मैदान था जो ताज़ी हरी घास से भरा हुआ था। वहाँ जाकर सारे पशु घास चरने में व्यस्त हो गये और बालक भी उन्ही के पास खेलने लगे।

खेलते-खेलते उनमे से एक बालक की नजर, मैदान के दूसरी तरफ खड़े एक विशाल खंडहर पर पड़ी। वह खंडहर घास-फूस और लताओं से पूरी तरह ढका हुआ था, इसलिये ध्यान से न देखने पर एक विशाल टीला ही मालूम पड़ता था। सभी बालक उत्सुकतावश उसकी ओर चल दिये। खंडहर पर उगी घास और बेलों को हटाकर जब वे उसके अन्दर पहुँचे, तो सभी बालक उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गये।

अपनी नक्काशी, विशालता और कलाकृतियों के कारण वह खंडहर सदियों पुराने किसी राजा के महल जैसा प्रतीत होता था। उस वीरान महल के बीचों-बीच कुछ पथरीले टीले उभरे हुए थे, जिन पर घास उग आयी थी और उनका वास्तविक स्वरुप छिप गया था। इन सभी टीलों के बीच में एक विशाल टीला और था, जो बाकी दूसरे टीलों से अधिक विशाल और ऊँचा था।

उन बालकों ने इन टीलों को ही अपने खेल का माध्यम बनाया और आपस में ही एक झूठा झगडा प्रस्तुत कर उसका सही निर्णय करने के लिये अपने बीच में से ही एक बालक को राजा घोषित कर दिया। वह बालक जो दूसरे बालकों से आयु में सबसे छोटा था, उनके निर्देशानुसार उस टीले पर बैठ गया जो सबके मध्य में था और सबसे विशाल तथा ऊँचा था।

दूसरे बालक भी दो पक्ष बनाकर दोनों ओर बने टीलों पर बैठ गये और उस राजा बने बालक के निर्णय की प्रतीक्षा करने लगे। इधर वह बालक जो राजा बनकर सबसे ऊँचे टीले पर बैठा था, उसमे अदभुत परिवर्तन हो गया। जहाँ अभी तक वह दूसरे बालकों की तरह हँसी-ठिठोली कर रहा था, अब बिल्कुल शांत और गंभीर हो गया था।

उसकी वाणी में ओज और प्रभुत्व झलकने लगा था। देखते ही देखते उसने उन बालकों के बीच के झगडे का निपटारा कर दिया। उसके व्यक्तित्व में हुए इस अदभुत परिवर्तन से और उसकी निर्णय क्षमता से सारे बालक हक्क-बक्के रह गये। उन्होंने उसके निर्णय को स्वीकार किया और फिर अपने-अपने घर चले गये। अब वे प्रतिदिन यही खेल खेलते।

वे एक झूठा स्वांग रचते, और वही किशोर राजा बनकर उनके विवाद का निपटारा करता। उस बालक की अदभुत न्याय क्षमता की चर्चा धीरे-धीरे सारे गाँव में फ़ैल गयी। अब दूसरे लोग भी अपने-अपने वास्तविक विवादों को उसके सामने लाते और उसके दिये निर्णय से प्रसन्नमन होकर लौटते। वह जो भी निर्णय देता, दोनों ही पक्ष उसे सहजता से स्वीकार कर लेते।

इस विचित्र घटनाक्रम में अदभुत विशेषता यह थी कि जैसे ही वह बालक उस ऊँचे टीले पर बैठता, उसके व्यक्तित्व और वाणी में गंभीरता और ओजस्विता छा जाती। उसकी बातों से ऐसे लगता जैसे कि वह कोई बालक नहीं, बल्कि कोई अत्यंत बुद्धिमान, विद्वान व्यक्ति हो। उसकी वाणी में एक राजा के प्रभुत्व की झलक होती।

पर जैसे ही वह उस टीले से नीचे उतरता, ये सभी गुण लुप्त हो जाते और वह अपनी आयु के दूसरे बालकों की ही तरह चंचल और अल्हड हो जाता। उस स्थिति में देखकर कोई उसे यह नहीं कह सकता था कि इसी बालक ने अभी-अभी सर्वमान्य और अत्यंत विद्वत्तापूर्ण निर्णय दिया है।अब वह बालक अनजान न रह गया। दूर-दूर के प्रदेशों से लोग अपने विवाद उसके पास लाने लगे।

उसकी बढती ख्याति, उज्जैन के राजा के कानों में भी पहुंची। एक साधारण बालक के अन्दर ऐसी अदभुत न्याय क्षमता और प्रखर विवेक देखकर राजा के मन में संदेह उठा कि हो न हो निश्चित ही वह स्थान महाराज विक्रमादित्य का राजदरबार ही है और जिस टीले पर बैठकर वह लड़का न्याय करता है, वह महाराज विक्रमादित्य का न्याय सिंहासन है।

राजा के मन में विचार उठा कि यदि मै किसी तरह उस राजसिंहासन को प्राप्त कर लूँ और उस पर बैठकर न्याय करूँ, तो मै भी विक्रमादित्य की ही तरह प्रसिद्द और न्यायप्रिय समझा जाउँगा। राजा अपने मंत्री और सेना को लेकर उस स्थान पर गया, जहाँ वह खंडहर था और उसने जाते ही उस स्थान को खुदवाना शुरू कर दिया।

कई दिनों की खुदाई के पश्चात आख़िरकार राजा को वह हासिल हो ही गया जिसकी उसे तलाश थी। जिस टीले पर बैठकर वह लड़का न्याय करता था, उसके काफी नीचे से राजा को एक रत्नजटित बहुमूल्य सिंहासन मिला जो पाँच पंखों वाले देवदूतों के हाथों पर टिका हुआ था। उस अदभुत राजसिंहासन को देखने के लिये भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

वह बालक जो उस टीले पर बैठकर न्याय करता था, सिंहासन छीन लेने से इतना दुखी था जैसे उसकी प्राणप्रिय वस्तु छीनी जा रही हो। सारे राज्य में घोषणा करवा दी गयी कि राजा एक शुभ दिन इस सिंहासन पर आरूढ़ होंगे और फिर न्याय करेंगे। आखिर वह दिन भी आ ही गया जिसकी सबको प्रतीक्षा थी। विक्रमादित्य के राजसिंहासन को प्रजा के सामने रखा गया।

आगे पढिये इस कहानी का अगला भाग Hindi Story on Justice of Pure Heart: सच्चे ह्रदय का न्याय

“न्यायाधीश हमारे न्यायिक तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी हैं, और वे ही सबसे ज्यादा सुरक्षित भी हैं।”
– एलन देर्शोवित्ज़

 

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