Best Hindi Story on Justice of King Aurangzeb

 

“इंसाफ के न्यायालयों से भी ऊपर एक न्यायालय है, और वह है – अंतःकरण का न्यायालय। यह दूसरे सभी न्यायालयों से ऊपर है।”
– महात्मा गाँधी

 

King Story in Hindi on Justice
कानून कानून नहीं है, यदि वह न्याय के शाश्वत सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

यह घटना मुग़ल बादशाह औरंगजेब के जीवन से सम्बंधित है। एक बार रात के समय औरंगजेब सोने की तैयारी कर ही रहा था कि तभी उसे शाही घंटे की आवाज सुनाई दी। यह शाही घंटा, उसके दादा जहाँगीर के ज़माने में फरियादियों के लिए लगवाया गया था, ताकि वे किसी भी समय न्याय की गुहार लगा सकें। जैसे ही वह कमरे से बाहर आया, उसे एक सैनिक अपनी ओर आता दिखाई दिया।

वह बोला – “हुज़ूरे-आलम! आदाब अर्ज़! क़ाज़ी साहब आलमपनाह से मिलने के लिए दीवानखाने में तशरीफ़ लाये हैं और आपका इंतज़ार कर रहे हैं।” बादशाह तुरंत ही दीवानखाने में गया और इतनी रात को आने का कारण पूछा। क़ाज़ी ने कहा – जहाँपनाह! गुजरात के अहमदाबाद शहर के एक आदमी, जिसका नाम मोहम्मद मोहसिन है, आप पर पाँच लाख रुपयों का दावा किया है।

इसलिए आपको कल दरबार में हाज़िर होना होगा। क़ाज़ी के जाने के बाद, औरंगजेब विचार करने लगा कि उसने किसी से पाँच लाख रुपये उधार तो नहीं लिए हैं, लेकिन बहुत याद करने पर भी उसे ऐसी कोई घटना याद नहीं आई। इतना ही नहीं, मोहसिन नाम के आदमी को तो वह पहचानता भी न था। दूसरे दिन दरबार लगा और बादशाह औरंगजेब मुजरिम के रूप में हाज़िर हुआ।

शहर भर में ये खबर आग की तरह फ़ैल गयी कि खुद बादशाह-ए-हिन्दुस्तान अदालत में हाज़िर हुए हैं। इस अदभुत नज़ारे को देखने के लिए सारा दरबार लोगों से खचाखच भरा हुआ था और पैर रखने को तिल भर की जगह भी न थी। औरंगजेब को उसके जुर्म का ब्यौरा पढ़कर सुनाया गया। असल बात यह थी कि औरंगजेब के भाई मुराद को गुजरात का शासन सौंपा गया था, पर जब शाहजहाँ बीमार पड़ा, तो औरंगजेब ने खुद को ही गुजरात का शासक घोषित कर दिया।

जब उसे खुद के नाम से सिक्के जारी करने के लिए पैसे की जरूरत महसूस हुई, तो उसने मोहम्मद मोहसिन से पाँच लाख रूपये उधार ले लिए थे। इस बीच औरंगजेब ने अपने बाप शाहजहाँ को कैद करके शासन हथिया लिया और अपने तीनो भाइयों – दाराशिकोह, शुजा और मुराद का क़त्ल करवा दिया। इसके अलावा उनकी सारी सम्पत्ति भी अपने खजाने में जमा कर ली।

इस तरह मोहसिन से लिए गए रूपये भी उसके खजाने में जमा हो गए। जब औरंगजेब ने अपने अपराध के प्रति जानकारी न होने की बात कही, तो उसे मोहसिन के पास का दस्तावेज दिखाया गया। उसे देखकर बादशाह ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया। न्यायाधीश(क़ाज़ी) ने औरंगजेब को रूपये अदा करने का हुक्म दिया।

औरंगजेब ने पाँच लाख रूपये शाही खजाने से निकलवाये और उन थैलियों को मोहसिन को देने के लिए पेश किया। बादशाह की यह न्यायप्रियता देखकर मोहसिन की आँखों में आंसू आ गए। वह झुककर सलाम करते हुए बोला, “जहाँपनाह, ये रूपये शाही खजाने में दोबारा जमा करा दिये जाये, यह रही रसीद। मेरे कारण आपको यह सब सहना पड़ा, इसके लिये मै बहुत शर्मिंदा हूँ।”

सारी प्रजा बादशाह की सच्ची न्यायशीलता को देखकर वाह-वाह कर उठी। औरंगजेब भले ही सत्ता का लोभी और धर्मांध था, लेकिन वह बेहद सादा जीवन बिताने वाला और इंसाफपसंद बादशाह था। अपने जीवन में उसने जो भी क्रूर कर्म किये वह उससे धर्म के सही स्वरुप को न जानने के कारण हुए, जिनके लिये उसे अपने जीवन के अंत में बड़ा भारी पश्चाताप भी हुआ था।

अपनी जीविका के लिए वह शाही खजाने से कोई पैसा नहीं लेता था, बल्कि कुरान की आयतें लिखकर और टोपी सिलकर गुजारा करता था। औरंगजेब शायद यह जानता था कि अन्याय चाहे किसी एक स्थान पर हो, पर वह हर जगह के न्याय के लिए खतरनाक होता है। अगर स्वयं शासक ही न्याय का सम्मान नहीं करेगा, तो प्रजा भी उसका अनुसरण करेगी और इस तरह सम्पूर्ण राष्ट्र में अराजकता फ़ैल जायेगी।

“अपने सर्वोत्तम रूप में, आदमी सभी जीवित प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है; लेकिन कानून और न्याय के बिना वह सबसे अधिक बुरा है।”
– अरस्तू

 

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