Best Real Hindi Story on Love for God

 

“भगवान की परम भक्ति मनुष्यों के लिये कामधेनु के समान बताई गई है। उसके रहते हुए भी अज्ञानी मनुष्य संसाररूपी विष का पान करते हैं। वह जान नहीं पाता कि ईश्वर भक्ति में कितना रस है! यह कितने आश्चर्य की बात है?”
– नारद पुराण

 

विख्यात दार्शनिक औस्पेंसकी, रूस के महान अध्यात्मवादी और योगी जॉर्ज गुरजिएफ के शिष्य थे। औस्पेंसकी दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे, पर उनके ज्ञान की पूर्णता और इस विषय की व्यापक समझ उन्हें गुर्जिएफ़ के सानिध्य में आने के पश्चात ही हो पाई थी। गुर्जिएफ़ चेतना के उच्चस्तरीय विज्ञान में बहुत उच्च स्तर तक पहुँचे हुए थे। वे मानवीय व्यक्तित्व के हर पहलू को सूक्ष्मता से जानते थे।

औस्पेंसकी भी अपने महान गुरु के संरक्षण में काफी आगे बढ़ चुके थे, पर कभी-कभी यह प्रश्न उनके मन को विचलित करने लगता था कि आखिर ईश्वर को कैसे पाया जाय? उसके दर्शन हमें किस प्रकार से हों? एक दिन उन्होंने अपनी जिज्ञासा गुर्जिएफ़ के सामने रखी। गुर्जिएफ़ औस्पेंसकी को देखकर पहले तो मंद-मंद मुस्कुराते रहे।

फिर शांत और गंभीर शब्दों में उनसे कहा, “बहुत शीघ्र ही तुम्हे अपने प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा।” बात आई-गई हो गई। एक दिन पाँच व्यक्ति गुर्जिएफ़ के पास आये। अध्यात्मविद्या के मर्मज्ञ के रूप में गुर्जिएफ़ की ख्याति दिनोदिन बढती ही जा रही थी, इसी से प्रभावित होकर वे पाँचों व्यक्ति उनका शिष्यत्व ग्रहण करने को वहाँ आये थे।

गुर्जिएफ़ ने औस्पेंसकी के सामने ही उन लोगों से पूछा, “आप लोग मेरे शिष्य क्यों बनना चाहते हैं? सभी ने एक स्वर में उत्तर दिया, “क्योंकि हम ईश्वर को जानना चाहते हैं, उसे पाना चाहते हैं।” गुर्जिएफ़ जल्दी से किसी को अपना शिष्य नहीं बनाते थे। क्योंकि वे जानते थे कि शिष्य का उत्तरदायित्व वहन करना कितनी कष्टसाध्य प्रक्रिया है?

उन्होंने उनकी बात का कोई उत्तर दिये बिना औस्पेंसकी के कान में कुछ कहा और फिर अपने साधना कक्ष में चले गये। अपने गुरु की आज्ञानुसार औस्पेंसकी ने पहले उन लोगों को कुछ जलपान कराया और फिर उनसे विनम्र शब्दों में कहा, “गुरुदेव आपको दीक्षा देने को तैयार हैं, पर पहले आपको परीक्षा देनी होगी। यदि आप परीक्षा देने को तैयार हैं तो कल प्रातःकाल यहाँ पर आ जाइये।

पाँचों लोगों ने उनकी बात मान ली और कल सुबह आने की बात कहकर चले गये। अगले दिन पाँचों व्यक्ति प्रातःकाल होते ही गुर्जिएफ़ के आश्रम में पहुँच गये। उन दिनों उस क्षेत्र में कड़ाके की सर्दी पड रही थी। इसलिये सभी लोग गर्म कपडे पहने हुए थे, पर गुर्जिएफ़ केवल एक बेहद हल्का और महीन वस्त्र ही पहने हुए थे। औस्पेंसकी सहित पाँचों व्यक्तियों ने उन्हें प्रणाम किया।

फिर गुर्जिएफ़ ने औस्पेंसकी से कहा, “तुमने इन्हें मेरी शर्त तो बता दी हैं ना! “जी गुरुदेव!” – औस्पेंसकी ने संक्षिप्त उत्तर दिया। “तब ठीक है, सभी अपने-अपने गर्म वस्त्र उतारकर मेरे पीछे-पीछे आओ।” – गुर्जिएफ़ शांत स्वर में अपनी बात कहकर आश्रम के पास बह रही नदी के तट पर चल दिये। उस दिन ठंड कुछ ज्यादा ही थी।

इसके अलावा शीतलहर चलने से मौसम और भी ज्यादा ठंडा हो गया था। सांय-सांय करती तेज हवाएँ कपड़ों के आर-पार हो रही थीं। पाँचों व्यक्ति ठंड से काँप रहे थे, पर चूंकि सभी गुर्जिएफ़ का शिष्यत्व ग्रहण करना चाहते थे, इसलिये चुपचाप उनके पीछे चले जा रहे थे। नदी के तट पर जाकर गुर्जिएफ़ एक क्षण को रुके और फिर तुरंत नदी के पानी में उतर गये।

उन्होंने वहीँ से एक व्यक्ति को पानी में आने का इशारा किया। वह आदमी डरता-डरता गुर्जिएफ़ के पास पहुँचा। गुर्जिएफ़ ने उससे पानी में डुबकी लगाने को कहा। जैसे ही उस व्यक्ति ने पानी में डुबकी लगाई, गुर्जिएफ़ ने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसे जबरदस्ती पानी में डुबोये रखा। उस आदमी ने छूटने की बहुत कोशिश की, पर चूंकि गुर्जिएफ़ शरीर से शक्तिशाली थे इसलिये अपनी गर्दन न छूटा सका।

कुछ देर तक पानी में डुबोये रखने के बाद जब गुर्जिएफ़ ने उसे छोड़ा, तो वह आदमी हाँफते-हाँफते पानी से बाहर निकला। छूटते ही उसने कहा, “क्या ऐसे ही परीक्षा ली जाती है? आपने तो आज मुझे मार ही डाला था। मुझे नहीं बनना ऐसे गुरु का शिष्य जो उन्हें मार डालने पर उतारू हो। ऐसे ही कई कटुवचन कहकर वह आदमी चला गया।

उसकी हालत देखने से ऐसा लगता था, जैसे वह बाल-बाल बचा हो। यह द्रश्य देखकर बाकी लोग खड़े-खड़े कांपने लगे। देखते ही देखते पाँच में से चार लोग उलटे पाँव पीछे लौट गये। केवल एक ही व्यक्ति वहाँ बचा रह गया। उन्होंने उससे भी पानी के अन्दर आने को कहा। गुर्जिएफ़ ने उससे कहा, “क्या तुम अब भी ईश्वर को पाना चाहते हो?

उस व्यक्ति के हाँ कहने पर, गुर्जिएफ़ ने उसे भी पानी में वैसे ही डुबो दिया जैसे पहले वाले को डुबोया था। कुछ देर तक पानी में डुबोये रखने के बाद जब गुर्जिएफ़ को लगा कि अब इसमें बस नाममात्र के प्राण शेष हैं, तो उन्होंने उसे पानी से बाहर निकाल लिया। नदी के अत्यंत शीतल जल में डूबे रहने के कारण और साँस न मिलने की वजह से वह युवक बेहोश हो गया था।

गुर्जिएफ़ ने उस युवक को अपने कंधे पर उठाया और आश्रम में ले आये। कुछ देर तक उसका उपचार करने के पश्चात जब वह युवक होश में आया तो गुर्जिएफ़ ने उससे कहा, “अब तुम मेरे शिष्य बनने के योग्य हो गये हो। मै आज शाम को ही तुम्हे दीक्षा दूंगा। अब तुम थोडा विश्राम करो। ऐसा कहकर जब गुर्जिएफ़ चलने लगे तो उस युवक ने उन्हें टोका और एक प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की।

उसने कहा, “गुरुदेव! ईश्वर को जानने में और पानी में डुबोने में क्या सम्बन्ध है? कृपया मुझे अपने ऐसा करने का कारण बतायें। गुर्जिएफ़ के अधरों पर एक मंद मुस्कान तैर गई। उन्होंने युवक से पूछा, “जब तुम पानी में डूबे हुए थे, तो उस समय तुम्हे कौन सी चीज सबसे ज्यादा प्यारी लग रही थी? युवक ने कहा, “उस समय मै बस साँस लेना चाहता था। तुम्हारे प्रश्न का भी यही उत्तर हैं।

डूबते समय जिस तरह तुम्हे केवल हवा लेने की ही चाहत थी, इसी तरह जिस दिन तुम्हारे ह्रृदय में केवल ईश्वर को पाने की चाहत जाग उठेगी, उसी दिन तुम्हे ईश्वर मिल जायेंगे। अपनी यही इच्छा हमेशा बनाये रखना और हाँ औस्पेंसकी, तुम्हारे उस दिन के प्रश्न का भी यही उत्तर है। इतना कहकर गुर्जिएफ़ अन्दर चले गये और उन दोनों की जिज्ञासा का समाधान भी हो गया।

“जो सत्कर्म करता है, आसक्ति से रहित है और किसी के प्रति वैर नहीं रखता, वह ईश्वर तक पहुँच जाता है।”
– स्वामी विवेकानंद

 

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