Best Hindi Story on Mercy of Lincoln

 

“दया वह भाषा है, जिसे बहरा सुन सकता है और अँधा देख सकता है।”
– मार्क ट्वेन

 

Mercy Quotes and Story in Hindi
सच्चा धर्म और कुछ नहीं बल्कि दया का दर्शन है

यह घटना अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रपतियों में से एक, अब्राहम लिंकन के जीवन से सम्बंधित है। एक बार वे अपने एक मित्र के साथ किसी सभा में जा रहे थे। अचानक रास्ते में, उन्हें एक गड्ढे में एक सूअर का बच्चा कीचड़ में फंसकर तड़पता हुआ दिखाई दिया। उसे बाहर निकालने के लिए अब्राहम लिंकन जैसे ही बग्घी से नीचे उतरने लगे, तो उनके मित्र ने उन्हें टोका, “यह आप क्या कर रहे हैं?

बिना कीचड़ में घुसे आप उसे बाहर नहीं निकाल सकेंगे और सभा में ऐसे गंदे कपड़ों में कैसे जाया जा सकता है? इसके अलावा सभा शुरू होने में भी बहुत ही कम समय बचा है। मेरी बात मानिये, अमेरिका के राष्ट्रपति को एक सूअर के बच्चे के बारे में इतनी चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है।” यह बात सुनकर लिंकन बड़े गंभीर हो गए और अपने मित्र से कहने लगे – “सभा मेरे बिना भी शुरू हो सकती है।

गंदे कपडे भी धुले जा सकते हैं, लेकिन इस कठिन समय में जहाँ एक प्राणी का जीवन दांव पर लगा हुआ है और जिस के लिए एक-एक पल कीमती है, निश्चय ही इससे बढ़कर दूसरा कोई कार्य मेरे या तुम्हारे लिए इस समय नहीं हो सकता कि हम उसकी हरसंभव सहायता करें। इसके अतिरिक्त, इस देश का राष्ट्रपति होने के नाते, यह मेरा प्रथम दायित्व भी बनता है कि प्रत्येक प्राणी के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करूँ।”

इतना कहकर लिंकन उस बच्चे को निकालने के लिए कीचड़ के तालाब में घुस गए। जाहिर सी बात है, उस काम में उनके सभी कपडे गंदे हो गए थे। लेकिन वापस न जाकर उन्होंने अपने हाथ-पैर धोये और कपडे साफ़ करके सभा में पहुंचे। उन्हें वहाँ पहुँचने में काफी देर हो गयी थी, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अचंभित था। क्योंकि हर कोई जानता था कि लिंकन समय के बहुत पाबंद हैं।

लेकिन उनके गंदे कपड़ों को देखकर लोगों को और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ। हर व्यक्ति उनके देर से आने और गंदे कपडे होने का कारण पूछता। लिंकन इस संबंध में चुप ही रहे, लेकिन उनके मित्र से सारी घटना का कारण जानकर, वहाँ उपस्थित जनसमुदाय के मन में अपने राष्ट्रपति के प्रति आदर का भाव और भी अधिक बढ़ गया।

उनका परिचय कराते हुए सभा के आयोजक ने कहा, “हमारे राष्ट्रपति कितने दयालु हैं। एक सूअर के बच्चे को गड्ढे में तड़पते देखकर उन्होंने अपने कपड़ों की परवाह किये बिना उसे तुरंत बाहर निकाल लिया।” वह वक्ता आगे कुछ और बोलता, उससे पहले ही लिंकन उठ खड़े हुए और बोले, “आप लोगों को कुछ ग़लतफ़हमी हुई है।

मैंने उस पशु की कोई मदद नहीं की है, बल्कि मैंने तो अपनी ही सहायता की है। वह बच्चा तड़प रहा था, इसलिए नहीं, बल्कि उसे तड़पता देखकर मैं स्वयं ही तड़पने लगा था। अतः उसके लिए नहीं, बल्कि मै अपने लिए गड्ढे में गया और उसे बाहर निकाल लिया।” सारी सभा परोपकार की इस उच्च भावना को देखकर आश्चर्यचकित रह गयी।

सेवाधर्म का वास्तविक स्वरुप कैसा हो, यह बात लोगों को उस दिन अच्छी तरह समझ में आ गई। लेकिन क्या सभी के ह्रदय में आदर्श की यह उच्च भावना जीवित है? हमारे समाज में ऐसे कितने लोग हैं, जो दूसरे की पीड़ा को देखकर द्रवित हो जाते हैं? कितने लोग हैं, जो दूसरों की मदद करने के बाद बदले में कुछ भी नहीं चाहते और इसे केवल कर्तव्यमात्र ही समझते हैं।

“दया वह वह सुनहरी जंजीर है जिससे सारा मानव समाज एक साथ बंधा हुआ है।”
– महात्मा गाँधी

 

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