Chanakya Niti Secrets: Happiness Tips in Hindi

 

“सुख हम पर ही निर्भर है, और इसे हासिल करने का सबसे अच्छा रास्ता उन चीज़ों की चिंता छोड़ने से है जो हमारी इच्छाशक्ति से बाहर की बात हैं।”
– एपिक्टेटस

 

Want Happiness, Stay Away from These People सुख चाहने वाले इनसे बचकर रहें : –

सुख पाने की इच्छा हर व्यक्ति के मन में समायी है, कोई भी इंसान दुःख नहीं पाना चाहता, लेकिन ये एक चक्र के रूप में हर व्यक्ति के जीवन में बारम्बार आते हैं। आचार्य चाणक्य ने चाणक्यनीति में अनेकों स्थानों पर ऐसे श्लोकों का वर्णन किया है, जिनमे बताया गया है कि जिन व्यक्तियों को सुख पाने की इच्छा हो उन्हें क्या करना चाहिये?

वैसे तो सुख पाने के लिये कई चीज़ों की आवश्यकता होती है, जिनमे एक बात यह भी शामिल है कि आप उन लोगों से दूर रहें जो आपका अहित कर सकते हैं। जो आपके शत्रु हैं और शत्रु ऐसे भी हो सकते हैं जो संबंधियों के रूप में आपके निकट ही रहते हों।

इसके अलावा आचार्य ने और भी कई अन्य महत्वपूर्ण बातों पर प्रकाश डाला है जिन्हें आप नीचे दिए जा रहे सूत्रों के माध्यम से जान सकते हैं। आशा है चाणक्यनीति के यह सूत्र आपके लिये निश्चित ही उपयोगी होंगे –

Secrets of Happiness and Pain सुख और दुःख का रहस्य : –

 

1. यस्मिन्देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमः कश्चित् वासं तत्र न कारयेत्॥

अर्थ – जिस देश में व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता; जहाँ आजीविका के साधन भी उपलब्ध न हों; और जहाँ उसके बंधु-बांधव(घर-परिवार के लोग व मित्र) भी नहीं रहते हों; उस देश में व्यक्ति का रहना उचित नहीं है; लेकिन यदि उस देश में विद्या-प्राप्ति के साधन भी नहीं हों, तो फिर वहाँ उस व्यक्ति को किसी भी कारण से नहीं रुकना चाहिये। उसे अविलम्ब उस देश को छोड़कर चले जाना चाहिये।

इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने यह बताया है कि व्यक्ति को किस स्थान पर निवास करना चाहिये। कोई भी व्यक्ति ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहता, जहाँ उसे आदर-सम्मान प्राप्त नहीं होता। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने आत्मसम्मान को खोकर नहीं जीना चाहेगा। यह प्रत्येक मनुष्य की सहज अभिलाषा है।

हर व्यक्ति को जीने के लिये आजीविका की आवश्यकता होती है और जिस स्थान पर यह उपलब्ध न होगी वहां कौन रहना चाहेगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और जन्म से लेकर मृत्यु तक वह अनेकों व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। कोई भी इंसान अपने मित्रों और प्रियजनों के बिना अधिक समय तक अकेला नहीं रहना चाहता।

मनुष्य केवल रोटी के लिये ही जीवित नहीं रहता, ज्ञान-प्राप्ति की लालसा उसके नैसर्गिक स्वभाव में है। और जहाँ विद्या की प्राप्ति का कोई भी साधन नहीं है, ऐसे स्थान पर किसी भी व्यक्ति को निवास नहीं करना चाहिये।

 

2. धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्य्स्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥

अर्थ – जिस देश में न तो कोई धनवान व्यक्ति हो; न ही कोई श्रोत्रिय ब्राहमण(विद्वान् व कर्मकांडी पुरोहित) हो; न ही कोई न्यायप्रिय राजा हो; न ही कोई नदी हो; और न ही कोई वैद्य हो; जहाँ पर ये पाँचों सुविधाएँ प्राप्त न हों, उस स्थान पर व्यक्ति को एक दिन भी निवास करना उचित नहीं है। आचार्य चाणक्य के ऐसा कहने का कारण यह है, क्योंकि जिस स्थान पर धनवान व्यक्ति ही नहीं होंगे, वहाँ पर धन आयेगा कहाँ से।

जीने के लिये व्यक्ति को आजीविका के रूप में धन की आवश्यकता होती है, जो केवल धनियों से ही मिल सकता है। देव पूजन, विवाह, संतान-जन्म और मृत्यु जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर तथा व्यक्ति को संस्कारवान और चरित्रवान बनाने के लिये जीवन में समय-समय पर अनेकों संस्कारों की आवश्यकता रहती है।

इसके अलावा मनुष्य को शिष्ट और शिक्षित बनाने के लिये एक विद्वान् की आवश्यकता भी होती है। जिसके लिये एक श्रोत्रिय की अनिवार्य रूप से जरुरत होती है। राज्य की शासन व्यवस्था के लिये और प्रजा की रक्षा के लिये एक न्यायप्रिय राजा का होना बहुत जरुरी है। इसी तरह नदी सभी के पीने के लिये, साफ-सफाई व सिंचाई करने के लिये जल की आपूर्ति करती है।

जब भी किसी व्यक्ति को रोग आ घेरता है, तो उस समय चिकित्सा से उसके प्राण बचाने केलिये वैद्य की आवश्यकता भी अनिवार्य रूप से होती है। इसीलिये व्यक्ति को सिर्फ उसी स्थान पर निवास करना चाहिये, जहाँ पर यह पाँचों उपलब्ध हों।

 

3. लोकयात्रा भय लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितम्॥

अर्थ – जहाँ के निवासियों में लोक-परलोक के प्रति कोई विश्वास न हो; जिन्हें ईश्वर और सामाजिक लोक-लाज का भी भय न हो; जिन्हें किसी प्रकार के कर्म करने में कोई लज्जा न आती हो; जहाँ के लोग चतुर न हों और न ही जिनमे त्याग की भावना हो, जहाँ ये पाँचों बातें हों, ऐसे स्थान पर मनुष्य को बिल्कुल निवास नहीं करना चाहिये।

इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते है कि मनुष्य को वहीँ पर निवास करना उचित है, जहाँ के निवासियों की लोक-परलोक में आस्था हो। जिन्हें गलत कर्म करने से भय लगता हो, जिनमे लज्जा व संकोच हो तथा जहाँ के व्यक्ति मूर्खतापूर्ण आचरण नहीं करते, बल्कि बुद्धिमानी से विचार करते हुए एक-दूसरे के हित के लिये त्याग करने को तैयार रहते हैं।

क्योंकि केवल ऐसे ही स्थान पर रहने से व्यक्ति सुखपूर्वक जीवन बिता सकता है। लज्जाहीन, भयहीन, मूर्ख और स्वार्थी व्यक्ति सदा दूसरों के लिये दुःख व कष्ट का ही कारण बनेगा, इसीलिये आचार्य ने उनसे बचने के लिये कहा है।

 

4. मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च।
दु:खितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोअप्यवसीदति॥

अर्थ – आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट और दुराचारिणी स्त्री का भरण-पोषण करने से तथा दुखी व्यक्तियों के साथ रहने से बुद्धिमान(पंडित) व्यक्ति को भी कष्ट हो सकता है। मनुष्य के लिये मूर्खता किसी अभिशाप से कम नहीं है। क्योंकि मूर्ख शिष्य किसी बात को न तो सही प्रकार से समझ सकता है और न ही उसका लाभ उठा सकता है।

बल्कि अपने अविवेकपूर्ण कार्यों से अपने परिवार, गुरु आदि के लिये अपमान और दुःख का कारण बनता है। इसी प्रकार से जिसकी भार्या दुष्ट प्रकृति की हो, उस व्यक्ति को गृहस्थ जीवन का कोई सुख नहीं मिल सकता। क्योंकि वह अपने कुत्सित कार्यों से न केवल अपने पति को बारंबार दुःख देती है, बल्कि उसके सामाजिक सम्मान को भी नष्ट कर देती है।

वह कृतघ्न की भांति पति से अपनी प्रत्येक इच्छा की पूर्ति तो कराती है, लेकिन न तो अपने किसी दायित्व का सही प्रकार से निर्वहन करती है और न ही उसे विवाहित जीवन का कोई सुखभोग प्रदान करती है। दुखी व्यक्तियों के साथ निरंतर रहने से व्यक्ति का अपना स्वयं का जीवन दुःख से भर जाता है। क्योंकि दुःख में मदद करने के लिए आपको उसके साथ रहना होगा, उसे ढाढस बँधाना होगा।

समय-समय पर आपको अपने आवश्यक कार्य छोड़कर उसकी मदद करनी होगी, अपने परिश्रम से उपार्जित धन-संपत्ति को उस पर खर्च करना होगा, जिससे आपका अपना जीवन भी दुःख से भर जायेगा। अतः सुख चाहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस तरह के लोगों के साथ रहने से अवश्य ही बचना चाहिये।

 

5. दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुराअवासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥

अर्थ – दुराचारी, दुष्ट स्वभाव वाला, बिना किसी उचित कारण के दूसरों को हानि पहुंचाने वाला और दुष्ट व्यक्ति से मित्रता रखने वाला, ऐसा व्यक्ति चाहे कोई श्रेष्ठ पुरुष ही क्यों न हो, वह भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह कहावत तो हम सभी ने सुनी ही है कि “एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है।” ठीक इसी प्रकार से दुष्ट व्यक्ति अपने और स्वयं से सम्बन्ध रखने वाले सभी लोगों का जीवन मुश्किल में डाल देता है।

क्योंकि अपने बुरे कर्मों के कारण उसका नष्ट होना तो निश्चित ही है, लेकिन जैसे गेहूँ के साथ रहने से घुन भी पिस जाता है उसी तरह उससे घनिष्टता रखने वाला व्यक्ति, चाहे वह उत्तम चरित्र का क्यों न हो अवश्य ही विपत्ति में फंस जाता है। इसलिये सुख के आकांक्षी व्यक्ति को इनसे हमेशा बचकर रहना चाहिये।

 

6. दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पों न दुर्जनः।
सर्पों दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे-पदे॥

अर्थ – इस श्लोक में आचार्य चाणक्य दुष्ट व्यक्तियों से बचने के लिये यह कहते हैं कि यदि दुर्जन और साँप में से किसी एक को चुनना पड़े, तो साँप को ही चुनना चाहिये। अगर कभी दुष्ट व्यक्ति और साँप में से किसी एक के साथ रहने का चुनाव करना पड़े, तो साँप के साथ रहना ज्यादा अच्छा है। लेकिन दुर्जन के साथ रहना एक पल भी अच्छा नहीं है।

क्योंकि साँप तो तभी काटेगा जब मृत्युकाल आयेगा, उससे पहले वह कुछ नहीं कहेगा। लेकिन दुष्ट व्यक्ति तो अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु पल-पल दुःख देगा। उसके साथ रहने से तो नित्य ही जीवन को खतरा है। इसीलिये आचार्य चाणक्य ने उसे सर्प से भी अधिक भयंकर मानते हुए उसे सर्वदा त्याज्य ही माना है। अतः जो सुख से रहना चाहते हों उन्हें दुष्टों के साथ कभी नहीं रहना चाहिये।

 

7. मूर्खस्तु परिहर्त्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिद्यते वाक्यशल्येन अदृष्टः कंटकम यथा॥

अर्थ – मनुष्य की तरह दो पैरों से युक्त होने पर भी मूर्ख व्यक्ति एक पशु के समान ही होता है। क्योंकि जिस प्रकार पशु बुद्धिहीन होता है, उसे उचित और अनुचित बातों के संबंध में कोई ज्ञान नहीं होता; उसी प्रकार मूर्ख को भी इस बात का ज्ञान नहीं होता कि उसे क्या कहना चाहिये और क्या करना चाहिये।

जिस तरह पैर के भीतर धंसा हुआ शूल(काँटा) बाहर से दिखाई न देने पर भी अंदर ही अंदर पीड़ा देता रहता है, उसी प्रकार से मूर्ख व्यक्ति भी अपने वचनों से और कार्यों से दूसरों को दुःख और पीड़ा ही देता रहता है। इसलिये जिन्हें सुख से रहने की इच्छा हो, उन्हें मूर्ख व्यक्तियों से सदा बचकर ही रहना चाहिये।

 

8. कुग्रामवासः कुलहीन सेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥

अर्थ – ऐसे ग्राम या स्थान पर निवास करना जहाँ न आजीविका का प्रबंध हो, न लोगों में सामाजिक समरसता की भावना हों और जहाँ दुष्ट, दुराचारी लोगों का निवास हो; किसी कुलहीन, आचारहीन नीच व्यक्ति की सेवा करना; केवल उच्छिष्ट, बासी और अरुचिकर भोजन का ही उपलब्ध होना; झगडालू और दुष्ट प्रकृति की पत्नी का मिलना; एक मूर्ख पुत्र का होना और घर में विधवा कन्या का निवास करना, ये छह चीज़ें मनुष्य के शरीर को बिना किसी अग्नि के हर समय जलाते रहते हैं।

न तो वह चैन से खा-पी सकता है और न ही चैन से सो सकता है। उसका जीवन एक दुखद यंत्रणा के समान हो जाता है। क्योंकि जहाँ आस-पास दुष्ट व्यक्तियों का निवास हो, कोई सहयोग करने को तैयार न हो, वहां रहना खतरे से खाली नहीं। यदि किसी व्यक्ति को मजबूरी में ऐसे आदमी की चाकरी करनी पड़ती हो जो दुष्ट, असभ्य और आततायी हो, तो उसके लिये इससे बढ़कर दुःख की बात कोई नहीं है।

क्योंकि वहां सम्मान खोकर काम करना पड़ता है। व्यक्ति भोजन के कारण ही जीवन धारण कर पाता है, यदि किसी व्यक्ति को परिश्रम करने के पश्चात भी खाने को पौष्टिक और शुद्ध भोजन न मिल सके, तो उसके लिये जीवन में इससे अधिक बुरा और क्या हो सकता है। जिस व्यक्ति की स्त्री अत्यंत क्रोधी स्वभाव की है, वह हमेशा अपने पति का सुख-चैन छीने रहती है।

उसकी सेवा-सहायता को भूल सदा उस पर प्रभुत्व जमाकर रखती है। ऐसे पुरुष को न तो कहीं सुख-शांति मिल सकती है और न ही वह चैन से जी सकता है। ऐसे ही जिस व्यक्ति का पुत्र मूर्ख हो और जिस व्यक्ति की पुत्री विधवा होकर घर में निवास करती हो, उसके लिये भी जीवन में समस्या और अपमान के अवसर बार-बार आते हैं।

उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। वह समाज में सिर उठाकर नहीं चल पाता। क्योंकि लोग उसकी संतान व उसकी हालत पर पीठ पीछे ख़ुशी मनाते हैं, मजाक उड़ाते हैं; जो उस व्यक्ति के लिये बहुत कष्टदायी होता है। अतः जिस व्यक्ति को सुख की कामना हो वह प्रयत्न करके इन दुखदायक परिस्थितियों से बचने का प्रयत्न करे।

 

9. नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुश्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

अर्थ – मनुष्यों में नाई, पक्षियों में कौआ, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों में मालिन को धूर्त माना गया है। क्योंकि ये सभी बिना किसी उचित कारण के ही दूसरों का कार्य बिगाड़ते हैं, सर्वदा अपने ही स्वार्थ की सिद्धि में लगे रहते हैं और दूसरों से ईर्ष्या करते हैं। इसलिये जो व्यक्ति सुख-शांति से रहना चाहता हो, उसे इन लोगों के साथ रहने से बचना चाहिये।

इस श्लोक के विषय में कुछ लोगों को शंका हो सकती है, विशेषकर प्रथम और अंतिम पद में। क्योंकि बाकी बीच के दोनों पदों के विषय में तो सभी जानते हैं कि कौवे और गीदड़ कितने धूर्त होते हैं। जब आचार्य के परीक्षा करने पर यह सत्य सिद्ध हुआ है, तो निश्चय ही प्रथम और अंतिम पद के विषय में उन्होंने जो कहा है, उस पर भी सभी व्यक्तियों को अवश्य विश्वास करना चाहिये।

 

10. पक्षिणां काक्श्चांडालः पशूनां चैव कुक्कुरः।
मुनीनां पाप्श्चांडालःसर्वेषां चैव निन्दकः॥

अर्थ – पक्षियों में सबसे अधिक दुष्ट और चांडाल (नीच) कौआ होता है। इसी प्रकार पशुओं में सबसे नीच कुत्ता होता है। मुनियों और साधुओं में सबसे अधिक चांडाल (नीच) वह होता है जो पाप कर्म करता है और सबसे बढ़कर चांडाल वह होता है जो दूसरों की निंदा करता है। आचार्य चाणक्य ने निंदक को सबसे बड़ा चांडाल यूँ ही नहीं बताया है।

चूँकि वह पीठ पीछे उस व्यक्ति की बुराई करता है जो वहाँ पर अपना पक्ष रखने के लिये उपस्थित ही नहीं होता, इसलिये वह नीच है। निंदा के पीछे एकमात्र उद्देश्य दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाकर उसकी प्रतिष्ठा का नाश करना होता है और इस पाप कर्म को करने के पीछे निंदक का व्यक्तिगत संतुष्टि का भाव रहता है।

जिस व्यक्ति की बुराई हो रही है वह चाहे निंदा का पात्र क्यों न हो, लेकिन फिर भी उसकी पीठ पीछे निंदा नहीं होनी चाहिये। क्योंकि धर्म की दृष्टि से ऐसा करना महान पाप है। हाँ, उसकी आलोचना अवश्य की जा सकती है, क्योंकि आलोचना सुधारात्मक होती है और उसमे व्यक्ति की कल्याण कामना निहित होती है।

“सुख बाह्य परिस्थितियों पर नहीं बल्कि अपने मन पर निर्भर है। सुखी रहने का मतलब है अपने आप को ऐसी चीज़ में डुबो देना जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करता है।”
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्ये

 

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