Chanakya Niti Life Building Secrets in Hindi

 

“आदर्श व्यक्ति जीवन में आने वाली आपात स्थितियों को गरिमा और अनुग्रह से सहता है, परिस्थितियों को सर्वोत्तम ढंग से उपयोग में लाते हुए।”
– अरस्तू

 

Life Secrets of Chanakya Niti in Hindi
चाणक्यनीति के गुप्त रहस्य जिन्हें आप पहले से नहीं जानते होंगे

Secrets of Chanakyaniti चाणक्यनीति के गुप्त रहस्य : –

चाणक्यनीति के इस लेख में भी पूर्व लेख की तरह अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्रों का उल्लेख किया गया है। जैसे – व्यक्ति के लिये क्या करना उचित है और क्या नहीं? उसे किन बातों को गुप्त रखना चाहिये और क्यों? जिसे लाभ पाने की आकांक्षा हो उसे क्या करना चाहिये आदि? क्योंकि यदि मनुष्य सफल होना चाहता है, तो उसे उचित और अनुचित का विचार करके ही कार्य करना चाहिये। नीचे दिए जा रहे श्लोक इसे और अधिक स्पष्ट करेंगे –

 

1. मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥

अर्थ – किसी कार्य के संबंध में मन में कोई योजना बनाने वाले को उसे वाणी से प्रकट नहीं करना चाहिये और जब तक उस योजना को कार्य रूप में परिणत नहीं कर दिया जाता, तब तक उसे गुप्त मंत्र के समान सुरक्षित रखना चाहिये।

 

2. सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम्।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

अर्थ – प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को इन छह बातों को यथासंभव गुप्त ही रखना चाहिये। किसी के पूछने पर भी यह बातें किसी से कहनी नहीं चाहियें, तभी व्यक्ति का कल्याण होता है। यह निम्न हैं – सिद्ध औषधि (जिसका प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता ); धार्मिक आचरण; अपने घर के दोष; मैथुन; कुभोजन और; बुरी बातें।

 

3. गृहीत्वा दक्षीणां विप्रास्त्यजन्ति यज्मानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

अर्थ – जिस प्रकार दक्षिणा प्राप्त करने के बाद पुरोहित यजमान के घर से चला जाता है; जिस प्रकार विद्या प्राप्त करने के बाद शिष्य गुरु के पास से चला जाता है; उसी प्रकार वन के जल जाने पर उसमे निवास करने वाले पशु-पक्षी उस वन को छोड़कर दूसरे वन में चले जाते हैं।

 

4. उद्योगे नास्ति दारिद्यं जपतो नास्ति पातकं।
मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥

अर्थ – उद्योग करने पर किसकी दरिद्रता दूर नहीं हो सकती; प्रभु का नाम जपने पर किसका पाप नष्ट नहीं हो सकता; चुप रहने पर कौन सा कलह समाप्त नहीं हो सकता और निरंतर जागने पर किसका भय नहीं समाप्त हो सकता। अर्थात सब कुछ दूर हो सकता है।

 

5. एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणः॥

अर्थ – साधना या तप के लिए एकांत पर्याप्त है; पठन-पाठन के लिए दो पर्याप्त हैं; गायन के लिए तीन पर्याप्त हैं; यात्रा के लिये चार व्यक्ति पर्याप्त हैं; खेत बोने के लिए पाँच व्यक्ति काफी हैं; लेकिन युद्ध करने के लिए बहुत लोगों की आवश्यकता होती है।

 

6. आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यम नायकम्॥

अर्थ – आलस्य के कारण और पर्याप्त अभ्यास के अभाव में प्राप्त विद्या भी नष्ट हो जाती है; दूसरे के हाथ में गया हुआ धन फिर लौटकर वापिस नहीं आता; थोडा बीज डालने से खेत नहीं फलता-फूलता; और सेनापति से रहित सेना विजय नहीं प्राप्त करती। आवश्यकता के समय

 

7. दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

अर्थ – दान से दरिद्रता का नाश होता है; चरित्र से दुर्गति का नाश होता है; प्रज्ञा(शुद्ध बुद्धि) से अज्ञान का नाश होता है और सदभावना से भय का नाश होता है।

 

8. वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढयेषु वृथा दीपो दिवाअपि च॥

अर्थ – सागर में वर्षा का होना व्यर्थ है; जो पहले से ही तृप्त हो ऐसे व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है; और धनी व्यक्ति को दान देना उसी प्रकार से व्यर्थ है जैसे दिन में सूर्य के प्रकाश में दीपक को जलाना व्यर्थ है।

 

9. धर्मं धनं च धान्यं च गुरौर्वचनमौषधम्।
सुगृहीतं च कर्तव्यमन्यथा तु न जीवति॥

अर्थ – धर्म (यज्ञ-अनुष्ठान, देव पूजा); धन, धान्य( अन्न ); गुरु का वचन और औषधि इन पाँच का प्रयोग व्यक्ति को बहुत सोच-समझकर करना चाहिये; अन्यथा गलत प्रयोग के कारण, जीवन तक से हाथ धोना पड सकता है।

 

10. पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च।
श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥

अर्थ – पैरों को धोने से बचा हुआ; पीने से बचा हुआ (जूठा जल); और सन्ध्या करने से बचा हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान त्याज्य है। जो भी व्यक्ति इस प्रकार के जल का सेवन कर लेता है, उसे अपनी शुद्धि के लिये चान्द्रायण व्रत करना चाहिये।

 

11. नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गंधलेपनम्।
आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यांपि श्रियं हरेत्॥

अर्थ – नाई के घर जाकर हजामत बनवाने वाला, पत्थर की देव प्रतिमाओं पर चन्दन का लेप लगाने वाला और जल में अपनी ही परछाई देखने वाला व्यक्ति चाहे वह इंद्र के समान ही प्रतिष्ठित और संपन्न क्यों न हो, शीघ्र ही शोभाहीन हो जाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य का गौरव नष्ट करने वाले इन कार्यों से बचना चाहिये।

“एक संतोषी मन किसी व्यक्ति के लिये वह सबसे बड़ा वरदान है, जिसका आनंद वह इस संसार में उठा सकता है।”
– जोसफ एडिसन

 

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