Life Changing Secrets of Chanakya Niti in Hindi

 

“जीवन क्षणभंगुर है, संसार भी नष्ट हो जाने वाला है। यह जानकार जो बोधपूर्वक जीता है, उसके सारे दुःख तिरोहित हो जाते हैं।”
– आचार्य विनोबा भावे

 

Chanakya Niti Secrets in Hindi
पढिये चाणक्यनीति के न भूलने योग्य अत्यन्त महत्वपूर्ण सूत्र

Principles of Chanakya Niti चाणक्य नीति के सिद्धांत : –

शायद ही संपूर्ण भारत में ऐसा कोई शिक्षित व्यक्ति हो जो आचार्य चाणक्य के नाम से परिचित न हो। एक असाधारण विद्वान्, परम चतुर व्यक्ति, महान कूटनीतिज्ञ, एक महान वंश के संस्थापक और एक निस्पृही ब्राहमण के रूप में उनका बहुयामी व्यक्तित्व आज भी भारतीय जनमानस के लिये आदर्श है। अपने बुद्धिबल और अचूक कूटनीति से ही उन्होंने एक आततायी राजवंश का अंत करके एक ऐसे राजवंश की स्थापना की जो सच्चे अर्थों में प्रजा का हितैषी था।

उनके ही प्रयासों से भारत पर विदेशियों का आधिपत्य स्थापित न होने पाया। इतिहास में आचार्य चाणक्य जैसी अलौकिक प्रतिभा और अपूर्व बुद्धिबल वाले ऐसे विद्वान् शायद उँगलियों पर गिनने लायक ही हुए होंगे, जिन्होंने मनुष्य के जीवन और व्यक्तित्व का इतनी गहनता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया हो।

संपूर्ण संसार में प्रसिद्द अपनी अद्भुत कृति ‘चाणक्यनीति’ में उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन का ज्ञान भर दिया है। जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसका विवरण इस पुस्तक में न हो। उनके सूत्र पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि कैसे उन्होंने इन सूक्ष्म बातों की परीक्षा की होगी। कई बातें तो बिल्कुल अबूझ और रहस्यमय ही प्रतीत होती हैं।

जिन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि यदि आचार्य जैसे विद्वान् ने इनका वर्णन न किया होता, तो शायद ही कोई उन बातों पर विश्वास करता। चूँकि उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी वह उस समय थीं, इसीलिये हमें यह उचित प्रतीत होता है कि संपूर्ण “चाणक्यनीति” के सूत्रों को विषयानुसार जीवनसूत्र के पाठकों के समक्ष रखा जाय, ताकि वे भी उनसे लाभ उठा सकें।

Life Transforming Formulas जीवन रूपांतरित करने वाले सूत्र : –

क्योंकि मूल पुस्तक में जो सत्रह अध्याय दिए गये हैं, उनमे एक ही अध्याय में अनेकों विषयों का वर्णन है, जिससे एक ही विषय से संबंधित समस्त सूत्रों का ज्ञान हो पाना असंभव है। लेकिन हमारी ओर से यही प्रयास रहा कि अपने पाठकों को एक ही स्थान पर सभी सूत्रों का व्याख्या सहित अनुवाद उपलब्ध करवाया जाय, जिससे उन्हें इधर-उधर न भटकना पड़े।

पर यह कार्य अत्यंत दुष्कर था। क्योंकि इसके लिये संपूर्ण चाणक्यनीति का अध्ययन कर अलग-अलग दिए सूत्रों को एक स्थान पर इकठ्ठा करना था, इसलिये काफी अधिक समय लग गया। कुछ सूत्र ऐसे भी रहे जो विलक्षण थे और जिन्हें किसी अन्य विषय के साथ नहीं दिया जा सकता था। ऐसे सूत्रों को हमने इस अध्याय और इससे अगले लेख में देने का निश्चय किया है।

बाकी को विषयानुसार अलग-अलग लेखों में बाँट दिया गया है, जिससे पढने में आसानी रहे। इस कार्य में निश्चित ही कुछ भूलें रहीं होंगी जिनके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। यदि वें आपकी दृष्टि में आयें, तो कृपया उनकी ओर ध्यान दिलाने की कृपा करें। आशा है यह महान ग्रन्थ अवश्य ही आपके लिये उपयोगी सिद्ध होगा –

 

1. शैले शैले न मानिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

अर्थ – जैसे हर पर्वत पर मणि व माणिक्य प्राप्त नहीं होते; उसी तरह प्रत्येक हाथी के मस्तक से गजमुक्ता मणि प्राप्त नहीं होती। जैसे हर जगह सज्जन पुरुष नहीं मिलते; उसी तरह सभी वनों में चन्दन नहीं मिलता।

2. निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यज्येत्।
खगाः वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाभ्यागतो गृहम्॥

अर्थ – जिस तरह वेश्या अपने प्रेमी को निर्धन होने पर छोड़ देती हैं; उसी तरह प्रजा हारे हुए और अपमानित राजा को त्याग देती है। जिस तरह पक्षी फलों से रहित सूखे वृक्ष को छोड़कर चले जाते हैं; ठीक उसी तरह अतिथि को चाहिये कि वह भी भोजन-सत्कार के पश्चात गृहस्थ के घर को त्याग दे।

3. कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरंतरम्॥

अर्थ – इस संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके कुल में कोई न कोई दोष या अवगुण न हो; इस संसार में ऐसा कौन है जो कभी किसी रोग से पीड़ित न हुआ हो; इस दुनिया में ऐसा कौन है जिसे कभी किसी व्यसन ने न घेरा हो और इस संसार में ऐसा कौन है जिसे सदैव सुख ही मिला हो। अर्थात ऐसा कोई इंसान नहीं है।

4. आचारः कुल्माख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
सम्भ्रमः स्नेह्माख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥

अर्थ – व्यक्ति के आचरण से उसके कुल का पता चलता है; भाषण अर्थात उसके वार्तालाप से उसके देश का पता चलता है; व्यक्ति के मन के भावों से उसके स्नेह का पता चलता है और उसके शरीर से उसके भोजन की मात्रा का पता चलता है।

5. त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत्॥

अर्थ – संपूर्ण कुल की रक्षा के लिए एक व्यक्ति की; संपूर्ण ग्राम की रक्षा के लिए एक कुल की; संपूर्ण प्रदेश की रक्षा के लिए एक ग्राम की; और अपनी रक्षा के लिए संपूर्ण पृथ्वी का भी त्याग करना पड़े, तो निःसंकोच कर देना चाहिये।

6. अतिरुपेण वै सीता अतिगर्वेंण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धों ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्॥

अर्थ – सीता अत्यधिक सुन्दर थी। उनके अद्भुत रूप लावण्य के कारण ही रावण ने उनका हरण कर लिया था। यदि वह इतनी अधिक सुन्दर न होती, तो शायद तब लंकेश भी उन्हें पाने के लिये इतना उत्सुक नहीं होता; रावण बहुत ज्यादा अभिमानी था। उसकी पत्नियों, भाइयों, मंत्रियों और रिश्ते-नातेदारों ने उसे इतना समझाया, पर उसने किसी की नहीं सुनी।

उसने अपने शत्रु के प्रबल पराक्रम को स्वयं अपनी आँखों से देखा था, लेकिन अपने गर्व की गुरुता को न छोड़ने के कारण वह कुल सहित मारा गया। राजा बलि बहुत दानी था और अपने शौर्य से देवताओं को भी आतंकित करता रहता था। दान की इसी अति के कारण उसने अपने गुरु की बात भी नहीं मानी और छल से वामन का रूप धरकर आये भगवान् ने उसकी समस्त राज्यलक्ष्मी का हरण कर लिया।

इस तरह अति के कारण इन लोगों को इतना अधिक कष्ट उठाना पड़ा। आचार्य चाणक्य इस श्लोक के माध्यम से यही सन्देश देते हैं कि किसी भी मनुष्य को कहीं पर भी किसी वस्तु की अति नहीं करनी चाहिये, अन्यथा व्यक्ति को बहुत दुःख उठाना पड सकता है।

“बुद्धिमान व्यक्ति जब चाहे तब सीख सकता है, पर मूर्ख तभी सीखता है जब उसके लिए ऐसा करना जरुरी होता है।”
– आर्थर वैलेस्ले

 

Comments: आशा है यह लेख आपको पसंद आया होगा। कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव देकर हमें यह बताने का कष्ट करें कि जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!