7 Wonders of Ancient World in Hindi – Part 2

 

“कल्पना सभी आविष्कारों और नवीनताओं की माँ है। यह एक अदभुत योग्यता है जो सभी मनुष्यों को मिली है ताकि जो संभव प्रतीत होता है उससे ऊपर सोच सकें और उन अनुभवों को महसूस कर सकें जिन्हें हमने पहले कभी नहीं बांटा है।”
– अज्ञात

 

Great Wonders of The World in Hindi
प्राचीन स्थापत्यकला का शानदार नमूना थे यह सात महान आश्चर्य

7 Wonders of The Ancient World दुनिया के 7 अदभुत आश्चर्य : –

7 Wonders of Ancient World in Hindi: प्राचीन विश्व के महान आश्चर्य में आपने प्राचीन विश्व के तीन महान आश्चर्यों के विषय में पढा ही होगा। निश्चित रूप से से आपको इनके बारे में यह सब जानकार अच्छा लगा होगा। प्राचीन विश्व कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में भी कितना अग्रणी रहा है, यह हमें इतिहास से पता चलता है।

और शायद हम मस्तिष्क पर थोडा जोर डालकर यह समझ सकें कि अगर हमें अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के विषय में कुछ भी ज्ञात न होता, तो क्या हम आज उन्नति के इस स्तर तक पहुँच सकते थे? क्या आश्चर्य, कल्पना, उमंग के भाव हमारे मन में पैदा हुए होते?

और क्या फिर हम असंभव को संभव करने की ओर क्रियाशील हुए होते? निःसंदेह नहीं। इस वेबसाइट पर इस प्रकार के विषय पर लेख लिखे जाने का बस यही कारण है। अब आप बाकी चार आश्चर्यों के विषय में पढिये और अतीत के रहस्मयी सागर में विचरण कीजिये।

4. Statue of Zeus at Olympia ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति, यूनान : –

यूनान में स्थित ज़ीउस की प्रसिद्ध मूर्ति का निर्माण महान यूनानी शिल्पकार फिडियस ने ओलंपिया नामक स्थान पर किया था। यह वही स्थान है जहाँ पर ईसा से लगभग 550 वर्ष पूर्व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हुई थी। फिडियस ने ही एथेंस में पार्थेनन और एथेना की भव्य मूर्ति का निर्माण किया था और जिसे सिर्फ प्राचीनकाल का ही नहीं, बल्कि अभी तक हुए सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकारों में से एक माना जाता है।

इस भव्य और विशाल मूर्ति का निर्माण ईसा से लगभग 435 वर्ष पूर्व हुआ था और मंदिर को 466 ईसा पूर्व और 456 ईसा पूर्व के कालखंड के दौरान बनाया गया था। यह मूर्ति यूनानियों के देवता ज़ीउस की है, जिसे प्राचीन यूनानी साहित्य में बिजली का देवता बताया गया है। इस प्रतिमा में ज़ीउस को उसके सिंहासन पर बैठा हुआ दर्शाया गया था।

और उसकी त्वचा को हाथी के दांत से निर्मित और कपड़ों को गढ़े हुए सोने से सजाया गया था। उसके शरीर का उपरी हिस्सा नग्न था और धड के नीचे उसने मूल्यवान वस्त्र पहने हुए थे। यह मूर्ति वास्तव में लकड़ी से बनी हुई थी, न कि सोने से, जैसा कुछ लोग मानते हैं। सिंहासन पर प्रभुत्व की मुद्रा में बैठे जीउस को उसके हाथों में करीने से गढ़े दो स्फिंक्स थामे दिखाया गया था।

यह वह पौराणिक जीव हैं जिसका सिर और छाती तो एक स्त्री का था, लेकिन जिसका शरीर शेर का और पंख एक पक्षी जैसे थे। 40 फीट की यह मूर्ति इतनी लम्बी थी कि इसका सिर मंदिर की छत को स्पर्श करता था। इस मूर्ति के निर्माण में कलाकार ने जिस अद्भुत कला का प्रदर्शन किया है, वह निःसंदेह आश्चर्यजनक और मुग्ध करने वाली है।

लगभग 12 मीटर ऊँची इस मूर्ति को उन उपासकों के अंदर भय को प्रेरित करने के लिए बनाया गया था, जो ओलंपिया में स्थित ज़ीउस के इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते थे। हालाँकि हर कोई इस मूर्ति से भयभीत नहीं होता था। स्ट्रेबो ने लिखा है – “भले ही मंदिर बहुत बड़ा और आकर्षक था।

लेकिन मूर्तिकार की इस बात के लिए आलोचना हुई थी कि उसने प्रतिमा के निर्माण में सभी अंगों को एक उपयुक्त अनुपात में क्यों नहीं बनाया? उसने जीउस को बैठे हुए दिखाया था, लेकिन उसका सिर छत को छू रहा था। जिसका तात्पर्य यह निकाला गया कि यदि देवता जीउस खड़े होकर चले, तो मंदिर बिना छत का ही हो जायेगा।

एक दंतकथा के अनुसार जब शिल्पकार फिडियस ने मूर्ति का निर्माण कार्य समाप्त करने के पश्चात देवता ज़ीउस से उनकी अनुमति का प्रतीक-चिन्ह माँगा; तो थोड़ी ही देर पश्चात मंदिर आकाशीय बिजली(तडित) के प्रकाश से चमकने लगा था। देवता ज़ीउस के आशीर्वाद स्वरुप उस भव्य प्रतिमा ने ओलंपिया के मंदिर को 800 वर्षों से भी अधिक समय तक अपनी आभा से उज्जवल किये रखा।

इस मूर्ति का विनाश कैसे हुआ था, इसके विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार जब सारी दुनिया में ईसाईयत का प्रभाव बढ़ रहा था, तो कुछ उन्मादी शासकों ने ईसाई धर्म के फैलाव में एक अवरोध समझकर इस मूर्ति को मंदिर के सहित नष्ट कर दिया था।

वहीँ कुछ अन्य लेखकों का यह मानना है कि रोम के शासक ने ईसाई पादरियों के बहकावे और दबाव में आकर चौथी सदी(400 A. D.) में इस मंदिर को बंद करवा दिया और इस मूर्ति को कांस्टेंटिनोपोल के एक मंदिर में भिजवा दिया था। जहाँ कुछ वर्षों बाद लौसीयन की एक भीषण आग में डलवाकर इस अद्भुत प्रतिमा को नष्ट करवा दिया गया और इस तरह एक और महान आश्चर्य सदा के लिए इस संसार से चला गया।

5. Mausoleum at Halicarnassus हेलिकारनासस का मकबरा, तुर्की : –

हेलिकारनासस के विशाल मकबरे का निर्माण ईसा से 351 वर्ष पूर्व फारसी साम्राज्य के छत्रप मौसुल की याद में, उसकी प्रिय पत्नी आरटेमीसिया II ने करवाया था। मौसुल एशिया मायनर में कार्निया का राजा था। जिसकी मृत्यु ईसा से 353 वर्ष पूर्व(353 B.C.) हुई थी और उसी ने हेलीकारनासस शहर को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया था।

मौसुल आरटेमीसिया का भाई भी था (मुस्लिम समुदाय में ऐसा प्रचलन है) और उसकी दिली इच्छा थी कि इतने महान राजा के अंतिम विश्राम स्थल के लिए कोई अद्भुत स्थान होना ही चाहिये। कहा तो यह भी जाता है कि मौसुल की मौत पर आरटेमीसिया इतनी ज्यादा दुखी थी कि उसने मौसुल के शरीर की भस्म को पानी में घोलकर पी लिया था और फिर गुम्बद के निर्माण का आदेश दिया था।

आरटेमीसिया की मृत्यु भी, मौसुल की मौत के 2 वर्ष पश्चात ही हो गयी थी। 351 ईसा पूर्व जब वह मरी तो उसकी चिता की भस्म भी मौसुल की भस्म के साथ उसी गुम्बद में रखी गयी थी। उस समय के इतिहासकार “प्लिनी द एल्डर” के अनुसार आरटेमीसिया की मृत्यु के पश्चात भी गुम्बद का निर्माण कार्य चलता रहा, क्योंकि शिल्पकार अपनी साम्राज्ञी के प्रति श्रद्धावनत थे।

वे यह मानते थे कि शायद यह कार्य उन्हें भी चिरयश दिलाने में सफल रहेगा। जिस स्थान पर यह गुम्बदनुमा मकबरा स्थित था आज वह जगह तुर्की के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित बोडरम शहर में पड़ती है। इस मकबरे को गुम्बद के स्वरुप में बनाया गया था और यह विशाल मकबरा पूरी तरह सिर्फ सफ़ेद संगमरमर से बना था। इसकी ऊंचाई 41 मीटर यानि 135 फुट थी।

इसका मुख्य आकर्षण इसका जटिल ढाँचा और सुन्दर नक्काशी थी। जो तीन आयताकार परतों से मिलकर बनी थी, जिसमे लिसियन, यूनानी और मिस्री वास्तुशैली की झलक थी। इसे बहुत ही उम्दा कारीगरी से अलंकृत करते हुए सजाया गया था जिसे उस समय के सर्वश्रेष्ठ शिल्पकारों ने अंजाम दिया था। पहली परत सीढियों का एक 60 फुट का आधार था।

उसके पश्चात बीच की परत में 36 एक समान ऊंचाई के खूबसूरत खंभे लगे थे और फिर उनके ऊपर एक सीढ़ीदार पिरामिड जैसी छत थी। अंत में सबसे ऊपर गुम्बद था, जिसे चार शिल्पकारों ने खूबसूरती से सजाया था। इसके अलावा चार घोड़ो वाले रथ का एक बीस फुट संगमरमर पर उकेरा चित्र था।

यह मकबरा डेड हजार वर्षों से भी अधिक समय तक बना रहा। लेकिन समय गुजरने के साथ यह कमजोर होता चला गया और बाहरवीं-तेहरवीं सदी के पश्चात सन 1490-1494 में लगातार आये शक्तिशाली भूकम्पों ने इसे जमींदोज कर दिया।

6. Colossus of Rhodes रोडेज की विशाल मूर्ति, यूनान : –

रोडेज की विशाल मूर्ति (कोलोसस ऑफ़ रहोड़स) का निर्माण 292 ईसा पूर्व और 280 ईसा पूर्व(292–280 BC) की अवधि में रोड्स निवासियों ने किया था। यह सूर्य देवता हेलियोस(जिसे रोड्स द्वीप का संरक्षक देवता माना जाता है) की काँसे से निर्मित एक प्रतिमा थी। यह 110 फुट ऊँची थी और जिसे रोड्स बंदरगाह के मुहाने पर स्थापित किया गया था।

इस मूर्ति का निर्माण तब आरम्भ हुआ था जब 304 ईसा पूर्व मेसेडोनिया का राजा डेमीट्रिअस युद्ध की पहल करने के बावजूद रोड्स के निवासियों से हार गया था। डेमीट्रिअस अपने बहुत सारे औजार और हथियार वहीँ पर छोड़कर भाग गया और रोड्स के निवासियों ने उन्हें बेचकर बहुत धन कमाया। जिसका इस्तेमाल उन्होंने एक विशालकाय मूर्ति को बनाने में किया।

इसका खाका उस समय के मशहूर शिल्पकार चरेस ने तैयार किया था। 12 वर्षों में तैयार हुई यह विशाल मूर्ति प्राचीनकाल की सबसे ऊँची प्रतिमा मानी जाती थी, पर यह प्रतिमा प्राचीन विश्व के सातों आश्चर्यों में सबसे कम समय तक ही स्थिर रह सकी। 54 वर्ष पश्चात 226 ईसा पूर्व (226 BC) रोड्स में आये एक भूकंप में सूर्य देव की यह प्रतिमा घुटनों के बल गिर पड़ी।

और फिर दोबारा कभी इसका पुनर्निर्माण नहीं हो सका। यह एक भग्न अवशेष के रूप में लगभग 800 वर्ष तक रोड्स की जमीन पर ही पड़ी रही। पर इस स्थिति में भी इस प्रतिमा में इतना आकर्षण था कि लोग दूर-दूर से इस आश्चर्य को देखने आते रहे। उस समय के इतिहासकारों ने इसके विषय में लिखा है कि सारी दुनिया में इस प्रतिमा के जैसी विशाल, भारी और कला के अद्भुत कौशल से भरी कोई संरचना नहीं थी।

ईसा के 600 वर्ष पश्चात रोड्स के निवासियों ने दूसरे देशों से आये हुए सौदागरों के हाथों इस प्रतिमा के अवशेषों को अनुपयोगी वस्तु समझकर बेच दिया। इसलिये इस मूर्ति की वर्तमान स्थिति के विषय में कोई भी पुरातत्व विशेषज्ञ कुछ नहीं जानता।

7. Lighthouse of Alexandria अलक्जेंडरिया का प्रकाश स्तम्भ, मिस्र : –

अलक्जेंडरिया के प्रकाश स्तम्भ का निर्माण ईसा से 280 वर्ष पूर्व मिस्र के अलक्जेंडरिया नामक स्थान पर हुआ था। यह प्रकाश स्तम्भ अलक्जेंडरिया शहर के निकट एक छोटे से द्वीप फरोस पर स्थित था। एक यूनानी वास्तुविद सोसट्रतोस ने इस प्रकाश स्तम्भ का डिजाईन तैयार किया था और वहाँ के शासक टॉलमी I के शासनकाल में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ था।

यह प्रकाश स्तम्भ मनुष्य द्वारा निर्मित संसार की तीसरी सबसे ऊँची इमारत थी, जिसकी ऊंचाई लगभग 134 मीटर या 440 फुट थी इसकी रौशनी का स्रोत, वास्तव में एक दर्पण था, जो सुबह के समय तो सूर्य की किरणें और रात्रि के समय आग को परावर्तित करता था। इस प्रकाश स्तम्भ की रौशनी को समुद्र में 35 मील दूर से भी देखा जा सकता था।

यह नील नदी से गुजरने वाले जहाजों को शहर के व्यस्त बंदरगाह में प्रवेश करने में और वहां से बाहर निकलने में मदद करता था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने कुछ प्राचीन काल के सिक्कों पर उभरे इस प्रकाश स्तम्भ के चित्रों को देखकर इसकी संरचना का अनुमान लगाया है। संरचना के आधार पर हम इस प्रकाश स्तम्भको तीन भागों में बाँट सकते हैं।

पहला यह कि इसका आधार चौकोर था, बीच में यह अष्टकोणीय स्तर का था और तीसरा इसकी छत बेलनाकार थी। इन सबके ऊपर एक सोलह फुट ऊँची मूर्ति स्थापित थी जिसकी अधिकांशतः यही सम्भावना यही है कि यह मूर्ति या तो टॉलमी की है या फिर सिकंदर महान की, जिसके नाम पर इस शहर का नामकरण किया गया था।

इस प्रकाश स्तम्भ की वास्तविक ऊंचाई के बारे में कई मतभेद हैं। इसकी ऊंचाई 300 फुट से लेकर 600 फुट तक बताई गई है, पर अधिकांश का यही मानना है कि इसकी ऊंचाई 400 फुट थी। जिन लोगों ने इस प्रकाश स्तम्भ को इसकी वास्तविक शोभा में देखा था उन्होंने इसके बारे में कहा था – ” इसकी सुन्दरता को बयाँ करने के लिये हमारे पास शब्द नहीं हैं।

धरती पर शायद ही कोई चीज़ इतनी विस्मयकारी हो।” 1700 से भी अधिक वर्षों तक यह प्रकाश स्तम्भ अपने प्रकाश के जरिये हजारों जहाजों को रास्ता दिखाता रहा। लेकिन दसवीं शताब्दी, फिर चौदहवीं शताब्दी और फिर पंद्रहवीं शताब्दी में बार-बार आये भूकम्पों के कारण यह कमजोर होता चला गया और अंत में सन 1480 में यह पूरी तरह से ही नष्ट हो गया।

इस प्रकाश स्तम्भ के कुछ अवशेष नील नदी में भी पाये गये थे। और इस तरह हम देखते हैं कि किस तरह से प्राचीनकाल के ये अदभुत आश्चर्य एक के बाद एक विनष्ट होते चले गये और हम इनके उस अद्भुत स्वरुप का दीदार करने से वंचित हो गये जिसके कारण इनकी ख्याति हजारों वर्षों तक दिग-दिगांतरों में व्याप्त रही।

“यदि आप एक जहाज बनाना चाहते हैं, तो लोगों को लकड़ी लाने के लिए, काम बांटने के लिए और आदेश देने के लिए नगाड़ा पीटकर इकठ्ठा मत कीजिये। इसके बजाय उन्हें अत्यंत विस्तृत और अंतहीन समुद्र के लिए ललकारना सिखाइए।”
– एंटोनी डी सेंट एक्सुपेरी

 

Comments: आशा है यह लेख आपको पसंद आया होगा। कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव देकर हमें यह बताने का कष्ट करें कि जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!