Seven Wonders of Ancient World in Hindi

 

“कल्पना सृजन की शुरुआत है। आप उसकी कल्पना कर सकते हैं जिसे आप चाहते हैं और तब आप वह होंगे, जो आप कल्पना करते हैं और आखिर में आप उसकी रचना कर लेंगे, जो आप करना चाहते हैं।”
– जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

 

7 Wonders of Ancient World in Hindi
यह हैं प्राचीन विश्व के सात महान आश्चर्य

7 Wonders of Ancient World प्राचीन विश्व के 7 अदभुत आश्चर्य : –

सन 2000 से लेकर 2007 तक चलने वाले एक लम्बे अभियान के बाद आखिरकार विश्व के सात नये आश्चर्यों का चुनाव हो ही गया। इन सात नये आश्चर्यों के विषय में सभी कुछ न कुछ जानते ही हैं। लेकिन बचपन में सिर्फ स्कूल में ही पढने के कारण, शायद ही आज हमें प्राचीन विश्व के सात महान आश्चर्यों के विषय में कुछ ज्ञात हो। ये सात अजूबे आज प्राचीन काल की कला और वास्तुशैली का बेजोड़ उदाहरण रहे होते।

यदि इन्हें संघर्ष, विध्वंस और अनियंत्रित महत्वाकांक्षा का शिकार न होना पड़ा होता। संसार के सात आश्चर्य या यूँ कहे कि पुरानी दुनिया के सात आश्चर्य जो मानवीय सभ्यता के अद्भुत कला कौशल, कल्पनाशीलता और अध्यवसाय का मूर्तिमान प्रतीक हैं। अनेकों इतिहासकारों ने इन सात अजूबों का अपने-अपने तरीके से वर्णन किया है।

लेकिन इनमे सबसे प्रख्यात हैं – बाईजेंटीयम के फिलो (Philo of Byzantium) जिन्होंने ईसा से 225 पूर्व अपनी पुस्तक “विश्व के सात आश्चर्य” में इनका वर्णन किया था। अन्य लोगों में सिडोन के एंटीपेटर (Antipater of Sidon) और हेरोडोटस प्रमुख हैं, ये सभी यूनानी साहित्यकार थे।इन सभी सात पुराने आश्चर्यों में एक बात बहुत सामान्य है कि ये सभी सात आश्चर्य भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ही पड़ते हैं।

जो देश भूमध्य सागर के समुद्री तट पर स्थित हैं ये सभी वहीँ अवस्थित थे, जैसे – यूनान, मिस्र, तुर्की और अन्य देश। पर यह बड़े दुःख की बात है कि इन सात पुरातन आश्चर्यों में से आज मात्र एक गीजा का पिरामिड ही बचा है जो कि सभी अजूबों में सबसे अधिक पुराना है, बाकी छः आश्चर्य काल के गर्त में समा चुके हैं। यहाँ इन आश्चर्यों का कालानुक्रम से वर्णन किया जा रहा है। आशा है इनके बारे में जानना एक रोमांचकारी अनुभव होगा।

1. Great Pyramid of Giza गीजा के महान पिरामिड, मिस्र : –

इन गगनचुम्बी और अत्यंत विशाल पिरामिडों का निर्माण 2584 ईसा पूर्व और 2561 ईसा पूर्व (2584-2561 B.C.) के बीच हुआ था। यह भीमकाय पिरामिड मिस्र की राजधानी काहिरा के उत्तर में नील नदी के तट पर स्थित हैं। यह पिरामिड न केवल संसार के सभी आश्चर्यों में सबसे अधिक प्राचीन हैं, बल्कि वह एकमात्र आश्चर्य है जो आज चार हजार वर्षों के बाद समय के अनगिनत थपेडे खाते हुए भी अविचलित खड़ा है।

वैसे तो यहाँ छोटे-बड़े कई पिरामिड हैं, पर इन सभी पिरामिडों में गीजा के पिरामिड सबसे भव्य, प्राचीन, विशालतम और स्थापत्य कला का नायाब नमूना हैं। ये तीन पिरामिड हैं, जिनका निर्माण मिस्र के चार अलग-अलग शासकों ने लगभग बीस वर्ष के दौरान कराया था। इन्ही राजाओं के नाम पर, जिन्हें वहां की भाषा में फ़राओ कहा जाता है, इन पिरामिडों का नामकरण किया गया है।

इनके नाम हैं – खुफु, खफरा और मेनकौरा। इन पिरामिडों को मिस्र के शासकों ने अपने समाधि स्थल (शाही मकबरा) के रूप में चुनकर अपने जीवनकाल में ही इनका निर्माण कराया था, क्योंकि वे मृत्यु के पश्चात काल के जीवन में विश्वास रखते थे। इन तीनों में सबसे बड़ा और सबसे भव्य है खुफु, जो लगभग 13 एकड़ भूमि में फैला है।

और जिसमे लगभग बीस लाख ऐसे विशाल पत्थर लगे हैं जिनमे से प्रत्येक का वजन 2 टन से लेकर 30 टन तक है। इन पिरामिडों का विशाल आकर ही लोगों को स्तब्ध नहीं करता, बल्कि इनकी बारीक नक्काशी, पूर्ण प्रतिसाम्य भी लोगों को अचंभित किये नहीं रहता। जो कि इस बात से प्रकट होता है कि इतने विशाल और भारी पत्थरों का उपयोग किये जाने के बाद भी इनमे अंगुली प्रविष्ट कराने तक को स्थान नहीं है।

और आज से लगभग चार हजार वर्ष पूर्व जब विज्ञान और तकनीक का स्तर शायद इतना उच्च नहीं था, टनों वजनी और भीमकाय पत्थरों को आखिर किस प्रकार से ढोकर लाया गया होगा और उन्हें इतनी अधिक ऊंचाई तक पहुँचाया गया होगा। निश्चय ही इस रहस्य को जानना आज भी हमारी कल्पनाशक्ति के बाहर की बात है।

इसीलिये न केवल पर्यटक, बल्कि वैज्ञानिक, इंजिनियर और भवन निर्माण विशेषज्ञ तक इन पिरामिडों को देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं और यह मानने को विवश हो जाते हैं कि वास्तव में यह पिरामिड उस गौरव के हकदार हैं जो इन्हें 4500 वर्षों तक मानव निर्मित इमारतों में सबसे अधिक ऊँचे स्मारक होने पर, अपने अत्यंत विशाल आकर, बेजोड़ कला-कौशल और प्रकृति की दुस्तर विभीषिकाओं को सतत झेलकर ही मिल पाया है। क्या इससे अद्भुत भी कुछ हो सकता है?

2. Hanging Gardens of Babylon बेबीलोन के झूलते बगीचे, इराक : –

प्राचीन यूनानी कवियों के अनुसार बेबीलोन के झूलते बगीचों का निर्माण, बेबीलोन के शासक नेबुचाडनेज्जर II ने अपनी पत्नी को उपहार स्वरुप देने के लिये ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व (600 B.C.) यूफ्रतेस नदी के निकट कराया था। आजकल यह स्थान इराक के हिल्ला नामक स्थान पर पड़ता है। लेकिन कई इतिहासकार इसे सिर्फ एक मिथक ही मानते हैं।

क्योंकि हेरोडोटस जो इतिहास के जनक के रूप में प्रसिद्ध है, उसने बेबीलोन के इतिहास में कहीं भी इनका वर्णन नहीं किया है। लेकिन प्राचीन लेखकों दिदोरस, फिलो और इतिहासकार स्त्राबो ने यह दावा किया है कि ये बगीचे ईसा के 100 वर्ष बाद भी तब तक मौजूद थे जब तक इन्हें एक शक्तिशाली भूकंप ने नष्ट नहीं कर दिया था।

कहा जाता है कि नेबुचाडनेज्जर II की पत्नी जिसे “मिडिया (ईरान का उत्तर-पश्चिम भाग) की अम्तिस” के नाम से जाना जाता है, अपने गृहप्रदेश में स्थित वनों, फूलों और पर्वतों को अक्सर याद किया करती थी और बेचैन रहती थी। इसलिये बादशाह के आदेशानुसार बेबीलोन में ही एक पर्वत और सुन्दर वन्य प्रदेश का निर्माण किया गया।

ये बगीचे एक विशाल ईंटों के चढावदार चबूतरों की श्रंखला के आधार पर हवा में लगभग 75 फुट की ऊंचाई तक झूलते रहते थे। इन्हें आकर्षक और लुभावना बनाने के लिये इनमे सुन्दर व सुगन्धित पेड़-पौधे लगाये गये थे और अनेकों सुन्दर वन्य जीव भी इनमे विहार करते थे। बाद के लेखकों ने तो यह भी लिखा है कि कैसे लोग इन सुन्दर बगीचों के नीचे चहलकदमी कर सकते थे, जो पत्थरों के ऊँचे खम्भों पर टिके हुए थे।

आधुनिक वैज्ञानिक मानते हैं कि इस प्रकार के बगीचे का अस्तित्व तभी संभव हो सकता है, जब एक एकीकृत सिचाईं व्यवस्था हवा में स्थित बगीचे को निरंतर पानी देने में सक्षम रही हो। लेकिन चूँकि इन बगीचों का वर्णन बेबीलोन के इतिहास में कहीं पर नहीं किया गया है, इसलिये वैज्ञानिक और विद्वान लेखक इन बगीचों को एक पौराणिक कथा का हिस्सा ही मानते हैं।

3. Temple of Artemis at Ephesus एफेसस में आर्टेमिस का मंदिर, तुर्की : –

एशिया मायनर की एक ग्रीक कालोनी एफेसस में बने आर्टेमिस के मंदिर को यूनानियों द्वारा निर्मित एक और महान आश्चर्य कहा जाय तो कुछ गलत नहीं होगा। और जब यह निर्माण उस देवी के लिये किया जा रहा हो जिसे प्राचीन यूनानी साहित्य में सौंदर्य, वैभव और प्रभुत्व की देवी माना गया है और जिसकी तुलना में आ सकने वाला कोई और नहीं, बल्कि वह स्वयं यानि आर्टेमिस ही हो, तब उस कृति के सर्वोत्तम, और आकर्षक होने में कोई संदेह नहीं रह जाता।

वास्तव में यहाँ केवल एक मंदिर नहीं बल्कि कई वेदियाँ और मंदिर बने, लेकिन कला के दुश्मनों ने यहाँ एक के बाद एक मंदिर उजाड़े। लेकिन एफेसस के निवासियों ने अद्भुत जिजीविषा का परिचय देते हुए उनका पुनर्निर्माण किया। आज यह स्थान आधुनिक तुर्की के पश्चिमी तट पर एक यूनानी बंदरगाह शहर(पोर्ट सिटी) है।

इन सभी रचनाओं में सबसे प्रसिद्ध, सबसे सुन्दर, और सबसे विशाल संगमरमर से बने वे दो मंदिर थे, जिनका निर्माण ईसा से 550 वर्ष पूर्व और 330 वर्ष पूर्व (550 B.C. और 330 B.C.) हुआ था। इन मंदिरों को सौंदर्य, भव्यता और विशालता का वह स्तर पाने में, जिसके लिए ये आज तक प्रख्यात है, लगभग 120 वर्ष लगे थे लेकिन नष्ट होने में सिर्फ एक ही दिन लगा।

और यह कितना दुखद है कि कला की अमूल्य और नायाब रचना का देदीप्यमान प्रतीक रहे इन मंदिरों का आज कोई अवशेष तक नहीं बचा है। साढ़े पाँच सौ (550 B.C.) वर्ष पूर्व जब इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ था, तब उस समय इस मंदिर की ऊंचाई 129 मीटर (425फीट) और चौड़ाई 69 मीटर यानि 225 फुट थी। यह 18 मीटर (60फुट) ऊँचे 127 खम्भों पर टिका हुआ था।

हेरोडोटस के अनुसार पहले मूल मंदिर का निर्माण लीडिया के धनवान शासक क्रोएसस ने करवाया था, जिसने इन्हें सुन्दर और भव्य बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। मंदिर इतना आकर्षक था कि इसकी प्रत्येक संरचना का वर्णन उसी तरह के आश्चर्यपूर्ण भाव से किया गया जैसा कि इसे सामने देखकर होता था

हर कोई इस बात से सहमत था कि यह दुनिया की उन सबसे अदभुत रचनाओं में से एक है जिनका निर्माण मनुष्यों ने किया था। ईसा से 356 वर्ष पूर्व हेरोस्ट्रेटस नामक एक क्रूर शासक ने इस नगर पर आक्रमण किया और उसे बुरी तरह लूटा, पर वह इतने पर ही नहीं रुका। जब उसने कला की इस अद्भुत कृति को देखा तो एक बार तो वह भी इसके सौंदर्य पर मुग्ध हो गया, पर फिर शाश्वत ख्याति पाने के एक बुरे विचार ने उसे भटका दिया।

उसका मानना था कि संसार उस व्यक्ति को हमेशा याद रखेगा जो इतनी सुन्दर रचना को नष्ट करेगा। चिरकाल के यश के लोभ में आकर उसने मंदिर में आग लगवा दी और उसे पूरी तरह नष्ट करवा दिया। कहते है कि जब वह इस मंदिर को तुडवा रहा था, तो सारे एफिसस वासियों ने शाप दिया कि न तो इतिहास में उसका नाम कहीं दर्ज किया जायेगा और न ही संसार उसे कभी याद करेगा।

लेकिन बाद में इतिहासकार स्ट्रेबो ने इस घटना को मंदिर के इतिहास में एक जरुरी बिंदु समझकर दर्ज कर लिया। जिस रात मंदिर को जलाया गया था, उसी रात सिकंदर महान का जन्म हुआ था। आगे चलकर सिकंदर ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण की इच्छा एफेससवासियों से जताई, लेकिन उन्होंने उसकी मदद लेना अस्वीकार कर दिया।

आगे चलकर जब सिंकंदर की मृत्यु हो गयी, तब उसी स्थान पर जहाँ पहला मंदिर नष्ट किया गया था, एक दूसरे मंदिर का निर्माण हुआ, लेकिन यह उतना भव्य नहीं था जितना पहला। हालाँकि यह भी बहुत सुन्दर और आकर्षक था, क्योंकि इसकी रचना भी पहले मंदिर जैसी ही थी, पर यह अपने पूर्ववर्ती की तुलना में छोटा था।

दूसरे मंदिर का निर्माण कार्य ईसा से 323 वर्ष पूर्व पूरा हुआ और यह लगभग 600 वर्षों तक अस्तित्व में बना रहा। पर सन 262 ई0 में जब ओस्ट्रोगाथ ने एफेसस पर आक्रमण किया, तो उसने इस विख्यात मंदिर का फिर से विध्वंस करा दिया और इतिहास की एक और बेशकीमती धरोहर लुटेरों और क्रूर व्यक्तिओं का शिकार बनकर सदा के लिए इतिहास में ही दफ़न हो गयी।

आगे नीचे दिये गये link में पढिये बचे हुए प्राचीन चार महान आश्चर्यों के विषय में –

मनुष्य की असीम सामर्थ्य का प्रमाण हैं यह 7 प्राचीन अदभुत आश्चर्य

“जानना वास्तव में कुछ भी नहीं है। कल्पना ही सब कुछ है।”
– अल्बर्ट आइंस्टीन

 

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