What is The Goal of Yoga in Hindi

 

“सन 2018 के एक योग अध्ययन के अनुसार, अमेरिका में 3.5 करोड़ से भी ज्यादा लोग लोग का अभ्यास करते हैं और अभ्यासीगण योग से संबंधित उत्पादों और कोचिंग क्लास पर, हर साल 15 अरब डॉलर से भी ज्यादा पैसा खर्च करते हैं।”

 

Yoga in Hindi
योग के अविश्वसनीय लाभ जानकार आप दंग रह जायेंगे

What is Yoga in Hindi क्या है योग

योग भारत की एक प्राचीन विधा/दर्शन है जो मनुष्य के अस्तित्व के तीनों घटक, शरीर, मन और आत्मा को कुछ विशेष शारीरिक मुद्राओं, प्राण के नियमन और एकाग्रता के माध्यम से जोड़कर, उसे अपनी दिव्यता पहचानने का दुर्लभ और अमूल्य अवसर प्रदान करती है। योग सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम से कहीं ज्यादा है, जिसे आज मात्र इतने तक ही सीमित करके मानवजाति को धोखा देने का काम किया जा रहा है।

योग के विषय में भ्रम फैलाकर, उन्हें उस बेशकीमती लाभ से वंचित किया जा रहा है जिस पर प्रत्येक मनुष्य का सहज अधिकार है। योग के गूढ़ अर्थ और उसके दर्शन को सही प्रकार से समझे बिना, अज्ञानपूर्वक सिर्फ योगासनों और अविधिपूर्वक किये गये प्राणायाम में उलझकर रह जाने से न सिर्फ योग का स्वरूप ही विकृत हो गया है, बल्कि उसके अविश्वसनीय और अद्भुत लाभ भी लोगों की पहुँच से बाहर हो गये हैं।

वह जीवनशैली जो योग जैसी महान विद्या का आश्रय पाकर, मनुष्य के लिये सर्वोत्तम सुख, संतोष और आनंद के द्वार खोल देती, अज्ञात ही रह जाती है। इसीलिये आज हम आपको योग के स्वरुप और उसके महत्व से अच्छी तरह परिचित कराएँगे। योग भारत के षड दर्शनों में से एक है और शायद सबसे ज्यादा प्रसिद्ध भी। योग संस्कृत का शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति युज धातु से हुई है जिसका सामान्य अर्थ है – जुड़ना, मिलना, योग करना।

योग का तात्विक अर्थ

इस प्रकार पूर्ण और आध्यात्मिक परिपेक्ष्य में देखा जाय, तो योग शब्द का तात्विक अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से योग कराना, आत्मा को परमात्मा से मिलाना। योग के प्रणेता यानि आदि आचार्य, भगवान हिरण्यगर्भ हैं, उन्ही के सूत्रों के आधार पर महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन का निर्माण किया है। योग क्या है, इसकी व्याख्या महर्षि पतंजलि ने इस एक सूत्र में कर दी है –

योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।।

अर्थ: चित्त की वृत्तियों का निरोध करना अर्थात उन्हें रोकना ही योग है।

क्योंकि चित्त में उठने वाले संस्कारों को शांत किये बिना, मनुष्य कभी भी अपने वास्तविक स्वरुप को जानकर उसमे प्रतिष्ठित नहीं हो सकेगा और उसके जीवन की यह सारी भाग-दौड़, सारे दुःख, सारी ख़ट-पट इसी अज्ञानता के कारण है कि आज तक वह अपने स्वरुप को नहीं पहचान पाया है। व्यवहार में कहें तो योग का अर्थ है – स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाना अर्थात बाहर से अंतर्मुख होना।

अंतर्मुख होने का अर्थ है – अपनी समस्त वृत्तियों का, अपने चित्त में उठने वाले सभी संस्कारों का गहन आत्मनिरीक्षण करना। क्योंकि उन पर पैनी दृष्टि रखे बिना, हम स्वयं को उनसे अलग करके नहीं देख सकेंगे। मीर्चा एलीयाडे, योग के बारे में कहते हैं कि यह सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं है, एक आध्यात्मिक तकनीक भी है। योग वास्तव में क्या है, इसका विशेष वर्णन हमने Yoga Meaning in Hindi में किया है, इसीलिये इस लेख को ध्यान से पढ़ें।

Historical Background of Yoga in Hindi

History of Yoga in Hindi योग का इतिहास

योग उन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक साधनाओं के समूह का बोधक है जिसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। इसका इतिहास 10,000 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। पिछले हजारों वर्षों में हिन्दू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में योग के अनेकों विद्यालयों, और साधनाओं का विकास हुआ है। योग का वर्णन सबसे प्राचीन वेद, ऋग्वेद में भी हुआ है।

हजारों वर्षों तक योग भारत में ही फला-फूला, बाद में भारत के महान योगियों ने, इसका प्रचार भारत से बाहर करते हुए, पश्चिम को योग से परिचित कराया। जिसका सर्वाधिक श्रेय जाता है, महान स्वामी विवेकानंद को, जिन्होंने 19वीं सदी के अंत में संसार को भारत की अतुल्य देन, अपनी असाधारण प्रतिभा और गहन अनुभव के साथ प्रदान की थी।

उनके बाद योगानंद परमहंस, स्वामी रामतीर्थ, बीकेएस अयंगर, महेश योगी और कुछ अन्य महान विभूतियों ने इस परंपरा को आगे बढाया। सन 1980 में योग शारीरिक व्यायाम के तंत्र के रूप में पाश्चात्य जगत में प्रसिद्ध हो गया, लेकिन दुखद रूप से संसार ने इसके भारतीय स्वरुप, अर्थात योग के आध्यात्मिक पक्ष को भुला दिया। 1 दिसंबर 2016 को योग को यूनेस्को ने अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की।

विश्व योग दिवस और भारतीय योग

भारत सरकार के प्रयासों से हर साल 21 जून का दिन विश्व योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। 21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया था। इस अवसर पर 192 देशों जिनमे 47 मुस्लिम देश भी शामिल थे, में योग दिवस का आयोजन किया गया था। देश की राजधानी दिल्ली में 35,985 लोगों ने एक साथ योगाभ्यास किया था। इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।

इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बनाकर ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में अपना नाम दर्ज कराया। पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के एक साथ योग करने का बना, तो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का।

पिछले कई वर्षों से कई अध्ययनों ने योग की सामर्थ्य का कुछ विशेष प्रकार की बीमारियों जैसे कि कैंसर, दमा, ह्रदय रोग, सिजोफ्रेनिया के उपचार में परीक्षण किया है और इनके परिणाम कुछ मिश्रित से रहे हैं। लेकिन इतना अवश्य है कि योग किसी भी रोग को जल्दी ठीक करने में निर्विवाद रूप से मददगार सिद्ध हुआ है।

Types of Yoga in Hindi योग के प्रकार

महर्षि पतंजलि ने अपने ग्रन्थ में जिस योग की चर्चा की है, उस योग के आठ अंग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। आरम्भ के पांच अंग योग के बहिरंग साधन और अंतिम तीन योग के अन्तरंग साधन हैं। आठ अंगों या विभागों के कारण ही पातंजल योग को अष्टांग योग भी कहते हैं। योग के मुख्य रूप से तीन अंतर्विभाग किये जाते हैं – कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।

जिसमे कर्मों में अनासक्त रहते हुए योग का अभ्यास किया जाता है, योग की उस विधा को कर्मयोग; जिसमे चित्त की वृत्तियों को सब ओर से हटाकर सिर्फ अपने इष्ट पर केन्द्रित किया जाता है, उसे भक्तियोग और जिसमे इस बात का ज्ञान हर समय बना रहता है कि मै अकर्ता हूँ, अर्थात गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, उसे ज्ञानयोग कहते हैं।

क्रियायोग के नाम से प्रचलित योग की अन्य शाखा कर्मयोग के ही अंतर्गत आती है। इन तीनों से इतर हिन्दू धर्म में योग के दो अन्य विभाग भी प्रचलित हैं, जिन्हें हठ योग और लय योग के नाम से जाना जाता है। हठयोग के प्रणेता महायोगी श्री गोरखनाथ जी महाराज माने जाते हैं, लेकिन योग का जो स्वरुप सबसे प्रमुख और सबसे प्रसिद्ध हैं, वह अष्टांग योग ही है। इसे राजयोग अर्थात राजाओं का योग भी कहते हैं।

वैसे तो योग के उपर हिन्दू धर्म में अनेकों ग्रन्थ लिखे गये हैं, लेकिन उनमे से यह तीन ही सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं – योगसूत्र, योगवाशिष्ठ, और श्रीमद्भागवद्गीता। इसमें भी श्रीमद्भागवद्गीता तो विशेष रूप से प्रसिद्ध है, क्योंकि इसका वर्णन भगवान कृष्ण के माध्यम से स्वयं परम चेतना ने किया है। प्रमुख योग ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं –

Elements of The Patanjal Yoga in Hindi

अष्टांग योग के आठ अंग

योग के इन आठों अंगों के अनुष्ठान से चित्त की मलिनताओं और अशुद्धियों का नाश होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है। कोई मनुष्य योग के इन अंगों का जितना अधिक पालन करता जाता है, उतनी ही क्लेश की निवृत्ति और ज्ञान के प्रकाश की अधिकता होती जाती है। पुरुष के योगारूढ़ होने पर ज्ञान पर प्रकाश इतना तीव्र हो जाता है कि उसमे आत्मा का स्वरूप स्पष्ट नजर आता है।

1. Yama in Hindi यम है योग का आधार

यम योग की सबसे बहिर्मुख अवस्था है और बहिर्मुखता की सबसे अंतिम अवस्था, मनुष्य का अन्य सभी प्राणियों के साथ व्यवहार है। इसलिये सबसे पहले अपने व्यवहारिक जीवन को यमों द्वारा सात्विक और दिव्य बनाना होता है। इससे वह सकाम कर्म जो जन्म, आयु और भोग के कारण है, निवृत्त हो जाते हैं। यमों की संख्या पाँच है जो इस प्रकार हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।

यह पाँच यम, पाँच महाव्रत है और इनमे से किसी एक की भी सम्यक सिद्धि योगी के लिये उस प्रचंड और अटल शक्ति का द्वारा खोल देती है जिसके बारे में हम सुनते चले आये हैं। सत्य तो यह है कि यमों का सही प्रकार से पालन किये बिना कोई भी योग की सिद्धि को हासिल नहीं कर सकता है और न ही समाधि की अवस्था का लाभ कर सकता है।

यमों का पालन करने से ही कोई व्यक्ति पाप से अछूता रह सकता है और योगमार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इसीलिये राजयोग के अभ्यासियों के लिये इनका पालन करना अनिवार्य है। यम को योग का आधार/नींव और प्रथम चरण इसीलिये कहा गया है, क्योंकि इनके बिना योग की सिद्धि दुष्प्राप्य है। यमों का विस्तार से वर्णन हमने एक अन्य लेख में किया है, उसे भी अवश्य पढ़ें।

2. Niyama in Hindi योग का दूसरा अंग है नियम

नियम योग का दूसरा अंग हैं। नियमों का संबंध केवल अपने व्यक्तिगत शरीर, इन्द्रियों तथा अंतःकरण के साथ होता है। इनके पालन से व्यक्ति के समग्र प्राकृत अस्तित्व की शुद्धि होती है और समस्त अशुद्धियों व मलों के दूर हो जाने से उसका जीवन पवित्र, सात्विक और दिव्य बन जाता है। नियमों की संख्या भी पाँच है – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।

नियमों का प्रतिपादन इसलिये किया गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को संयमी बनाते हैं और उसकी इच्छाशक्ति को दृढ करते हैं। नियमों का पालन किये बिना यमों का पालन लगभग असंभव ही है, इसीलिये जो योगमार्ग पर चलने की इच्छा रखते हों, उन्हें इन पाँचों नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करना चाहिये। इन नियमों के बारे में हमने विस्तार से दूसरे लेख में लिखा है।

3. Asanas in Hindi योगासन के प्रकार

आसन योग का तीसरा अंग है और इनका सम्बन्ध शारीरिक क्रिया से है। इसके द्वारा शरीर की रजरूप चंचलता और अस्थिरता तथा तमरूप आलस्य और प्रमाद हटकर शरीर में सात्विक प्रकाश और दिव्यता उत्पन्न होती है। योग शरीर की अशक्तता, जड़ता और रोगजन्य निर्बलता को दूर करने में बड़े प्रभावी हैं।

प्रमुख योग ग्रंथों, जिनमे कि हठ योग प्रदीपिका और घेरंड संहिता भी शामिल हैं, में लगभग 1,000 से भी ज्यादा योगासनों का वर्णन किया गया है। चूँकि स्वास्थ्य लाभ और शक्ति अर्जन के लिये किसी भी आसन को कम से कम 5 मिनट का समय नियत है, इसीलिये कोई भी व्यक्ति एक ही समय में इतने सारे आसनों का प्रयोग नहीं कर सकता है।

इस कारण से प्राचीन और आधुनिक योगाचार्यों ने शरीर के लिये सबसे महत्वपूर्ण आसनों की एक संक्षिप्त सूची बनायीं जिसमे लगभग 60 से 70 योगासनों को विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। क्योंकि यह शरीर के प्रत्येक अंग को गतिशील बनाने के साथ-साथ, उसकी निर्बलता और रोग को दूर करने की भी क्षमता रखते हैं। इन आसनों के नाम इस प्रकार हैं –

लम्बे समय तक सुखपूर्वक बैठने वाले आसन (ध्यान योग्य)

1. स्वस्तिकासन
2. सिद्धासन
3. समासन
4. पद्मासन
5. बद्धपद्मासन
6. वीरासन
7. गोमुखासन
8. वज्रासन
9. सरलासन

चित लेटकर करने के आसन

10. पादांगुष्ठ-नासाग्र-स्पर्शासन
11. पश्चिमोत्तासन
12. सम्प्रसारण भू-नमनासन
13. जानुशिरासन
14. आकर्ण-धनुषासन
15. शीर्ष पादासन
16. ह्रदयस्तम्भासन

17. उत्तानपादासन – इसके नौ भेद बताये गये हैं
द्विपाद-चक्रासन
उत्थित द्विपादासन
उत्थित एकैक-पादासन
उत्थितहस्त-मेरुदंडासन
शीर्षबद्धहस्त-मेरुदंडासन
जानुस्पृष्टभाल-मेरुदंडासन
उत्थितहस्तपाद-मेरुदंडासन
उत्थितपाद-मेरुदंडासन
भालस्पृष्ट द्विजानु-मेरुदंडासन

18. हस्त-पादांगुष्ठासन
19. स्नायु-संचालनासन
20. पवन-मुक्तासन
21. उर्ध्व-सर्वांगासन
22. सर्वांगासन (हलासन)
23. कर्णपीड़ासन
24. चक्रासन
25. गर्भासन
26. शवासन (विश्रामासन)

पेट के बल लेटकर करने के आसन

28. मस्तक-पादांगुष्ठासन
29. नाभ्यासन
30. मयूरासन
31. भुजंगासन (सर्पासन)
32. शलभासन
33. धनुरासन

बैठकर करने के आसन

35. मत्स्येन्द्रासन
36. वृश्चिकासन
37. उष्ट्रासन
38. सुप्त वज्रासन
39. कन्द-पीड़ासन
40. पार्वती-आसन
41. गोरक्षासन
42. सिंहासन
43. वकासन
44. लोलासन
45. एक-पादांगुष्ठासन

पद्मासन लगाकर करने के आसन

46. उर्ध्व पद्मासन
47. उत्थित पद्मासन
48. कुक्कुटासन
49. गर्भासन
50. कूर्मासन
51. मत्स्यासन
52. तोलांगुलासन
53. त्रिबंधासन

खड़े होकर किये जाने वाले आसन

54. ताड़ासन
55. गरुडासन
56. द्विपाद-मध्यशीर्षासन
57. पादहस्तासन
58. हस्त-पादांगुष्ठासन
59. कोणासन
60. त्रिकोणासन
61. उत्तानासन
62. सूर्य नमस्कार

4. Pranayama in Hindi प्राणायाम

प्राणायाम योग का चौथा अंग है। इसमें प्राण की गति को रोककर अथवा धीमा करके शरीर की आन्तरिक गति (प्राण) को सात्विक (दिव्य) बनाया जाता है। योगसूत्र के अनुसार, आसन के स्थिर होने पर, श्वास-प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम है। प्राणायाम कहने से रेचक, पूरक और कुम्भक की क्रिया समझी जाती है। साँस को बाहर निकालकर उसकी स्वाभाविक गति का अभाव करना रेचक प्राणायाम है।

साँस को अंदर खींचना पूरक प्राणायाम है और साँस लेने और छोड़ने, यह दोनों क्रियाएँ बंद करके प्राण को एकदम जहाँ का तहाँ रोक देना, कुम्भक प्राणायाम है। इस कुम्भक के भी दो भेद होते हैं – बाह्य कुम्भक और अन्तः कुम्भक। प्राणायाम की क्रियाओं की भिन्नता से कुम्भक आठ प्रकार का होता है –

अनुलोम-विलोम, सूर्यभेदी, भस्त्रिका, भ्रामरी, उज्जायी, शीतली, मूर्च्छा और प्लाविनी। इनके अलावा नाडीशोधन और कपालभाति भी प्राणायाम के कुछ अन्य प्रकार हैं। लेकिन राजयोग के अभ्यासियों के लिये चतुर्थ प्राणायाम का उपदेश किया जाता है, जिसमे बाहर-अन्दर के विषय को फेंका जाता है, पर इसका ज्ञान गुप्त और गुरुगम्य ही है।

5. Pratyahara in Hindi प्रत्याहार

प्रत्याहार योग का पाँचवा अंग है। प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों को आलस्य, प्रमाद और संसार के प्रति व्यर्थ की बहिर्मुखता से शून्य करके अंतर्मुख किया जाता है, ताकि वह सात्विक होकर, चित्त के शोधन में सहायक हों। प्रत्याहार से इन्द्रियों की व्यर्थ और अनुपयोगी चेष्टाओं तथा बुरी आदतों को निर्मूल करने में सहायता मिलती है।

6. Dharana in Hindi धारणा

धारणा योग का छठा अंग है और योग का प्रथम अन्तरंग साधन भी। धारणा द्वारा चित्त के रजस और तमस मल को हटाया जाता है और उसे सात्विक रूप में वृत्ति मात्र से किसी एक विषय (ध्येय) में ठहराया जाता है, ताकि उसकी दिव्यता/निर्मलता को बढ़ाया जा सके। धारणा में ध्याता, ध्यान और ध्येय इन तीनों का ज्ञान बना रहता है।

7. Dhyana in Hindi ध्यान

जब ध्येय वस्तु या विषय में चित्त इस प्रकार से लीन हो जाता है कि उस विषय के अलावा अन्य किसी चीज की स्मृति न हो और रजस तथा प्रमाद उत्पन्न करने वाला कोई क्लिष्ट संस्कार न उपजे, तो उसे ध्यान कहा जाता है। ध्यान में सिर्फ ध्याता और ध्येय इन दोनों का ज्ञान रहता है।

8. Samadhi in Hindi समाधि

जिस विषय को लक्ष्य बनाकर (ध्येय) ध्यान किया जा रहा है, जब चित्त उसमे इतना तल्लीन हो जाता है कि ध्याता और ध्यान दोनों का ज्ञान लुप्त हो जाय, तो उस अवस्था को समाधि कहते हैं। दूसरे अर्थों में जब ध्यान तैलधारावत अखंड रूप से कम से कम एक पहर तक चलता रहे, तो ध्यान की उस परिपक्व अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि में चित्त ध्येयाकार रूप से भासता है।

समाधि की भी चार अवस्थाएँ होती है जिनका वर्णन हमने अगले लेखों में किया है। योगी का लक्ष्य समाधि की सर्वोच्च अवस्था में पहुंचकर, पुरुष का साक्षात्कार करना है और यही योग का भी उद्देश्य है, सिर्फ शरीर को रोगमुक्त और ताकतवर बनाना नहीं।

Ultimate Benefits of The Yoga in Hindi

अविश्वसनीय हैं योग के लाभ

पिछले कई वर्षों से पाश्चात्य जगत में योग की लोकप्रियता लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इन्सान हो, जो योग से बिल्कुल ही अपरिचित हो। यहाँ तक कि चिकित्सक, वैज्ञानिक और सेलेब्रिटी भी योग के अविश्वसनीय प्रभावों से हैरत में पड़े हुए हैं और तो और जिम में वर्कआउट करने वाले लोगों के अन्दर भी योग के लिये जबरदस्त क्रेज हैं।

चूँकि यौगिक क्रियाएँ शरीर के स्वास्थ्य के लिये चमत्कारिक रूप से फायदेमंद हैं, इसीलिये आज हम आपको योग के लाभों के बारे में भी बताएँगे, ताकि आपका शरीर और मन स्वस्थ रहकर, मानव जीवन के उद्देश्य को पूरा कर सके।

शरीर के सभी अंगों को स्वस्थ और सबल रखता है योग

1. इलिनोइस विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, योगाभ्यास आपके मस्तिष्क को नवजीवन प्रदान करता है। क्योंकि योगासन और प्राणायाम के माध्यम से आपके Brain तक न सिर्फ प्रचुर रक्त आपूर्ति पहुँचनी सुनिश्चित होती है, बल्कि ऑक्सीजन युक्त प्राणवायु भी निर्बाध और तेज ढंग से मस्तिष्क कोशिकाओं की अशुद्धियों को दूर कर देती है। इसके अतिरिक्त योग आपके मस्तिष्क को विपरीत परिस्थितियों के बीच भी शांत रखता है, जिससे मानसिक संतुलन सही रहने से आपका यह अंग क्षतिग्रस्त होने बच जाता है।

2. योग आपके उदर और आँतों को स्वस्थ रखता है। कई अध्ययनों में यह सिद्ध हुआ है कि नियमित रूप से योगाभ्यास करने वाले पुरुषों और स्त्रियों का Gastrointestinal Tract बेहतर तरह से अपना काम करता है। कुछ शोधों की मानें तो जो लोग प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं, उनमे दर्द सहने की क्षमता उन लोगों से कहीं ज्यादा होती है, जो इसका अभ्यास नहीं करते हैं। दर्द सहने की क्षमता के अतिरिक्त क्रोनिक पेन की कुछ घटनाएँ जैसे कि कमर दर्द आदि की समस्याएँ, प्रतिदिन योग करने वाले लोगों से प्रायः दूर ही रहती हैं।

3. परिसंचरण तंत्र की तरह कम श्वसन दर होने का अर्थ है कि आपके फेफड़ें पर्याप्त क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से आपकी साँस लेने और छोड़ने की क्षमता नियंत्रित होती है, जिससे न सिर्फ आपकी फिटनेस सुधरती है, बल्कि फेफड़ें भी स्वस्थ, बलशाली और जीवाणुओं से मुक्त हो जाते हैं। बॉल स्टेट यूनिवर्सिटी की एक छोटी स्टडी में पता चला है कि 15 सप्ताह तक हठयोग का अभ्यास करने से फेफड़ों की वाइटल कैपेसिटी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी होती है।

4. प्रतिदिन योगाभ्यास करने से आपकी पल्स रेट सामान्य बनी रहती है जिससे आपका दिल भी स्वस्थ रहता है। नाडी दर कम होने का अर्थ है कि आपका दिल इतना शक्तिशाली है कि कम धड़कने पर भी यह शरीर में ज्यादा खून पम्प कर सकता है।

बुढ़ापे और कमजोरी को दूर रखता है योग

5. हमारा शरीर लम्बे समय तक स्वस्थ व शक्तिशाली बना रहे तथा दुश्मन कीटाणुओं और बीमारियों के हमले से सुरक्षित रहे, इसके लिये Immune System का सशक्त रहना बहुत जरुरी है। कई शोध अध्ययन में यह पाया गया है कि जो लोग रोजाना योगाभ्यास करते हैं उनका रोग प्रतिरोधक तंत्र मजबूत बना रहता है।

6. नियमित रूप से योगाभ्यास करने से आपके शरीर में रक्त का परिसंचरण सही प्रकार से होता है और सही रक्त संचालन से शरीर की प्रत्येक कोशिका तक शुद्ध ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुँचते हैं जिससे आपके शरीर की त्वचा और सभी अंग स्वस्थ रहते हैं।

7. हमारा शरीर स्वस्थ रहे, और भूख तथा मोटापा भी नियंत्रित रहे, इसके लिये चयापचय की दर (Metabolism Rate) का सही रहना बहुत जरुरी है। लगातार योगाभ्यास करने से चयापचय संतुलित रहता है।

8. चूँकि लगातार योग करने से शरीर को प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन तथा प्राण शक्ति मिलती है और रक्त प्रवाह सही बना रहता है, इसीलिये आपका रक्तचाप भी सही बना रहता है।

9. योग शरीर के अन्दर, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया (Detoxification Process) को और तेज करता है, जिससे बुढ़ापे की रफ़्तार को थामने में मदद मिलती है।

Yoga Benefits in Hindi संतुलन सधता है योग से

10. प्रतिदिन योगासन करने से आपको अपने शरीर के पोस्चर को सही प्रकार से नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। इससे आप अपने शरीर को एक निश्चित समय के लिये एक विशेष मुद्रा में साधकर बैठ सकते हैं। इतना ही नहीं आपको यह भी ज्ञान हो जाता है कि कौन सी मुद्रा में बैठना आपके शरीर के लिये लाभदायक है और कौन सी नुकसानदायक। Body Postures का यह ज्ञान योगसाधकों के लिये अनिवार्य है, क्योंकि यह जाने बिना योग की सिद्धि संभव नहीं।

11. चूँकि संयम योग का अनिवार्य और महत्वपूर्ण अंग है, इसीलिये प्रतिदिन योगाभ्यास करने वाले लोगों के अन्दर संतुलन बनाये रखने की सामर्थ्य का विकास होता है और यह संतुलन सिर्फ शरीर के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण संतुलन के रूप में सामने आता है।

12. योगाभ्यास करने वाले लोग अनिद्रा से दूर ही रहते हैं, क्योंकि नींद न आने का मुख्य कारण शरीर और मन की पीड़ा या बेचैनी ही है। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जिन लोगों ने योग को अपने रोज के रूटीन में स्थान दिया हुआ है, वह अच्छी और भरपूर नींद लेते हैं।

13. नियमित रूप से योगाभ्यास करने वालों की Sexuality बेहतर हो जाती है, क्योंकि वह ज्यादा रिलैक्स और ज्यादा कॉंफिडेंट तो होते ही हैं, खुद को ज्यादा बेहतर तरीके से कण्ट्रोल भी कर सकते हैं।

प्रतिदिन योगाभ्यास करने से शरीर ताकतवर बना रहता है

14. योग से अपने शरीर के प्रति जागरूकता बढती है। आसनों के माध्यम से शरीर की मुद्राओं पर, प्राणायाम से श्वास-प्रश्वास पर और ध्यान से एकाग्रता पर अधिकार प्राप्त होता है, जिससे अपने शरीर की हर छोटी से छोटी चेष्टा और आदत पर पैनी नजर रखी जा सकती है। योग हमें हमारी बुरी आदतों और व्यर्थ की कुचेष्टाओं से सरलता से मुक्ति दिला सकता है।

15. नियमित रूप से योग करने पर आपके शरीर का उर्जा भंडार बढ़ता चला जाता है। कुछ शोध अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो लोग प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं, वह योग न करने वालों की तुलना में ज्यादा चुस्त, फुर्तीले और उर्जावान होते हैं।

16. प्रतिदिन योगाभ्यास करने से आपका वजन नियंत्रित रहता है। अर्थात न तो आप दुबले-पतले रहेंगे और न ही ज्यादा मोटे होंगे। ऐसा इसलिये, क्योंकि योग चयापचय तो बेहतर करता ही है, साथ ही यह माँसपेशियों पर सिलवटें पड़ने की संभावना को भी दूर कर देता है।

17. योग का विशेष सकारात्मक प्रभाव रीड की हड्डी और उसके अन्दर स्थित मेरुरज्जु पर पड़ता है। मेरुदंड हमारे शरीर का आधार है, पर यह बहुत संवेदनशील भी है। निरंतर योगाभ्यास करने से Spine का स्वास्थ्य तो बेहतर होता ही है, साथ ही यह सशक्त, लचीली और ज्यादा क्रियाशील भी हो जाती है।

योग के 50 अन्य फायदों के बारे में जानने के लिये पढ़ें – 50 Benefits of the Yoga in Hindi

Yogi and The Goal of Yoga in Hindi

Goal of Yoga in Hindi योग का लक्ष्य

योग का परम यानि मुख्य उद्देश्य है – मोक्ष जिसे मुक्ति या कैवल्य भी कहते हैं। मोक्ष का तात्पर्य है – जीवन और अस्तित्व के उन समस्त दुखों, पीडाओं, विवशताओं, और नकारात्मकताओं से छुटकारा जो जीव को अपने बंधन में बाँधकर उसे सनातन आनंद और स्थायी शांति से वंचित रखते हैं। दूसरे अर्थों में कहें तो समस्त सांसारिक कष्ट तथा जन्म और मृत्यु के चक्र (नश्वर संसार) से मुक्ति प्राप्त करना ही मोक्ष है।

योग के स्वरुप और उद्देश्य को इन 4 सिद्धांतों की रौशनी में समझा जा सकता है –

1. योग उच्चतर विवेक और प्रज्ञा के आयाम खोलने वाला दर्शन है जिससे सर्वज्ञता की दृष्टि पैदा होती है और जीवात्मा समस्त भ्रमों, असत्यों और काल्पनिक मायाजाल से परे होकर, स्वयं के वास्तविक स्वरुप का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।

2. योग एक उच्चस्तरीय जीवनशैली है जो समस्त नकारात्मकताओं और कष्टों से मुक्त करके स्थायी आंतरिक शांति और मोक्ष का द्वार खोलती है, जिससे व्यक्ति इसी जीवन में स्वर्गीय सुख की उपलब्धि कर सकता है।

3. योग अपनी चेतना का व्यष्टि से समष्टि में विस्तार है, जिससे प्रत्येक प्राणी के साथ अपने साहचर्य का बोध होता है।

4. योग ब्रह्माण्डव्यापी परम चेतना से मनुष्य का सम्बन्ध स्थापित करके उसके लिये अनंत सामर्थ्य और असीम शक्ति का द्वार खोलता है जिसकी परिणति कई पारलौकिक उपलब्धियों (Supernatural Accomplishments) में घटित होती है। इन्हें ही योग की सिद्धियाँ कहते हैं, जिनका विशेष वर्णन पातंजल योगसूत्र में किया गया है।

Who are Yogis in Hindi कौन होते हैं योगी

योग के प्रति पूर्ण निष्ठा बरतने वाले उच्च स्तर के पुरुष साधकों को योगी और स्त्री साधकों को योगिनी के नाम से जाना जाता है। योगी शब्द मनुष्य की उच्चतर महिमा को प्रकट करने वाला एक गौरवशाली शब्द है।
जिसका प्रयोग सिर्फ उन्ही के लिए किया जाता है, जिन्हें योग में सिद्धि प्राप्त हो गयी हो अर्थात जो योग को तत्व से जानकर अपने स्वरुप में अचल रूप से प्रतिष्ठित हो गये हों।

ऐसे ही योगियों की दर्शन के अमूल्य ग्रन्थ श्रीमद्भागवद्गीता में भगवान कृष्ण ने पग-पग पर प्रशंसा की है। इस संबंध में गीता का एक सूत्र वाक्य इस प्रकार है – योगी फल की कामना और कर्तापन के अभिमान को छोड़कर, अंतःकरण की शुद्धि के लिये केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करते हैं, जबकि अयोगी कामना के अधीन होकर फल में आसक्त हुआ बँधता है।

जाहिर सी बात है, योग की यह अमूल्य सिद्धि, सिर्फ 1 या 2 घंटे तक किये जाने वाले कुछ आसन और प्राणायामों के बल पर हासिल नहीं हो सकती है, बल्कि इसके लिये तो अपने सम्पूर्ण जीवन को ही योगमय बनाना पड़ता है, त्याग और निष्ठा से भरा जीवन जीना पड़ता है।

तब कहीं जाकर योग का वह फल मिलता है, जिसकी योग ग्रंथों में योगियों ने इतनी प्रशंसा की है। सिर्फ योगासनों तथा सांस लेने और छोड़ने के चक्कर में लगा हुआ अभ्यासी, तो जीवन भर बस सिर्फ शरीर को स्वस्थ बनाने के ध्येय में लगा रहता है। हाँ यह सच है कि योग का एक उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना भी है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य में आध्यात्मिक पूर्णता लाना है।

अगर इस उद्देश्य को भूलकर, कोई योग जैसी दिव्य विधा को बस देह तक ही सीमित रखना चाह रहा है, तो वह ठीक वैसा ही कर रहा है, जैसे कोई अनाडी हीरे से कौड़ियों का काम ले। आशा है योग पर दिया यह लेख आपको पसंद आया होगा। योगाभ्यास करते समय किन-किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिये और किन नियमों का पालन करने से योग के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है, इसका वर्णन हमने Yoga Tips in Hindi में किया है।

“सांख्य के समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है और योग के समान दूसरा कोई बल नहीं है।”

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