Dengue Fever in Hindi: Causes, Symptoms and Treatment

 

“सावधानी ही डेंगू से बचाव का सबसे कारगर हथियार है।”
– जीवनसूत्र

 

Causes, Symptom and Treatment of Dengu Fever in Hindi
Source: Pixabay     वक्त पर इलाज न मिलने से डेंगू जानलेवा साबित हो सकता है

Dengue and Environment डेंगू और वातावरण : –

कुछ ही समय पहले मेरे एक परिचित को खतरनाक डेंगू बुखार के कारण एक सप्ताह तक अस्पताल में रहना पड़ा और उनके जैसे कितने ही लोग हैं जो अभी भी चिकित्सकों की नियमित देखरेख में इस बीमारी का उपचार करा रहे हैं। हालत यह है कि उत्तर भारत के अधिकांश अस्पताल इस बुखार के मरीजों से भरे हुए हैं। कुछ सरकारी अस्पतालों की तो यह हालत है कि जगह न होने के कारण एक बेड पर दो-दो मरीजों का उपचार चल रहा है।

इसीलिये आज हमने यह प्रयास किया है कि इस जानलेवा और वृहत स्तर पर फैली बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक किया जाय। क्योंकि यदि हमें इस बीमारी को फैलने से रोकना है तो मच्छरों को पनपने से भी अनिवार्य रूप से रोकना ही होगा। डेंगू के वायरस और इस मच्छर का पर्यावरण और मौसम से बहुत बड़ा सम्बन्ध है जिनके बारे में लोग प्रायः अनजान ही हैं।

यदि देश और समाज पर आपकी सूक्ष्म-दृष्टि रहती है तो आपने देखा ही होगा कि बीमारियाँ अपने अनुकूल मौसम में ही फैलती है। जैसे मलेरिया और हैजा का आतंक मई से जुलाई के बीच ज्यादा रहता है। दिसम्बर और जनवरी में खतरनाक फ्लू वायरस का असर रहता है और सितम्बर और अक्टूबर में डेंगू का आतंक छाया रहता है।

ऐसा नहीं है कि यह रोग अन्य मौसम में नहीं होते हैं, लेकिन इन दिनों यह एक महामारी के रूप में फैलते हैं। आयुर्वेद में शरद ऋतु को रोगों की माता माना गया है, क्योंकि यह परजीवियों के पनपने के लिये सबसे अनुकूल ऋतु है और इसी ऋतु मे फैलता है खतरनाक डेंगू का बुखार। अगर आप सोचते हैं कि डेंगू सिर्फ भारत में ही फैलता है तो आप गलत है।

दुनिया के लगभग 100 से भी अधिक देश डेंगू वायरस की गिरफ्त में हैं और दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यह एक विश्वव्यापी समस्या बन चुका है। प्रतिवर्ष लगभग 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग इस वायरस के कारण संक्रमित होते हैं और उनमे से लगभग 15 से 20 हजार लोगों की मौत हो जाती है। आज स्थिति यह है कि समुचित प्रयास करने के बाद भी यह समस्या साल दर साल बढती ही चली जा रही है।

What is Dengue and How it Infect Humans डेंगू का मनुष्य में संक्रमण : –

Dengue/डेंगू एक विशेष प्रकार का बुखार है जो डेंगू वायरस के कारण होता है। यह बुखार मुख्य रूप से मच्छरों की एक विशेष प्रजाति के काटने से फैलता है जिसे Aedes/एडीज मच्छर के नाम से जाना जाता है। जब डेंगू वायरस से संक्रमित मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो यह वायरस मच्छर की लार के साथ ही उस व्यक्ति की त्वचा में भी प्रवेश कर जाता है।

जहाँ से वह White Blood Cells/श्वेत रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है और उन्हें भ्रमित करके उनके ही अन्दर अपनी संख्या को बढाने लगता है। चूँकि W.B.C रक्त के साथ-साथ पूरे शरीर में प्रवाहित होती हैं इसीलिये यह वायरस बहुत जल्दी ही सारे शरीर में फ़ैल जाता है। W.B.C हमारे Immune System/प्रतिरक्षा प्रणाली के सुरक्षा प्रहरी हैं।

यह शरीर में किसी भी जीवाणु के प्रवेश करते ही अपनी संख्या बढाकर उसे नष्ट करना आरंभ कर देते हैं। लेकिन अपनी विचित्र प्रोटीन संरचना के कारण यह श्वेत रक्त कोशिकाओं की पहचान में आये बिना उनसे बंध जाता है और स्वयं की प्रतिकृति तैयार करने लगता है। जैसे ही W.B.C को इनकी उपस्थिति का आभास होता है तो वह immune system को सूचना देने के लिये कुछ विशेष प्रकार के प्रोटीनों को पैदा करते हैं।

इनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप ही शरीर में तेज ठंड के साथ आने वाला बुखार, मांसपेशियों में ऐंठन, शरीर में भयंकर दर्द और दूसरे लक्षण पैदा होते हैं। आम तौर पर रोगी को ठीक होने में दो से दस दिन तक का समय लगता है। लेकिन कुछ cases में, जब यह वायरस शरीर में बहुत तेजी से बढ़ने लगता है, तब यह बीमारी जीवन को संकट में डालने वाली परिस्थितियाँ पैदा कर देती है।

विशेषकर तब, जब यह बुखार रोगी के मस्तिष्क तक पहुँच जाता है जिसे Dengue Hemorrhagic Fever के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं, यह वायरस शरीर के vital organs जैसे Liver और Bone Marrow पर भी बुरा प्रभाव डालता है। इनके प्रभावित होने पर रक्त, छोटी रक्त वाहिकाओं की दीवारों से रिसकर, body cavity/शरीर के छिद्रों में भरने लगता है।

इस कारण से धमनियों और शिराओं में कम रक्त प्रवाहित होता है और रोगी के शरीर का blood pressure बहुत कम हो जाता है। जिससे शरीर के vital organs को आवश्यक रक्त नहीं मिल पाता है। जब रोगी की प्लेटलेट्स गिरकर बहुत कम हो जाती हैं तो Bleeding/खून बहने का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इनके ही कारण रक्त में थक्के बनते है और उसका घनत्व कायम रहता है।

ऐसा होने पर dengue shock syndrome के पैदा होने से रोगी की तत्काल मृत्यु हो सकती है। क्योंकि इसमें रोगी के शरीर के किसी भी हिस्से से, विशेषकर मुँह, नाक और Gastrointestinal Tract/पाचन क्षेत्र से खून निकलने लगता है या blood plasma का leakage होने लगता है जिसे रोकना प्रायः मुश्किल ही होता है क्योंकि वायरस बहुत तेजी के साथ बढ़ता है।

डेंगू के वायरस के कुल पांच अलग-अलग प्रकार होते हैं। सामान्य तौर पर यदि कोई इंसान किसी एक प्रकार के वायरस से संक्रमित हो जाय, तो वह लगभग जीवन भर के लिये वायरस के उस विशेष प्रकार के लिये प्रतिरोधकता हासिल कर लेता है, लेकिन दूसरे प्रकारों के लिये नहीं। इसलिये यह माना जाता है कि दोबारा डेंगू होने पर इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है।

Sign and Symptoms of Dengue डेंगू के लक्षण : –

डेंगू बुखार Aedes Aegypti/एडीज मच्छर की कई प्रजातियों से फैल सकता है। आम तौर पर जो लोग डेंगू वायरस से संक्रमित होते हैं उनमे 80% से अधिक लोगों में इसके सामान्य लक्षण, Dengue का Infection होने के तीन से चौदह दिन के पश्चात दिखाई देने लगते हैं। जैसे –

ठंड या कंपकपी के साथ आने वाला तेज बुखार, सिर में तेज दर्द का उठना, मांसपेशियों में ऐंठन, शरीर के जोड़ों में भयंकर दर्द, बेचैनी, उलटी-दस्त आदि। इसके साथ-साथ इस बीमारी में एक अन्य लक्षण भी उभरता है और वह है त्वचा में खुजली का होना, जिसमे कई जगह शरीर पर लाल-लाल दाने हो जाते हैं या चक्कते पड़ जाते हैं। डेंगू में त्वचा पर होने वाले लाल चकत्ते कुछ-कुछ चेचक जैसे ही होते हैं।

पांच से सात प्रतिशत लोगों में डेंगू का गंभीर संक्रमण फ़ैल सकता है और कुछ लोगों में तो यह जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है। बच्चों में डेंगू वायरस के लक्षण कुछ-कुछ आम सर्दी-जुकाम और उलटी तथा दस्त के होते हैं। चूँकि उनकी immunity काफी कम् होती है इसलिये उन्हें कई गंभीर समस्याएँ होने का खतरा ज्यादा होता है।

इसे हड्डीतोड़ बुखार के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें मांसपेशियों और जोड़ों मे बहुत दर्द होता है जो कई दिन तक बना रह सकता है। डेंगू में तेज बुखार की शिकायत आम है जो कभी-कभी 104 से 105०F तक पहुँच जाता है। इसके अलावा इलाज के दौरान भी, शरीर की पीड़ा, सिरदर्द, उलटी आदि समस्याएँ 10-15 दिन तक निरंतर बनी रह सकती है।

How to Diagnose Dengue Fever डेंगू का पता कैसे लगायें : –

खून की जांच से डेंगू का पता आसानी से लगाया जा सकता है जिसमे मुख्य रूप से प्लाज्मा, TLC (Total Leukocyte Count) और प्लेटलेट्स की संख्या देखी जाती है। एक स्वस्थ व्यक्ति में Platelets की औसत संख्या 300000 से 450000/ml होती है। यदि इनका स्तर गिरकर 75000 से नीचे चला जाय तो रोगी को प्रथम द्रष्टया डेंगू के वायरस से ग्रस्त माना जाता है, लेकिन रोग की पुष्टि करने के लिये चिकित्सक कुछ अन्य जाँच भी करा सकते हैं।

डेंगू के बुखार में एक ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि Treatment के दौरान, Platelets की संख्या कम होने पर जब Plasma Transfusion किया जाता है तो पहले तो प्लेटलेट्स बढ़कर 150000 या 300000 से ऊपर पहुँच जाती है। लेकिन 48 या 72 घंटे बाद ही यह फिर से घटने लगती हैं और गिरकर 40000 या 50000 तक आ जाती है।

क्योंकि वायरस शरीर में तब भी इतनी संख्या में होता है कि यह इन्हें नष्ट करता रहता है। लेकिन जैसे-जैसे वायरस का प्रभाव कम होने लगता है वैसे-वैसे यह अपने आप बढ़ने लगती हैं और अपने सामान्य स्तर पर आ जाती हैं। कुछ व्यक्तियों में Platelets  के घटने बढ़ने की प्रक्रिया दो या तीन बार भी हो सकती हैं, लेकिन ऐसे समय घबराना बिल्कुल नहीं चाहिये। योग्य चिकित्सक की देखरेख में रोगी शीघ्र स्वस्थ हो सकता है।

Treatment of Dengue Fever डेंगू का इलाज : –

डेंगू का उपचार विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में ही होना चाहिये, अन्यथा लापरवाही से रोगी के जीवन पर संकट आ सकता है। जैसे ही रोगी में डेंगू का वायरस होने की पुष्टि हो उसे अविलम्ब किसी कुशल चिकित्सक के मार्गदर्शन में रखकर उसकी चिकित्सा करानी चाहिये। डेंगू के उपचार के सम्बन्ध में यह कुछ बातें अवश्य ध्यान रखनी चाहियें।

1. यह दुःख की ही बात है कि इतना लम्बा इतिहास होने के बावजूद आज तक डेंगू के लिये न तो कोई vaccine/वैक्सीन तैयार की जा सकी और न ही इसकी कोई दवा। हालाँकि कुछ विकसित देशों में इसकी वैक्सीन/दवा trial phase पूरा कर चुकी है और सरकार और अन्य नियामकों से अनुमति पाकर commercially available होना भी आरंभ हो गयी हैं। लेकिन अभी भी 90 प्रतिशत से अधिक देशों में इसकी दवा की व्यवस्था नहीं है।

2. डेंगू एक viral disease है, लेकिन कोई विशेष दवा न होने के चलते चिकित्सक लक्षणों के आधार पर ही इसका उपचार करते हैं।

3. डेंगू के इलाज के पूर्व या इसका उपचार करते समय, Infection/संक्रमण बढ़ने के कारण रोगी को Antibiotics भी दी जाती हैं जिनका निर्धारण स्वयं चिकित्सक ही करता है।

4. चूँकि यह वायरस से पैदा होने वाला रोग है इसीलिए Antibiotics भी अधिक कारगर नहीं होती हैं, क्योंकि एंटीबायोटिक्स Bacteria को समाप्त करने के लिये बनी होती हैं। यह वायरस पर ज्यादा प्रभाव नही डाल पाती हैं, इस कारण से रोगी का स्वास्थ्य बहुत धीरे-धीरे ही सुधरता है। अतः धैर्य बनाये रखिये।

5. रोगी को अधिक से अधिक पानी और तरल पदार्थ देना चाहिये, क्योंकि डेंगू में शरीर में पानी की बहुत कमी हो जाती है। विशेषकर तब जब रोगी को उलटी और दस्त की समस्या से भी जूझना पड रहा हो।

6. यदि रोगी मुँह से कुछ खाने में असमर्थ है (ऐसा तब होता है जब रोगी को निरंतर उल्टियाँ आ रही हों और Liver सही प्रकार से कार्य करने में असमर्थ  हो) तब Fluid Transfusion (Glucose) के जरिये उसके शरीर में तरल पदार्थों की आपूर्ति की जाती है।

7. रोगावस्था में आराम वैसे तो हर अस्वस्थ व्यक्ति के लिये लाभदायक है। लेकिन डेंगू में इसकी बहुत आवश्यकता है, क्योंकि रोगी की संपूर्ण देह में पीड़ा रहती है और सामान्य जीवन जीने लायक उर्जा का उसमे बिल्कुल अभाव रहता है। अतः अपनी उर्जा बचाने हेतु रोगी को पूरा आराम करना चाहिये ताकि शरीर उस उर्जा से अपनी प्रतिरोधकता बढाकर रोग से लड़ने में सक्षम हो सके।

8. Platelets की संख्या 40000 या 50000 से कम होने पर रोगी का Plasma Transfusion आवश्यक हो जाता है, जिसके लिये Blood donate करने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। लेकिन इसका निर्धारण चिकित्सक ही करता है। सामान्यतः ऐसा मुश्किल परिस्थितियों में ही किया जाता है।

9. डेंगू की अत्यंत गंभीर स्थिति में जब Heavy Bleeding (शरीर के अंगों से खून बहने लगता है) होने लगती है, तब चिकित्सक रोगी की जान बचाने के उद्देश्य से Blood Transfusion के साथ-साथ खून के थक्के बनाने हेतु Blood Coagulant Injections का प्रयोग भी करते हैं, जो कि इस बीमारी का अंतिम उपचार होता है।

10. रसीले और मीठे फलों का सेवन करना डेंगू में बहुत लाभाकरी है क्योंकि यह न केवल शरीर में पानी की कमी की पूर्ति करते हैं, बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिये आवश्यक Essential Major Minerals और Important Vitamins का भी प्रचुर स्रोत है। फलों के क्या लाभ हैं इसका वर्णन हम पहले ही Health Benefits of Fruits in Hindi में कर चुके हैं।

11. रोगी को समय पर दवाइयाँ लेनी चाहिये और वह भी चिकित्सक के निर्देशानुसार ही। अपनी मर्जी से या किसी अन्य के कहने पर दवाइयाँ लेना घातक सिद्ध हो सकता हैै।

Ayurvedic Treatment of Dengue डेंगू का आयुर्वेदिक इलाज : –

12. आयुर्वेद का एक प्रचलित प्रयोग जो कि आज भी कई घरों में बुखार के कारण उत्पन्न हुई कमजोरी को दूर करने में प्रयोग किया जाता है यहाँ दिया जा रहा है। हमने और अन्य कई लोगों ने इस अनुभूत प्रयोग से लाभ उठाया है। यह न केवल बुखार की जीर्णता को तोड़कर शरीर की Immunity/रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है, बल्कि एक Natural Strong Antibiotic भी है।

इसे सभी तरह के बुखार में दिया जा सकता है कुछ लोगों के मत में यह Platelets की संख्या बढ़ाने में भी सहायक है। पर ध्यान रखिये यह डेंगू के उस निर्धारित और अनिवार्य उपचार का विकल्प नहीं है जिसमे रोगी को एक कुशल और अनुभवी चिकित्सक की निरंतर आवश्यकता होती है। जीवन की सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिये।

यह उस स्थिति के लिये है जब रोगी Treatment के पश्चात Recovery Phase से गुजर रहा हो। इस आसव की सामग्री और निर्माण की विधि इस प्रकार है –

नीमगिलोय     –  एक मुट्ठी 2 से 3 इंच बड़े टुकड़े (ताजे प्रयोग करना सर्वोत्तम है)

पपीते के पत्ते  – औसत आकार के 1 से 2 पत्ते

अजवाइन      – 1 चम्मच

अमरुद के पत्ते – 10 से 15

तुलसी के पत्ते   – 15 से 20

काला नमक     – 1 छोटा चम्मच

सबसे पहले नीमगिलोय के टुकड़े काटकर उन्हें किसी भारी वस्तु से मसल दें और पपीते के पत्तों को भी थोडा सा कूट लें। फिर एक बर्तन में 500ml पानी लेकर उसे धीमी आंच पर उबलने रख दें और उसमे बाकी सभी चीज़ें भी डाल दें। जब पकते-पकते यह 150ml रह जाय तो इसे उतारकर कुछ ठंडा करके पी जायें। ध्यान रखिये इसे बिलकुल ठंडा नहीं करना है। इसे पीने के पश्चात कम से कम 40 मिनट तक कुछ न खायें।

जहाँ तक हो सके इस आसव में प्रयोग होने वाली चीज़ों को ताज़ी अवस्था में ही प्रयोग में लाना चाहिये, अजवाईन और नमक को छोड़कर। नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय को ही नीमगिलोय कहा जाता है। यह सामान्य गिलोय की तुलना में अधिक गुणकारी होती है। ध्यान रखें पंसारी या दुकानों से मिलने वाली गिलोय का उपयोग न करें। यह कोई प्रभाव नहीं डाल पायेगी।

क्योंकि उनके पास रखी चीज़ें सालों पुरानी हो सकती हैं और आयुर्वेद चिकित्सकों के अनुसार किसी भी आयुर्वेदिक वनौषधि का लाभ उठाने के लिये यह छह महीने से अधिक पुरानी नहीं होनी चाहिये। अतः इसे ताजी ही लें, क्योंकि यही इस पेय का मुख्य घटक है। यह एक दिन की सामग्री दी गयी है, दूसरे दिन के लिये इसे दोबारा बनायें। इस आसव को दिन में तीन बार सुबह, दोपहर और शाम के समय पीना चाहिये।

यह लेख काफी लम्बा हो गया है लेकिन हमें आशा है कि यहाँ दी गयी बातें इस बीमारी के संबंध में आपकी कई शंकाओं का समाधान कर सकेंगी। किसी भी रोग को वृहत स्तर पर फैलने से रोकने का एकमात्र उपाय उसके बारे में लोगों को जागरूक करना ही है यदि व्यक्ति को इस बात का पता होगा कि अमुक रोग अमुक कारण से फैलेगा तो वह पहले से ही इसका बचाव कर सकेगा

यदि आप डेंगू के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो WikipediaMedicinenet और Healthline पर भी काफी अच्छी जानकारी उपलब्ध है अगले लेख में पढिये कैसे रोकें डेंगू को फैलने से और जानिये डेंगू के बारे में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य

“वह सबसे अच्छा चिकित्सक है जो अधिकांश दवाइयों की निरर्थकता को समझता है।”
– बेंजामिन फ्रेंक्लिन

 

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