Health Benefits of Vitamins in Hindi

 

“जिसके पास स्वास्थ्य है, उसके पास आशा है; और जिसके पास आशा है, उसके पास जिंदगी में सब कुछ है।”
– अरब की कहावत

 

Health Benefits of Vitamins in Hindi
हमें खाते रहेंगे, तो जल्दी बीमार नहीं पड़ेंगे

Vitamins are Essential for Our Health विटामिन और हमारा स्वास्थ्य : –

इस धरती पर हर मनुष्य इस शरीर को जीवित और स्वस्थ रखने के लिए, प्रतिदिन अपनी-अपनी रूचि के अनुसार भोजन लेता है। यह केवल भोजन का स्वाद और उसकी पौष्टिकता नहीं है, जो इस देह का अस्तित्व बनाये हुए है, बल्कि उसमे समाहित वह विटामिन और मिनरल्स हैं जो हमारे जीवन के लिये अनिवार्य हैं। यही कारण है कि क्यों इन तत्वों से युक्त एक संतुलित आहार लेना प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिये अत्यंत आवश्यक है।

क्यों चिकित्सक सभी रोगियों को अपनी खाने की आदतें सुधारने के लिये कहते हैं, क्योंकि हमारा शरीर न तो किसी मिनरल को बनाने में समर्थ है और न ही यह मनुष्य के जीवन के लिये अनिवार्य 11 Vitamins को बना पाने में समर्थ है। हमारा शरीर 13 अनिवार्य विटामिन में से केवल 2 ही Vitamins अपने स्वयं के बल पर निर्मित कर सकता है। बाकी की उपलब्धता के लिये यह प्रकृति पर ही निर्भर है।

Vitamins और Minerals को संयुक्त रूप से माइक्रोन्यूट्रिएंटस यानि सूक्ष्म पुष्टिकर पदार्थ कहा जाता है। क्योंकि शरीर को उनकी बहुत थोड़ी मात्रा की ही आवश्यकता पड़ती है, लेकिन यदि उस थोड़ी मात्रा की पूर्ति न हो पाए, तो शरीर को बीमारियों का शिकार होते देर नहीं लगती। शरीर को किन मिनरल्स की आवश्यकता होती है, इसका वर्णन हम पहले ही Health Benefits of Minerals में कर चुके हैं।

ये दोनों तत्व साथ-साथ मिलकर शरीर के सैकड़ों कार्यों को करते हैं। शरीर की प्रत्येक कोशिका के निर्माण और मरम्मत से लेकर अस्थि, माँस, रक्त की उपलब्धता, घावों को ठीक करना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाये रखना और आहार को उर्जा में बदलने समेत न जाने ऐसे कितने काम हैं, जिनका पूर्ण होना इनके बिना बिल्कुल संभव नहीं।

इसी बात से हर कोई यह अंदाजा लगा सकता है कि इनकी हमारे जीवन में क्या महत्ता है। अब इस लेख के जरिये विटामिनों के प्रकार, शरीर में उनके कार्य और उनकी प्राप्ति के स्रोत के विषय में चर्चा की जायेगी। आशा है यह लेख स्वास्थ्य की जागृति की दिशा में सहायक होगा!

Difference between Vitamins and Minerals विटामिन और मिनरल्स में क्या अंतर है : –

विटामिन और मिनरल्स दोनों ही शरीर के लिये अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन इनमे बहुत अंतर है। Vitamins जहाँ जैविक पदार्थ हैं, वहीँ Minerals अजैविक पदार्थ हैं; अर्थात इनमे कोई कार्बनिक पदार्थ नहीं है। विटामिन ऊष्मा, एसिड और वायु के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं, लेकिन मिनरल्स अपनी रासायनिक संरचना को बरकरार रखते हैं। यही कारण है कि Minerals आसानी से भोज्य पदार्थों के जरिये हमारी देह में अवशोषित हो जाते हैं।

लेकिन Vitamins भोजन को पकाने, उबालने और भण्डारण की प्रक्रिया में या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर वे अपनी शक्ति खो देते हैं। Vitamins शब्द का तात्पर्य यह नहीं है कि दूसरे अनिवार्य पुष्टिकर पदार्थ जैसे – आहार में लिये जाने वाले खनिज, अनिवार्य वसा अम्ल या अनिवार्य एमिनो एसिड (जिनकी शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है) और अधिकांश प्रकार के अन्य पुष्टिकर पदार्थ जो स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, वे भी इसके अंतर्गत आते हैं।

बल्कि यह उनसे पूर्णतया अलग वह यौगिक व अत्यंत महत्वपूर्ण पुष्टिकर पदार्थ है जिसकी एक जीव को सीमित मात्रा में ही आवश्यकता होती है। एक बात और ध्यान देने की यह है कि विटामिन और मिनरल्स दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विटामिन के विभिन्न प्रकारों की उचित मात्रा के बिना हमारा शरीर उनसे सम्बंधित मिनरल्स को शरीर में संचित रखने में असमर्थ ही रहता है।

इसलिये आपको दोनों की उपयुक्त मात्रा को बनाकर रखना चाहिये। जैसे Vitamin D की कमी के कारण हमारा शरीर Calcium को अवशोषित नहीं कर पाता और यह शरीर से वैसे ही बाहर निकल जाता है। Vitamins शरीर की वृद्धि, विकास और कोशिकाओं की सामान्य प्रक्रियाओं के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं

और यह भी Minerals की ही तरह मेटाबोलिज्म (चयापचय) की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा हैं। Metabolism (चयापचय) वह प्रक्रिया है जिसके जरिये हमारा शरीर हमारे द्वारा खाये गये भोजन को उर्जा के रूप में रूपांतरित करता है। जो अंततः हमारे ही शरीर की अनेकों शारीरिक क्रियाओं को पूर्ण करने के लिये शक्ति उपलब्ध कराती है।

सोचने से लेकर दौड़ने तक हम जो कुछ भी इस शरीर से करते हैं, उसके लिये उर्जा उपलब्ध कराना, और शरीर को हमेशा स्वस्थ बनाये रखना ही इनका कार्य है। हमारे शरीर को कुल 13 अनिवार्य विटामिनों की आवश्यकता होती है; जिन्हें उनकी प्रकृति या संरचना के आधार पर नहीं, बल्कि जैविक और रासायनिक क्रियाओं के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता हैं। जो इस प्रकार हैं –

Fat-Soluble Vitamins (वसा में घुलने वाले विटामिन) : –

वसा में घुलने वाले विटामिन वे Vitamins हैं जो केवल वसा में ही घुल सकते हैं और हमारे उदर के अंदर जाकर वसा से बंध जाते हैं। ये शरीर के भीतर ही लम्बे समय के लिये संचित हो जाते हैं, ताकि बाद में आवश्यकता पड़ने पर इनका उपयोग किया जा सके। वसा में घुलने वाले विटामिन सीधे हमारे खून में नहीं मिलते हैं, बल्कि यह आँतों की दीवारों में स्थित लसीकाओं के माध्यम से खून में प्रवेश करते हैं।

वसा में घुलने वाले कई विटामिन केवल प्रोटीन के संरक्षण में रहकर ही शरीर के अन्य भागों तक पहुच पाते हैं, क्योंकि प्रोटीन इनके लिये एक वाहक (करियर) का कार्य करता है। शरीर में इन Vitamins का अवशोषण कुछ इस तरह से होता है – जब हम वसा में घुलनशील विटामिनों से युक्त भोजन खाते हैं, तो वह आमाशय में जाकर वहाँ स्रावित होने वाले पाचक अम्लों से पचाया जाता है।

जहाँ से वह छोटी आंत में आ जाता है। वहां उसका देर तक पाचन और अवशोषण होता है। चूँकि वसा में घुलने वाले विटामिनों को अवशोषित करने के लिये पित्त की आवश्यकता होती है, इसलिये यकृत(लीवर, जहाँ पित्त का निर्माण होता है) से पित्त आकर छोटी आँत में मिल जाता है। जहाँ यह वसा को तोड़ देता है और समस्त पोषक तत्व आँतों की दीवारों द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं।

यहाँ से यह विटामिन लसिका नलिकाओं में चले जाते हैं; जहाँ से फिर यह सीधे खून में मिल जाते हैं। ये Vitamins वैसे तो संपूर्ण शरीर में उपस्थित होते हैं, क्योंकि शरीर को समय-समय पर इनकी आवश्यकता पड़ती हैं। लेकिन इनकी बड़ी और अतिरिक्त मात्रा लीवर में और वसा उतकों में संरक्षित रहती है। लगभग अधिकांश वसा में घुलनशील विटामिन अपने आप ही शरीर में इधर-उधर जाने के लिये असमर्थ होते हैं।

इसलिये इनके साथ वाहक के रूप में अनिवार्य रूप से प्रोटीन अणुओं की आवश्यकता पड़ती हैं। चूँकि यह Vitamins हमारे शरीर में लम्बे समय तक संचित रहते हैं, इसलिये इन विटामिनों को इनकी निर्धारित मात्रा में ही लेना चाहिये। सप्लीमेंट के रूप में इन्हें अधिक मात्रा में लेना घातक है। रोग या चोट आदि के समय, जब-जब हमें इन Vitamins के अतिरिक्त भंडार की आवश्यकता होती है, तो हमारा यकृत इन्हें मुक्त कर देता है।

आप यह जानकार आश्चर्यचकित रह जायेंगे कि यदि हम आज और अभी से Vitamin-A लेना बंद कर दें, तब भी यह हमारे लीवर में इतनी मात्रा में संचित रहता है कि अगले 7-8 वर्षों तक हमारे शरीर को विटामिन-A की निर्बाध आपूर्ति कर सके। Vitamin A, Vitamin D, Vitamin E और Vitamin K ये चार वसा में घुलनशील विटामिन हैं।

Water-Soluble Vitamins (जल में घुलने वाले विटामिन) : –

पानी में घुलनशील विटामिन वे Vitamins हैं जो भोजन के जलीय अंश में उपस्थित रहते हैं और पाचन की प्रक्रिया के दौरान जैसे ही भोजन अन्य घटकों में टूटता है, यह अवशोषित होकर तुरंत खून में मिल जाते है। चूँकि मनुष्य शरीर में सबसे बड़ा अंश जल का है, इसीलिये ये Vitamins तुरंत ही सारे शरीर में आसानी से फ़ैल जाते हैं। हमारे गुर्दे जल में घुलनशील विटामिनों के स्तर को लगातार नियंत्रित करते रहते हैं।

इसीलिये जब भी इन Vitamins का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है, तो इन्हें मूत्र के जरिये बाहर निकाल दिया जाता है। हाँलाकि जल में घुलनशील विटामिन शरीर में अनेकों कार्य करते हैं, लेकिन उनमे सबसे महत्वपूर्ण है – उस भोजन से उर्जा को मुक्त करने में सहायता करना, जिसे आप खा रहे हैं। दूसरे Vitamins हमारे उतकों को स्वस्थ रहने में मदद करते हैं।

सामान्य तौर पर जल में घुलनशील विटामिन शरीर में केवल कुछ समय तक ही संचित रह पाते हैं, लेकिन Vitamin B12 वर्षों तक हमारे लीवर में संचित रहता है। फॉलिक एसिड और विटामिन C कुछ दिन तक हमारे शरीर में संचित रहते हैं, पर अधिकांश विटामिनों की पूर्ति करने के लिये इनका जल्दी-जल्दी नियमित तौर पर सेवन करना जरुरी है।

लेकिन इन Vitamins को सप्लीमेंट के जरिये अधिक मात्रा में लेना नुकसानदेह है। Vitamin B के कुल सातों प्रकार और Vitamin C जल में घुलनशील विटामिन हैं। आइये अब विस्तार से इनके बारे में जानें –

Proper Dose of Vitamins विटामिनों को कितनी मात्रा में ग्रहण करना चाहिये : –

RDA – हमारे शरीर को किस विटामिन की कितनी मात्रा की आवश्यकता है, इसके लिये वैसे तो प्रत्येक देश के अपने अलग-अलग मानक निर्धारित हैं। लेकिन इस लेख में सभी विटामिनों की मात्रा US RDA (United States Recommended Dietary allowances) के अनुसार दी जा रही है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के संगठन FNB के द्वारा व्यापक शोध के आधार पर निर्धारित है।

RDA प्रत्येक विटामिन और मिनरल की आहार के रूप में प्रतिदिन ली जाने वाली वह औसत मात्रा है, जो एक व्यक्ति को स्वस्थ और उनकी कमी से मुक्त बनाये रखने के लिये आवश्यक है। यहाँ पर विटामिनों की जो मात्रा दी जा रही है वह 19 से 70 वर्ष तक के पुरुषों के लिये उपयुक्त है। कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में इनकी कम मात्रा की आवश्यकता होती है।

UL – UL (Tolerable Upper Intake Level) विटामिनों व मिनरल्स की प्रतिदिन ली जा सकने वाली वह अधिकतम मात्रा है जो एक औसत व्यक्ति के लिये सुरक्षित है। इसलिये यदि आप इन तत्वों की अधिक मात्रा के कारण शरीर में पैदा होने वाली विषाक्तता से बचना चाहते हैं, तो इनका सेवन इससे कम मात्रा में ही करें। इन सभी तत्वों को मिलीग्राम (mg), माइक्रोग्राम (mcg या µg) में मापा जाता है।

चूँकि विटामिनों का विषय न केवल विस्तृत है, बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी बहुत महत्वपूर्ण है; इसलिये इस लेख में हम केवल वसा में घुलनशील विटामिनों का ही विस्तृत वर्णन करेंगे। जल में घुलनशील दोनों विटामिनों का वर्णन अगले लेख में किया जायेगा। अब आगे पढिये-

Fat-Soluble Vitamins वसा में घुलनशील विटामिन : –

1. Vitamin A विटामिन A : –

Vitamin A का रासायनिक नाम रेटिनौल, रेटिनल है। इसे बीटा केरोटिन के नाम से भी जाना जाता है। Vitamin A के कुछ प्रकार, कोशिका और उतकों की वृद्धि के नियंत्रक और उनमे विभेद करने का कार्य देखते हैं। इसे मुख्य रूप से आँखों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसका कार्य मात्र इतने तक ही सीमित नहीं है। यह अन्य कई अत्यावश्यक कार्य करता है।

जैसे – यह लाल और श्वेत रक्त कणिकाओं के निर्माण में सहायक होता है, उनकी क्रियाशीलता बढाता है और शरीर की सामान्य वृद्धि और विकास के लिये महत्वपूर्ण है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और रक्त वाहिनियों को स्वस्थ रखता है तथा त्वचा, दांत और कोशिकाओं को स्वस्थ रखने से लेकर हड्डियों के पुनर्निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाता है।

Vitamin A हमारी कुछ तरह के कैंसर और आँखों के रोगों से भी बचाव करता है तथा रेटिना के स्वास्थ्य के लिये भी यह बेहद जरुरी है। यह Vitamin कुछ तरह के त्वचा रोगों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जाता है।

विटामिन A की कमी और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में Vitamin A की कमी के कारण रतौंधी, हाइपरकेराटोसिस और केराटोमैलासिया के रोग होते है। रतौंधी का रोग होने पर व्यक्ति कम रौशनी में कुछ नहीं देख पाता। अधिक बुरी स्थिति में रोगी अंधा भी हो सकता है। इस विटामिन को अधिक मात्रा में लेना भी खतरनाक है, क्योंकि ऐसा करने से हाइपरविटामिनोसिस A का रोग होने की प्रबल सम्भावना रहती है।

विटामिन A के स्रोत व मात्रा –

यकृत, मछली, अंडे, काड लीवर ऑइल, दूध, पके हुए पीले-नारंगी रंग के फल जैसे – आम, खरबूजा, संतरा, विलायती खरबूजा, केला आदि व गाजर, चुकंदर, कद्दू, पालक, शकरकंद, सोया दूध और हरी पत्तेदार सब्जियाँ इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में Vitamin A पाया जाता है।

हमारे शरीर को प्रतिदिन 900 µg Vitamin A की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 3000 µg निर्धारित है।

2. विटामिन D : –

Vitamin D को कोलकेल्सिफेरोल (विटामिन D3) और एर्गोकेल्सिफेरोल (Vitamin D2) के रासायनिक नाम से भी जाना जाता है। यह विटामिन हमारी हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत रखने के लिये बहुत आवश्यक है। इसके अभाव में शरीर की कैल्शियम को अवशोषित करने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जिसके कारण हड्डियां भंगुर हो जाती है और उनके हल्की सी चोट से भी टूटने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

Vitamin D हमारे शरीर में हार्मोनों की तरह से कार्य करते हुए, खनिजों के चयापचय के नियंत्रक का कार्य भी करता है। यह न केवल कैल्शियम के चयापचय के लिये, बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने, तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने और हड्डियों का घनत्व बढाने के लिये भी अत्यंत आवश्यक है।

सूर्य का प्रकाश इसका सबसे सरल और प्रचुर प्राकृतिक स्रोत है, जो इस विटामिन को क्रियाशील करने के लिये भी आवश्यक है। सर्दियों में इस Vitamin को विशेष रूप से लेने की आवश्यकता है। केवल एक घंटे तक धूप में बैठने से ही शरीर को इसकी पर्याप्त मात्रा मिल जाती है।

विटामिन D की कमी और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

Vitamin D की कमी के कारण रिकेट्स और ओस्टोमैलासिया के रोग होने की सम्भावना होती है, जो हड्डियों से संबंधित रोग हैं। इनमे अस्थियाँ मुलायम और कमजोर होकर मुड जाती हैं, जिससे शरीर में कुबडापन आ जाता है। इसकी अधिक मात्रा भी शरीर के लिये नुकसानदेह है, ऐसी स्थिति में हाइपरविटामिनोसिस D का रोग होने की प्रबल सम्भावना होती है। अतः उचित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिये।

कुछ समय पहले एक शोध में यह तथ्य सामने आया था कि भारत के 80% से अधिक स्त्री-पुरुषों में Vitamin D की भारी कमी है। शायद यह भी एक कारण हो सकता है कि प्रौढ़ अवस्था में पहुँचने वाले अधिकांश लोगों में जोड़ों से संबंधित समस्याएँ बढती ही चली जा रही हैं।

विटामिन D के स्रोत व मात्रा : –

मछली, अंडे की जर्दी, यकृत, मशरूम, प्रसंस्करित अनाज, प्रसंस्करित दूध, सूर्य की धूप आदि इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में विटामिन D पाया जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 10 µg Vitamin D की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 50 µg निर्धारित है।

3. विटामिन E : –

Vitamin E का रासायनिक नाम टोकोफेरोल्स, टोकोट्रिनोल्स है। यह विटामिन भी अन्य विटामिनों की तरह विविध जैवरासायनिक कार्यों को संपन्न करता हैं। विटामिन E अत्यावश्यक लिपिडो को क्षति से बचाने, मुक्त अणुओं को शरीर से बाहर निकालने और कोशिका झिल्ली को एकीकृत बनाये रखने में सहायता करता है।

यह एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में भी कार्य करता है और शरीर को फ्री रेडीकल्स से बचाने के लिये आवश्यक है। यदि शरीर में संतुलन और उचित समन्वय की कमी महसूस हो या माँसपेशियों में कमजोरी या हाथ-पैर का सुन्न हो जाना जैसी समस्याएँ होने लगे, तो यह इस बात का संकेत हैं कि आपके शरीर में Vitamin E की मात्रा बहुत कम हो चुकी है।

विटामिन E की कमी और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में Vitamin E की कमी की सम्भावना वैसे तो बहुत दुर्लभ है, लेकिन यदि हो जाय तो पुरुषों में बांझपन और स्त्रियों में गर्भपात के रोग देखने को मिलते हैं। नवजात शिशुओं के अंदर इस विटामिन की कमी होने से रक्त की कुछ कमी (हीमोलाय्टिक एनीमिया) हो जाती है। इस विटामिन को अधिक मात्रा में लेने से ह्रदय की गति रुकने की सम्भावना हो सकती है।

क्योंकि ऐसा एक विस्तृत पर अनियमित अध्ययन में सामने आया है। विश्व के अधिकांश देशों के निवासियों में Vitamin E की भी काफी कमी है, जिसके कारण बढती उम्र में थकान, कमजोरी, अनिद्रा आज सभी के लिये एक व्यापक समस्या बन चुकी है।

विटामिन E के स्रोत व मात्रा –

फल व सब्जियाँ जैसे एवोकेड़ो, गिरियाँ और बीज जैसे – बादाम, काजू, अखरोट, चिरौंजी, पहाड़ी बादाम, खरबूजे के बीज, जौ, साबुत अनाज, जैतून का तेल आदि इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में विटामिन E पाया जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 15 mg Vitamin E की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 1000 mg निर्धारित है।

4. विटामिन K : –

Vitamin K का रासायनिक नाम फिलोक्वीनोन, मेनाक्वीनोन है। यह अनिवार्य विटामिन शरीर के घावों को भरने के लिये और हड्डियों के विकास के लिये बहुत आवश्यक है। K शब्द का तात्पर्य जर्मन शब्द koagulation से है, जिसका अर्थ है थक्का जमाना। यह विटामिन कटे-फटे स्थान से बहते हुए रक्त को थक्कों के रूप में जमाकर, शरीर के घावों को शीघ्र ठीक होने में सहायता करता है और घातक संक्रमण को फैलने से रोकता है।

जो स्त्रियाँ गर्भ निरोधक गोलियाँ ले रही है, उन्हें इस विटामिन की अधिक खुराक लेने से बचना चाहिये, क्योंकि यह गोलियाँ और इस Vitamin की अतिरिक्त मात्रा अनावश्यक थक्के जमाने का खतरा बढ़ा देती हैं।

विटामिन K की कमी और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में इसकी मात्रा कम हो जाने से रक्त बहने, नाक से रक्त निकलने, मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्त निकलने व चोट के प्रति सुग्राहिता बढ़ने की समस्या हो जाती है। रक्त जल्दी नहीं जमता और संक्रमण फैलने का भय रहता है। इस Vitamin को अधिक मात्रा में भी नहीं लेना चाहिये।

क्योंकि यह रोगियों में, विशेषकर उनमे जो वारफेरिन ले रहे हैं, खून के थक्के जमने की गति को बढ़ा देता है, जिसके कारण शरीर के भीतर ही किसी स्थान पर थक्के जमने से व्यक्ति का जीवन संकट में पड़ सकता है।

विटामिन K का स्रोत व मात्रा –

यकृत, अंडे की जर्दी, हरी पत्तेदार सब्जियाँ जैसे – पालक, ब्रोकोल्ली, पत्ता गोभी, सरसों, करमसाग, अजमोद आदि इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में विटामिन K पाया जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 120 µg Vitamin K की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा अभी निर्धारित नहीं की जा सकी है, इसलिये इसे कम ही मात्रा में लें।

“आरोग्य की इच्छा हमेशा ही स्वास्थ्य की आधी रही है।”
– सेनेका

 

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