Tuberculosis Meaning, Causes, Types and Diagnosis in Hindi

 

“ट्यूबरक्लोसिस या क्षय रोग, एक जानलेवा और खतरनाक रोग है, जो सीधे तौर पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ा है। हर साल 15 से 20 लाख लोग, टी. बी के कारण वक्त से पहले ही दम तोड़ देते हैं। एक अनुमान के अनुसार, संसार की लगभग एक-तिहाई जनसँख्या, क्षय रोग से संक्रमित है। लेकिन इसके लक्षण तभी उभरते हैं, जब देह के कमजोर पडने पर जीवाणु सक्रिय हो जाता है।”

 

Tuberculosis Causes, Symptoms and Treatment in Hindi
आज भी हर साल लाखों लोगों का शिकार करता है क्षय रोग

Tuberculosis Meaning in Hindi ट्यूबरक्लोसिस का अर्थ

Tuberculosis का अर्थ है – क्षय रोग, जिसे टी. बी. भी कहते हैं। यह जीवाणु (Mycobacterium Tuberculosis) से फैलने वाला, एक गंभीर संक्रामक रोग हैं। इसे यक्ष्मा और तपेदिक के नाम से भी जाना जाता हैं। आम तौर पर यह बीमारी फेफड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन यह शरीर के दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकती है। टी. बी बैक्टीरिया से फैलने वाली उन सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों की मौत का कारण बनती हैं।

क्षय रोग दुनिया के कुछ सबसे पुराने रोगों में से एक है। संसार की अनेकों सभ्यताओं में इसके इतिहास से संबंधित कई अभिलेख मिले हैं। हिन्दुओं के पौराणिक साहित्य में भी इसका कई बार उल्लेख मिलता है। जैसे दक्ष प्रजापति के शाप देने के कारण चन्द्रमा क्षय रोग से पीड़ित हो गये थे और पांडवों के दादा विचित्रवीर्य भी इसी रोग से मृत्यु को प्राप्त हुए थे।

संसार में कई राजाओं की मृत्यु इसी क्षय रोग के कारण हुई है। चूँकि भोग-बिलास में आकंठ डूबे रहने वाले और सेक्स लाइफ में असंयम बरतने वाले सैकड़ों-हजारों राजा-रानियाँ, ट्यूबरक्लोसिस के कारण मरे हैं, इसीलिये इस रोग को राजयक्ष्मा भी कहते हैं – अर्थात ‘राजाओं को खाने वाला’। Tuberculosis Meaning in Hindi में आज हम इस रोग का सम्पूर्ण वर्णन करेंगे।

History of Tuberculosis in Hindi क्षय रोग का इतिहास

क्षय रोग दुनिया के सबसे पुराने रोगों में से एक है और मिस्र में मिली हुई ममियों के अवशेषों से पता चला है कि यह रोग ईसा से 3,000 से 4,000 वर्ष पूर्व भी खूब प्रचलित था। ट्यूबरक्लोसिस के जीवाणु की सबसे पुरानी और सुस्पष्ट पहचान 17,000 साल पुराने भैंसे के अवशेषों में भी हुई है। क्षय रोग प्राचीन समय से ही मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन रोग रहा है।

हिप्पोक्रेट्स ने टीबी की पहचान, उस समय के सबसे व्यापक रोग के रूप में की थी। इसमें बुखार और रक्त भरी खाँसी शामिल थी और ये लगभग हर बार घातक सिद्ध होता था। नयी दुनिया के नाम से जाना जाने वाला अमेरिका भी इस जानलेवा रोग से बच नहीं पाया था और ईसा से भी 100 वर्ष पूर्व यहाँ टीबी दस्तक दे चुकी थी।

ऐसा माना जाता है कि मानव जाति के इतिहास में शायद ही दूसरे किसी रोग ने इंसानों की इतनी जाने ली हों, जितनी कि क्षय रोग ने। तो आखिर मनुष्यों के काल बने, इस रोग के उत्पन्न होने का कारण क्या है? कौन है जो इस खतरनाक रोग को पैदा करता है? क्या यह कोई वायरस, जीवाणु या फिर कोई कवक है?

Causes of The Tuberculosis Disease in Hindi

मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस है क्षय रोग का जन्मदाता

आपका सोचना सही है। एक बैक्टीरिया ही ट्यूबरक्लोसिस का जन्मदाता है और इसी के नाम पर इस बीमारी का नामकरण भी हुआ है। इस जीवाणु का नाम है – मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस (Mycobacterium tuberculosis), जो रॉड के आकार का एक सूक्ष्म जीवाणु है। यह बैक्टीरिया साँस के जरिये सीधे फेफड़ों में प्रवेश कर जाता है और वहाँ अपनी कालोनियाँ बसाकर रहने लगता है।

धीरे-धीरे यह फेफड़ों को खा जाता है और फिर मौका मिलते ही शरीर के दूसरों हिस्सों में फैलने का प्रयास करता है। चूँकि Lungs अत्यंत सुकोमल अंग हैं और इनमे ऑक्सीजन और रक्त की प्रचुर व्यवस्था रहती है, इसीलिये TB का जीवाणु शरीर में सबसे पहले यहीं हमला बोलता है।

लेकिन यह वक्त के साथ-साथ, धीरे-धीरे, हड्डियों के जोड़ (Bone Joints), लिम्फ ग्रंथियों (Lymph Glands) और आंतों (Intestines) को भी प्रभावित कर सकता है। इतना ही नहीं TB, मस्तिष्क, मूत्र और प्रजनन संस्थान, और हड्डियों में भी फ़ैल सकती है और यह स्थिति बहुत घातक होती है। हालाँकि टीबी का जीवाणु, दूसरे बैक्टीरिया की तुलना में कहीं ज्यादा धीमी गति से बढ़ता है।

जहाँ दूसरे जीवाणु एक घंटे से भी कम समय में विभाजित हो जाते हैं, वहीँ इसे ऐसा करने में 16 से 20 घंटे लगते हैं। मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस की सबसे पहले पहचान, डा. रोबर्ट कोच ने मार्च सन 1882 में की थी। उनकी इस बेहद महत्वपूर्ण खोज के लिये, उन्हें सन 1905 में चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। उनके सम्मान में TB को कभी-कभी Koch’s Syndrome भी कह दिया जाता है।

Tuberculosis in Hindi क्या हैं टीबी के फैलने के कारण

टीबी के फैलने के लिये यह प्रमुख कारण जिम्मेदार माने जाते हैं, क्योंकि यह सभी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। यह बैक्टीरिया, शरीर में तभी सक्रिय होता है, जब शरीर आन्तरिक रूप से कमजोर होता है –

1. कम जगह में अधिक लोगों का रहना या गंदे और बदबूदार वातावरण में लम्बे समय तक निवास करना।
2. अधिक देर का रखा हुआ गाय का कच्चा और प्रदूषित दूध पीना।
3. टीबी के मरीज का खुले में कफ या या बलगम थूकना, खाँसना।
4. संक्रमित मांसाहारी भोजन का सेवन करना।

5. संक्रमित हवा में सांस लेना।
6. रोगी के खून चढ़ाते समय सावधानी न बरतना।
7. अपर्याप्त व अपौष्टिक भोजन लेना।

ट्यूबरक्लोसिस का रोग हवा के माध्यम से तब फैलता है, जब सक्रिय क्षय रोग से ग्रसित कोई व्यक्ति, असुरक्षित तरीके से खांसता, छींकता या बोलता है। क्योंकि तब उसके शरीर में उपस्थित, क्षय रोग के बैक्टीरिया, उसके मुँह से निकलने वाली लार और थूक के माध्यम से वातावरण में फ़ैल जाते हैं।

Tuberculosis in Hindi सबसे खतरनाक संक्रामक रोग है टीबी

जब कोई दूसरा स्वस्थ व्यक्ति इस संक्रामक तरल के संपर्क में आ जाता है, तो मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस के ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई, उसके शरीर में साँस के माध्यम से प्रवेश कर जाते हैं। क्योंकि यह वायुमंडल में कई घंटों तक सक्रिय अवस्था में रह सकते हैं। चूँकि Tuberculosis एक तेजी से फैलने वाला संक्रामक रोग है और इसे ठीक होने में महीनों लगते हैं, इसीलिये इसे एक बेहद गंभीर बीमारी समझा जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार, इस दुनिया के एक-तिहाई लोग यानि, 230 करोड़ लोग, ट्यूबरक्लोसिस के जीवाणु से संक्रमित (लेटेंट या सुप्त टीबी संक्रमण) हैं। जिनमे से 2 करोड़ लोग इसके सक्रिय रोगी है। इन इन्फेक्टेड लोगों में से 20 से 25 लाख लोग हर साल बेमौत मारे जाते हैं। यह बात टीबी को किसी एक संक्रामक बीमारी से मौत का सबसे बड़ा कारण बनाती है।

Tuberculosis की इस खतरनाक स्थिति से लोगों को आगाह करने के लिये, WHO हर साल 24 मार्च के दिन, पूरे संसार में विश्व टीबी दिवस (World TB Day) मनाता है। ताकि लोग समय रहते ट्यूबरक्लोसिस के लक्षणों को पहचानकर अपना उपचार करायें और जहाँ तक संभव हो सके, इसकी चपेट में आने से बचें।

यह हैं बैक्टीरिया से फैलने वाली दस सबसे खतरनाक बीमारियाँ – 10 Most Dangerous Bacterial Disese in Hindi

Types of The Tuberculosis in Hindi टीबी के प्रकार

TB के बैक्टीरिया की सक्रियता के आधार पर, क्षय रोग का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है – एक सक्रिय टीबी और दूसरी सुप्त टीबी। इन दोनों के बीच क्या अंतर है, इसके बारे में नीचे बताया जा रहा है –

1. Latent Tuberculosis in Hindi सुप्त क्षय रोग

क्षय रोग की सुप्त अवस्था का अर्थ है कि बैक्टीरिया आपके शरीर में तो मौजूद है, लेकिन आपके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) के कारण, वह सक्रिय होकर रोग को फैलाने में सफल नहीं हो पा रहा है। सुप्त अवस्था में संक्रमण तो होता है, लेकिन टीबी का जीवाणु निष्क्रिय अवस्था में ही पड़ा रहता है। इनएक्टिव या असक्रिय टीबी (Latent TB) के कोई बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं और न ही आपसे यह बीमारी किसी अन्य व्यक्ति में फ़ैल सकती है।

लेकिन अगर भविष्य में आपकी Immunity कमजोर पड़ती है, तो क्षय रोग की यह सुप्त अवस्था सक्रिय टीबी में बदल सकती है। Active Tuberculosis की तरह Latent Tuberculosis, ज्यादा घातक नहीं है और दुनिया में 2 अरब से ज्यादा लोग इसके संक्रमण से पीड़ित हैं।

2. Active Tuberculosis in Hindi सक्रिय क्षय रोग

क्षय रोग की सक्रिय अवस्था का अर्थ है कि बैक्टीरिया आपके शरीर में मौजूद है और वह आपके इम्यून सिस्टम को भेदकर, खुद को दिनोदिन विकसित कर रहा है। सक्रिय क्षय रोग की अवस्था में बैक्टीरिया आपके शरीर में एक्टिव स्टेट में रहता है और आपसे टीबी की बीमारी दूसरों तक आसानी से फ़ैल सकती है। इसीलिये सक्रिय क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति को अपने मुँह पर, मास्क या कपडे जैसा सुरक्षा उपाय बांधना चाहिये।

ताकि उसके बात करते और खाँसते समय जीवाणु बाहरी वातावरण में न फैलें। Active Tuberculosis के रोगी को, अपने शरीर में टीबी के लक्षण, आसानी से महसूस होने लगते हैं, क्योंकि व्यक्ति अपने शरीर में निर्बलता और कमजोरी को तेजी से महसूस करने लगता है।

सक्रिय क्षय रोग को भी शरीर में बैक्टीरिया की उपस्थिति के आधार पर, दो भागों में बाँटा जाता है – एक फेफड़ों का क्षय रोग (Pulmonary Tuberculosis) और दूसरा शरीर के अन्य स्थानों में होने वाला क्षय रोग (Extra Pulmonary Tuberculosis)। इनके बीच निम्न अंतर है –

1. Pulmonary Tuberculosis फुफ्फुसीय यक्ष्मा

जब TB का बैक्टीरिया सक्रिय होकर, फेफड़ों को संक्रमित करता है, तब उसे पल्मोनरी टीबी या फुफ्फुसीय यक्ष्मा कहते है। वैसे क्षय रोग के 85 से 90 प्रतिशत मामलों में इसका बैक्टीरिया, फेफड़ों को ही ज्यादा प्रभावित करता है। इस प्रकार की टीबी से ज्यादातर कम उम्र वाले बच्चे या फिर अधिक उम्र वाले वृद्ध लोग ही ज्यादा पीड़ित होते है, क्योंकि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कुछ ज्यादा ही कमजोर होती है।

फेफड़ों के ऊपरी हिस्से में होने वाली टीबी को कैविटरी टीबी कहते है। निचले भाग की अपेक्षा, फेफड़ों के ऊपरी भागों में TB के इन्फेक्शन की ज्यादा संभावना होती है। क्योंकि एक तो वहाँ, वायु का प्रवाह कहीं ज्यादा बेहतर होता है, दूसरा वहाँ लिम्फ प्रवाह खराब होता है। इसके अलावा टीबी का जीवाणु, कंठनली को भी प्रभावित कर सकता है, इसे लेरींक्स टीबी कहते हैं।

2. Extra Pulmonary Tuberculosis इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा

जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, एक्ट्रापल्मोनरी टीबी में टीबी का जीवाणु, फेफड़ों के स्थान पर, शरीर के दूसरे अंगों को प्रभावित करता है। हालाँकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी वाले व्यक्ति को  पल्मोनरी टीबी नहीं हो सकती। क्योंकि ज्यादातर मामलों में रोग पुराना होने पर या प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा कमजोर होने पर, बैक्टीरिया का संक्रमण फेफड़ों से बाहर भी फैल जाता है और शरीर के दूसरे अंगों को प्रभावित करना शुरू कर देता है।

क्षय रोग के कुल मामलों में, एक्ट्रापल्मोनरी टीबी का योगदान 10 से 15 प्रतिशत होता है। Extra Pulmonary Tuberculosis शरीर के जिस अंग में विकसित होती है, इसे उसी अंग के आधार पर नाम दिया जाता है। जैसे अगर टीबी का जीवाणु, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, तो वह मैनिंजाइटिस टीबी कहलाती है। लिम्फ नोड (लसिका प्रणाली) में होने वाली टीबी को लिम्फ नोड टीबी कहा जाता है।

शरीर के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित करती है एक्ट्रापल्मोनरी टीबी

पेराकार्डिटिस टीबी में, ह्रदय के आसपास की झिल्ली (पेरीकार्डियम) प्रभावित होती है और वहाँ एक तरल पदार्थ भर जाता है। हड्डियों व जोड़ों को प्रभावित करने वाली टीबी को बॉन टीबी या हड्डियों के क्षय रोग के नाम से जाना जाता है। जबकि प्रजनन संस्थान और मूत्र प्रणाली को प्रभावित करने वाले क्षय रोग को, मूत्रजननांगी टीबी (Genitourinary Tuberculosis) कहते हैं।

माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु, इन स्थानों के अलावा शरीर के दूसरे अंगों में भी फ़ैल सकता है। इन सभी प्रकार की टीबी में सबसे ज्यादा घातक है ‘फैली हुई टीबी’ जिसे मिलियरी टीबी के नाम से भी जाना जाता है। मिलियरी टीबी, इतरफुफ्फुसीय मामलों का 10% होती है और यह तब फैलती है, जब क्षय रोग का जीवाणु शरीर के क्षतिग्रस्त उतकों को पार करके रक्त में मिल जाता है।

रक्त के माध्यम से यह जीवाणु, शरीर के कई हिस्सों में निर्बाध रूप से अपना विकास करने लग जाता है और तब इसे समाप्त करने के लिये अधिक समय तक तेज एंटीबायोटिक दवाइयों का उपयोग करना पड़ता है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी, अधिकतर कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों और छोटे बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है। हालाँकि एचआईवी से पीड़ित लोगों में, इस प्रकार की टीबी ज्यादा (50 प्रतिशत से अधिक) होती है।

Symptoms of The Tuberculosis Disease in Hindi

कैसे होते हैं ट्यूबरकुलोसिस या क्षय रोग के लक्षण

Latent Tuberculosis या सुप्त क्षय रोग होने पर, इस बीमारी का कोई भी लक्षण जल्दी से नहीं दिखायी देता, क्योंकि टीबी का बैक्टीरिया इनएक्टिव रहता है। लेकिन एक बार जब बैक्टीरिया एक्टिव हो जाता हैं, तो ट्यूबरकुलोसिस के लक्षण आसानी से दिखने लगते हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति, थोडा ध्यान देने भर से आसानी से पहचान सकता है।

हालाँकि ध्यान दें, ट्यूबरकुलोसिस के लक्षणों को शरीर में विकसित होने में कुछ समय लगता है। इसी वजह से जल्दी से बीमारी का पता नहीं चल पाता है। इनकी अवधि एक महीने से लेकर 3 साल या इससे भी ज्यादा हो सकती है। क्षय रोग के सबसे प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं –

TB Symptoms in Hindi क्षय रोग के सबसे प्रमुख लक्षण

1. लगातार तीन सप्ताह से ज्यादा समय तक खांसी का जारी रहना।
2. शाम के समय बुखार आना और ठण्ड लगना।
3. छाती में दर्द रहना और सांस का फूलना।
4. काफी ज्यादा थकान महसूस करना।

5. खांसी में बलगम के साथ खून आना।
6. वजन का तेजी से कम होना।
7. रात में अधिक पसीना आना।
8. भूख कम लगना।

इन 8 लक्षणों के अलावा ट्यूबरकुलोसिस के कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जो टीबी के प्रकार (जीवाणु शरीर के किस भाग में उपस्थित हैं) पर निर्भर करते हैं। लेकिन 99 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में यही लक्षण प्रमुखता से दिखायी देते हैं।

Diagnosis of The Tuberculosis (TB) in Hindi

आखिर टीबी की जांच कैसे की जाती है

एक बार जब शरीर में टीबी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, तो इसकी पुष्टि आवश्यक हो जाती है, ताकि अविलम्ब रोग की चिकित्सा शुरू करायी जा सके। आम तौर पर टीबी के परीक्षण सरल होते हैं और स्पुटम टेस्ट,  चेस्ट एक्स-रे तथा स्किन टेस्ट से ही क्षय रोग का पता चल जाता है।

लेकिन कुछ लोगों में जिनमे टीबी के प्रमुख लक्षण तेजी से उभरकर सामने नहीं आते या जो कुछ समय तक टीबी का उपचार कराकर फिर छोड़ देते हैं, उनमे इसका परीक्षण करना काफी मुश्किल हो जाता है। इसीलिये  ट्यूबरकुलोसिस की जाँच करने के लिये डॉक्टर, रोगी को कई तरह के टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. Sputum Culture Test बॉडी फ्लूइड कल्चर टेस्ट

स्पयूटम टेस्ट में पहले, मरीज के बलगम या लार का सैंपल लेकर, प्रयोगशाला में स्लाइड पर उसका स्मीयर बनाया जाता है, फिर उसकी एसिड फास्ट बैक्टीरिया के लिये स्टैंनिंग की जाती है। स्टैंनिंग के पश्चात, स्लाइड पर रखे बलगम की माइक्रोस्कोप द्वारा जांच (स्मीयर माइक्रोस्कोपी) की जाती है, ताकि टीबी के बैक्टीरिया की उपस्थिति जाँची जा सके। बलगम की जाँच के लिये, फ्लोरोसेन्स माइक्रोस्कोपी मेथड ज्यादा प्रचलित है।

क्योंकि यह परंपरागत जील-नेल्सन स्टैंनिंग से ज्यादा संवेदनशील है। इस प्रकार से स्पयूटम टेस्ट की जाँच में अधिकतम 3-4 घंटे का समय लगता है। लेकिन कई बार इस जाँच में गड़बड़ होने की आशंका रहती है, इसीलिये सैम्पल लेते समय ही बलगम का, लोएस्टीन जेनसेन या मिडिलब्रूक मीडिया से कल्चर किया जाता है।

क्योंकि यह माइकोबक्टेरियम के कई स्वरूप की पहचान कर सकते हैं। इसमें एक विशेष डाई की मदद से बैक्टीरिया को देखा जाता है। इसके बाद सैंपल को इनक्यूबेटर में 37 डिग्री सेंटीग्रेड पर कुछ दिनों के लिये रख दिया जाता है। हालाँकि इस प्रकार से परिणाम हासिल करने में 4 से 8 सप्ताह का समय लग सकता है।

स्मीयर माइक्रोस्कोपी सरल और तेज विधि है, पर यह कम संवेदनशील होती है। जबकि, अत्यधिक संवेदनशील विधि और बहुत ज्यादा एक्यूरेसी होने के बावजूद, कल्चर परीक्षण के परिणाम आने में कई सप्ताह लग जाते हैं। हालाँकि यह टेस्ट उन्ही रोगियों के लिये कारगर है जो फेफड़ों की टीबी से पीड़ित हैं।

क्योंकि इसमें मुख्य रूप से बलगम की जाँच की जाती है। बलगम का सैंपल देने के लिये रोगी को जोर लगाकर खाँसना होता है, ताकि वह फेफड़ों के अंदर गहराई से निकलकर आये। अगर कल्चर टेस्ट पॉजिटिव आता है, तो आप टीबी के बैक्टीरिया से इन्फेक्टेड हैं।

2. Mantoux Tuberculin Skin Test मोन्टेक्स टेस्ट

मोन्टेक्स ट्यूबरकुलिन टेस्ट एक Immunological Test है। अर्थात इसमें टीबी के बैक्टीरिया की प्रतिक्रिया जानने के लिए आपके Immune System की जांच की जाती है। मोन्टेक्स टेस्ट एक स्किन टेस्ट है, क्योंकि इसमें एक इंजेक्शन द्वारा, आपकी त्वचा की उपरी परत में, टीबी के मृत जीवाणुओं से निकाले गये प्रोटीन डाले जाते हैं। इसीलिये इसे प्यूरीफाइड प्रोटीन डेरीवेटिव टेस्ट या PPD (Purified Protein Derivative) Tuberculin टेस्ट भी कहते हैं।

यह इंजेक्शन आपकी बाँह में लगाया जाता है और फिर 72 घंटे बाद इसका एक कुशल चिकित्सक द्वारा परीक्षण किया जाता है। अगर व्यक्ति टीबी के संक्रमण से पीड़ित होता है, तो जहाँ इंजेक्शन लगाया गया होता है, वह स्थान सूजकर फूल जाता है और वहाँ हल्का लाल फुंसी जैसा निशान बन जाता है।

फिर इस निशान को पैमाने से मापा जाता है। अगर यह 15 मिमी से अधिक होता है, तो टेस्ट पॉजिटिव समझा जाता है और माना जाता है कि रोगी टीबी के बैक्टीरिया से संक्रमित है। लेकिन अगर यह 10 मिमी के आस-पास होता है, तो चिकित्सक पूरी संतुष्टि के लिये दूसरी जाँच भी करा सकते हैं। सूजन 5 मिमी से कम रहने पर यह टेस्ट नेगेटिव समझा जाता है, अर्थात टीबी एक्टिव एवं असक्रिय है।

हालाँकि इस टेस्ट में उन लोगों का परिणाम भी पॉजिटिव आ जाता है, जिन्हें पहले बीसीजी का टीका लगा होता है और जो लेटेंट टीबी से संक्रमित होते हैं। क्योंकि यह टेस्ट, सिर्फ शरीर की बैक्टीरिया के प्रति अतिसंवेदनशीलता को प्रदर्शित करता है। यह नहीं बताता कि क्या आपको वर्तमान में भी टीबी का सक्रिय संक्रमण है या नहीं।

इसके अलावा कभी-कभी उन लोगों का भी टेस्ट भी पॉजिटिव आ जाता है, जो टीबी से पीड़ित नहीं होते हैं। जबकि टीबी से पीड़ित कुछ रोगियों में, यह नकरात्मक रिपोर्ट दे देता है। इसीलिये जहाँ संदेह होता है, वहाँ चिकित्सक कुछ दूसरी जाँच भी करा सकते हैं। मोन्टेक्स टेस्ट की एक्यूरेसी 60 से 70 प्रतिशत मानी जाती है।

3. Interferon Gamma Test इंटरफेरॉन गामा टेस्ट

इंटरफेरॉन गामा टेस्ट का पूरा नाम है – Interferon Gamma Release Assay Test, इसे IGRA Test भी कहते हैं। यह Tuberculosis की जाँच के लिये इस्तेमाल होने वाले नये तरह के टेस्ट हैं। आम भाषा में इसे TB गोल्ड टेस्ट भी कहते हैं। यह टेस्ट, मोन्टेक्स ट्यूबरकुलिन टेस्ट की तुलना में, ज्यादा सटीक और विश्वसनीय परिणाम देता है। हालाँकि यह काफी महंगा भी होता है।

इस टेस्ट में मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस के एंटीजन से टीबी की पहचान होती है। इस टेस्ट में रोगी का ब्लड टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट से यह भी पता चल जाता है कि रोगी को Latent टीबी है या Active टीबी। आम तौर पर यह टेस्ट तभी कराया जाता है, जब टीबी विकसित होने का ज्यादा खतरा हो और स्किन टेस्ट लगातार नेगेटिव रिजल्ट दे रहा हो या हाल ही में बीसीजी का टीका लगा हो।

4. Line Probe Assay Test लाइन प्रोब असे टेस्ट

यह टेस्ट एक नया टेस्ट है और WHO भी इस रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट को, मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट या रिफाम्पिसिन रेसिस्टेंट TB की पहचान करने के लिये अनुमोदित करता है। इस टेस्ट के माध्यम से आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन जैसी फर्स्ट लाइन ड्रग्स के प्रति, टीबी के जीवाणु की प्रतिरोधकता का पता, 24 से 48 घंटों में लगाया जा सकता है।

साथ ही बैक्टीरिया में आये जेनेटिक म्यूटेशन की पहचान भी हो जाती है। लेकिन इन टेस्ट्स का एक नुकसान यह है कि यह एक ओपन-ट्यूब फॉर्मेट टेस्ट हैं, जो क्रॉस कंटैमिनेशन और गलत पॉजिटिव रिजल्ट्स का खतरा बढा सकते हैं। लाइन प्रोब असे टेस्ट में PCR (Polymerase Chain Reaction) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

5. Gene Xpert MTB Test जीन एक्सपर्ट टेस्ट

जीन एक्सपर्ट टेस्ट एक NAAT या न्यूक्लिक एसिड एम्फ्लिफिकेशन टेस्ट (Nucleic Acid Amplification Test) है। न्यूक्लिक एसिड में या तो पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (PCR) तकनीक इस्तेमाल होती है या फिर ट्रांसक्रिप्शन-मीडीएटेड अम्प्लिफिकेशन (TMA) तकनीक या फिर न्यूक्लिक एसिड एम्फ्लिफिकेशन के दूसरे तरीके, जिनसे मायकोबैक्टीरियल न्यूक्लिक एसिड की पहचान हो सके।

इस टेस्ट की संवेदनशीलता और एक्यूरेसी बहुत ज्यादा (90 प्रतिशत से अधिक) होती है। सन 2010 में एक्सपर्ट MTB टेस्ट जो NAAT पर आधारित एक नवीनतम तकनीक है, व्यवसायिक रूप से उपलब्ध हो गयी है। इसकी मदद से जहाँ TB की तेजी से जाँच हो सकती है, वहीँ यह ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की भी पहचान कर सकता है। इस टेस्ट से सिर्फ 2 घंटे के अन्दर-अन्दर परिणाम पाये जा सकते हैं।

यह टेस्ट, बैक्टीरिया के डीएनए में आये जेनेटिक म्यूटेशन और सबसे महत्वपूर्ण फर्स्ट लाइन ड्रग मानी जाने वाली रिफाम्पिसिन के प्रति, इसकी प्रतिरोधकता की जाँच कर सकता है। एक्सपर्ट टेस्ट, एक कार्टिरेज बेस्ड टेस्ट है और इसमें बलगम द्वारा टीबी का पता लगाया जाता है।

6. Chest X-Ray Test छाती का एक्स-रे

Sputum Culture Test के द्वारा रोगी के थूक और बलगम को जांचने के साथ-साथ, उसकी छाती का एक्स-रे भी किया जाता है। ताकि TB टीबी की जांच, अधिक विश्वसनीय तरीके से की जा सके। इन दोनों से आसानी से पता चल जाता है कि रोगी को एक्टिव टीबी है या नहीं। अगर मोंटोक्स या पीपीडी टेस्ट की रिपोर्ट भी पोज़िटिव आती है तो और ज्यादा संतुष्टि के लिये छाती का एक्स-रे भी कराया जाता है।

एक्स-रे जाँच से, पल्मोनरी टीबी पूर्ण रूप से सुनिश्चित की जा सकती है, हालाँकि शरीर के दूसरे हिस्सों में आई टीबी का इससे पता नहीं चलता। X-Ray में आसानी से दिख जाता है कि आपके फेफड़ों में टीबी के छोटे-छोटे पैच या धब्बे उपस्थित हैं या नहीं। यह धब्बे वह स्थान हैं जहाँ बैक्टीरिया कालोनी बनाकर रहता है।

अगर एक्स-रे रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो आप फेफड़ों की टीबी से संक्रमित हैं, अन्यथा नहीं। टीबी की जाँच के साथ-साथ, आपको HIV AIDS की जाँच भी करानी चाहिये। क्योंकि एड्स से पीड़ित 15 प्रतिशत लोगों में टीबी का संक्रमण, मुख्य रूप से उभरता है।

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