Childcare Tips in Hindi from Chanakya Niti

 

“ऐसे किसी भी व्यक्ति को बच्चों को दुनिया में नहीं लाना चाहिये जो उनकी प्रकृति और शिक्षा में सुधार हेतु अंत तक अडिग रहने को तैयार नहीं है।”
– प्लेटो

 

Childcare Tips in Hindi from Chanakya Niti
अपने बच्चों की जिंदगियों को आसान बनाकर उन्हें अक्षम मत बनाइये

Quality of Good Parents and Children माता-पिता और अच्छी संतान के गुण : –

यदि हम प्राचीन भारत के इतिहास पर दृष्टि डालें और श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रवण कुमार, पांडव, हरिश्चंद्र, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य, स्वामी दयानन्द, मदन मोहन मालवीय, अरविन्द घोष, श्यामाचरण लाहिड़ी जैसे महापुरुषों के जीवन और कृतत्व का अवलोकन करें, तो पाएंगे कि अगर पति-पत्नी संतान के रूप में एक ऐसे पुत्र की अभिलाषा करते हैं, जो न केवल अपना जीवन सफल बनाये बल्कि उन्हें और उनके पूर्वजों को भी गौरवान्वित होने का अवसर प्रदान करें, तो इसमें बुराई क्या है?

ग्रामीण भारत में आज भी यह कहावत प्रचलित है कि एक सत्पुत्र सात पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। शायद यह विचारधारा भी उन महत्वपूर्ण कारणों में से एक है, जो प्रायः सभी भारतीय माता-पिता के मन में पुत्र लालसा को जन्म देती रही है। हालाँकि अनेकों लोगों को यह बिलकुल भी उचित प्रतीत नहीं होगा कि पुत्र और पुत्री में किसी प्रकार का विभेद किया जाय।

ऐसे लोगों से हमारा बस यह कहना है कि इस लेख में हम केवल अच्छे पुत्र के गुण और कर्तव्य के विषय में बता रहे हैं, जिनका वर्णन आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रन्थ में किया है। इसलिये यह लेख बिना किसी दोषदृष्टि के ही पढ़ें। निःसंदेह प्रत्येक माता-पिता अपने दाम्पत्य जीवन की पूर्णता के लिये संतान रूप में एक आदर्श जीव की ही चाह रखते हैं।

जिसकी पूर्ति करना प्रत्येक अच्छी संतान का कर्तव्य है तभी वह माता-पिता के भारी ऋण से उऋण हो सकती है। जिन संतानों के कारण माता-पिता को दुःख, अपमान व् पीड़ा सहनी पड़ती है और उन्हें समाज में नीचा देखना पड़ता है, उनका जीवन एक पशु से भी अधिक निकृष्ट कहा गया है, यहाँ तक कि ऐसी संतानों का अपना जीवन भी भयंकर रूप से दुखमय होता देखा गया है।

निर्दोष माता-पिता को दुःख देकर कोई संतान सुख से नहीं रह सकती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को एक अच्छा पुत्र या पुत्री बनने का प्रयास करना चाहिये और एक गौरवशाली जीव होने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहिये। हमें आशा है कि आचार्य चाणक्य द्वारा प्रतिपादित नीचे दिए जा रहे चाणक्यनीति के इन अद्भुत सूत्रों से शायद यह तथ्य और अधिक प्रकट हो सकेगा –

6 Childcare Formulas from Chanakya Niti : –

 

1. पुत्राश्च विविधैः शीलैनिर्योज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसंपन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

अर्थ – जिस प्रकार एक ही उत्तम वृक्ष अपने पुष्पों की सुगंध से संपूर्ण वन को सुगंधित बना देता है; उसी तरह एक ही सुपुत्र अपने शील और सद्गुणों से संपूर्ण कुल को यशस्वी और प्रसिद्द बना देता है। सभी जानते हैं कि पुष्पों की सुगंध वायु के साथ दूर तक जाती है। इसलिये एक ही वृक्ष समस्त वन को सुशोभित करने में समर्थ होता है, लेकिन व्यक्ति के सदगुणों की चर्चा तो चारों दिशाओं में फैलती है।

इस तरह यदि कुल में एक भी गुणवान संतान उत्पन्न हो जाय, तो संपूर्ण कुल की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जाते हैं। अतः सभी विवाहित व्यक्तियों को एक उत्तम संतान उत्पन्न करने के लिये विशेष प्रयास करना चाहिये। क्योंकि कामवासना से प्रेरित होकर एक नये जीव की उत्पत्ति करने में तो पशु भी समर्थ हैं, फिर इसमें मनुष्य के लिये गौरव करने लायक क्या बात है?

गौरवशाली तो वही माता-पिता हैं जो इस पृथ्वी पर एक ऐसे जीव की अभिव्यक्ति का माध्यम बने हैं, जिसने अपने शील और सद्गुणों से उनके और अपने पूर्वजों का मान बढाया है और इस धरती पर दूसरे जीवों का भी सहायक बना है।

 

2. माता शत्रुः पिता बैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

अर्थ – जिस प्रकार जलता हुआ एक ही सूखा वृक्ष सारे वन को जला कर राख बना देता है, ठीक वैसे ही कुपुत्र भी संपूर्ण कुल को उसी वन की तरह दग्ध कर देता है। अर्थात संपूर्ण कुल को अपने कुकर्मों से कलंकित कर देता है। आचार्य चाणक्य ने कुपुत्र की, जलते सूखे वृक्ष के साथ तुलना उचित ही की है। क्योंकि न तो वह अपने परिवार के सदस्यों को ही सुखपूर्वक जीने देता है और न ही दूसरे प्राणियों को।

वह वंश की समस्त उच्च मान-मर्यादाओं को नष्ट कर देता है, जिससे संसार में न केवल उसे अपयश मिलता है, बल्कि उसके कारण संपूर्ण कुल को भी लज्जित होना पड़ता है। अतः प्रत्येक सद्गृहस्थ का यह कर्तव्य है कि वह अपनी संतान को जन्म से ही श्रेष्ठ संस्कारों की शिक्षा दे और उसे एक शीलवान, विद्वान् व्यक्ति बनने के लिये प्रोत्साहित करे।

 

3. लालनाद बहवो दोषास्ताडनाद बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताड़येन्न तु लालयेत॥

अर्थ – जिस प्रकार एक अकेला चाँद घोर अँधेरी रात को भी अपने प्रकाश से जगमगा देता है, अंधकार दूर कर उसे सुहानी बना देता है; उसी तरह से एक ही शीलवान, विद्वान और अच्छे स्वभाव का सुपुत्र अपने सद्गुणों, आचरण और सुयश से संपूर्ण कुल को गौरवान्वित कर देता है और समस्त परिवार को आह्लादित कर देता है। जैसे अँधेरी रात किसी को अच्छी नहीं लगती, वैसे ही कुपुत्र भी किसी को नहीं सुहाता।

आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सत्पुत्र के गौरव को रेखांकित किया है। चंद्रमा समस्त संसार का अन्धकार दूर करता है और उसे सुखी बनाता है; वैसे ही एक श्रेष्ठ, सुयोग्य और चरित्रवान संतान न केवल अपने माता-पिता, बल्कि अपने समस्त पूर्वजों को, संपूर्ण कुल को यशस्वी बनाती है। उन्हें सम्मानित महसूस करने का एक अलभ्य अवसर प्रदान करती है। इतना ही नहीं, समाज भी उनके उच्चतर कार्यों से लाभ पाता है।

 

4. एकेनाअपि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं ताडवनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥

अर्थ – अपने आचरण से शोक और सन्ताप देने वाले बहुत से पुत्रों की अपेक्षा, तो कुल की प्रतिष्ठा को बढाने वाला और समस्त परिवार को सुख देने वाला एक ही पुत्र अधिक अच्छा है। यहाँ आचार्य ने संख्या की अपेक्षा गुण को अधिक महत्व देते हुए, एक गुणवान पुत्र को कई निक्कमे पुत्रों की अपेक्षा अधिक योग्य बताया है।

जैसे सौ दुष्ट कौरवों की अपेक्षा पाँच पांडव संख्या में कम होते हुए भी, गुणों में उनसे कहीं अधिक श्रेष्ठ थे। कष्ट सहते हुए भी अपने धर्म पर अटल रहने के कारण, अपने शील और सद्गुणों का त्याग न करने के कारण, समस्त संसार आज भी उनका सम्मान करता है।

अपने सत्कर्मों और त्याग से उन्होंने अपने पूर्वजों की कीर्ति को इतने उच्च स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया कि वह आज हजार वर्ष बीत जाने पर भी फीकी नहीं पड़ी है और इतिहास भी यही सिद्ध करता है कि दुष्टता चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो जाय; अंत में विजय गुणों की ही होती है, संख्या/बल की नहीं।

 

5. एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वहिनना।
दह्यते तदवनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

अर्थ – व्यक्ति के केवल एक गुणवान पुत्र का होना, सैकड़ों गुणहीन पुत्रों से अधिक अच्छा होता है। ठीक वैसे ही जैसे एक अकेला चाँद रात्रि के समस्त अंधकार को दूर कर देता है, लेकिन हजारों तारे मिलकर भी उस अंधकार को दूर नहीं कर पाते। यहाँ आचार्य ने गुणवान पुत्र की तुलना चाँद से की है। क्योंकि एक शीलवान पुत्र अपने सत्कर्मों से संपूर्ण कुल का नाम रोशन करता है, यश-प्रतिष्ठा अर्जित करता है।

लेकिन सैकड़ों गुणहीन मूर्ख पुत्र मिलकर भी कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं कर सकते, बल्कि अपनी दुर्बुद्धि से वैसे कार्य कर बैठते हैं जो कुल को कलंकित करते हैं और दूसरों को कष्ट देते हैं। यही कारण है कि श्रेष्ठ व्यक्ति ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि यदि उन्हें संतान प्राप्त हो, तो एक शीलवान पुत्र ही मिले, अन्यथा अच्छा है कि संतान ही न हो।

 

6. एकेनाअपि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥

अर्थ – अज्ञानी और मूर्ख पुत्र के चिरायु होने की अपेक्षा उसका जन्म लेते ही मर जाना अधिक अच्छा है, क्योंकि जन्म लेकर तुरंत मरने वाले का दुःख तो थोड़े समय तक ही रहता है। लेकिन मूर्ख पुत्र तो जब तक जीवित रहता है, तब तक सबको दुःख देता रहता है। इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मूर्ख संतान के जीवन को धिक्कार योग्य माना है और यह उचित भी प्रतीत होता है।

वास्तव में ऐसी संतान को सुपुत्र किसी प्रकार से नहीं कहा जा सकता जो जड्मूर्ख है, जिसमे न ज्ञान है न बुद्धि, न विवेक है न शील। ऐसा प्राणी जब तक जीता है तब तक न केवल अपने परिवार के लिये, बल्कि जहाँ भी वह निवास करता है वहां के निवासियों के लिये भी समस्याएँ ही उपस्थित करता रहता है। ऐसी संतान इस धरती पर बोझ ही है। अतः आचार्य ने उसकी मृत्यु को उसके लम्बे जीवन से अधिक श्रेष्ठ माना है।

“अपने बच्चों की जिंदगियों को आसान बनाकर उन्हें अक्षम मत बनाइये।””
– रॉबर्ट ए. हेनलिन

 

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