Great Personality in Hindi: Founder of Red Cross

 

“सारा संसार उस व्यक्ति के लिए रास्ता छोड़कर खड़ा हो जाता है, जो यह जानता है कि वह कहाँ जा रहा है।”
– अज्ञात

 

Great Personality in Hindi: Founder of Red-cross
एक सच्चा इंसान जो सिर्फ इंसानियत के लिये जिया

Founder of Red Cross रेड क्रॉस के संस्थापक : –

Red Cross के नाम से, तो शायद आप सब परिचित ही होंगे। अगर नहीं भी जानते है, तो आपने Doctors के Clinics और Ambulance पर लगे हुए लाल रंग के क्रास (+)के निशान को तो देखा ही होगा। यह चिंह वास्तव में ईसाईयों के धार्मिक प्रतीक चिंह Cross का ही एक स्वरुप है, जिसे Red Cross ने अपने संगठन की पहचान के रूप में प्रयुक्त किया है। Red Cross के द्वारा ही इस चिंह का प्रचार, सारे संसार में, जीवन रक्षा के प्रतीक चिंह के रूप में हुआ है।

Red Cross एक International Organization है, जिसका मुख्य उद्देश्य युद्ध या किसी भीषण आपदा के समय लोगों की जीवन रक्षा करना है। यह संगठन सारे संसार में फैला हुआ है, पर जो महापुरुष इस Global Humanitarian Organization के founder थे, उन्हें अपने जीवनकाल में इसका वैसा श्रेय न मिल सका, जैसा मिलना चाहिए था।

उनका सारा जीवन अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सतत संघर्ष करने और कठिन परिस्थितियों का सामना करने में ही बीता था। जैसा कि प्रत्येक सामाजिक आन्दोलन के साथ होता है, समाज सदा उस व्यक्ति का विरोध करता है, जो उसे बदलने की दिशा में काम करता है। यही उस महान व्यक्ति, Jean Henry Dunant के साथ भी हुआ।

न जाने कितने कष्ट सहे, न जाने किस-किस का विरोध सहना पड़ा, पर उस महात्मा ने जीवन के उद्देश्य से कोई समझौता नहीं किया। लेकिन उनके जीवन के अंतिम समय में संसार ने उनका मूल्य समझा और सन 1901 के प्रथम नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया।

Early Life of Jean Henry Dunant डूनांट का प्रारम्भिक जीवन : –

Jean Henry Dunant का जन्म Switzerland के खूबसूरत जेनेवा शहर में 8 मई सन 1828 के दिन एक businessman family में हुआ था। वे अपने माता-पिता Jean-Jacques Dunant और Antoinette Dunant-Colladon की पहली संतान थे। उनका परिवार एक बहुत धर्मपरायण काल्विन मतवादी परिवार था, जिसका जेनेवा समाज पर बड़ा प्रभाव था।

उनके माता-पिता Social Work को बहुत महत्व देते थे, इसलिए ज्यादातर समय उनके पिता अनाथों और असहायों की मदद करने और माँ बीमारों और गरीबों की सेवा में बिताती थी। उनके पिता एक अनाथाश्रम और जेल में काम करते थे। इस तरह बचपन से ही उन पर धार्मिक संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा और 18 वर्ष की आयु में वे Geneva की Charity Society में शामिल हो गए।

वे उस दौर में बड़े हुए, जब यूरोप में धार्मिक जागरण का समय चल रहा था, जिसे Réveil के नाम से जाना जाता है। सन 1849 में जब वे 21 वर्ष के थे, तो poor grades के चलते उन्हें college छोड़ना पड़ा। अपनी पढाई पूरी करने से पहले ही, वे Geneva के एक bank में apprentice करने लगे और बाद में वहीँ पर नौकरी भी। पर उनका अधिकतर समय जेलों की visit करने और social work में ही बीतता था।

चूँकि समाज के लिए कुछ करने का जज्बा, उनमे बचपन से हिलोरे मारता था, इसलिए कुछ समय बाद ही उन्होंने अपने मित्रों के साथ “Thursday Association” नाम के एक संगठन की स्थापना की, जो कुछ नवयुवकों का समूह था, जिसका उद्द्देश्य गरीबों की मदद करना था और जो Bible के मतों को मानते थे। सन 1852 में उन्होंने YMCA की Geneva Branch की स्थापना की।

Great Moments of Transformation परिवर्तन के महान क्षण : –

सन 1853 में उन्हें company की ओर से Algeria और Tunisia की यात्रा पर जाना पड़ा, जहाँ उन्हें Swiss Colony “Setif” का चार्ज लेना था। काम का कम अनुभव होते हुए भी उन्होंने अपनी responsibility को बहुत अच्छी तरह से निभाया। सन 1856 में उन्होंने ‘Financial and Industrial Company’ के नाम से एक firm बनाई थी।

लेकिन पानी और जमीन पर अधिकार के मुद्दे पर मतभेद होने और Local Authorities के co-operative न होने से Dunant ने सीधे French Emperor Napoleon III के सामने Appeal करने का निर्णय लिया, जो उस समय Lombardy में अपनी सेना के साथ आया हुआ था।

Battle of Solferino सोल्फेरिनो का युद्ध : –

Napoleon III वहाँ Northern Italy में Piedmont-Sardinia की तरफ से Austria के विरुद्ध लड़ रहा था। Napoleon उस समय एक छोटे शहर Solferino में रहता था। Dunant ने पहले तो Napoleon की प्रशंसा में एक किताब भेजी और बाद में स्वयं उससे मिलने Solferino गये। Dunant 24 June 1859 की जिस शाम को Solferino पहुंचे थे, उसी दिन दोनों सेनाओ के बीच भयंकर युद्ध हुआ था।

उस युद्ध में लगभग 23000 घायल और मरे हुए लोग धरती पर पड़े हुए थे, जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इस घटना से Dunant का दिल दहल उठा। इससे पहले उन्होंने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। फिर कभी लोगो को इस तरह न मरना पड़े, इसके लिए उन्होंने civilian population, विशेषकर औरतों और बच्चो की मदद से एक organization बनाने का decision लिया।

जिसका उद्द्देश्य बीमार और घायल सैनिकों की मदद करना था। चूँकि उन्हें आवश्यक सामग्री का अभाव रहता था, इसलिए Dunant ने खुद ही आवश्यक सामग्री जुटाने और temporary hospitals बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के सभी को सबकी समान भाव से सेवा करने को कहा, जिसका Slogan था ‘Tutti fratelli'(All are brothers).

Idealistic Attitude of Dunant डूनांट का आदर्शवादी दृष्टिकोण : –

Geneva लौटने के कुछ समय बाद Dunant ने सन 1862 में अपने अनुभवों पर एक किताब लिखी, जिसका नाम था “A Memory of Solferino”। इसे उन्होंने अपने खुद के expenses पर distribute किया। इस किताब में उन्होंने युद्ध, उस पर आने वाले खर्च और उसके बाद की terrible circumstances का वर्णन किया था।

इसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि future में एक ऐसा Neutral Organization बनाया जाये, जो घायल सैनिकों की मदद कर सके। उन्होंने इस किताब को पूरे यूरोप में leading Political Parties और Military Regiments में बंटवाया। Dunant अपने इस Idea को सबके सामने रखने के लिए सारे यूरोप में घूमे।

अब वे प्रसिद्ध हो चुके थे और राज्यों के मुखिया, राजा तथा European Courts के राजकुमार भी उनका सम्मान करते थे। उनकी किताब की सभी ने दिल से सराहना की और “Geneva Society for Public Welfare” के President “Gustave Moynier ने इस किताब के विचारों पर संगठन की एक meeting रखी।

सभी members ने उनकी recommendations को परखा और मुक्तकंठ से उनकी सराहना की। इस Meeting में 5 लोगों की एक Committee बनाई गई, जिसका उद्द्देश्य इन suggestions के Implementation की संभावनाओं को final shape देना था। इस committee के members में Dunant को भी शामिल किया गया।

Foundation of the Red Cross रेड क्रॉस की स्थापना : –

17 February 1863 की first meeting को ‘International Committee of Red Cross’ की founding date माना जाता है। लेकिन जल्दी ही Gustave Moynier और Dunant के बीच अपने अलग-अलग personal plans और vision के कारण मतभेद और झगड़े बढ़ने लगे। Moynier ने Dunant के plans को unfeasible बताया और उन्हें उन पर काम न करने की सलाह दी।

पर Dunant High-Ranking Political और Military Figures के साथ अपनी यात्राओं और वार्ताओं में अपने Idea की बात जोर से उठाते थे। इस कारण से व्यवहारिक सोच वाले Moynier और Visionary Idealist Dunant के बीच झगडा और भी बढ़ गया और Moynier ने सीधे-सीधे Dunant की Leadership को ही challenge कर दिया।

Resign From Committee समिति से त्यागपत्र देना : –

सन 1863 में Geneva में आयोजित की गयी Committee की meeting में 14 States ने भाग लिया। सन 1864 में Swiss Government के द्वारा आयोजित की गयी, Diplomatic Conference में First Geneva Convention की नीव रखी गयी, लेकिन Dunant को कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गयी। Geneva में फैली सामाजिक अराजकता ने भी उन्हें International Committee से अलग होने को मजबूर किया।

सन 1868 में उनकी माँ की मृत्यु हो गई। उसी साल उन्हें YMCA से भी निकाल दिया गया। March 1867 में उन्होंने अपने Home city Geneva को छोड़ दिया और फिर कभी नहीं लौटे। अगले कई वर्षों तक, Moynier ने अपने प्रभाव का पूरा इस्तेमाल करते हुए, इस बात का भरसक प्रयास किया कि Dunant को अपने साथियों और सहायकों से कोई मदद न मिल सके।

उदाहरण के लिए – Paris World’s Fair में Sciences Morales का Gold Medal Prize Dunant को मिलना पहले से ही तय था, लेकिन यह Moynier, Dufour, और Dunant को सम्मिलित रुप से दिया गया, ताकि सारी की सारी prize money Committee के खाते मे जाये और Dunant को कुछ भी न मिल सके। इस तरह देखा जाय, तो Dunant को किसी भी तरफ से कोई मदद नहीं मिल पा रही थी, फिर भी उन्होंने अपना धैर्य टूटने न दिया और अपने प्रयास में लगे रहे।

Great Struggle of Jean Henry Dunant डूनांट का कठोर संघर्ष : –

अपने Idealistic Views के कारण Algeria में Dunant का Business मंदा पड़ने लगा और एक financial firm के Scandal की वजह से दिवालिया हो जाने पर Geneva Trade Court ने Dunant की निंदा की और धोखे से कारोबार करने के कारण, सन 186 में उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया। उस firm में Investment होने के कारण, उनके परिवार और मित्रों को बहुत घाटा उठाना पड़ा।

Dunant पूरी तरह से बर्बाद हो चुके थे और उन पर उस समय लगभग 1 Million Swiss Francs का भारी क़र्ज़ था। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें public benches पर सोना पड़ा। हालाँकि Napoleon III ने उन्हें मदद की पेशकश की थी। 25 August 1868 को उन्होंने Secretary के पद से इस्तीफा दे दिया। कुछ ही दिन बाद Moynier के कारण उन्हें Committee से ही पूरी तरह निकाल दिया गया।

Days of Poverty गरीबी के दिन : –

Dunant, Paris चले गए, जहाँ पर उन्होंने मुफलिसी में दिन काटे। हालाँकि, वहां भी वे अपने Humanitarian Ideas और Plans पर काम करते रहे। Franco-Prussian War (1870–1871)के दौरान उन्होंने Common Relief Society की स्थापना की। उन्होंने International conflicts को निपटाने के लिए एक International Court के निर्माण की दिशा में भी काम किया था।

कुछ वर्ष बाद उन्होंने एक World Library बनाने के लिए प्रयास किया, जो बाद में UNESCO के रूप में सामने आया। अपने Ideas को मूर्त रूप देने के लिए, उन्होंने अपनी financial condition और income पर भी ध्यान नहीं दिया, जिस कारण उनकी आर्थिक स्थिति और ज्यादा ख़राब हो गयी। वे गरीबी में रह रहे थे, फिर भी अपने noble aim के लिए 1874 और 1886 के बीच उन्होंने यूरोप के कई देशों की यात्राए की।

Austria, Netherlands, Sweden, Prussia और Spain की National Red Cross societies के honorary member होने के बावजूद उन्हें Red Cross Movement की Official Meetings में कोई महत्व नहीं दिया जाता था, जबकि Red Cross तेजी से दूसरे देशों में भी फैलता जा रहा था। अगले कई वर्षों तक, एक समय के Famous Businessman रहे Dunant को भटकते हुए और भीषण गरीबी में दिन काटने पड़े।

Dunant as A Great Humanitarian एक महान मानवतावादी के रूप में : –

Dunant के अथक प्रयासों के कारण 1 फ़रवरी सन 1875 को लंदन में “नीग्रों और गुलामों के व्यापार के संपूर्ण और निर्णायक अंत” के विषय पर एक International Congress आयोजित की गयी। उन्होंने Alsace, Germany और Italy की पैदल यात्राएं की, जहाँ वे अपने कुछ मित्रों की मेहमाननवाज़ी और charity पर निर्भर रहे।

सन 1887 में उन्हें अपने दूर के family members से हर महीने कुछ financial support मिलने लगी। आखिर में उसी वर्ष वे Switzerland के एक गाँव Heiden चले गए, जहाँ उन्होंने बाकी का जीवन बिताया। लेकिन environment बदलने के कारण वे बीमार पड गए। वहां उन्हें एक local hospital में शरण मिली, जहाँ एक Journalist ‘Georg Baumberger’ ने उन्हें खोज निकाला।

September 1895 में Georg Baumberger (जो एक famous newspaper के chief editor थे), Dunant से Heiden में मिले और उन्होंने “Red Cross के Founder – Henry Dunant” के title से एक article निकाला। बाद में Germany की एक प्रसिद्ध पत्रिका ने भी उन पर एक article लिखा, और फिर ये लेख यूरोप के दूसरे कई publications ने भी छापे।

इस article ने उन्हें पूरे यूरोप में famous कर दिया। सारे संसार से लोगों के सहानुभूतिपूर्ण सन्देश Dunant तक पहुँचने लगे और रातों-रात वे फिर से और ज्यादा प्रसिद्ध और सम्मानित हो गए। सन 1897 में Rudolf Miller (जो Stuttgart में एक अध्यापक थे) ने Red Cross के Origin पर एक पुस्तक लिखी, जिसमे उन्होंने Dunant के योगदान पर जोर दिया था और Solferino के युद्ध की चर्चा भी की थी।

उन्हें एक Swiss Prize मिला और Pope ने भी उनकी प्रशंसा की। कई अन्य लोगो से सहायता मिलने के कारण, अब उनकी financial condition भी सुधरने लग गयी थी। इसके बाद Dunant ने कई लेख लिखे और स्त्रियों के अधिकारों के लिए सन 1897 में एक संगठन “Green Cross” की स्थापना भी की।

Nobel Peace Prize शांति का नोबेल पुरस्कार : –

सन 1901 में Dunant को उनके extraordinary works के लिए पहले Noble Peace Prize से सम्मानित किया गया। यह prize उन्हें French शांतिदूत Frederic Passy के साथ सयुंक्त रूप से दिया गया, जो Peace League के founder थे। Moynier और ‘International Committee of Redcross’ को भी इस Prize के लिए Nominate किया गया था।

लेकिन selection process के दौरान ज्यादातर लोगो ने Dunant का ही समर्थन किया। कुछ लोगों ने Red Cross की यह कहकर आलोचना की कि इससे युद्ध को बढ़ावा मिलेगा। इसलिए Muller ने Committee को एक पत्र लिखा, जिसमे उन्होंने पुरस्कार को Dunant और Passy के बीच बाँटने की सलाह दी।

इसके अलावा, उन्होंने यह भी लिखा कि यदि Dunant को prize देना ही है, तो उनकी उम्र और बुरे स्वास्थ्य को देखते हुए इसे जल्द से जल्द दिया जाये। International Committee ने ‘International Red Cross Movement’ की स्थापना करने और Geneva Convention शुरू करने के लिए उनकी यह कहते हुए सराहना की –

“दूसरा कोई भी व्यक्ति इस सम्मान को पाने का उतना हकदार नहीं है, जितने कि आप। क्योंकि यह आप ही थे, जिसने 40 साल पहले युद्धभूमि में घायल पड़े लोगों, की मदद के लिए एक International Organization की नीव रखी थी। बिना आपके समर्पण के Red Cross, जो 19th century का Supreme Humanitarian Achievement है, का अस्तित्व शायद ही संभव रहा होता।“

True Meaning of Success सफलता का वास्तविक अर्थ : –

अगले कई वर्षों में उन्हें, अनेकों awards दिए गए। सन 1903 में University of Heidelberg की ओर से उन्हें doctorate की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया। अपनी वसीयत में उन्होंने Nobel prize में मिले पैसे को, Heiden Nursing Home को दान कर दिया था, जिसका उपयोग कई free beds के arrangement में किया जाना था, ताकि उस क्षेत्र के गरीब मरीजों को हमेशा निशुल्क बिस्तर मिल सके।

कुछ पैसे उन्होंने अपने मित्रों और Norway तथा Switzerland के charitable organizations को दे दिये। बचे हुए पैसे को उन्होंने अपने कर्ज़ेदारों को दे दिया, ताकि कुछ ऋण चुकता हो सके। पर उनकी मृत्यु तक, उन्हें यह अफ़सोस बना रहा कि वह अपना क़र्ज़ नहीं चुका सके। 8 May, जो उनका Bitrthday भी है, World Red Cross और Red Crescent Day के रूप में मनाया जाता है।

उनके जीवन पर कुछ फिल्मों का भी निर्माण किया गया है। वे अपनी मृत्यु के समय तक Heiden के nursing home में ही रहे। उनकी आखिरी इच्छा के अनुसार, उन्हें बिना किसी ceremony के Zurich में दफना दिया गया। Heiden के उस पुराने nursing home में अब Henry Dunant Museum बना हुआ है।

Last Days of Life जीवन के अंतिम दिन : –

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, वह Depression और Paranoia के शिकार हो गए थे, क्योंकि उनके कर्ज़ेदार और Moynier अब भी उनका पीछा कर रहे थे। नौबत यहाँ तक आ गयी थी कि Dunant अपने लिए आने वाले भोजन को पहले nursing home के cook को अपनी आँखों के सामने taste कराते, ताकि संभावित जहर के खतरे से बचा जा सके।

30 October 1910 के दिन, मानवता के इस महान पुजारी का निधन हो गया। उनके आखिरी शब्द थे कि “मानवता कहाँ चली गयी है?” Jean Henry Dunant को गए हुए 100 वर्ष से भी ऊपर का समय हो चला है, पर आज भी उनकी अमिट कीर्ति बनी हुई है। उनके द्वारा स्थापित किया हुआ International Red Cross Organization, आज सारे संसार में फ़ैल चुका है।

150 से भी ज्यादा देशो में Red Cross Society, अपने कार्यों में तल्लीन है, जिन्होंने युद्ध और अन्य आपदाओं में तड़पती मानवता की अहर्निश सेवा की है। यह कैसा विरोधाभास है, कि स्वार्थ और अहंकार में चूर होकर, विश्व के कुछ राष्ट्र अपनी संतानों का खून बहाने से गुरेज नहीं करते और पिशाचों जैसा बर्ताव करते हैं। वही दूसरी ओर Henry Dunant जैसे व्यक्ति है, जो दूसरों की पीड़ा मिटाने के लिए तिल-तिल मरते है।

Geneva और दूसरे कई स्थानों में, उनके नाम पर कई गलियों और स्कूलों का नामकरण हुआ है। उनकी स्मृति में हर 2 वर्ष बाद International Red Cross द्वारा दिया जाने वाला Henry Dunant Medal इसका सबसे बड़ा सम्मान है। इस महापुरुष के प्रति हमारी बस यही श्रद्धांजलि हो सकती है कि हम सभी Universal Brotherhood (विश्व-बंधुत्व) की भावना का विकास करे और उनके त्याग को पूर्णता तक पहुंचाए।

“जो महान होते है, उन्हें दूसरों की विपत्ति में अपनी विपत्ति का विचार नहीं रहता।”
– शरतचंद

 

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