Swami Vivekananda Quotes in Hindi on Youth Day

 

“मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना ऊँचा और श्रेष्ठ बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान और शक्तिशाली बनना होगा, मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना होगा। इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकेगा।”
– स्वामी विवेकानंद (वि.स.6/352)

 

आज भारत का राष्ट्रीय युवा दिवस है। वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल की सरकार की पहल पर, केंद्र सरकार ने सन 1984 में 12 जनवरी के दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित कर दिया था। और सन 1985 से यह भारत में हर साल, स्कूलों, कॉलेजों, सेमिनार, महोत्सव और जलसों में युवा चेतना दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।

हमारे कई मित्रों को शायद इस तारीख की महत्ता के विषय में कुछ पता नहीं होगा, और न ही वह जानते होंगे कि आखिर यह युवा दिवस क्या है और किस महान व्यक्ति से इसका संबंध है? आप भले ही 12 जनवरी के दिन को भूल जाँय, लेकिन हमें उम्मीद है कि आपने अपने जीवन में कभी न कभी तो इस महापुरुष का नाम अवश्य ही सुना होगा जो भारत का गौरव है, जिससे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने प्रेरणा प्राप्त की थी।

और जिसने अपने गौरवशाली देश के ज्ञान, संस्कृति और विश्वबंधुत्व की भावना से दुनिया का परिचय कराया था। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं महान स्वामी विवेकानंद की, जिनका जीवन युवाओं के लिये आदर्श है। 12 जनवरी सन 1963 को इस धरा पर जन्मे इस योगी का जन्मदिन पूरा देश हर्षोल्लास से मनाता हैं। आज हम भी उनके ओजस्वी विचारों को आपके सामने प्रस्तुत करते हुए भारत के इस महान सपूत के प्रति अपनी कृतज्ञता और श्रद्धा को प्रकट कर रहे हैं –

25 Blatant Thoughts of Swami Vivekananda –

प्रायः देखने में आता है कि अच्छे लोगों पर अक्सर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफानों के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों पुरानी चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता। (वि.स.१/३८९)

जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो। उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर बिल्कुल ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो। वे जितना शीघ्र बह जाएँ, उतना अधिक अच्छा है।

ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं, इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

मन का विकास करो और उसका संयम करो। उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो, उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय – एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

सभी मरेंगे – साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। इस देश को चाहिये चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं। निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

Ignite Your True Potential –

जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उसे उससे बहुत आगे जाना पड़ेगा, लेकिन साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

हे मित्र, तुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपने ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो, ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं, प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यति लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ! (वि.स. 6/8)

तुम अपनी अंतरात्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करोगे कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम कदापि मुक्त नहीं हो सकते।

ज्ञान शाश्वत, सनातन और सदा निवर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक मंजिल न प्राप्त हो जाये।

हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।

किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स.4/320)

लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। (वि.स.6/88)

मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो — यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, ईश्वर मेरे साथ हैं इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ। (विवेकानन्द साहित्य खण्ड – पृष्ठ 4 -315)

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