Motivational Story of Cow and Tiger in Hindi

 

“एक बार साँझ के समय एक नयी ब्याही गाय जंगल से निकलकर तेजी से अपने घर की तरफ दौड़ती जा रही थी कि अचानक एक शक्तिशाली बाघ बीच रास्ते में आकर खड़ा हो गया।”

पुराणों में एक से बढ़कर एक नैतिक कहानियाँ पढने-सुनने को मिलती हैं, जिनमे आदर्शों, जीवन मूल्यों, त्याग और सिद्धांतों का निचोड़ समाहित है। ऐसी ही एक कहानी (Cow and Tiger Story in Hindi) के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं। यह घटना सत्य युग की है। यह सृष्टि का वह कालखंड है, जिसमे चारों ओर सत्य की ही प्रतिध्वनि गूँजती है। इस युग में सभी प्राणी सत्य पर स्थिर रहकर अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।

इस युग में न सिर्फ मनुष्य, बल्कि पशु-पक्षी भी सत्य का ही आचरण करते हैं, इसीलिये इसे सत्य युग कहते हैं। यह कहानी है एक सत्यनिष्ठ गाय और बाघ की, जिन्होंने सत्य पर दृढ रहकर, इतना ऊँचा आदर्श स्थापित किया कि वह इंसानों से भी आगे बढ़ गये। एक बार साँझ के समय एक नयी ब्याही गाय जंगल से निकलकर तेजी से अपने घर की तरफ दौड़ती जा रही थी कि अचानक एक शक्तिशाली बाघ बीच रास्ते में आकर खड़ा हो गया।

उसे देखकर गाय एकदम सहम गयी, क्योंकि वह जानती थी कि बाघ के रूप में उसका काल ही रास्ते में आकर खड़ा हो गया है और वह उसे मारे बिना नहीं छोड़ेगा। लेकिन उसे अपने जीवन की नहीं, बल्कि अपनी संतान, उस बछड़े की चिंता थी जो एक दिन पहले ही जन्मा था। अपनी मजबूरी देखकर, उस गाय की आँखों में आँसू आ गये।

Cow and Tiger Story in Hindi

कोई और उपाय न देख उसने बाघ से ही विनती करने का निश्चय किया, क्योंकि अब उसके और उसकी संतान के जीवन का भाग्यविधाता वही था। वह बाघ से बोली – “हे वनराज! कृपया मुझे जाने दो। मेरा बछड़ा घर पर मेरा इंतजार कर रहा है। उसने कुछ ही समय पहले जन्म लिया है और वह मेरे दूध पर ही जिन्दा है। अगर तुम मुझे मार डालोगे, तो निश्चित रूप से वह भी मर जायेगा।”

कृपया मेरी विनती सुनकर मुझे जाने की आज्ञा दे दो, ताकि अंतिम बार मै अपने बच्चे को अपना दूध पिला आँउ। फिर मै स्वयं ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे आसानी से खा लेना, मै सत्य की शपथ खाकर कहती हूँ। बाघ मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोला – “हे गौ! मै पिछले कई दिन से भूखा हूँ और आज संध्या के समय तुम मुझे आहार के रूप में प्राप्त हुई हो।

अगर मै तुम्हे ऐसे ही छोड़ दूँगा, तो मुझे आज भी भूखा ही रह जाना पड़ेगा। इससे मेरा भी जीवन संकट में पड़ सकता है। अब तुम ही बताओ, भला मै इतनी मुश्किल से हाथ में आये शिकार को कैसे जाने दे सकता हूँ।” गौ बोली – “हे वनराज! मै सिर्फ तुमसे थोड़ी देर इंतजार करने के लिये ही कह रही हूँ। दो घडी पश्चात मै निश्चित रूप से तुम्हारे समक्ष आ जाऊँगी, तुम मेरा विश्वास तो करो।”

सत्यवादी गाय और दयालु बाघ की कहानी

बाघ बोला – “हे गौ! अपने प्राण हर प्राणी को प्रिय होते हैं। ऐसा कोई नहीं है जो सामने आयी मौत को देखकर भी उससे बचने का प्रयास न करे। अरे पशु-पक्षी तो क्या मनुष्य भी सामने आई मृत्यु को देखकर उससे थर-थर काँपते हैं। और तो और जिन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य पा लिया है और जो साधारण मनुष्यों से भी बहुत उच्च समझे जाते हैं, वह संत और महात्मा भी अपने जीवन को बरकरार रखने की इच्छा रखते हैं।”

“फिर भला मै कैसे तुम्हारी इस बात का विश्वास कर लूँ कि तुम यहाँ से जाने के बाद वापस मेरे पास लौट ही आओगी? क्या तुम्हे अपने प्राणों से मोह नहीं है?, क्या तुम्हे मौत का डर नहीं है?” गाय बोली – “हे वनराज! जैसे सभी प्राणियों को अपना जीवन प्यारा होता है, वैसे ही मुझे भी है। और सच कहूँ तो दूसरों की तुलना में मुझे अपना जीवन अब कुछ ज्यादा ही प्यारा है, क्योंकि मेरे जीवन से मेरे बच्चे का जीवन भी जुड़ा है।”

“लेकिन यह जीवन भी धर्मरूप सत्य से बढ़कर नहीं है, क्योंकि सत्य ही सारी सृष्टि को धारण करता है, सत्य ही समस्त प्राणी समुदाय का पोषण करता है और सत्य ही जीवों का कल्याण करता है। इसीलिये मै सत्य पर दृढ रहना और उसका पालन करना अपना कर्तव्य समझती हूँ। अब यदि तुम मेरी बात को सत्य समझते हो, तो कृपया मुझे जाने दो, क्योंकि मेरा बच्चा बहुत देर से मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा।”

 

Inspiring Hindi Story of A Cow & Tiger

तब बाघ बोला – “हे गौ! तुमने सत्य की जो महत्ता बतायी है, उससे मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि तुम अपने वचन पर स्थिर रहोगी। अब तुम सुखपूर्वक अपने बच्चे के पास जा सकती हो।” यह कहकर उस शक्तिशाली बाघ ने गौ का रास्ता छोड़ दिया और गाय अपने बच्चे के पास आकर उसे दूध पिलाने लगी।

पर आज अपने बछड़े को दूध पिलाते हुए, वह गौ रोजाना की तुलना में ज्यादा दुलार कर रही थी। इसके अलावा उसकी आँखे आँसुओं से भी भरी थी। अपनी माँ की ऐसी दशा देखकर बछडा बोला – “माँ! क्या कारण है जो आज तुम मुझे प्यार करते हुए भी रो रही हो?” गाय रुँधे गले से बोली – “बेटा! आज मै तुम्हे अंतिम बार अपना दूध पिला रही हूँ। इसके बाद तुम मुझे फिर कभी नहीं देख सकोगे।”

बछड़े के पूछने पर गाय ने उसे सारी घटना सुना दी और उससे विदा लेकर जाने लगी। उसे जाते देखकर बछड़ा बहुत जोर से रंभाने लगा, पर खूँटे से बंधे रहने के कारण वह गाय के पीछे न जा सका। इधर गाय अपना वचन पूरा करते हुए दो घडी बाद ही बाघ के सामने आ गयी और उससे बोली – “हे वनराज! तुम्हारा हार्दिक धन्यवाद, जो तुमने मुझे अपने बच्चे को अंतिम बार देखने की अनुमति दी। अब तुम मुझे अपना आहार बना सकते हो।”

Motivational Story of Cow & Tiger in Hindi

यह कहते हुए गाय का गला भर आया। उसकी सजल आँखे देखकर बाघ भी अपनी हिंसक प्रवृत्ति को भुला बैठा। वह बोला – “हे गौ! तुम्हारे जैसा धर्मनिष्ठ मैंने आज तक कहीं नहीं देखा! तुम अच्छी तरह से जानती थी कि मेरे पास आने पर तुम्हारा मरण निश्चित है, पर फिर भी तुमने सत्य की रक्षा के लिये अपने प्राणों का मोह नहीं किया। यहाँ तक कि अपनी संतान को भी सत्य की बलिवेदी पर प्रस्तुत कर दिया।”

“तुम्हारी अपूर्व सत्यनिष्ठा को मै प्रणाम करता हूँ। मै भी बड़ा भाग्यशाली हूँ जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया। तुम्हारा कल्याण हो! अब तुम सुखपूर्वक अपने बच्चे के पास जा सकती हो।” उन दोनों प्राणियों का संवाद देवताओं ने भी सुना। उनके इस त्याग को दुर्लभतम मानते हुए, उन्होंने प्रकट होकर उन दोनों को वरदान देते हुए कहा –

“हे गौ! तुमने इस जीवन में सत्य के प्रति जो असाधारण निष्ठा दिखायी है, उसके कारण शीघ्र ही तुम स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त करोगी और वहां के दिव्य भोगों को भोगने के बाद पृथ्वी पर उच्च राज कुल में जन्म लोगी। फिर वे बाघ से बोले – “हे वनराज! स्वयं भूखे होने पर भी दो प्राणियों को जीवनदान देकर तुमने जो त्यागरुपी पुण्य किया है, उसके प्रभाव से तुम भी स्वर्ग लोक को जाओगे और उसके बाद धरती पर एक महान राजवंश में जन्म लोगे।”

इस तरह अपने-अपने व्रत पर अटल रहकर गाय और बाघ ने न केवल त्याग की उच्च भावना प्रदर्शित की, बल्कि देवताओं से अत्यंत दुर्लभ वरदान भी हासिल किये। इस प्रेरक कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि आपत्ति में भी कभी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये और निर्दोष प्राणियों पर सदा ही दया करनी चाहिये।

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