Elephant and Tailor Moral Story in Hindi

 

“इन्सान दूसरों के साथ जैसा बर्ताव करता है, बदले में वैसा ही परिणाम पाता है। अगर आप दूसरों को प्यार, स्नेह, सम्मान और आदर देंगे, तो बदले में वह भी आपको इन्ही चीजों से नवाजेंगे। क्योंकि क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम सिर्फ भौतिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जगत में भी उतनी ही तीव्रता के साथ क्रियाशील होता है।”
– पवन प्रताप सिंह

 

विकासनगर में दामोदर नाम का एक दरजी रहता था, जो अपने सिलाई के हुनर की वजह से लोगों का चहेता था। दामोदर अपने काम में जितना कुशल था, उतना ही अच्छा इन्सान भी था। वह सभी से प्रेमभाव रखता और अक्सर ही दूसरों की मदद किया करता था। उसके अच्छे स्वभाव की वजह से, एक बार उसकी एक हाथी से दोस्ती हो गयी। जब कभी हाथी दामोदर की दुकान के सामने से होकर गुजरता था, तो वह कुछ देर के लिये उसके पास जरुर रुकता।

भले ही वह बेजुबान हाथी बोल नहीं सकता था, लेकिन उसके हाव-भाव और आँखों से दामोदर उसके मन की हर बात भाँप जाता था। ऐसे ही हाथी भी दामोदर का हर इशारा समझ जाता था। इस तरह उनकी दोस्ती को काफी समय बीत गया। दामोदर अक्सर अपने मित्र का आदर-सत्कार करने के लिये, उसे गन्ना, फल और सब्जियाँ खाने के लिये दे दिया करता था।

जिसका वह हाथी बड़ा उपकार मानता था, आखिरकार जानवरों के अन्दर कृतज्ञता इंसानों से कहीं ज्यादा ही होती है। इसलिये जब भी हाथी दामोदर की दुकान पर आता, तो वह उसके लिये भेंटस्वरूप बड़े और सुगन्धित कमल के फूल लाया करता था। कमल के वह फूल बड़े दुर्लभ थे, क्योंकि दूर-दूर तक उस इलाके में कमल के ऐसे पुष्प नहीं होते थे।

Elephant and Tailor Story in Hindi

ऐसे सुन्दर और दिव्य फूलों की चाह हर किसी को थी। इसलिये पुजारी, अमीर लोग और राजकर्मचारी अक्सर उससे इन पुष्पों को खरीद लिया करते थे। लोगों ने उससे कई बार उन कमल के फूलों का पता जानना चाहा, पर वह विनम्रता से मना कर देता था। वास्तव में न तो दर्जी को धन की चाह थी और न ही हाथी की दृष्टि में उन दिव्य पुष्पों की कोई कीमत थी।

वह तो बस मित्रधर्म का सम्मान करने के लिये, सिर्फ अपना विशुद्ध प्रेम और स्नेह ही एक दूसरे को अर्पित करते थे। दामोदर का एक बेटा भी था, जिसका नाम सुन्दर था। लेकिन सुन्दर अपने पिता के अनुरूप शालीन और अच्छे स्वभाव वाला इन्सान नहीं था। जब कभी सुन्दर दुकान पर होता और हाथी वहाँ आता, तो उसे देखकर सुन्दर नाराज हो जाता था।

क्योंकि उसके अनुसार उसका पिता, उस हाथी पर व्यर्थ ही अपना समय और प्यार लुटा रहा था। हाथी के प्रति अपने पिता का प्यार देखकर सुन्दर को जलन सी हो जाती थी। एक बार दामोदर बहुत बीमार हो गया, इसी कारण से वह काफी दिन तक दुकान पर नहीं आ सका। उसकी अनुपस्थिति में सुन्दर ही दुकान का सारा काम-काज देखा करता था।

इसी बीच एक दिन हाथी दुकान पर आया और उसने हमेशा की तरह एक सुगन्धित पुष्प मेज पर रख दिया। वह चुपचाप बहुत गौर से दुकान के अन्दर और आस-पास देखने लगा, क्योंकि उसकी नजरें दामोदर को ढूंढ रही थी। यूँ तो वह सुन्दर को भी अच्छी तरह से पहचानता था, लेकिन जो स्नेह और सत्कार उसे दामोदर से मिलता था, वैसा उसके बेटे से कभी नहीं मिला।

हाथी और दर्जी की कहानी

जानवर भले ही बेजुबान होते हों, लेकिन उनकी मन के भावों को पहचानने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है, जिसमे वह हाथी बहुत कुशल था। वह यह सोचकर कुछ देर और दुकान के सामने ठहरा रहा कि शायद दामोदर कहीं आस-पास ही हो, लेकिन सुन्दर का हाथी का अपनी मेज के सामने खड़ा होना बर्दाश्त नहीं हुआ।

एक तो कई दिन से अकेले काम करते रहने के कारण उसका मूड बिगड़ा हुआ था, उपर से हाथी का आना भी उसे पसंद नहीं था, इसलिये वह हाथी को दुकान से हटाने की तरकीब सोचने लगा। उसने मेज की दराज से एक सुईं निकाली और उसे निरपराध हाथी की सूंड में चुभो दिया। बेचारा हाथी बहुत तिलमिलाया, लेकिन गुस्से में कोई नुकसान करने के बजाय वह चुपचाप चला गया।

अगली बार जब हाथी आया, तो उस दिन सुन्दर के साथ-साथ दामोदर भी दुकान पर बैठा हुआ था। जैसे ही हाथी दुकान के सामने आया, तो उसने अपनी सूंड में भरा सारा गन्दा पानी सुन्दर के उपर फेंक दिया। गंदे पानी की वजह से सुन्दर के साथ-साथ दुकान के सारे नये कपडे भी गंदे हो गये, यहाँ तक कि दामोदर पर भी कई छींटे पड़े। अपनी सूंड का सारा पानी उलीचकर हाथी वापस मुड़ा और चला गया।

हाथी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से दामोदर एकदम भौचक्का रह गया, क्योंकि आज तक हाथी ने कभी भी ऐसा बुरा बर्ताव नहीं किया था। वह समझ गया कि जरुर उसके पीछे उसके मूर्ख बेटे ने हाथी के प्रति बुरा व्यवहार किया होगा। उसने सुन्दर को डाँटते हुए सारी बात सच-सच बताने को कहा। सुन्दर ने सारी घटना सुना दी।

सच बात जानकर दामोदर ने अपने बेटे से कहा – तुमने हाथी के साथ जैसा बर्ताव किया था, उसने भी वैसा ही किया है, क्योंकि जैसे के साथ तैसा ही होता है।” हमें भी इस कहानी से सबक लेते हुए, दूसरों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार करना चाहिये।

“बोये पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय, जैसी करनी वैसी भरनी।”
– सुभाषितानि

 

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