Best Hindi Story on Life Transformation of Sufi Saint

 

“एक शमां से हजारों शमाएँ जलाई जा सकती हैं, पर किसी भी शमां की जिंदगी इससे कम नहीं होती। खुशियाँ बाँटने से कभी कम नहीं पड़तीं।”
– महात्मा बुद्ध

 

अक्सर देखा ऐसा जाता है कि कोई इंसान अपनी जिंदगी में जो-जो भले-बुरे कर्म करता है, उसका फल उसे बहुत बाद में मिलता है। कई बार तो कर्मफल मिलने में कुछ जन्म तक लग जाते हैं, पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अच्छे-बुरे कर्म का फल हाथों हाथ मिलता है, जो प्रायः एक ज्वलंत उदाहरण के रूप में लोगों की आँखें खोल देने वाला होता है और जिसे हमेशा एक मिसाल के रूप में याद रखा जाता है।

मध्यकाल की इस घटना के माध्यम से भी शायद यही सत्य प्रकट होता है। सूफी संत हबीब आजमी पहले एक सूदखोर थे। लोगों की नजरों में तो वे एक अमीर थे, पर उनका वास्तविक काम जरुरतमंदों को सूद पर रुपया देना और फिर ऊँचे ब्याज पर उसे हर तरह से वसूल करना था। यही उनके जीवन निर्वाह का साधन था। सूद वसूलने का उनका अपना एक अलग ही नियम था।

जब कभी भी वे सूद की वसूली के लिये घर से निकलते, तो न केवल कर्जेदार के घर में ठहरते, बल्कि वहीँ भोजन भी करते। पैसे से बढ़कर मुक़द्दस चीज़ इस दुनिया में उनके लिये कोई दूसरी न थी। अगर यह कहा जाय कि पैसे को वह दांतों से पकड़ते थे, तो कुछ गलत न होगा। इस धंधे से जितना पैसा उन्होंने अपनी तिजोरी में जुटाया, उससे कहीं ज्यादा आँसू और गम उन्होंने अपने कर्जेदारों को दिये थे।

पर इस एक घटना से उनकी सारी जिंदगी बदल गयी। दूसरों का लहू चूसने वाला लालची सूदखोर, सब कुछ लुटाने वाला फ़कीर बन गया। हुआ कुछ यूँ कि एक दिन वे कर्जा वसूल करने एक कर्जेदार के घर गये थे। वहाँ उन्हें वह कर्जदार तो नहीं मिल सका, पर उसकी पत्नी अवश्य मिली। पूछने पर पता चला कि वह व्यक्ति किसी काम से घर से बाहर गया है,

पर हबीब को इससे कोई मतलब न था, उन्हें चिंता थी तो बस अपने पैसों की। पैसा ही उनकी जान था और पैसा ही उनका खुदा। इसलिये उन्होंने उसकी पत्नी से ही धन का तगादा किया। पर वह बेचारी गरीब औरत इतने पैसे कहाँ से लाती? घर में तो फूटी कौड़ी भी न थी। उसने हबीब से रहम की अपील की।

“ठीक है, तुम्हे औरत जानकार इस बार तो मै छोड़ देता हूँ, पर अगली बार हमारा पैसा जरूर चुकता कर देना।” – हबीब आजमी ने बनावटी दया दिखाते हुए कहा। उस औरत को कुछ सुकून मिला कि चलो अब इस सूदखोर से कुछ दिनों तक के लिये तो छुटकारा मिला। पर हबीब के अन्दर इंसानियत कहाँ थी।

उन्होंने उस औरत से कहा, “तो अब चलो हमारे लिये खाना बनाओ, क्योंकि हमारा कायदा है कि हम कर्जेदार के घर से बिना कुछ लिये नहीं जाते। वह बेचारी गिडगिडाने लगी। अपनी गरीबी का रोना रोते हुए उसने कहा, “हुजूर! घर में चूल्हा जलाने के लिये लकड़ी तक नहीं है, फिर मै आपके लिये खाना कैसे पेश करूँ?”

“ये सब हम नहीं जानते। पडोसी से लाओ, चाहे उधार लाओ, मगर खाना जरुर खिलाना पड़ेगा। बिना खाना खाये मै यहाँ से नहीं हिलने वाला।” – हबीब ने मुँह फेरते हुए कहा। मरता क्या न करता। वह बेचारी अपने पडोसी के पास गयी और उससे कुछ खाने का सामान उधार मांग कर लायी। अभी खाना पक ही रहा था कि दरवाजे पर एक फ़कीर और आ गया।

आगे पढिये इस कहानी का अगला भाग – एक छोटा सबक भी जिंदगी बदल सकता है: Life Changing Story of A Greedy Person in Hindi

“संपन्न होने पर भी जो असंतुष्ट है, वह वास्तव में निर्धन है।”
– अश्वघोष

 

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