Hindi Story on Real Service of God

 

“सारे जहानों का मालिक परमेश्वर इस सृष्टि के छोटे-से छोटे जीव का, प्रत्युत्तर में किसी भी चीज की आशा रखे बिना मृत्युपर्यंत पोषण करता है, जबकि इंसान थोड़ी सी सेवा करने के पश्चात ही यह मानने लगता है जैसे उसने कोई बड़ा भारी उपकार कर दिया हो और बदले में वह यश, प्रतिष्ठा, धन और भी न जाने कितनी-कितनी चीज़ों की अपेक्षा करने लग जाता है। क्या इंसानों को अपने स्वर्गीय पिता से यह शिक्षा नहीं लेनी चाहिये कि अनाम रहकर दिखायी गयी उदारता न केवल सर्वश्रेष्ठ है बल्कि सबसे ज्यादा प्रभावशाली भी है।”
– अरविन्द सिंह

 

मध्यकाल के सूफी संतों में हजरत इब्राहीम नामक एक प्रसिद्ध औलिया हुए हैं जिन्होंने अपना जीवन बहुत ही सरल तरीके से, ईश्वर की उपासना करते हुए बिताया था। परवरदिगार की भक्ति के साथ-साथ यह प्राणी सेवा को भी बहुत महत्व देते थे। इनका नियम था कि जब तक यह किसी अतिथि को भोजन नहीं करा देते थे तब तक स्वयं भी भोजन नहीं करते थे। लेकिन जब एक दिन बहुत इंतजार करने के पश्चात भी कोई व्यक्ति नहीं आया तो यह बहुत बेचैन हो गये और अपनी कुटिया के दरवाजे पर बैठकर ही रास्ते से होकर गुजरने वाले राहगीरों का इंतजार करने लगे।

साँझ ढलने के पश्चात इन्हें दूर से एक वृद्ध आदमी चलता नजर आया जो लगभग सौ बरस की आयु का मालूम होता था और सफ़र और उम्र के बोझ से दबा हुआ लाठी टेकता हुआ चला आ रहा था। इब्राहीम ने खुदा को उनके नियम की रक्षा करने के लिये धन्यवाद दिया और दौड़कर उसके पास पहुँचे। उन्होंने बड़े अदब से उसका इस्तकबाल किया और उससे मिन्नत करते हुए भोजन करने की प्रार्थना की। वह बूढा आदमी मान गया।

संत इब्राहीम ने उसके पैर धोये और उसे बिठाकर भोजन परोसा। पर यह देखकर वह हैरान रह गये कि उस बूढ़े आदमी ने न तो इबादत ही की, और न ही खुदा को धन्यवाद दिया, बल्कि वह तुरंत ही भोजन करने लग गया। उन्होंने उस बूढ़े आदमी से पूछा, “बाबा, क्या आप खुदा को याद नहीं करेंगे? वह बूढा व्यक्ति पारसी धर्म का अनुयायी था, उसने जवाब दिया – “मै अग्नि की पूजा करता हूँ और उसके अतिरिक्त और किसी ईश्वर को नहीं मानता।

उसकी ऐसी बातों को सुनकर इब्राहीम को उस बूढ़े पर एकदम से बड़ा क्रोध आ गया। उन्होंने उसके पास से भोजन की थाली खींच ली और फिर उसे जबरदस्ती अपनी कुटिया से बाहर निकाल दिया। आवेश में उन्हें इस बात का भी बिल्कुल ध्यान न रहा कि उन्होंने एक भूखे व्यक्ति को जिसका शरीर जर्जर हो चुका था, और जो असहाय था, अँधेरी रात में, एक बियाबान रेगिस्तान में ऐसे ही छोड़ दिया था।

उस बूढ़े के जाने के थोड़ी देर बाद इब्राहीम ने अपनी रात्रि की पूजा संपन्न की और सो गये। सपने में ईश्वर ने उन्हें दर्शन दिये और उस वृद्ध से अनुचित व्यवहार करने का कारण पूछा। इब्राहीम बोले – “अल्लाह, मैंने उसे इसलिये निकाल दिया, क्योंकि न तो वह तुम्हारी इबादत करता है और न ही तुम्हारे प्रति कृतज्ञ है। ईश्वर ने कहा – “इब्राहीम मै उस बूढ़े को अच्छी तरह से जानता हूँ, वह हमेशा इसी तरह से मेरी तौहीन करता रहता है।

फिर भी मै उसे सौ साल से सहता चला आ रहा हूँ, पर क्या तुम उसे एक रात के लिये भी नहीं सह सकते थे।” भगवान की यह गूढ़ वाणी सुनकर संत इब्राहीम को अपने व्यवहार पर बड़ी शर्म आयी और उन्होंने दोबारा ऐसा न करने का संकल्प लिया। ईश्वर कितना दयालु है और साथ ही कितना निःस्वार्थ भी यह इस छोटी मगर मर्मस्पर्शी कहानी से सरलता से प्रकट होता है।

“”सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से दान कर, नेकी कर दरिया में डाल।”
– वेद

 

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