Hindi Story on Self Respect of A Princess

 

“किसी की मर्यादा पर आक्रमण किया जा सकता है, बर्बरता बरती जा सकती है और निर्दयता से उपहास भी किया जा सकता है। लेकिन इसे तब तक नहीं छीना जा सकता जब तक कि इसे आत्मसमर्पण करके न दे दिया जाय।”
– माइकल जे. फॉक्स

 

 Hindi Story on Self Respect of A Princess

अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना मनुष्य के स्वभाव का नैसर्गिक गुण है, जिसे प्रत्येक मूल्य पर सुरक्षित रखा जाना चाहिये। पर यह ध्यान रखने योग्य बात है कि जब आत्म-सम्मान की भावना में अभिमान का अंश मिश्रित होने लगता है, तब वह मर्यादा का अतिक्रमण करके अत्याचार का रूप धारण कर लेती है। इस महीन रेखा का निर्धारण व्यक्ति को बहुत सावधानी से करना चाहिये। प्रस्तुत कहानी में इसे बहुत सुन्दर तरीके से दर्शाया गया है।

राजस्थान का समूचा प्रदेश अपने गौरवशाली इतिहास के लिये प्रसिद्ध है, जिसमे एक से बढ़कर एक वीर हुए हैं और जिन्होंने अपने आत्म-सम्मान को हमेशा सर्वोपरि रखा है। स्त्रियाँ भी इसमें पीछे नहीं रही हैं। आंबेर रियासत के महाराजा जयसिंह की छोटी रानी कोटा राजवंश की राजकुमारी थी। लेकिन राजकुल के लोगों की तरह विलासिता वाला जीवन उसे कतई पसंद नहीं था। सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श को मानने वाली वह राजकुमारी जिस साधारण तरीके से अपना जीवन व्यतीत करती थी, वह जयसिंह को बिल्कुल पसंद नहीं था।

क्योंकि वह उसे हमेशा आभूषणों से लदी और श्रंगार किये हुए देखना चाहता था। एक दिन बातों ही बातों में जयसिंह ने अपनी रानी की सादगी पर कटाक्ष करते हुए कहा, “तुम्हारे कपड़ों और आभूषणों से तो हमारे नगर की सामान्य स्त्रियाँ भी अच्छे वस्त्राभूषण धारण करती हैं, तुम तो उनसे भी अधिक गयी-गुजरी हो।” लेकिन रानी चुप ही रही, उन्होंने मर्यादा समझकर राजा की बात को अनसुना कर दिया। लेकिन इससे जयसिंह को गुस्सा आ गया।

और उसने वहीँ पास रखे एक काँच के टुकड़े को उठाकर रानी के कपडे फाड़ने के लिये हाथ बढाया। राजा की चेष्टा समझकर रानी का स्वाभिमान जाग उठा और उसने फुर्ती से राजा की म्यान से तलवार निकाल ली। तलवार को राजा की ओर तानकर रानी रोष से बोली, “महाराज, मैंने जिस वंश में जन्म लिया है वह इस प्रकार के अपमान को कभी सहन नहीं कर सकता है। यदि आपने आगे कभी इस प्रकार से मेरा उपहास करने का प्रयास किया तो उसका परिणाम अच्छा न होगा।

आपको मालूम हो जायेगा कि आम्बेर के राजकुमार काँच का टुकडा चलाने में उतने तेज नहीं होते, जितनी तेज कोटा की राजकुमारियाँ तलवार चलाने में होती हैं। राजा जयसिंह को भयभीत देखकर रानी बोली, “कोटावंश की किसी राजकुमारी का भविष्य में इस प्रकार से अपमान न हो, इसीलिये मजबूरीवश आज मुझे ऐसा करना पड़ा है, इतना कहकर उसने तलवार फेंक दीं। जयसिंह अपनी रानी के अकस्मात धारण किये रौद्र रूप को देखकर सहम गया था। उसने अपनी गलती के लिये क्षमा माँगी और भविष्य में उसका अपमान न करने का प्रण लिया।

“स्वाभिमान की भावना हर व्यक्ति में विद्यमान होती है। जिन्होंने अपने सूक्ष्म अहंकार का भी परित्याग कर दिया है उन योगीजनों को छोड़कर, राजा से लेकर भिखारी तक कोई भी इससे मुक्त नहीं है। हर कोई सम्मान चाहता है और जब कोई व्यक्ति उस पर आक्रमण करने का प्रयास करता है तो व्यक्ति अपनी सामर्थ्यानुसार उसका प्रतिरोध करता है।”
– पवन प्रताप सिंह

 

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