Best Hindi Story on Justice of Pure Heart

 

“नीति और न्याय के सिद्धांत समय की धारा के साथ नहीं बदलते हैं। परोपकार का प्रत्येक कार्य, दया और सहानुभूति का हर कृत्य न्याय की सनातन मर्यादा को और भी ऊँचा उठा देता है।”
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

 

इस शानदार और प्रेरक कहानी का पिछला भाग आप Best Moral Story for Children in Hindi: एक महान और न्यायी राजा में पढ़ ही चुके हैं। अब प्रस्तुत है अगला भाग –

पंडितों ने वेदमंत्रों से उसकी पूजा की और विधिपूर्वक उसे प्रतिष्ठित किया। सभी लोगों की नजरें उस अदभुत सिंहासन पर ही लगी हुई थीं। महाराज विक्रमादित्य का वह राजसिंहासन वास्तव में बेजोड़ था। उसमे बहुमूल्य रत्न जड़े थे जिनकी आभा हर किसी का चित्त चुराये ले रही थी और उसे अपने हाथों में थाम रखा था, स्फटिक जैसे निर्मल श्वेत पंखों वाले, संगमरमर के पाँच देवदूतों ने।

राजा बड़ी उत्सुकता से उस सिंहासन की ओर बढा। पर जैसे ही वह उस पर बैठने को था, तभी उनमे से एक देवदूत की मूर्ति के भीतर से आवाज आयी, “ठहरो राजन!, क्या तुम वास्तव में स्वयं को इस सिंहासन पर बैठने योग्य समझते हो? क्या तुमने कभी दूसरे राजाओं के राज्य को छीनने का प्रयास नहीं किया?” राजा के हाँ कहने पर उस देवदूत ने कहा, “तो जाओ पहले अपनी राज्य लोलुपता को दूर करो।

“फिर जब योग्य हो जाओ तब इस सिंहासन पर बैठना” इतना कहकर वह देवदूत आसमान में उड़ गया। राजा निराश होकर लौट आया और अपनी इस बुराई को दूर कर पुनः सिंहासन के पास आया। पर जैसे ही उसने सिंहासन पर बैठना चाहा, उनमे से एक देवदूत की आवाज फिर आयी, “ठहरो राजन!, क्या तुमने कभी दूसरों के धन-संपत्ति को लेने की चेष्टा नहीं की?

क्या तुमने दूसरे लोगों के वैभव और सुख को देखकर कभी उनसे ईर्ष्या नहीं की?” राजा के हाँ कहने पर देवदूत ने कहा, “तो जाओ पहले जाकर अपने लोभ और ईर्ष्या को दूर करो। फिर इस सिंहासन पर बैठना।” इतना कहकर दूसरा देवदूत भी आसमान में उड़ गया। राजा फिर से निराश होकर लौट आया। कुछ ही दिनों में अपने बुरे स्वभाव को दूर कर वह फिर सिंहासन के पास आया।

पर जैसे ही उसने उस पर बैठने का प्रयास किया, तीसरे देवदूत के भीतर से आवाज आयी, “ठहरो राजन!, क्या तुमने कभी दूसरों पर प्रभुत्व ज़माने की चेष्टा नहीं की? क्या तुमने कभी अपने अधिकार का अनुचित प्रयोग नहीं किया?” राजा के हाँ कहने पर देवदूत बोला, ठीक है तो जाओ पहले अपने अभिमान को दूर करो और इतना कहकर तीसरा देवदूत भी ऊपर उड़ गया।

कुछ दिन के पश्चात अपने अहंकार को दूर कर राजा फिर सिंहासन के पास आया, पर जैसे ही वह उस पर बैठने को तैयार हुआ, चौथा देवदूत बोला, “रुको राजन!, क्या तुममे निश्चयात्मिका बुद्धि है? क्या तुम्हारे पास निर्मल प्रज्ञा और हंस जैसा विवेक है?” राजा के नहीं कहने पर चौथा देवदूत भी यह कहकर उड़ गया, “ठीक है तो जाओ पहले अपने अन्दर प्रज्ञा और विवेक का प्रकाश उत्पन्न करो।”

राजा फिर से निराश होकर लौट आया। अब उसे लगने लगा था कि शायद वह इस सिंहासन पर कभी नहीं बैठ सकेगा, क्योंकि वह इस बैठने योग्य नहीं है, पर फिर भी उसने अंतिम प्रयास करते हुए स्वयं को वैसा बना लिया जैसा कि चौथे देवदूत ने उससे कहा था। आज कई दिनों के पश्चात जब वह सिंहासन पर बैठने जा रहा था, तो उसे पूर्ण विश्वास था कि आज वह निश्चय ही उस विश्वविख्यात न्यायसिंहासन पर बैठ सकेगा।

राजा बड़ी आशा से उस सिंहासन पर बैठने को तैयार हुआ ही था कि अचानक ही अंतिम देवदूत बोल उठा, “ठहरो राजन!, क्या तुम्हारा ह्रदय एक बच्चे की तरह निश्चल और शुद्ध है? यदि ऐसा है तो तुम वास्तव में इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी हो।” राजा ने निराश और मंद स्वर में उत्तर दिया नहीं, “मेरा ह्रदय शुद्ध नहीं है।”

राजा के इतना कहते ही वह देवदूत उस जगतविख्यात न्यायसिंहासन को लेकर आकाश में उड़ गया और इस तरह विक्रमादित्य का राजसिंहासन सदा के लिये अद्रश्य हो गया। यह घटना कितनी सत्य है और कितनी असत्य यह तो हम नहीं जानते, परन्तु यह उन मूलभूत सूत्रों को अवश्य प्रकट करती है जो न्याय की आत्मा हैं

और जो एक सच्चे न्यायाधिकारी के अन्दर अवश्य होने चाहियें तथा जिनके बिना निर्दोष न्याय कर पाना संभव नहीं है। केवल तार्किक बुद्धि से या कानून की धाराएँ रट लेने भर से न्याय नहीं हो सकता। जहाँ न्याय से धन की अपेक्षा जुड़ जाय या न्यायकर्ता के भीतर अहंकार जड़ जमा ले, वहाँ निर्दोष न्याय दे पाना संभव नहीं है।

एक सच्चा न्यायाधीश होने के लिये सर्वप्रथम आवश्यकता है एक पवित्र और निश्चल ह्रदय की, व्यक्तिगत अहं की सीमाओं से परे जाकर अपनी आत्मीयता का विस्तार करने की, क्योंकि प्रभुत्व और अधिकार पाने की लालसा और दायित्व की मर्यादा का बोध न होने से चेतना संकुचित होती है और फिर वह प्रखर विवेकशीलता और प्रज्ञा कभी उत्पन्न नहीं हो सकती, जो न्यायकर्ता की सबसे प्रबल शक्ति है।

महाराज विक्रमादित्य इतिहास के सबसे प्रसिद्द न्यायी राजाओं में से एक रहे हैं। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने कभी किसी निर्दोष को दंड नहीं दिया और अपराधी कभी बिना दंड पाए न रह सका। उनकी विलक्षण न्याय क्षमता और तेज को देखकर अपराधी उनके सामने आते ही थर-थर कांपने लगते थे। उनके शासनकाल में प्रजा बहुत सुखी थी। कहीं भी अपराध का नामो-निशान न था।

क्योंकि राज्य की दंड व्यवस्था अत्यंत कठोर और त्वरित थी, जिस पर स्वयं महाराज विक्रमादित्य का नियंत्रण था। क्या आज भी हमें राजा हरिश्चंद्र, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और विक्रमादित्य जैसे सच्चे न्यायकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है जो जीवन में न्याय को सर्वप्रथम रख सके? जो उसकी सनातन मर्यादा को अक्षुण्ण रख सकें? निःसंदेह! आज संसार को ऐसे ही आदर्श न्यायकर्ताओं की आवश्यकता है।

“न्यायी व्यक्ति एक दिन की कृति नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालीन गहन चिन्तनयुक्त और पीड़ादायक जन्म का परिणाम है।”
– चार्ल्स वाग्नेर

 

Comments: आशा है यह कहानी आपको पसंद आयी होगी। कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव देकर हमें यह बताने का कष्ट करें कि जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

Spread Your Love