Panchatantra Story in Hindi by Vishnu Sharma: शेर और खरगोश

 

“पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र भारतीय साहित्य का ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया का एक अनमोल रत्न है। जिस तरह से उन्होंने पशु-पक्षियों के माध्यम से नीतिशास्त्र के महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर प्रकाश डाला है, वह वास्तव में अनुपमेय है। प्रस्तुत कहानी में उन्होंने जीवन में बुद्धिमानी की आवश्यकता और महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि कैसे व्यक्ति मृत्युतुल्य संकट में फँसे होने पर भी अपनी बुद्धि के बल पर बाहर निकल सकता है।”

 

किसी समय शिबपुर के वन में भासुर नाम का एक सिंह रहता था जो बहुत बलवान और पराक्रमी था। वह हर रोज कई जानवरों का शिकार किया करता था। उसके खौफ के कारण जंगल के सारे पशु थर्रा उठे, सबने जान के डर से जंगल में निकलना छोड़ दिया। लेकिन जब भूखे मरने की नौबत आ गयी तो सबसे शेर के पास जाकर ही विनती करने का निश्चय किया। वे नम्रतापूर्वक शेर से बोले – “महाराज! प्रतिदिन इतने जानवरों को अकारण मारने से आखिर क्या लाभ है, जबकि आपकी तृप्ति सिर्फ एक ही जानवर से हो जाती है।

यदि आप हमें प्राणरक्षा का वचन दें, तो हम भी आपकी भूख का ध्यान करते हुए प्रतिदिन एक पशु को आपके पास भेज दिया करेंगे। जिसे खाकर आप चैन से जी सकते हैं और हम भी जंगल में बिना किसी भय के रह सकेंगे। तब भासुर शेर ने उन जानवरों की प्रार्थना सुनकर कहा – “ठीक है! मुझे तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार है, लेकिन यदि किसी दिन कोई जीव नहीं आया, तो मै तुम सबको मारकर खा जाउँगा।” सभी पशुओं ने एक स्वर में हामी भर दी।

फिर हर रोज एक पशु मध्यान्ह में शेर का आहार बनने के लिये जाने लगा। इस तरह जंगल में सभी पशु बेखौफ विचरने लगे, लेकिन अन्दर ही अन्दर उनके मन में इस बात का डर समाया रहता था कि एक न एक दिन उन्हें भी इस निर्दयी शेर का शिकार बनना ही पड़ेगा। पर वे बेचारे कर भी क्या सकते थे। इसी क्रम में एक दिन एक खरगोश की बारी आयी, वह बेचारा भी मौत के डर से धीरे-धीरे शेर के घर की तरफ जाने लगा।

लेकिन जीवन के इन अंतिम क्षणों में भी वह अपनी जान बचाने का उपाय ढूंढ रहा था। चलते-चलते उसने मार्ग में एक कुआँ देखा जो काफी गहरा था और जिसमे जल भी भरा था। कुँए को देखकर खरगोश के मन में एक युक्ति आई और वह जान-बूझकर देर से शेर के पास पहुँचा। जब शेर से खरगोश को देखा तो वह भूख से पागल हुआ गुस्से से बोला – “एक तो तू इतना छोटा है और उस पर भी देर से आया है। बता कहाँ था तू इतनी देर तक।”

“मै दोपहर से तेरी राह देख रहा हूँ और तू शाम के समय आया है आज मै सब जानवरों को मार डालूँगा।” शेर को क्रोधित देखकर खरगोश विनय से बोला – “महाराज! देरी से आने में न तो मेरा दोष है और न ही दूसरे जानवरों का। रास्ते में आते समय जंगल में एक दूसरे सिंह ने मेरा रास्ता रोक लिया था। उसने मेरे परिवार के दो सदस्यों को खा लिया है, बस किसी तरह से मै ही अपनी जान बचाकर आपके पास आ पाया हूँ ताकि अपना वचन पूरा कर सकूँ।”

जब मैंने उस शेर को बताया कि आप ही इस जंगल के राजा हैं और हम आपके शरणागत हैं, तो वह रोष से कहने लगा – “कौन है भासुर! मै ही इस जंगल का राजा हूँ और तुम सब मेरे गुलाम हो। फिर उसने मेरे दो साथियों को मार डाला और मै यहाँ चला आया।” उस शशक की यह बात सुनकर भासुर सिंह को बहुत क्रोध आया। वह खरगोश से बोला – “तेरा शिकार तो मै बाद में करूँगा, चल पहले मुझे वह दुष्ट शेर दिखा जो खुद को जंगल का राजा कहता फिरता है।

मै आज उसे जीवित नहीं छोडूंगा।” खरगोश ने शेर का विश्वास जीतने के अभिप्राय से कहा – “महाराज! वह शेर बहुत बलवान है और एक दुर्ग में रहता है। मेरी मानिये आप भी वहाँ मत जाइये, क्योंकि वह अपने पास जाने वाले हर जानवर को मार डालता है। भासुर शेर खरगोश को डाँटते हुए बोला – “चल डरपोक! तू मुझे बस उसका किला दिखा।” खरगोश चुपचाप शेर को उसी कुँए पर ले आया और कुँए को दिखलाता हुआ बोला – “स्वामी! वह सिंह इसी दुर्ग में छिपा हुआ है।”

जब शेर ने कुँए में झांककर देखा तो उसे अपना प्रतिबिंब दिखायी दिया। भासुर ने उसे ही दूसरा शेर समझा, वह गुस्से से जोरों से दहाडा। जैसे ही कुँए से उसकी दहाड़ की प्रतिध्वनि निकली, मूर्ख भासुर सिंहनाद करता हुआ कुँए में कूद पड़ा और वहीँ जल में डूबकर मर गया। खरगोश ने लौटकर शेर के मारे जाने की बात जंगल के सभी पशुओं को बताई जिसे सुनकर सबने आनंद का अनुभव किया और वे निर्भय होकर वन में विचरने लगे।

किसी विद्वान् ने सच ही कहा है इस संसार में बुद्धिबल से बढ़कर कोई दूसरा बल नहीं है। वह खरगोश जो शरीर की दृष्टि से शेर की तुलना में बिल्कुल नगण्य ही था, अपने बुद्धिबल से उसे परास्त कर अपने साथ-साथ अनेकों पशुओं की प्राणरक्षा का निमित्त बना। इसीलिये किसी महान व्यक्ति ने कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति जितने अवसर पाते हैं उससे कहीं ज्यादा स्वयं बनाते हैं। वह खरगोश भी यदि निराश हो जाता तो अपने जीवन की रक्षा न कर पाता।

“हम तीन प्रकार से बुद्धिमानी सीखते हैं: पहला, चिंतन से, जो सर्वश्रेष्ठ है; दूसरा, अनुकरण करके, जो सरलतम है; और तीसरा अनुभव से, जो सबसे कष्टकारी है।”
– कन्फ़्यूशियस

 

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