Chhatrapati Shivaji Maharaj Story in Hindi: वीर शिवाजी

 

“महान वीर और मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज न केवल महाराष्ट के, बल्कि सम्पूर्ण भारत के गौरव हैं। मुगलों के अत्याचार से लोहा लेने वाले इस हिंदू महावीर पर प्रत्येक देशवासी को गर्व होना चाहिये। महाराज शिवाजी की वीरता और संघर्ष के किस्सों से ज्यादातर लोग परिचित ही होंगे, क्योंकि स्कूली शिक्षा के दिनों में भारत की इन महान विभूतियों के बारे में लगभग हर जगह पढाया जाता है।”

 

आज हम आपको छत्रपति के उच्च चरित्र बल के विषय में बताने जा रहे हैं जो उनकी स्त्रियों के प्रति सम्मान की उच्च भावना को दर्शाता है। यह 17वीं शताब्दी में उस समय की बात है जब मुगलों और मराठों में कल्याण के किले पर अधिपत्य ज़माने के लिये भीषण संग्राम छिड़ा हुआ था। अंत में मराठों ने मुगलों को खदेड़कर किले पर अधिकार कर लिया। किले के अन्दर से उन्हें अस्त्र-शस्त्र के अलावा बहुत बड़ी संपत्ति भी हासिल हुई।

इसी बीच जब किलेदार को लगा कि अब किला उसके हाथ से निकल गया है, तो वह अपने परिवार को छोड़कर भाग गया। कुछ सैनिकों ने उसके परिवार की स्त्रियों को मराठा सेनापति के सामने पेश किया। जब सेनापति ने मुगल किलेदार की एक नवयुवती स्त्री को देखा तो वह उसके सौंदर्य से अभिभूत हो गया, क्योंकि वह स्त्री अत्यंत सुन्दर थी। सभी अवाक् होकर उसे ही देखने लगे।

सेनापति ने उसे एक अमूल्य स्त्री रत्न समझकर महाराज शिवाजी को नजराने के रूप में भेंट करने का निश्चय किया। सैनिकों की टुकड़ी उस सुंदरी को पालकी में बिठाकर राजधानी की ओर चली। जब सेनापति वहाँ पहुँचा उस समय शिवाजी अपने मंत्रियों के साथ एक महत्वपूर्ण विषय पर मंत्रणा कर रहे थे। उसने छत्रपति को प्रणाम किया और बोला – “महाराज! कल्याण का किला हमारे अधिकार में आ गया है और वहाँ से बहुत बड़ा खजाना भी प्राप्त हुआ है।”

यह सुनकर शिवाजी ने सेनापति की पीठ थपथपाई, फिर सेनापति ने आगे कहा – “महाराज! हमें वहाँ से एक अनमोल और दुर्लभ रत्न भी प्राप्त हुआ है जिसे देखकर आप अत्यंत प्रसन्न होंगे। इतना कहकर उसने पालकी की तरफ इशारा किया। शिवाजी के मन में हल्की सी जिज्ञासा उठी और वे पालकी की तरफ चल दिये। जैसे ही उन्होंने पालकी का पर्दा हटाया उन्हें उस खूबसूरत मुगल नवयौवना के अप्रतिम सौंदर्य के दर्शन हुए जो किसी अप्सरा के जैसी ही लग रही थी।

उस नवयुवती ने भी उन्हें देखा और सिर झुकाकर प्रणाम किया। महाराज शिवाजी ने उस स्त्री को देखते ही अपना मस्तक नीचे कर लिया और फिर वे विनम्रता से बोले – “काश! मेरी माताजी भी इतनी सुन्दर होती, तो मै भी आज बड़ा खूबसूरत होता।” इतना कहकर शिवाजी सेनापति की ओर मुड़े और उसे डाँटते हुए कहने लगे – “तुम इतने दिन तक मेरे साथ रहे और फिर भी मेरे स्वभाव को न समझ सके।

जाओ अभी इस स्त्री को ससम्मान इसके पति के पास छोड़कर आओ और याद रखना कि भविष्य में दोबारा ऐसा न हो। शिवाजी दूसरे की स्त्रियों को हमेशा अपनी माँ के समान समझता है।” वह सेनापति छत्रपति की बात सुनकर अवाक् रह गया, उसने उनसे क्षमा माँगी और कुछ सैनिकों के साथ पालकी को वापस किलेदार के पास भेज दिया। जब वह सुंदरी मुगल किलेदार के पास पहुँच गयी तब उसने उसे इस घटनाक्रम के बारे में बताया।

किलेदार को अपने दुश्मन शिवाजी से इस प्रकार के व्यवहार की कतई आशा न थी। उसने भी शिवाजी की उच्च चरित्रनिष्ठा को प्रणाम किया। वास्तव में महाराज शिवाजी ने जिस प्रकार की अनासक्ति का उदाहरण पेश किया था वह अत्यंत दुर्लभ है। क्योंकि असाधारण रूपवती युवती को देखकर मन को रोक सकना बड़ा कठिन कार्य है और जब बात शत्रु से प्रतिशोध लेने व उसकी संपत्ति पर अधिकार जमाने की आती है तब वैराग्य और चरित्रबल का इतना ऊँचा उदाहरण प्रस्तुत करना दुष्कर ही है।

“साहस की सबसे बड़ी परीक्षा वासनाओं को जीत लेने की क्षमता में निहित है। जिसने स्वयं पर जय पा ली है, उसने सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है।”
– अरविन्द सिंह

 

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