Famous Gautama Buddha Story in Hindi on Death

 

“जब आपके मरने का समय बिलकुल नजदीक आ जाय, तो उन लोगों की तरह मत बनिये जिनके दिल मौत के डर से छलके हुए हैं, ताकि जब उनका वक्त आ जाय तो वे रोयें और थोड़े समय के लिये और एक नये अंदाज में दोबारा अपनी जिंदगी जीने की दुआ माँग सकें। अपनी मौत का गीत गाइये, और एक घर लौटते शूरवीर की तरह मरिये।”
– टेकुम्सेह

 

Gautama Buddha Story in Hindi on Death
हर कोई इंसान स्वर्ग जाना चाहता है, लेकिन मरना कोई भी नहीं चाहता

भगवान बुद्ध उस समय प्रवास पर थे। प्रतिदिन अनेकों नर-नारी उनके सान्निध्य मे आकर ज्ञानलाभ प्राप्त करते और एक श्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प लेकर लौटते। एक दिन एक स्त्री बहुत शोक-संतप्त स्थिति में उनके पास आयी और रोते-रोते कहने लगी – “भगवन! मेरे इकलौते पुत्र की सर्प द्वारा काटने से मृत्यु हो गयी है, मेरे पति की मृत्यु तो पहले ही हो चुकी है।

अब बस केवल मेरा पुत्र ही जीने का एकमात्र सहारा बचा था, उसे भी काल ने छीन लिया। आप कृपा करके उसे जिला दीजिये।” भगवान बुद्ध ने उस स्त्री को सांत्वना देते हुए कहा – “देवि! यह कैसे संभव है। इस संसार में जो भी प्राणी जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। अतः अब तुम उसके लिये शोक मत करो और उसका दाह-संस्कार कर जीवन में आगे बढ़ो।”

परन्तु वह स्त्री कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी। पुत्र की मृत्यु के शोक ने उसके बुद्धि-विवेक को हर लिया था। उसने प्रभु से कहा – “यह सब मै जानती हूँ प्रभु! लेकिन आप अपनी शक्ति से सब कुछ करने में समर्थ हैं, यह सब लोग कहते हैं। इसलिये जब तक आप मेरे पुत्र को जीवित नहीं कर देते, तब तक मै यहाँ से नहीं जाउंगी।

ऐसा कहकर वह सीधे भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर रोने लगी। महात्मा बुद्ध ने जान लिया कि शोक की भीषण आग में जलती इस स्त्री को समझाना अत्यंत ही कठिन है। अतः उन्होंने उसे बोध कराने के उद्देश्य से कहा – “उठो देवि! अब यह विलाप छोड़ दो। मै तुम्हारे पुत्र को अवश्य जीवनदान दूँगा, पर पहले तुम किसी के घर से जाकर एक मुट्ठी सरसों के दाने ले आओ।

लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि जिस घर से तुम सरसों लाओगी, उस घर में आज तक किसी की मृत्यु न हुई हो।” वह स्त्री प्रसन्न मन से यह सोचकर उठी कि अब तो उसका पुत्र अवश्य ही जीवित हो जायेगा। क्योंकि गाँव में कोई न कोई घर तो ऐसा मिल ही जायेगा जहाँ अब तक कोई न मरा हो। पर उसका यह सोचना बिल्कुल गलत सिद्ध हुआ।

वह गाँव के प्रत्येक घर में गई, यहाँ तक कि आस-पास के गाँवों में भी उसने द्वार खटखटाये। पर बहुत प्रयत्न करने पर भी उसे कोई ऐसा घर न मिल सका जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो। लोग उसे एक मुट्ठी सरसों के बदले, मनों सरसों देने को तैयार थे, पर उसकी इस शर्त को पूरी करने में असफल थे। सुबह से शाम हो गयी, पर उसे इस मर्ज की दवा कहीं न मिली।

थक-हार कर वह वापस भगवान बुद्ध के पास आयी और बोली कि बहुत प्रयास करने पर भी उसे वह घर नहीं मिल पाया है। अब तक उस स्त्री को भी भली-भांति समझ में आ गया था कि इस मृत्युलोक में जो भी प्राणी आता है, वह एक न एक दिन अवश्य ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है। भगवान बुद्ध ने अपनी दिव्य अमृतवाणी से उस स्त्री की मानसिक व्यथा को दूर कर दिया।

शोक और भ्रम का वह भारी दैत्य जो उसके मन में जड़ जमाकर बैठ गया था अब दूर भाग चुका था। इस लोक में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी की मृत्यु निश्चित है, क्योंकि देह विनाशशील है। अतः हर किसी को इस दुखद घटना को सहना पड़ता है। मृत्यु का आघात सहन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये संभव नहीं होता।

प्रियजनों की मृत्यु किसी भी व्यक्ति के लिये सबसे भीषण पीड़ा होती है, जो व्यक्ति को जडवत बना देती है, उसके सोचने-समझने की सामर्थ्य को नष्ट कर देती है। प्रियजनों में स्नेह का बंधन जितना दृढ होता है उसके वियोग से होने वाली मानसिक व्यथा भी उतनी ही अधिक होती है।

कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही सामर्थ्यवान, बलशाली क्यों न रहा हो, इस जटिल समस्या के निवारण में निरुपाय ही है। इसलिये सभी को यह प्रयास करना चाहिये कि संबंधियों से स्नेह तो किया जाय पर उनकी नश्वरता का बोध भी साथ ही रहे।

“मौत उसकी मुक्तिदाता है जिसे स्वतंत्रता मुक्त नहीं कर सकती, उसकी चिकित्सक है जिसे दवाएँ ठीक नहीं कर सकती, और उसे सुकून देने वाली हैं जिसे वक्त दिलासा नहीं दे सकता।”
– चार्ल्स कैलेब कोल्टन

 

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