Best Hindi Story of Kalidasa and Vidyottama

 

“कोई भी प्रतिष्ठा इतनी प्रभावशाली नहीं है, और न ही कोई स्वाधीनता इतनी महत्वपूर्ण है, जितनी कि अपने साधनों में ही जीवन निर्वाह करना।”
– केल्विन कूलिज

 

इस शानदार और प्रेरक कहानी का पिछला भाग आप Hindi Story on Willpower: ब्रह्मांड का सबसे अचूक अस्त्र में पढ़ ही चुके हैं। अब प्रस्तुत है अगला भाग –

वहां जाकर पंडितों ने विद्योत्तमा के पास सन्देश भिजवाया कि इस बार हमारे गुरु आपके साथ शास्त्रार्थ करना चाहते हैं, पर चूँकि उन्होंने मौन व्रत धारण किया हुआ है अतः वे मुख से कुछ नहीं बोल सकेंगे, इसलिये आपको जो भी प्रश्न पूछना हो वह संकेतों में ही पूछिये। विद्योत्तमा ने पंडितों की यह शर्त स्वीकार कर ली। इधर पंडितों ने कालिदास को भी सख्त ताकीद कर दी कि राजकुमारी तुमसे चाहे कुछ भी कहे, चाहे कुछ भी पूछे, पर मुँह बिलकुल मत खोलना।

वह जो भी सवाल पूछे उसका जवाब हाथ के इशारे से ही देना। कालिदास ने बात मान ली। नियत समय पर शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। पहले विद्योत्तमा ने अपने हाथ की एक अँगुली उठाई, जिसका अर्थ था कि ब्रह्मा एक है, परन्तु कालिदास तो यह नहीं समझते थे कि उसके संकेत का क्या अर्थ है। उन्होंने तो यही समझा कि यह औरत उनकी एक आँख फोड़ना चाहती है। इस बात ने उनके ह्रदय में प्रतिशोध की भावना भर दी।

उन्होंने राजकुमारी के प्रश्न के उत्तर में अपने हाथ की दो अंगुलियाँ खड़ी कर दीं जिसका अभिप्राय था कि यदि तुम मेरी एक आँख फोड़ोगी, तो मै तुम्हारी दोनों आँखे फोड़ दूँगा। पर वहां उपस्थित पंडितों ने कालिदास के संकेत का अर्थ राजकुमारी को दूसरे ही अर्थों में समझाया। उन्होंने विद्योत्तमा से कहा, “गुरुदेव दो अँगुलियों से यह बताना चाहते हैं कि सृष्टि में ब्रह्म और जीव, ये दोनों ही सत्य हैं।

विद्योत्तमा ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया। फिर राजकुमारी ने अपने हाथ की पाँचों उँगलियाँ खड़ी कीं जिसका तात्पर्य था कि संसार पञ्च तत्वों से मिलकर बना है। पर कालिदास ने यह समझा कि यह मेरे गाल पर थप्पड़ मारना चाहती है, इसलिये उन्होंने क्रोध में आकर अपना मुक्का विद्योत्तमा की ओर लक्षित करते हुए जवाब दिया कि यदि तुम मेरे गाल पर चाँटा मारोगी तो मै तुम्हे मुक्के से मारूँगा।

पर वहाँ उपस्थित विद्वानों ने जवाब दिया, “आप संसार को पंचतत्वों से निर्मित बताती हैं, लेकिन हमारे गुरुदेव का कहना है कि जब तक ये पाँचों तत्व अलग-अलग रहते हैं, तब तक इनसे कुछ विशेष कार्य सिद्ध हो पाना असंभव है। जीव का आश्रय पाकर और एकरूप होकर ही संसार में इनकी अभिव्यक्ति संभव है। इस तरह विद्योत्तमा ने अपनी हार स्वीकार कर ली और उसका विवाह कालिदास से हो गया।

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, पर एक दिन बाहर एक ऊँट को जाते देखकर कालिदास जोर से ऊट्र-ऊट्र चिल्लाये। उन्हें अशुद्ध उच्चारण करते देखकर विद्योत्तमा को यह समझते देर न लगी कि उसका विवाह एक मूर्ख व्यक्ति से करवा दिया गया है। उसने कालिदास को बहुत बुरा-भला कहा और यह कहकर महल से निकाल दिया कि जब विद्वान बन जाना तभी घर लौटना।

कालिदास मूर्ख तो थे, पर लज्जाहीन नहीं। वे अपने आत्मसम्मान पर पड़ी इस चोट को सहन नहीं कर सके और चुपचाप चल दिये। इसके बाद उन्होंने विद्या प्राप्ति के लिये दीर्घकाल तक घोर परिश्रम किया, उत्कट साधनाएँ की, पर फिर भी अपने अनुकूल परिणाम न देखकर उनका मन क्षुब्ध हो उठा। एक दिन प्राण-त्याग के विचार से वह रात्रि के समय देवी के मंदिर में गये।

तलवार हाथ में लेकर कालिदास जैसे ही अपना मस्तक देवी के चरणों में अर्पित करने वाले हुए, तभी अचानक मंदिर दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा और माता की चिन्मयी प्रतिमा साकार हो उठी। माँ वीणावादिनी की अजस्त्र कृपा बरस पड़ी और कालिदास को उनकी दीर्घकाल की साधना का फल अतुल्य विद्वत्ता और अप्रतिम मेधा के रूप में मिला।

सारे देश में कालिदास की ख्याति फ़ैल गयी और वे सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक बने। संकल्प का बाण अचूक है। हाँ, अपने अभीष्ट लक्ष्य को पाने में कुछ देर अवश्य लग सकती है, क्योंकि प्रबल प्रतिरोध अधिक समय तक धैर्यपूर्वक निरंतर परिश्रम की माँग करते हैं, पर असंभव कुछ नहीं है।

प्रचंड संकल्प शक्ति का तात्पर्य यह नहीं है कि यह हाथों-हाथ आसमान से तारे तोड़कर लाने देने वाली कोई विशिष्ट क्षमता है और न ही इस सामर्थ्य को एक दिन में विकसित किया जा सकता है। लम्बे समय तक एकाग्रचित्त और धैर्यवान बने रहकर जटिल मुश्किलों का सामना करके ही इस अदभुत शक्ति को हासिल किया जा सकता है।

“वह इंसान कभी नाकामयाब नहीं हो सकता है जिसने अपना आत्म-सम्मान नहीं खोया है।”
– स्वेट मार्डेन

 

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