Hindi Story on Divine Love of Radha and Sri Krishna

 

“प्रेम समस्त खामोशियों के नीचे दबी आवाज है; ऐसी आशा है जिसका डर में कोई विरोधी नहीं है; ऐसी शक्ति है जो इतनी सशक्त है कि जिसका एकमात्र बल दुर्बलता है: ऐसा सत्य है जो सूरज से भी ज्यादा नजदीक है और सितारे से भी ज्यादा दूर है।”
– ई. ई. कम्मिंग्स

 

आजकल जिधर देखिये उधर प्रेम का ही बोलबाला है। प्रेमी-प्रेमिकाएँ और पति-पत्नी प्रेम के बारे में बात करते अघाते नहीं हैं और आजकल के कम आयु के किशोरों और किशोरियों का तो कहना ही क्या! I Love You शब्द तो जैसे उनकी वर्णमाला का अति सामान्य शब्द ही है। फिल्मों और पाश्चात्य सभ्यता से आकर्षित हुए युवक युवतियाँ जिस दैहिक आकर्षण को प्रेम समझकर वासना की आँधी में उड़ते चले जा रहे हैं, क्या वह वास्तव में प्यार जैसे पवित्रतम शब्द की बराबरी कर सकता है?

क्या मर्यादा को लांघकर क्षणिक आमोद-प्रमोद में मग्न रहते हुए अपने शील को नष्ट कर डालना, प्रेम जैसे दिव्य और ईश्वरीय भाव का अपमान नहीं है? यह प्राचीन कहानी प्रेम की उच्च और महान गरिमा का अत्यंत सुन्दर उदाहरण है, जहाँ प्रेमी ह्रदय से सिर्फ अपने प्रेमास्पद का हित चाहता है और उसका दुःख दूर करने के लिये हजारों वर्ष तक दुःख सहने के लिये भी तैयार है। अवश्य ही यह प्रेम लौकिक नहीं, अलौकिक है जो महान आत्माओं के बीच ही संभव है।

यह प्रसंग महर्षि व्यास द्वारा रचित एक पुराण कथा का अंश है। इस बार नारद बहुत दिनों बाद पृथ्वी पर आये थे और वह भी मजबूरीवश, क्योंकि उन्हें जानना था वह रहस्य, जिसके कारण तीनों लोको में राधा के अनिवर्चनीय प्रेम की स्तुति हो रही थी। आज तक वह अपने आप को भगवान का सबसे बड़ा भक्त मानते आये थे, लेकिन आज हर जगह हो रहा राधा का गुण-गाण उनके ह्रदय को विचलित किये जा रहा था।

इधर द्वारिका में भी सभी रानियाँ अपने ह्रदय में इसी बात का अहंकार पाले बैठी थीं कि वही भगवान से सबसे अधिक प्रेम करती है। आज भगवान् ने इन सभी का अहंकार एक साथ तोड़ने की ठान ली, क्योंकि अभिमान भक्त को ईश्वर से दूर कर देता है। खिन्न दशा में देवर्षि नारद भगवान श्रीकृष्ण के महल में पधारे। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भगवान मस्तकशूल की असहनीय वेदना से छटपटा रहे हैं और सभी पटरानियाँ उन्हें घेरे खड़ी हैं तथा उनकी सेवा-सुशुर्षा कर रही हैं।

उनकी दशा देखकर नारद को अपना प्रश्न भूल गया और वे भगवान से उस पीड़ा के निवारण का उपाय जानने के लिये व्याकुल हो गये। भगवान ने कहा – “नारद उपचार तो अवश्य है, लेकिन उसका होना संभव नहीं दिखता।” नारद ने कहा – “प्रभु! आप बतायें तो सही, मै अपने प्राण तक देने के लिये तैयार हूँ।” उनकी उत्कट इच्छा देखकर योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले – “देवर्षि! यदि मेरा कोई भक्त मुझे अपना चरणोंदक पिला दे तो ज्वर की यह भीषण वेदना शांत हो सकती है, अन्यथा इसके दूर होने का कोई उपाय नहीं है।

भगवान के मुख से यह बात सुनते ही नारद का मुँह उतर गया, वह पसोपेश में पड़ गये। वह मन में विचार करने लगे – “भक्त का चरणोदक भगवान के मुँह में! यह कैसे संभव है। नहीं, नहीं! मै यह नीच कर्म नहीं करूँगा।” उन्हें चुप देखकर भगवन श्रीकृष्ण बोले, “देवर्षि! आप भी तो मेरे भक्त हैं! आप ही क्यों मुझे अपना चरणोदक नहीं पिला देते?” भगवान की बात सुनकर नारद हाथ जोड़कर कहने लगे – :नहीं प्रभु, मै सहर्ष अपने प्राण दे सकता हूँ।

लेकिन अपना चरणोदक पिलाने का यह घोर पाप नहीं कर सकता। कृपया मुझे क्षमा करें।” फिर भगवान ने रुक्मिणी से अपना चरणोदक देने को कहा तो उन्होंने उत्तर दिया – “नहीं स्वामी! मै आपकी पत्नी हूँ। मेरा स्थान आपके श्रीचरणों में है। मै भला कैसे आपको अपना चरणोदक पिलाने का महापाप कर सकती हूँ। जब रुक्मिणी ने भी मना कर दिया तब भगवान ने सत्यभामा से कहा। सत्यभामा ने भी कुछ इस प्रकार से उत्तर दिया – “नहीं भगवन! आप मेरे प्राण ले लें मै खुशी-खुशी इन्हें त्याग दूँगी।

लेकिन अपना चरणोदक पिलाने का साहस मुझमे नहीं है, क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि ऐसी पत्नी को हजारों वर्षों तक नरक यातना भोगनी पड़ती है।” जब सत्यभामा ने भी अपना चरणोदक देने से मना कर दिया तब भगवान ने जाम्बवती, कालिंदी आदि रानियों से अपना चरणोदक देने की प्रार्थना की, लेकिन नरक जाने के डर से सभी ने मना कर दिया। तब भगवान ने नारद को राधा के पास चरणोदक लाने के लिये भेजा। वहाँ जाकर नारद ने वृषभानु नंदिनी से अपना चरणोदक देने की प्रार्थना की।

जैसे ही राधा ने श्रीकृष्ण की पीड़ा की बात सुनी, वह तत्क्षण एक पात्र में जल भरकर लायी और उसमे अपने पैर डुबोकर जल-पात्र देवर्षि को दे दिया। नारद यह देखकर भौचक्के रह गये। उन्होंने सोचा कि शायद राधा यह नहीं जानती होगी कि वह कितना बड़ा पातक कर रही है। इसलिये चेताने की दृष्टि से उन्होंने राधा से कहा – “देवी क्या तुम जानती हो कि भगवान को अपना चरणोदक पिलाने का क्या परिणाम होगा! इससे तुम्हे रौरव नरक मिलेगा!”

राधा ने रुँधे गले से उत्तर दिया – “देवर्षि! मै जानती हूँ कि इस पाप से मुझे रौरव नरक मिलेगा, लेकिन अपने प्रियतम के सुख के लिये मै हजारों युगों की नरक यातना को भी भोगने के लिये तैयार हूँ। कृष्ण ही मेरा सर्वस्व है। अब आप विलम्ब मत कीजिये और तुरंत ही द्वारिका चले जाइये। नारद ने राधा के अनिवर्चनीय प्रेम को नमस्कार किया और भगवान के पास आ गये। चरणोदक पीते ही भगवान की पीडा दूर हो गयी, फिर भगवान ने नारद से सारा घटनाक्रम पूछा।

नारद ने जैसा हुआ था, वैसा सब हाल बयां कर दिया। उसे सुनकर भगवन ने सबको बोध कराने के लक्ष्य से कहा – “अब तो आप सब समझ ही गये होंगे कि क्यों सर्वत्र राधा के दिव्य प्रेम का ही गान हो रहा है? उनकी बात सुनकर नारद और सभी रानियों के सिर लज्जा से झुक गये और उन्होंने भी मन ही मन राधा को प्रणाम किया।

“जहाँ भी प्यार है वहीँ जीवन है, क्योंकि प्रेम स्वयं ही जीवन है।”
– महात्मा गाँधी

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