Famous Guru Nanak Dev Ji Story in Hindi

 

“जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना और बोध नहीं है, उसके लिये शास्त्र क्या कर सकता है? आँखों से हीन अर्थात अंधे मनुष्य के लिये दर्पण, बहरे के लिये राग जिस तरह व्यर्थ हैं, उसी तरह अविवेकी और अश्रद्धालु के लिये शास्त्र भी किसी काम का नहीं होता।”
– स्वामी विवेकानंद

 

Guru Nanak Dev Ji Story in Hindi
कोई भी विरासत इतनी समृद्ध नही, जितनी कि ईमानदारी

सिक्खों के प्रथम गुरु नानकदेव अपने शिष्यों के साथ देशाटन पर थे। उन दिनों हिन्दुस्तान में मुगलों का शासन था और इस्लाम धर्म का बलपूर्वक प्रसार करने हेतु उनका अत्याचार हिन्दुओं पर दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था। सभी को बलपूर्वक मुसलमान बनाया जा रहा था। जो इनकार करता उसे या तो मौत के घात उतार दिया जाता या उसका सब कुछ छीन लिया जाता।

ऐसे विपरीत समय में गुरु नानकदेव जैसे दिव्य महापुरुषों ने ही हिन्दुओं की इन विधर्मियों से रक्षा की। सनातन धर्म के दिव्य संदेशों की जनसमुदाय में अलख जगाते-जगाते वे एक बार सुल्तानपुर पहुँचे। गुरु नानकदेव जैसे ईश्वरीय संत का सान्निध्य पाकर, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान सभी उनके प्रति श्रद्धा से अवनत हो गये।

उनकी बढती ख्याति से वहाँ के काजी के पेट में दर्द होने लगा। उसने शहर के सूबेदार दौलत खां से खूब नमक-मिर्च लगाकर उनकी शिकायत की और कहा, “न जाने इस पाखंडी ने लोगों पर कैसा जादू दाल दिया है। लोग अपना ईमान-धर्म सब भूलते जा रहे हैं। यदि यह कुछ समय और यहाँ रह गया तो इस्लाम की जड़ काट देगा।  यह न तो खुद नमाज पढता है, न ही औरों को पढने देता है।

न खुद मस्जिद जाता है और न ही दूसरों को जाने देता है।” काजी की बातें सुनकर दौलत खां बहुत तैश में आ गया। उसने उसी समय एक सिपाही गुरु नानकदेव को बुलाने भेजा, पर वे नहीं गये। इससे दौलत खां का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने सैनिकों की पलटन भेजकर कहा कि यदि वे आराम से न आये, तो कैद करके ले आना।

दौलत खां की बुद्धि शुद्ध करने के अभिप्राय से गुरु नानकदेव शांतचित्त उन सैनिकों के साथ चले आये। उन्हें देखते ही दौलत खां उन्हें फटकारते हुए बोला, “पहले बुलाने पर क्यों नहीं आये?” “मै खुदा का बंदा हूँ, सिर्फ उसकी बंदगी करता हूँ, तुम्हारी नहीं।” गुरुनानकदेव ने निर्भयतापूर्वक उत्तर दिया। दौलत खां बोला, “अच्छा! तो तुम खुद को खुदा का बंदा मानते हो?

फिर यह बताओ कि तुमने मुझे सलाम क्यों नहीं किया? क्या तुम्हे अदब का भी लिहाज नहीं है?” “मै खुदा के अलावा और किसी को सलाम नहीं करता।” गुरु नानकदेव की बात सुनकर दौलत खां के तन-बदन में आग लग गई। उसने गुस्से से नानकदेव से कहा “तो फिर, खुदा के बन्दे, चल मेरे साथ मस्जिद में नमाज पढने चल।”

गुरु नानकदेव, सूबेदार और काजी के साथ मस्जिद में नमाज पढने चल दिये। वहाँ जाकर काजी और सूबेदार तो नमाज पढने में मशरूफ हो गये। पर गुरु नानकदेव चुपचाप उन्हें खड़े होकर देखते ही रहे। उधर नमाज पढ़ते-पढ़ते भी काजी और सूबेदार का मन अपने-अपने कामों में ही लगा हुआ था। सूबेदार का ध्यान उस व्यापारी पर था, जो आज उसके लिये बढ़िया नस्ल के अरबी घोड़े लाने वाला था।

उससे मुलाकात की बेचैनी सूबेदार को इतनी ज्यादा थी कि वह उस समय बस यही चाह रहा था कि किसी तरह नमाज जल्दी से ख़त्म हो तो वह लौटकर सौदागर से से घोड़ों का सौदा पक्का कर ले। इधर काजी महाशय के मन में तो लड्डू फूट रहे थे कि आज मैंने इस विधर्मी नानक को आखिरकार झुका ही दिया।

आगे पढिये इस कहानी का अगला भाग Hindi Story on Fraud and Cheating: कपट से हमेशा दूर ही रहिये

“भक्ति का अर्थ यह नहीं है कि उसके नाम पर हर बात को आँख मूँदकर स्वीकार कर लिया जाय। परम्पराएँ महत्त्वपूर्ण हैं, परन्तु उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, विवेक और विचार।”
– पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी

 

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