बुधवार, 28 सितंबर 2016

9 things unhappy people always do

9 काम जिन्हें दुखी लोग हमेशा करते हैं





"सुख हम पर ही निर्भर है, और इसे हासिल करने का सबसे अच्छा रास्ता उन चीज़ों की चिंता छोड़ने से है जो हमारी इच्छाशक्ति से बाहर की बात हैं।"
– एपिक्टेटस


सुख और दुःख जीवनरुपी पहिये के दो पहलू हैं। दुःख के पीछे सुख और सुख के पीछे दुःख लगा ही रहता है और यह सिलसिला न जाने कब से अनवरत रूप से चला आ रहा है। यदि कोई सुख को स्वीकार करता है तो उसे निश्चित रूप से दुःख को भी स्वीकार करना ही पड़ेगा। यह संभव नहीं कि हम सुख को तो स्वीकार कर लें, लेकिन दुःख से बचते फिरें। नियति के इस चक्र को रोक पाना संभव नहीं। दुःख हमारी जिंदगी में न जाने किन-किन राहों के जरिये प्रवेश करता है। कभी पीड़ा, तो कभी पतन, कभी रोग, तो कभी वियोग।

इंसान दुःख सहने को मजबूर हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि हम सभी तरह के दुःख भोगने को विवश हैं। कुछ अनिवार्य भोगों को छोड़ दिया जाय तो जिंदगी के ज्यादातर दुःख हमारे अपने ही पैदा किये हुए हैं। यदि हम अपने स्वभाव को परिवर्तित कर सकें, अपने जीवन पर सूक्ष्म दृष्टि का पहरा रखे सकें, तो जीवन बदलते देर नहीं लगेगी। यह केवल कोरा आश्वासन नहीं है, बल्कि सभी महान व्यक्तियों द्वारा अनुभूत यथार्थ तथ्य है। इस लेख के जरिये यह बताने का विनम्र प्रयास किया गया है कि दुखी लोगों के जीवन में छाया अँधियारा काफी हद तक उनकी ही नासमझी का परिणाम है जिसे वे इन नौ दरवाजों के जरिये अपने जीवन में प्रवेश करने देते हैं।


1. आत्म-विश्वास नष्ट कर लेना -

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व में आकर्षण उसके आत्म-विश्वास के समानुपाती होता है। आत्म-विश्वास ही व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, उत्साह और शक्ति का संचार करता है। दुखी लोगों की चेतना, दुःख के भार से इतने ज्यादा दबाव में आ जाती है कि उन्हें सब कुछ दुखपूर्ण ही लगने लगता है। उन्हें हमेशा ऐसा प्रतीत होता है कि अब वे बिल्कुल अकेले पड़ चुके हैं और अब कोई भी उनकी सहायता करने नहीं आने वाला है। ये निराशा उन्हें अन्दर तक तोड़ डालती है और यह ज्वलंत सत्य है कि इस दुनिया में उस इंसान की कोई मदद नहीं कर सकता जो अपना आत्म-विश्वास खो चुका है।

जिसका आत्म-विश्वास बिल्कुल नष्ट चुका है, वह इंसान जीता हुआ भी मुर्दा ही है और मुर्दे को कोई आखिर कब तक चला सकता है? आत्म-विश्वास से हीन व्यक्ति में न तो उत्साह रहता है और न ही परिश्रम करने की ललक। न तो इच्छाशक्ति ही उपजती है और न ही दृष्टि विकसित हो पाती है। निश्चित रूप से आत्म-विश्वास न केवल कामयाबी का, बल्कि जीवन में मिलने वाली हर खुशी, हर सुख का रहस्य है। इसलिये हर किसी को अपनी इस कीमती दौलत को बचाकर रखना चाहिये।


2. अपनी क्षमताओं का गलत आँकलन करना -

दुखी लोगों के जीवन की मीमांसा करने पर एक तथ्य यह भी उभरकर सामने आया है कि अधिकांश दुखी लोग भ्रम में जीते हैं और इसकी मुख्य वजह होती है अपनी क्षमताओं का सही आँकलन न कर पाना। कोई भी व्यक्ति यदि किसी ऐसे कार्य को हाथ में ले ले जो उसकी क्षमता से अधिक योग्यता की माँग करता है, जिसके विषय में उसे आवश्यक ज्ञान नहीं है और जिसमे निरंतर परिश्रम और धैर्य की दरकार है, तो उस कार्य में उसका असफल होना आश्चर्यजनक नहीं है।

और कुछ संकल्पित मनुष्यों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश लोगों के लिए असफलता दुःख का ही कारण बनती है। खीझकर और निरंतर तनाव में रहते हुए किसी काम को न तो सही तरह से पूरा करना ही संभव है और न ही अपनी जीवनीशक्ति को बचाए रख पाना। इसलिए बेहतर तो यही है कि पहले उन कार्यों को हाथ में लिया जाय जहाँ अपनी योग्यता पर्याप्त हो, और फिर प्राप्त अनुभव का इस्तेमाल करते हुए, अपनी योग्यता बढ़ाते हुए बड़े उत्तरदायित्व हाथ में लिये जाँय।


3. अतीत में जीना -

दुखी लोग हमेशा अतीत में जीना पसंद करते हैं, क्योंकि बचपन की, जवानी की यादें और बीते कल की कामयाबी हम सभी के जीवन के वे अनमोल, सुनहरे पल हैं जहाँ हमें न कभी किसी चीज़ की कमी महसूस हुई और न ही किसी भारी जिम्मेदारी का भार हमारे कन्धों पर पड़ा। माता-पिता और प्रियजनों की छाया तले गुजरे वे दिन शायद ही कोई इंसान मरते दम तक भूल सके। सुखी लोग अपने अतीत की गलतियों का ईमानदारी से मूल्यांकन करते हुए भविष्य के लिये एक बेहतर योजना तैयार करते हैं और कामयाबी हासिल करते हैं।

लेकिन दुखी व्यक्ति, सुखी इंसानों की तरह अतीत को एक प्रेरक प्रसंग समझकर उसे अपने आगामी जीवन को और अधिक बेहतर करने के लिये उपयोग में नहीं लाते, बल्कि वे उसी में ठहरकर, सिर्फ बीती हुई यादों का आनंद लेना चाहते हैं, वे आगे नहीं बढ़ना चाहते, बल्कि वर्तमान और भविष्य की ओर से मुँह फेर लेते हैं। ऐसी हालत में उनकी समस्त उन्नति, सारी प्रगति रूक जाती है। हमें समझना चाहिये कि वर्तमान की समस्या को, आज के दुःख को, अतीत के सुखद क्षणों के सहारे नहीं बदला जा सकता, बल्कि एक अच्छे भविष्य की आशा रखकर, मेहनत करके ही बदला जा सकता है।


4. स्वयं के जीवन की दूसरों के साथ तुलना करना -

अपने जीवन को दुखदायी बनाने के लिये दुखी लोग जिस काम को जाने-अनजाने सबसे ज्यादा करते हैं वह है- "अपने जीवन की दूसरों के जीवन से तुलना करना।" केवल इस एक कारण से ही दुःख 75 प्रतिशत लोगों के जीवन में अँधियारा करता चला जाता है। इस दुनिया में लोगों के जीवन की खुशियाँ छीनने वाले जितने भी कारण है, उसमे सबसे अहम् भूमिका सिर्फ इसी की है। अगर लोग स्वयं की दूसरों के साथ तुलना करना छोड़ सके, तो न केवल उनका जीवन सुखमय हो जाय, बल्कि आधे से ज्यादा सामाजिक अपराधों पर स्वयं ही रोक लग जाय।

स्वयं को प्रत्येक क्षेत्र में दूसरों से ऊपर देखने की महत्वाकांक्षा ने ही आज इस मानव समाज को इस विकृत अवस्था में पहुंचा दिया है। दिन प्रतिदिन बढ़ता भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती, रिश्वतखोरी, पैसे और ताकत का ओछा और भौंडा प्रदर्शन सिर्फ इसी एक बीमारी के कारण सिर उठाये हुए हैं, अन्यथा पेट भरने और सामान्य जीवन जीने के लिए थोड़े परिश्रम से प्राप्त आजीविका ही काफी है। ज्यादा नहीं बस थोडा संतोष रखकर ही हम इस आदत से दूर रह सकते हैं और अपने जीवन की अमूल्य खुशियाँ लुटने से बचा सकते हैं।


5. दूसरे लोगों के काम में टांग अडाना -


यह आदत भी लोगों की जिंदगी को अनावश्यक तनाव और दुःख से भरने वाली है। हमें समझना चाहिये कि इस धरती पर किन्ही भी दो व्यक्तियों के व्यक्तित्व पूर्णतया एक जैसे नहीं हैं, सभी लोग अलग-अलग परिवेश में ढले हुए, अलग-अलग विचार रखने वाले और अपने-अपने तरीके से कार्य करने वाले होते हैं। यदि आप लोगों को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करेंगे, उन्हें अपने अनुसार कार्य करने को बाध्य करेंगे तो निश्चित जान लीजिये, शीघ्र ही आप उनके प्रबल प्रतिरोध का सामना करेंगे, चाहे वह आपकी अपनी संतान ही क्यों न हो?

स्वतंत्रता हर व्यक्ति को प्रिय है, इस धरती पर कोई भी परतंत्र रहकर जीना नहीं चाहता।। कोई भी व्यक्ति धन के लोभ से या दबाव से एक सीमा तक ही कार्य कर सकता है और तब भी वह कभी आपका ह्रदय से सम्मान नहीं करेगा। इसलिये सबको एक ही डंडे से हाँकने की अपनी नीति को बदल डालिये। अन्यथा इस आदत को जीवन के हर क्षेत्र तक फैलने में देर नहीं लगेगी। जिन लोगों के जीवन का उत्तरदायित्व आपके ऊपर है, केवल उन्ही लोगों का समय-समय पर मार्गदर्शन करिये, पर वह भी बलपूर्वक नहीं। लेकिन बाकी लोगों को उनकी जिंदगी उनके इच्छित तरीके से ही जीने दीजिये, अन्यथा उनकी ख़ुशी तो बाद में खोयेगी, आप अपने जीवन को पहले दुखद बना लेंगे।


6. स्वयं पर भार लादे रखना -

कुछ लोगों की आदत होती है कि वे अपने सीने पर व्यर्थ की चिंताओं और कामनाओं का भार लादे रखते हैं। जैसे - इस बात की चिंता करते रहना कि दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे? अपनी नाकामयाबी के लिये बार-बार खुद को ही दोषी मानते रहना, आदि बातें। यह हर किसी को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि दूसरे व्यक्ति की आपके बारे में बनाई गई धारणा से न तो उसका ही हित हो सकता है और न आपका ही। हमारा लक्ष्य एक ऐसा व्यक्ति बनना नहीं होना चाहिये जो दूसरों को अच्छा लगे, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति बनना होना चाहिये, जो वास्तव में श्रेष्ठ हो।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट का कथन है- "मै उस बात की चिंता नहीं करता कि मै जो करता हूँ दूसरे उसके बारे में क्या सोचते हैं, लेकिन मै उस बात की बहुत चिंता करता हूँ कि जो मै करता हूँ उसके बारे में मै क्या सोचता हूँ!" याद रखिये - अच्छाई का संबंध चरित्र से है – अखंडता, ईमानदारी, दयालुता, उदारता, नैतिक साहस, और उसी प्रकार के अन्य गुण स्वयं में विकसित करना ही, किसी भी इंसान के लिए सबसे उत्तम मार्ग है। यदि हम ऐसा व्यक्ति बनने में सफल हो सकें, तो फिर किसी की अपने बारे में बनाई धारणा का कोई औचित्य नहीं?

अपनी असफलता के लिये स्वयं को ही दोषी मानते रहना, भूतकाल की गलतियों के लिये स्वयं को आत्मप्रताडित करना, परिस्थितियों को और बिगाड़ने जैसा है। दुखी लोग ऐसा करके न केवल अपने जीवन को पतन और अंधकार के गर्त में धकेल रहे होते हैं, बल्कि ईश्वरीय वरदान के रूप में मिली हुई दिव्य संकल्पशक्ति और बेशकीमती वक्त को भी व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं। इसलिये आपसे जो गलतियाँ हुई हैं, उन्हें भूल जाइये। दूसरों के विश्वास को, उनके सम्मान को आपने जो ठेस पहुँचाई है, उसे याद करके दुखी मत होईये, बल्कि यह सोचिये कि जो क्षति आपने स्वयं को या दूसरों को पहुँचाई है अब उसकी भरपाई कैसे हो? और फिर उसके लिये जी-जान से जुट जाइये।


7. दृष्टि का अभाव पैदा कर लेना -

दुखी लोगों में दृष्टि का अभाव होता है। दरअसल समस्या देखने का उनका तरीका ही असली समस्या होता है। वे सिर्फ समस्याओं से बचने के बारे में ही सोचते रहते हैं। अपने पास उपलब्ध दूसरे अवसरों पर उनकी नजरे नहीं रहती। सुखी लोगों और दुखी लोगों में एक महीन अंतर होता है, लेकिन वह अंतर एक बड़ा अंतर पैदा कर देता है और वह इस वजह से जन्म लेता है। स्पष्ट दृष्टि का अभाव उनकी सोच को संकुचित कर देता है। दुखी लोग वह नहीं देख पाते जो दूरद्रष्टा देख सकते हैं। वास्तव में तो होना यह चाहिये कि हम सर्वश्रेष्ठ की आशा करें। सबसे बुरे के लिये तैयार रहें और जो सामने आता है उसका लाभ उठाने को तैयार रहें।


8. दूसरे लोगों से अपेक्षा करना -

हम सभी की यह आंतरिक आकांक्षा होती है कि हमें भी दूसरे व्यक्तियों का सम्मान, सहयोग और प्यार प्राप्त हो। वे हमारे कहे का मान करें, हमारी अपेक्षाओं के अनुसार जियें। अन्य लोगों की तुलना में हमारी अपेक्षाएँ अपने परिवारीजनों से और मित्रों से ज्यादा होती हैं। माता-पिता को यह शिकायत होती है कि बच्चे उनकी चाहना के अनुरूप कार्य नहीं करते, बच्चे सोचते हैं कि हमारे माता-पिता हमारी भावनाओं को नहीं समझते, दोस्त सोचते हैं कि इसके पास हमारे लिए वक्त नहीं और पति-पत्नी सोचते हैं कि उनका जीवनसाथी रिश्ते को अहमियत नहीं देता, सिर्फ उनसे ही समर्पण की मांग करता है।

दूसरे लोगों से अपेक्षा करते-करते कब हम उनके जीवन में हस्तक्षेप करने लगते हैं, यह हमें पता ही नहीं चलता और जब वे हमें नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं तब हम स्वयं को ही कोसने लगते हैं। और इस तरह न केवल रिश्तों को बल्कि अपनी पूरी जिंदगी को ही जटिल बना लेते हैं। दुखी लोग यदि अपनी इस आदत से छुटकारा पा लें, तो न केवल उनके जीवन के कई दुःख दूर हो जाँय, बल्कि उनके परिवार और जीवन की परिधि में आने वाले हर व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति का प्रवेश हो जाय।


9. स्वयं को धोखा देना -

दुखी लोगों की कई आदतों में खुद से झूठ बोलना, स्वयं को धोखा देना भी शामिल होता है। हालाँकि वह यह सब करते अनजाने में ही हैं। एक कहावत है कि जब बिल्ली कबूतर का शिकार करने के लिए उसके सामने आती है, तो कबूतर अपनी आँखे बंद कर लेता है, यह सोचकर कि बिल्ली शायद चली गयी हो, लेकिन होता उल्टा ही है। यही समस्या दुखी लोगों के साथ होती है। मुश्किलों के प्रचण्ड स्वरुप को देखकर वे हताश हो जाते हैं और उनसे पीछा छुड़ाने के लिये, उनकी ओर से मुँह फेर लेते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि एक उच्चतर और महत्वपूर्ण जीवन आपसे न जाने कितनी बार अपने सुखों का बलिदान माँगता हैं - असहनीय कष्टों, त्याग और निरन्तर पीड़ा के रूप में।

और यदि कोई यह मूल्य चुकाने को तैयार नहीं है, तो वह सर्वोत्तम सुख पाने का अधिकारी भी नहीं है। महान लेखक खलील जिब्रान के शब्दों में कहें तो- "केवल वही इंसान सुख के सर्वोच्च रूप का अनुभव कर सकता है, जिसने दुखों को उनकी अंतिम सीमा तक जिया है।" सच्चा सुख आराम की, एक आसान जिंदगी गुजारकर हासिल नहीं किया जा सकता।
अपनी कमियों का ईमानदारी से, पक्षपातरहित होकर अवलोकन कीजिये, तब आप समझ जायेंगे कि आप कहाँ गलत थे, और जैसे ही आप निश्चय करेंगे कि अब स्वयं को धोखा नहीं देंगे, खुद से झूठ नहीं बोलेंगे और डटकर मुश्किलों का सामना करेंगे, उसी क्षण आप सुख के रास्ते पर आगे बढ़ चलेंगे।


"आप यहाँ केवल एक छोटी सी सैर पर हैं। जल्दी मत कीजिये, चिंता मत कीजिये और पथ में खिले फूलों की महक लेना मत भूलिये।"
- वाल्टर हगें



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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

what is the soft skills

क्यों जरुरी हैं Soft Skills एक अच्छे करियर के लिये





"वे सभी लोग जिन्होंने बड़ी चीजें हासिल की हैं, उनका एक महान उद्देश्य रहा है। वे कामयाब हुए, क्योंकि उन्होंने अपनी द्रष्टि एक ऐसे लक्ष्य पर केन्द्रित कर दी जो ऊँचा था, वह जो कभी-कभी असंभव प्रतीत होता था।"
- स्वेट मार्डेन


एक जमाना था जब कामयाबी पाने के लिये महज एक डिग्री की जरुरत पड़ा करती थी और ग्रेजुएट होते ही उन्नति के लिये ढेरों अवसर मिल जाते थे। पर आज जमाना बहुत बदल चुका है। आज किसी अच्छे संस्थान से ऊँची डिग्री लेने के बाद भी यह आशा नहीं की जा सकती कि अपने इच्छित क्षेत्र में उपयुक्त योग्यता के आधार पर कार्य करने का मौका मिल भी सकेगा या नहीं। हर साल लाखों की संख्या में अनेकों शिक्षित युवा एक बेहतर नौकरी की तलाश में स्कूल-कालेजों से निकलते हैं। केवल अच्छे नंबरों के या किसी professional degree के आधार पर आज के इस cut throat cometitive world में survive कर पाना बहुत मुश्किल है।


आखिर क्या हैं Soft Skills? -

अनेकों लोगों के मन में यह संशय रहता है कि जीवन में उन्नति करने के लिये हम किस क्षेत्र का चुनाव करें, कौन सी राह हमें हमारे इच्छित लक्ष्य तक ले जा सकती है। जीवनसूत्र के इस लेख में हमारे सम्मानित पाठकों की इसी दुविधा को दूर करने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है। एक शोध के अनुसार कामयाबी पाने में आपकी स्कूल या कॉलेज की शिक्षा का योगदान महज 25% ही होता है, जबकि 75 फीसदी योगदान आपकी उस योग्यता, कुशलता और सामर्थ्य का होता है, जिसे आप धीरे-धीरे आयु, अनुभव और संघर्ष के साथ समाज के बीच रहकर स्वयं अर्जित करते हैं। न तो कोई आपको इनका प्रशिक्षण देता है और न ही किसी स्कूल में इन्हें सिखाया जाता है।

अपनी मानसिक अभिरुचि, प्रबल जिज्ञासा, विवेकशीलता और निरंतर अध्यवसाय से ही व्यक्तित्व को सँवारकर भीड़ से अलग खड़ा करने वाली इन skills यानी soft skills में महारत हासिल की जाती है। आप अपने जीवन में, करियर में कितना आगे बढ़ पायेंगे, यह इन Soft Skills से, व्यक्तित्व की अनोखी विशेषताओं से तय होता है। कई लोग इन्हें बीजरूप में जन्मजात लेकर आते हैं, क्योंकि वे पहले से ही इन पर परिश्रम कर रहे होते हैं और थोड़े ही परिश्रम से इन्हें निखारकर जल्दी ही दूसरों से बहुत आगे निकल जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति उन सफल लोगों की तरह इन soft skills को विकसित कर अपने जीवन में, नौकरी में, व्यवसाय में आगे बढ़ सकता है।

यह समझ लेना बेहद आवश्यक है कि Soft Skills को प्रभावशाली बनाये बिना जिंदगी में आगे बढ़ना मुमकिन नहीं, फिर चाहे आपने कोई भी क्षेत्र क्यों न चुना हो? "Soft Skills व्यक्ति के व्यक्तित्व में बसी हुई उन मानसिक योग्यताओं(Mental Faculties) का वह समूह है जो उसे सामान्य लोगों से अलग बनाती है, अलग ढंग से कार्य करने की, एक अलग ढंग से सोचने की क्षमता प्रदान करती है। यह कहा जा सकता है कि विवेक और द्रष्टिकोण का साथ पाकर उसके व्यक्तित्व की सभी अच्छाईयाँ खिल उठती हैं, और बुराईयाँ खत्म होती जाती हैं। सच कहा जाय तो इनकी आवश्यकता न केवल पारिवारिक और सामाजिक जीवन में, बल्कि हर जगह है। कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है।"

इसी वजह से, आज इनकी इतनी महत्ता को देखते हुए, Technical Knowledge से ज्यादा demand 'Cutting Edge Skills' की है। आप अपनी class में topper थे या नहीं, Corporate World को इससे कोई लेना देना नहीं है या फिर आपको अपने subject की कितनी deep knowlege है इस बात से भी बहुत ज्यादा अंतर नहीं पड़ता। वे तो यह जानना चाहते हैं कि क्या आपमें Impressive Leadership Capability हैं? या फिर क्या आप Team Management में expert हैं? क्या आपके पास Extraordinary communication skills हैं? या आपमें Sound Decision Making Skills हैं? आप marks या degree के आधार पर नौकरी तो पा जायेंगे पर जिस स्थान पर पहुँचने की आशा आप पाले हुए हैं वहाँ तक कभी नही पहुँच पायेंगे, यदि आपके पास ये soft skills नहीं हैं -


1. Leadership Skills - प्रभावशाली नेतृत्व क्षमता

2. Communication Skills - सम्प्रेषण का हुनर

3. Team Management Skills - समूह प्रबंधन कौशल

4. Out of the Box Thinking Power - अलग ढंग से सोचने की काबिलियत

5. Sound Decision Making Skills - निर्णय लेने की ठोस क्षमता

6. Problem Solving Skills - समस्या सुलझाने का कौशल

7. Risk Taking Ability - खतरा उठाने की योग्यता

8. Time Management Skills - समय प्रबंधन का कौशल

9. Interpersonal Skills - सम्बन्ध जोड़ने का कौशल

10. And Many Others - और कई दूसरे गुण


जीवनसूत्र में आगे हम इन सभी soft skills पर ही चर्चा करेंगे, क्योंकि आज इन क्षमताओं के बिना न तो career में आगे बढ़ा जा सकता है और न ही जिंदगी में कोई बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है। हमें आशा है कि यह लेख आप सभी विद्वान पाठकों के लिये विशेष उपयोगी सिद्ध होगा और आपको जीवन में आगे बढाने में मददगार होगा। सभी पाठकों को एक उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएँ!


शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

ancient wonders of the world part 2

प्राचीन विश्व के सात महान आश्चर्य-भाग 2





"कल्पना सभी आविष्कारों और नवीनताओं की माँ है। यह एक अदभुत योग्यता है जो सभी मनुष्यों को मिली है ताकि जो संभव प्रतीत होता है उससे ऊपर सोच सकें और उन अनुभवों को महसूस कर सकें जिन्हें हमने पहले कभी नहीं बांटा है।"
- अज्ञात


अभी तक आप प्राचीन विश्व के तीन महान आश्चर्यों के विषय में पढ़ चुके हैं। निश्चित रूप से आपको इनके बारे में यह सब जानकार अच्छा लगा होगा। प्राचीन विश्व कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में भी कितना अग्रणी रहा है, यह हमें इतिहास से पता चलता है। और शायद हम मस्तिष्क पर थोडा जोर डालकर यह समझ सकें कि अगर हमें अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के विषय में कुछ भी ज्ञात न होता, तो क्या हम आज उन्नति के इस स्तर तक पहुँच सकते थे?

क्या आश्चर्य, कल्पना, उमंग के भाव हमारे मन में पैदा हुए होते? और क्या फिर हम असंभव को संभव करने की ओर क्रियाशील हुए होते? निःसंदेह नहीं। इस वेबसाइट पर इस प्रकार के विषय पर लेख लिखे जाने का बस यही कारण है। अब आप बाकी चार आश्चर्यों के विषय में पढिये और अतीत के रहस्मयी सागर में विचरण कीजिये।


4. ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति, यूनान-

यूनान में स्थित ज़ीउस की प्रसिद्ध मूर्ति का निर्माण महान यूनानी शिल्पकार फिडियस ने ओलंपिया नामक स्थान पर किया था। यह वही स्थान है जहाँ पर ईसा से लगभग 550 वर्ष पूर्व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हुई थी। फिडियस ने ही एथेंस में पार्थेनन और एथेना की भव्य मूर्ति का निर्माण किया था और जिसे सिर्फ प्राचीनकाल का ही नहीं, बल्कि अभी तक हुए सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकारों में से एक माना जाता है। इस भव्य और विशाल मूर्ति का निर्माण ईसा से लगभग 435 वर्ष पूर्व हुआ था और मंदिर को 466 ईसा पूर्व और 456 ईसा पूर्व के कालखंड के दौरान बनाया गया था। यह मूर्ति यूनानियों के देवता ज़ीउस की है, जिसे प्राचीन यूनानी साहित्य में बिजली का देवता बताया गया है।

इस प्रतिमा में ज़ीउस को उसके सिंहासन पर बैठा हुआ दर्शाया गया था तथा उसकी त्वचा को हाथी के दांत से निर्मित और कपड़ों को गढ़े हुए सोने से सजाया गया था। उसके शरीर का उपरी हिस्सा नग्न था और धड के नीचे उसने मूल्यवान वस्त्र पहने हुए थे। यह मूर्ति वास्तव में लकड़ी से बनी हुई थी, न कि सोने से, जैसा कुछ लोग मानते हैं। सिंहासन पर प्रभुत्व की मुद्रा में बैठे जीउस को उसके हाथों में करीने से गढ़े दो स्फिंक्स थामे दिखाया गया था। यह वह पौराणिक जीव हैं जिसका सिर और छाती तो एक स्त्री का था, लेकिन जिसका शरीर शेर का और पंख एक पक्षी जैसे थे।

40 फीट की यह मूर्ति इतनी लम्बी थी कि इसका सिर मंदिर की छत को स्पर्श करता था। इस मूर्ति के निर्माण में कलाकार ने जिस अद्भुत कला का प्रदर्शन किया है, वह निःसंदेह आश्चर्यजनक और मुग्ध करने वाली है। लगभग 12 मीटर ऊँची इस मूर्ति को उन उपासकों के अंदर भय को प्रेरित करने के लिए बनाया गया था, जो ओलंपिया में स्थित ज़ीउस के इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते थे। हालाँकि हर कोई इस मूर्ति से भयभीत नहीं होता था। स्ट्रेबो ने लिखा है - "भले ही मंदिर बहुत बड़ा और आकर्षक था। लेकिन मूर्तिकार की इस बात के लिए आलोचना हुई थी कि उसने प्रतिमा के निर्माण में सभी अंगों को एक उपयुक्त अनुपात में क्यों नहीं बनाया?

उसने जीउस को बैठे हुए दिखाया था, लेकिन उसका सिर छत को छू रहा था। जिसका तात्पर्य यह निकाला गया कि यदि देवता जीउस खड़े होकर चले, तो मंदिर बिना छत का ही हो जायेगा। एक दंतकथा के अनुसार जब शिल्पकार फिडियस ने मूर्ति का निर्माण कार्य समाप्त करने के पश्चात देवता ज़ीउस से उनकी अनुमति का प्रतीक-चिन्ह माँगा; तो थोड़ी ही देर पश्चात मंदिर आकाशीय बिजली(तडित) के प्रकाश से चमकने लगा था। देवता ज़ीउस के आशीर्वाद स्वरुप उस भव्य प्रतिमा ने ओलंपिया के मंदिर को 800 वर्षों से भी अधिक समय तक अपनी आभा से उज्जवल किये रखा।

इस मूर्ति का विनाश कैसे हुआ था, इसके विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार जब सारी दुनिया में ईसाईयत का प्रभाव बढ़ रहा था, तो कुछ उन्मादी शासकों ने ईसाई धर्म के फैलाव में एक अवरोध समझकर इस मूर्ति को मंदिर के सहित नष्ट कर दिया था। वहीँ कुछ अन्य लेखकों का यह मानना है कि रोम के शासक ने ईसाई पादरियों के बहकावे और दबाव में आकर चौथी सदी(400 A. D.) में इस मंदिर को बंद करवा दिया और इस मूर्ति को कांस्टेंटिनोपोल के एक मंदिर में भिजवा दिया था। जहाँ कुछ वर्षों बाद लौसीयन की एक भीषण आग में डलवाकर इस अद्भुत प्रतिमा को नष्ट करवा दिया गया और इस तरह एक और महान आश्चर्य सदा के लिए इस संसार से चला गया।


5. हेलिकारनासस का मकबरा, तुर्की -

हेलिकारनासस के विशाल मकबरे का निर्माण ईसा से 351 वर्ष पूर्व फारसी साम्राज्य के छत्रप मौसुल की याद में, उसकी प्रिय पत्नी आरटेमीसिया II ने करवाया था। मौसुल एशिया मायनर में कार्निया का राजा था। जिसकी मृत्यु ईसा से 353 वर्ष पूर्व(353 B.C.) हुई थी और उसी ने हेलीकारनासस शहर को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया था। मौसुल आरटेमीसिया का भाई भी था(मुस्लिम समुदाय में ऐसा प्रचलन है) और उसकी दिली इच्छा थी कि इतने महान राजा के अंतिम विश्राम स्थल के लिए कोई अद्भुत स्थान होना ही चाहिये।

कहा तो यह भी जाता है कि मौसुल की मौत पर आरटेमीसिया इतनी ज्यादा दुखी थी कि उसने मौसुल के शरीर की भस्म को पानी में घोलकर पी लिया था और फिर गुम्बद के निर्माण का आदेश दिया था। आरटेमीसिया की मृत्यु भी, मौसुल की मौत के 2 वर्ष पश्चात ही हो गयी थी। 351 ईसा पूर्व जब वह मरी तो उसकी चिता की भस्म भी मौसुल की भस्म के साथ उसी गुम्बद में रखी गयी थी। उस समय के इतिहासकार "प्लिनी द एल्डर" के अनुसार आरटेमीसिया की मृत्यु के पश्चात भी गुम्बद का निर्माण कार्य चलता रहा, क्योंकि शिल्पकार अपनी साम्राज्ञी के प्रति श्रद्धावनत थे और यह मानते थे कि शायद यह कार्य उन्हें भी चिरयश दिलाने में सफल रहेगा।

जिस स्थान पर यह गुम्बदनुमा मकबरा स्थित था आज वह जगह तुर्की के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित बोडरम शहर में पड़ती है। इस मकबरे को गुम्बद के स्वरुप में बनाया गया था और यह विशाल मकबरा पूरी तरह सिर्फ सफ़ेद संगमरमर से बना था। इसकी ऊंचाई 41 मीटर यानि 135 फुट थी और इसका मुख्य आकर्षण इसका जटिल ढाँचा और सुन्दर नक्काशी थी। जो तीन आयताकार परतों से मिलकर बनी थी, जिसमे लिसियन, यूनानी और मिस्री वास्तुशैली की झलक थी। इसे बहुत ही उम्दा कारीगरी से अलंकृत करते हुए सजाया गया था जिसे उस समय के सर्वश्रेष्ठ शिल्पकारों ने अंजाम दिया था।

पहली परत सीढियों का एक 60 फुट का आधार था। उसके पश्चात बीच की परत में 36 एक समान ऊंचाई के खूबसूरत खंभे लगे थे और फिर उनके ऊपर एक सीढ़ीदार पिरामिड जैसी छत थी। अंत में सबसे ऊपर गुम्बद था, जिसे चार शिल्पकारों ने खूबसूरती से सजाया था। इसके अलावा चार घोड़ो वाले रथ का एक बीस फुट संगमरमर पर उकेरा चित्र था। यह मकबरा डेड हजार वर्षों से भी अधिक समय तक बना रहा। लेकिन समय गुजरने के साथ यह कमजोर होता चला गया और बाहरवीं-तेहरवीं सदी के पश्चात सन 1490-1494 में लगातार आये शक्तिशाली भूकम्पों ने इसे जमींदोज कर दिया।


6. रोडेज की विशाल मूर्ति, यूनान -

रोडेज की विशाल मूर्ति (कोलोसस ऑफ़ रहोड़स) का निर्माण 292 ईसा पूर्व और 280 ईसा पूर्व(292–280 BC) की अवधि में रोड्स निवासियों ने किया था। यह सूर्य देवता हेलियोस(जिसे रोड्स द्वीप का संरक्षक देवता माना जाता है) की काँसे से निर्मित एक प्रतिमा थी। यह 110 फुट ऊँची थी और जिसे रोड्स बंदरगाह के मुहाने पर स्थापित किया गया था। इस मूर्ति का निर्माण तब आरम्भ हुआ था जब 304 ईसा पूर्व मेसेडोनिया का राजा डेमीट्रिअस युद्ध की पहल करने के बावजूद रोड्स के निवासियों से हार गया था।

डेमीट्रिअस अपने बहुत सारे औजार और हथियार वहीँ पर छोड़कर भाग गया और रोड्स के निवासियों ने उन्हें बेचकर बहुत धन कमाया। जिसका इस्तेमाल उन्होंने एक विशालकाय मूर्ति को बनाने में किया। इसका खाका उस समय के मशहूर शिल्पकार चरेस ने तैयार किया था। 12 वर्षों में तैयार हुई यह विशाल मूर्ति प्राचीनकाल की सबसे ऊँची प्रतिमा मानी जाती थी, पर यह प्रतिमा प्राचीन विश्व के सातों आश्चर्यों में सबसे कम समय तक ही स्थिर रह सकी। 54 वर्ष पश्चात 226 ईसा पूर्व (226 BC) रोड्स में आये एक भूकंप में सूर्य देव की यह प्रतिमा घुटनों के बल गिर पड़ी और फिर दोबारा कभी इसका पुनर्निर्माण नहीं हो सका।

यह एक भग्न अवशेष के रूप में लगभग 800 वर्ष तक रोड्स की जमीन पर ही पड़ी रही। पर इस स्थिति में भी इस प्रतिमा में इतना आकर्षण था कि लोग दूर-दूर से इस आश्चर्य को देखने आते रहे। उस समय के इतिहासकारों ने इसके विषय में लिखा है कि सारी दुनिया में इस प्रतिमा के जैसी विशाल, भारी और कला के अद्भुत कौशल से भरी कोई संरचना नहीं थी। ईसा के 600 वर्ष पश्चात रोड्स के निवासियों ने दूसरे देशों से आये हुए सौदागरों के हाथों इस प्रतिमा के अवशेषों को अनुपयोगी वस्तु समझकर बेच दिया। इसलिये इस मूर्ति की वर्तमान स्थिति के विषय में कोई भी पुरातत्व विशेषज्ञ कुछ नहीं जानता।


7. अलक्जेंडरिया का प्रकाश स्तम्भ, मिस्र -

अलक्जेंडरिया के प्रकाश स्तम्भ का निर्माण ईसा से 280 वर्ष पूर्व मिस्र के अलक्जेंडरिया नामक स्थान पर हुआ था। यह प्रकाश स्तम्भ अलक्जेंडरिया शहर के निकट एक छोटे से द्वीप फरोस पर स्थित था। एक यूनानी वास्तुविद सोसट्रतोस ने इस प्रकाश स्तम्भ का डिजाईन तैयार किया था और वहाँ के शासक टॉलमी I के शासनकाल में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ था। यह प्रकाश स्तम्भ मनुष्य द्वारा निर्मित संसार की तीसरी सबसे ऊँची इमारत थी। जिसली ऊंचाई लगभग 134 मीटर या 440 फुट थी और इसकी रौशनी का स्रोत, वास्तव में एक दर्पण था, जो सुबह के समय तो सूर्य की किरणें और रात्रि के समय आग को परावर्तित करता था।

इस प्रकाश स्तम्भ की रौशनी को समुद्र में 35 मील दूर से भी देखा जा सकता था और यह नील नदी से गुजरने वाले जहाजों को शहर के व्यस्त बंदरगाह में प्रवेश करने में और वहां से बाहर निकलने में मदद करता था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने कुछ प्राचीन काल के सिक्कों पर उभरे इस प्रकाश स्तम्भ के चित्रों को देखकर इसकी संरचना का अनुमान लगाया है। संरचना के आधार पर हम इस प्रकाश स्तम्भको तीन भागों में बाँट सकते हैं। पहला यह कि इसका आधार चौकोर था, बीच में यह अष्टकोणीय स्तर का था और तीसरा इसकी छत बेलनाकार थी।

इन सबके ऊपर एक सोलह फुट ऊँची मूर्ति स्थापित थी जिसकी अधिकांशतः यही सम्भावना यही है कि यह मूर्ति या तो टॉलमी की है या फिर सिकंदर महान की, जिसके नाम पर इस शहर का नामकरण किया गया था। इस प्रकाश स्तम्भ की वास्तविक ऊंचाई के बारे में कई मतभेद हैं। इसकी ऊंचाई 300 फुट से लेकर 600 फुट तक बताई गई है, पर अधिकांश का यही मानना है कि इसकी ऊंचाई 400 फुट थी। जिन लोगों ने इस प्रकाश स्तम्भ को इसकी वास्तविक शोभा में देखा था उन्होंने इसके बारे में कहा था - " इसकी सुन्दरता को बयाँ करने के लिये हमारे पास शब्द नहीं हैं। धरती पर शायद ही कोई चीज़ इतनी विस्मयकारी हो।"

1700 से भी अधिक वर्षों तक यह प्रकाश स्तम्भ अपने प्रकाश के जरिये हजारों जहाजों को रास्ता दिखाता रहा। लेकिन दसवीं शताब्दी, फिर चौदहवीं शताब्दी और फिर पंद्रहवीं शताब्दी में बार-बार आये भूकम्पों के कारण यह कमजोर होता चला गया और अंत में सन 1480 में यह पूरी तरह से ही नष्ट हो गया। इस प्रकाश स्तम्भ के कुछ अवशेष नील नदी में भी पाये गये थे। और इस तरह हम देखते हैं कि किस तरह से प्राचीनकाल के ये अदभुत आश्चर्य एक के बाद एक विनष्ट होते चले गये और हम इनके उस अद्भुत स्वरुप का दीदार करने से वंचित हो गये जिसके कारण इनकी ख्याति हजारों वर्षों तक दिग-दिगांतरों में व्याप्त रही।


"यदि आप एक जहाज बनाना चाहते हैं, तो लोगों को लकड़ी लाने के लिए, काम बांटने के लिए और आदेश देने के लिए नगाड़ा पीटकर इकठ्ठा मत कीजिये। इसके बजाय उन्हें अत्यंत विस्तृत और अंतहीन समुद्र के लिए ललकारना सिखाइए।"
– एंटोनी डी सेंट एक्सुपेरी



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