गुरुवार, 25 अगस्त 2016

संत तिरुवल्लुर की असाधारण सहनशीलता

संत तिरुवल्लुर की सहनशीलता





“सहनशीलता उन सबसे श्रेष्ठ सदगुणों में से एक है जो किसी इंसान के अन्दर हो सकते हैं। इसे सीखना एक मुश्किल सबक जरूर हो सकता है, लेकिन इसका फल इंतज़ार करने लायक है।”
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य


यह सत्य कथा तमिल आध्यात्मिक साहित्य के महान लेखक और भगवान श्रीराम के भक्त महात्मा तिरुवल्लुर के जीवन से सम्बंधित है। ये महान संत आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व तमिलनाडु राज्य में हुए थे। ये अत्यंत ही सरल स्वभाव, उदारमना, और बेहद सादगी से जीने वाले सच्चे संत थे। अपने और परिवार का निर्वाह करने के लिए ये सूत कातकर कपडा तैयार करते और फिर उसे बाजार में ले जाकर बेचते। दिन भर के कमरतोड़ परिश्रम से वे अपनी आजीविका अर्जित करते थे।

सहनशीलता, धैर्य और क्षमा की तो वे मूर्ति ही थे। लेकिन जैसे इस संसार में कभी न तो अच्छे और महान व्यक्तियों की कमी हुई है, उसी तरह यहाँ पर कभी न तो दुष्टों और न ही नरपशुओं की कमी रही है। एक दिन जब वे बड़े परिश्रम से तैयार की हुई एक बहुमूल्य साडी को लेकर बाजार में उसे बेचने के लिए बैठे थे तो दूसरे लोगों की तरह एक नवयुवक भी वहां पर आया। वह दुष्ट प्रकृति का था और संत तिरुवल्लुर की ख्याति से जलता था।

आज सुनहरा अवसर देखकर उसने उनकी परीक्षा लेने की सोची और उस साड़ी का मूल्य पूछा। संत तिरुवल्लुर ने उसे प्यार भरे शब्दों में साड़ी का मूल्य चार रूपये बता दिया। पर जैसे दुष्ट व्यक्ति अपने स्वभाव से बाज नहीं आता, उसी तरह उस युवक ने संत को क्रोध दिलाने के लिए उस साड़ी को उठाकर उसके दो टुकड़े कर दिए और फिर उनका मूल्य पूछा। महात्मा तिरुवल्लुर ने बिलकुल शांत रहते हुए ही साड़ी का मूल्य दो-दो रूपये बताया। उस व्यक्ति ने दोबारा प्रत्येक साड़ी के दो-दो टुकड़े कर दिए और फिर प्रत्येक साड़ी का मूल्य पूछा।

संतजी ने उसी निश्चल प्रेम भाव से उसे साड़ी का मूल्य एक-एक रूपये बताया, पर संत की सहनशीलता को देखकर भी उस युवक को लज्जा नहीं आई थी। उसने फिर से प्रत्येक साड़ी के दो टुकड़े किये और फिर उनका मूल्य पूछा। संतजी ने अविचलित रहते हुए ही उनका मूल्य बताया - आठ-आठ आने। वह युवक इसी तरह साड़ियों के टुकड़े-टुकड़े करता गया और उनके दाम पूछता गया। वह यह सोच रहा था कि कभी न कभी तो यह व्यक्ति क्रोधित होगा ही और उसे अवश्य ही कुछ कहेगा, और तब वह संत को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर सकेगा।

लेकिन संत तिरुवल्लुर के ह्रदय में तो क्रोध का लवलेश भी नहीं था। वे युवक को उसकी दुष्टता का कोई उत्तर दिए बिना शांत भाव से मूल्य बताते चले गये। आखिरकार जब फाड़ते-फाड़ते वह साडी बिल्कुल तार-तार हो गयी, तो वह युवक साड़ियों के रेशों का गुच्छा संतजी के सामने फेंकते हुए बोला - "अब इसमें क्या रह ही गया है जो इसके पैसे दिये जाँय।" फिर उस व्यक्ति ने धन का अभिमान प्रदर्शित करते हुए कहा - "यह लो! इस साड़ी की कीमत और उसने पैसे संतजी के सामने फेंक दिये।"

संतजी ने निश्चल और शांत स्वर में उत्तर दिया -"बेटा! यह पैसे तुम अपने पास ही रख लो, जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं तो तुमसे पैसे क्यों लूँ और उन्होंने युवक को पैसे वापस कर दिए।" इस घटना से उस युवक का ह्रदय पश्चाताप से इतना जलने लगा कि वह सीधे उनके पैरों में ही गिर पड़ा। उसके आंसुओं से भरे नेत्रों को देखकर संतजी की आँखे भी भर आयी। फिर वे उस युवक से बोले -"बेटा! तुम्हारे चार रूपये देने से इस क्षति की भरपाई नहीं हो सकती। क्या तुमने कभी यह सोचा है कि इस साड़ी को इतना सुन्दर रूप देने के लिए कितने लोगों को अथक परिश्रम करना पड़ा है?

क्या तुम्हे पता है कि कितनी मुश्किलों से किसान ने कपास की फसल प्राप्त की होगी? उसे धुनने और सूत बनाने में कितने लोगों ने अथक परिश्रम किया होगा और अपना अमूल्य समय दिया होगा? मेरे परिवार ने उसे एक मूल्यवान और सुन्दर साडी बनाने के लिए कितनी मेहनत की होगी? उनके गहन बोध से भरे इन शब्दों को सुनकर वह व्यक्ति रोकर उनसे कहने लगा- "तो फिर आपने मुझे पहले ही यह गलत काम करने से क्यों नहीं रोक दिया?"

महात्मा तिरुवल्लुरबोले- "यदि मै तुम्हे पहले ही ऐसा करने से रोक देता तो तुम्हे यह अमूल्य शिक्षा कैसे मिलती और फिर मुझे भी अपनी सहनशक्ति का पता कैसे चलता? वह युवक प्रसन्न मन से विदा हुआ और फिर बाद में उका शिष्यत्व स्वीकार कर एक अच्छा इन्सान बना।

“जो शिक्षा प्रेम, सहानुभूति और क्षमा से दी जाती है केवल वही व्यक्ति केव्यक्तित्व में सच्चा परिवर्तन ला सकती है क्योंकि यह शब्द नहीं, बल्कि अन्तःकरण के पवित्र भाव हैं जो बदलाव के कारक हैं।"
- अरविन्द सिंह



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बुधवार, 24 अगस्त 2016

दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?

यक्ष और युधिष्ठिर संवाद





“विवेकशील व्यक्ति कभी भी दो मन वाले नहीं होते; परोपकारी व्यक्ति कभी चिंता नहीं करते; साहसी व्यक्ति कभी भी भयभीत नहीं होते।”
- कन्फ़्यूशियस


यह घटना उस समय की है जब दुर्योधन ने छल से पांडवों का सारा राज्य छीन लिया था और वे बेचारे वन में मारे-मारे फिर रहे थे। इसी तरह दिन बिताते हुए एक दिन जब वे प्यास के कारण बहुत शिथिल हो गए, तो युधिष्ठिर ने अपने सबसे छोटे भाई सहदेव को पानी की खोज में भेजा। लेकिन उसके बहुत देर तक भी न लौटने पर फिर उन्होंने नकुल को भेजा। लेकिन काफी देर बाद भी जब वह नहीं आया, तो उन्होंने फिर अर्जुन को और अंत में भीम को पानी लाने के लिए भेजा।

लेकिन जब चारों भाइयों में से कोई भी वापस नहीं लौटा तो धर्मराज को बहुत चिंता हुई और फिर वे भी शीघ्रता से उनकी खोज में चल पड़े। आगे जाने पर उन्हें स्वच्छ और निर्मल जल से भरा हुआ एक जलाशय दिखाई दिया, जिसके किनारे पर उनके चारों भाई निर्जीव पड़े हुए थे। उन्हें इस अवस्था में देखकर धर्मराज को बहुत दुःख हुआ, लेकिन फिर यह सोचकर कि शायद प्यास के कारण ही उनकी यह दशा हुई हो, वे जल लेने के लिये जलाशय में उतर गए।

पर जैसे ही उन्होंने पानी लेना चाहा, एक तेज और प्रभावशाली आवाज ने उन्हें यह चेतावनी देते हुए पानी लेने से रोक दिया -"हे युधिष्ठिर! तुम भी मेरी आज्ञा के बिना जल लेने का प्रयत्न मत करों, यदि दुस्साहस करोगे तो तुम्हारी भी वही दशा होगी जो तुम्हारे इन भाइयों की हुई है। यदि तुम जल पीना चाहते हो तो पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।" उस आवाज को सुनकर, पर अपने सामने किसी को भी न देखकर, उन्होंने उस अद्रश्य व्यक्ति से स्वयं को प्रकट करने की प्रार्थना की।

धर्मराज के अनुरोध करने पर एक भयंकर यक्ष ने स्वयं को एक पेड़ के ऊपर प्रकट किया। उसे अपने सामने देखकर युधिष्ठिर ने उसे प्रणाम किया और उससे अपने प्रश्न पूछने के लिए कहा। फिर यक्ष ने युधिष्ठिर से जो प्रश्न पूछे वे न केवल किसी व्यक्ति के ज्ञान और उसकी विद्वत्ता की पहचान करने की उच्च कसौटी ही हैं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, सेवा और सद्गुण की जीवन में महत्ता बताने वाले उच्च्स्तरीय सूत्र भी हैं। कहानी को छोटा रखने के उद्देश्य से हम केवल कुछ ही प्रश्न और उनके उत्तर दे रहे हैं। विस्तृत रूप से इस कहानी को पढनेके लिए इस e-book को download करें -

यक्ष ने पूछा - ऐसा कौन पुरुष है जो इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते हुए, श्वास लेते हुए तथा बुद्धिमान, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होने पर भी वास्तव में जीवित नहीं है?

युधिष्ठिर बोले - जो देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता और आत्मा का पोषण नहीं करता, वह वास्तव में साँस लेने पर भी जिन्दा नहीं है।

यक्ष ने पूछा - धरती से भी भारी क्या है? आकाश से भी ऊँचा क्या है? वायु से भी तेज चलने वाला क्या है? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है?

युधिष्ठिर बोले - माता भूमि से भी ज्यादा भारी(बढ़कर) है, पिता आकाश से भी ऊँचा(महान) है, मन वायु से भी तेज चलने वाला है और चिंता तिनकों से भी बढ़कर है।

यक्ष ने पूछा - सो जाने पर पलक कौन नहीं मूँदता? उत्पन्न होने पर भी चेष्टा कौन नहीं करता? ह्रदय किसमे नहीं है? और वेग से कौन बढ़ता है?

युधिष्ठिर बोले - मछली सोने पर भी पलक नहीं मूंदती, अंडा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थर में ह्रदय नहीं है और नदी वेग से आगे बढती है।


यक्ष ने पूछा - विदेश में जाने वाले का मित्र कौन है? घर में रहने वाले का मित्र कौन है? रोगी व्यक्ति का मित्र कौन है? और मृत्यु के निकट पहुँचे व्यक्ति का मित्र कौन है?

युधिष्ठिर बोले - साथ के यात्री विदेश में जानेवाले के मित्र हैं, स्त्री घर में रहने वाले की मित्र है, चिकित्सक रोगी का मित्र है और दान मरने वाले मनुष्य का मित्र है।

यक्ष ने पूछा - किस वस्तु के त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है? किसे त्यागने पर शोक नहीं करता? किसे त्यागने पर वह धनवान होता है? और किसे त्यागकर वह सुखी होता है?

युधिष्ठिर बोले - मान को त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध को त्यागने पर शोक नहीं करता, काम को त्यागने पर वह धनवान होता है और लोभ को त्यागकर वह सुखी होता है।

यक्ष ने पूछा - युधिष्ठिर! यह बताओ, मधुर वचन बोलने वाले को क्या मिलता है? सोच-विचारकर काम करने वाला क्या पा लेता है? जो बहुत से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है? और जो धर्मनिष्ठ है उसे क्या मिलता है?

युधिष्ठिर बोले - जो मीठी वाणी बोलता है वह सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करने वाले को सफलता मिलती है; जो बहुत से मित्र बना लेता है, वह सुख से रहता है और जो धर्म के मार्ग पर दृढ है उसे सद्गति मिलती है।


यक्ष ने पूछा - हे युधिष्ठिर! अब यदि तुम मेरे इस अंतिम प्रश्न का भी समुचित उत्तर दे दो, तो तुम्हारे सभी भाई निश्चय ही जीवित हो जायेंगे यह बताओ कि इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है और वार्ता क्या है?

युधिष्ठिर बोले - प्रतिदिन लाखों प्राणी नियमित रूप से यमराज के घर जा रहे हैं; लेकिन जो मनुष्य जीवित बचे हुए हैं, वे यह देखकर भी हमेशा जीवित रहने की इच्छा करते हैं - यही इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है। मनुष्य मृत्यु को अनिवार्य जानकर भी, अधर्म और अन्याय के द्वारा संपूर्ण जीवन भोगों की उपलब्धि में ही खर्च कर देता हैं, इस सत्य को भूलकर कि ये समस्त भोग उसका यहीं त्याग कर देंगे और केवल धर्म ही उसका अनुसरण करेगा, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? इस महामोहरूप कडाह में काल भगवान् समस्त प्राणियों को मास और ऋतुरूप करछुल से उलट-पलटकर, सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधन के द्वारा राँध रहे हैं यही वार्ता है।

यह यक्ष और कोई नहीं बल्कि स्वयं भगवान् धर्म ही थे, जो महाराज युधिष्ठिर की परीक्षा लेने आये थे। युधिष्ठिर की धर्म में अत्यंत निष्ठा जानकर और उनके उत्तरों से प्रसन्न होकर भगवान धर्म उनके चारों भाइयों को जीवनदान देकर और वर देकर अपने लोक वापस लौट गये। आज न तो वह युग है और न ही पांडव हैं, लेकिन फिर भी उनकी कमनीय कीर्ति इस संसार में फैली हुई है, तो यह सिर्फ इस कारण हैं कि उन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का परित्याग नहीं किया।

भीषण और मृत्युतुल्य कष्ट सहकर भी उन्होंने धर्म के मार्ग को नहीं छोड़ा, बल्कि प्रत्येक स्थिति में उस पर अचल रहे और धर्मपालन का यह महाव्रत ही वह कारण था जिसने महाभारत के उस अतिघोर युद्ध में एक अभेदय कवच की तरह उनकी रक्षा की। इस दुष्कर धर्म का पालन करने के कारण ही स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण को (जो नररूप में स्वयं महाकाल थे) उनकी सुरक्षा करने और विजय सुनिश्चित करने के लिए आगे आना पड़ा। क्योंकि जहाँ धर्म है, वहीँ ईश्वर हैं और जहाँ ईश्वर है, वहीँ जय है।

“जो सभी कर्मों को आसक्ति त्यागकर और ईश्वर को अर्पित करके करता है, वह पाप से उसी प्रकार बचा रहता है जैसे जल से कमलपत्र।"
- भगवद गीता



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गुरुवार, 12 नवंबर 2015

best hindi quotes on deepawali festivals

 FESTIVALS





Christmas is not a time nor a season, but a state of mind. To cherich peace and goodwill, to be plenteous in mercy, is to have the real spirit of christmas.
- Calvin Coolidge

X is for X-mas Concentrate your energies, your thoughts and your capital. Put all your eggs in one basket and then watch that basket, then all your Christmases can come at once!

- Lucas Remmerswaal

Festivals promote diversity, they bring neighbors into dialogue, they increase creativity, they offer opportunities for civic pride, they improve our general psychological well-being. In short, they make cities better places to live.

- David Binder