शरीर के तिलों से जानिये अपने व्यक्तित्व के गुप्त रहस्य

Body Language:
Moles, Your Life & Personality

“अज्ञानी व्यक्ति उन
सवालों को पूछते हैं, जिनका जवाब बुद्धिमान व्यक्ति हजारों साल पहले ही दे
चुके होते हैं।”
– जोहान वोल्फगांग वों गेटे

Body Signs Reflects
Your Personality शारीरिक चिन्ह आपके व्यक्तित्व का दर्पण हैं : –

Body Language (SBL) के पिछले लेख में आप शरीर की भाषा को समझाने वाले इस
अद्भुत विज्ञान की महत्ता व आवश्यकता के बारे में पहले ही पढ़ चुके है। इस
लेख से अब हम क्रमवार बॉडी लैंग्वेज के उन रहस्यों पर से पर्दा हटाते
चलेंगे, जिन्हें जानना न केवल आपके जीवन के लिये ही उपयोगी होगा,
बल्कि आप अपने और दूसरों के व्यक्तित्व व स्वभाव की पहचान कर उनसे
अपेक्षित लाभ उठा सकते हैं।

इतना ही नहीं, आप अपनी कमजोरियों व कमियों को
जानकर उन्हें दूर कर सकते हैं, अपने भविष्य के प्रति उठती आशंकाओं को दूर
कर सकते हैं और आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिये समाधान के विषय में
सोच सकते हैं। साथ ही अपने व्यक्तित्व के मजबूत पक्ष को पहचानकर उसका लाभ
उठा सकते हैं दूसरों के स्वभाव की जानकरी पाकर उनसे सतर्क रहते हुए अपना
हित साधन कर सकते हैं।

इस अद्भुत ज्ञान के विषय में कई लोगों का यह मानना है कि यह मनगढ़ंत और
काल्पनिक है, क्योंकि वे इसके पीछे आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित
कोई निश्चित प्रमाण नहीं पाते। इसके बारे में हमें उन लोगों से केवल यही
कहना है कि इस विशेष विज्ञान का संबंध सिर्फ हड्डियों और माँसपिंड के इस
पिंजरे से नहीं है, जिसकी जांच वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं की टेस्ट
ट्यूब में करते हैं।

यह उससे कहीं ज्यादा जटिल और दुर्बोध्य मनोविज्ञान और आत्मविज्ञान की नींव
पर खडा है, जहाँ केवल विचारों, भावों और इच्छाओं का
ही वर्चस्व है। जिनकी आज का वैज्ञानिक समुदाय अपने संपूर्ण प्रयासों के
पश्चात भी केवल झलक भर ही पा सका है, क्योंकि भावजगत भौतिक संसार की तुलना
में हजारों गुना सूक्ष्म है और यहाँ के किसी उपकरण की पहुँच वहां तक संभव
नहीं है।

Moles Belongs to
Your Life & Personality तिलों का आपके जीवन व
व्यक्तित्व से गहरा संबंध है : –

इस लेख में हम शरीर पर बने चिन्ह, जिन्हें प्रायः तिल या मस्से (Moles) के
नाम से पुकारा जाता है, की अंग विशेष पर उपस्थिति के आधार पर जातक के
व्यक्तित्व व स्वभाव की चर्चा करेंगे। इसके अलावा उनके आधार पर उसके जीवन
मे घटने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ कई लोग यह
सोचेंगे कि भला एक छोटे से चिन्ह के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व और
जीवन का गहन विश्लेषण कैसे संभव है?

इस बारे में कैसे कोई निश्चित निर्णय दिया जा सकता है? मात्र एक चिंह के
आधार पर यह कैसे कहा जा सकता है कि अमुक व्यक्ति बुद्धिमान होगा या
दुश्चरित्र। हमारे ऐसे जिज्ञासु मित्र, कृपया सभी लेख और यह अनुच्छेद
ध्यान से पढ़ें, और उस पर गंभीरता से मनन भी करें। हमारे शरीर का प्रत्येक
अंग उससे सम्बंधित विशेष शक्ति से क्रियाशील होता है और उसकी छाप लिये
होता है। जैसे मस्तिष्क या ललाट क्षेत्र मनुष्य की मानसिक, बौद्धिक एवं
सात्विक शक्ति का सूचक है।

नासिका क्षेत्र व्यक्ति की भौतिक और राजसिक प्रवृत्तियों का सूचक है, मुख
क्षेत्र व्यक्ति की जैविक वासनात्मक एवं मानसिक इच्छाओं का सूचक है, हमारा
ह्रदय क्षेत्र कोमल भावनाओं का सूचक है, हमारा उदार क्षेत्र(पाचन संस्थान)
हमारी भौतिक प्रवृत्तियों, लालसाओं, का सूचक है, हमारा प्रजनन
क्षेत्र(जननांग) हमारी शारीरिक और वासनात्मक इच्छाओं का सूचक है। इसी आधार
पर अन्य क्षेत्रों के विषय में भी जानना चाहिये।

A. Moles on Head
मस्तक (ललाट) पर होने वाले तिलों का प्रभाव : –

1. जिन लोगों के ललाट(माथा) की दाहिनी कनपटी पर तिल का चिंह होता है, वे
दूसरों से स्नेह करने वाले, सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले और समृद्ध
होते हैं। लेकिन जिन लोगों के मस्तक पर बाईं ओर तिल होता है,
उन्हें जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

2. यदि किसी व्यक्ति के ललाट में शुक्र रेखा के ऊपर
तिल का चिंह हो, तो वह व्यक्ति धनवान व पूर्णतया सुखी होता है। उसके पास
भोग-विलास के प्रचुर साधन होते हैं और उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं
होती।

3. जिन व्यक्तियों की सूर्य रेखा के मध्य में तिल होता है, वे ऐश्वर्य से
संपन्न और पूर्ण सुख-सुविधा से भरा जीवन गुजारते हैं, समाज में
उच्च प्रतिष्ठा और यश प्राप्त करते हैं।

4. यदि सूर्य रेखा के दाहिनी ओर तिल हो, तो वह व्यक्ति अचल
संपत्ति का स्वामी होता है व जमीन आदि से लाभ उठाता है।

5. यदि सूर्य रेखा के बायीं ओर तिल हो, तो उस व्यक्ति के गृहस्थ जीवन में
निरंतर समस्याएँ बनी रहती हैं।

6. यदि चन्द्र रेखा पर तिल हो, तो वह व्यक्ति अल्पायु होता है तथा वह
गुप्त रोगों से ग्रस्त होता है।

7. यदि चन्द्र रेखा के दाईं ओर तिल हो, तो ऐसा व्यक्ति धनवान व समाज में
यशस्वी होता है।

8. जिस व्यक्ति की चन्द्र रेखा के बाई ओर तिल का निशान होता है, वह
व्यक्ति दूसरों के लिये परेशानियाँ पैदा करता रहता है।

9. यदि शुक्र रेखा के बाई ओर तिल हो, तो ऐसा व्यक्ति कामी, परस्त्रीगामी
होता है।

10. यदि गुरु रेखा के दाईं ओर तिल हो, तो वह व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति
करता है।

11. यदि मंगल रेखा के मध्य में तिल हो, तो वह व्यक्ति संतानहीन होता है।

12. शनि रेखा के आस-पास तिल होने पर व्यक्ति डरपोक होता है, पर इस रेखा के
बाईं ओर तिल होने पर व्यक्ति अपने जीवन में यात्राओं से धन अर्जित करता है।

13. जिनकी बुध रेखा के दाईं ओर तिल होता है, वे सफल व्यापारी होते हैं।
लेकिन जिन व्यक्तियों की बुध रेखा के बाईं ओर तिल का निशान होता है, वे
दब्बू, कायर और डरपोक किस्म के होते हैं। वे अपनी ही नासमझी से अपने स्वयं
के कामों को बिगाड़ लेते हैं।

B. Moles on Face
मुख पर होने वाले तिलों का प्रभाव : –

(l) कान : –

14. जिन व्यक्तियों के कान के उपरी सिरे पर तिल का निशान होता है, वे
व्यक्ति दीर्घायु होते हैं, लेकिन उनका शरीर कुछ कमजोर होता है।

15. जिनके दाहिने कान के पास तिल का निशान होता है, वे बड़े साहसी और
पराक्रमी होते हैं।

16. जिनके दाहिने कान के उपरी हिस्से पर तिल का चिंह होता है, ऐसे व्यक्ति
सरल स्वभाव के व युवावस्था में पूर्ण उन्नति करते हैं।

17. जिनके बाएँ कान पर तिल होता है, उन्हें अल्पायु का भय रहता है।

(II) आँखे व भौंहे : –

18. जिनकी दोनों भौंहों के बीच में या ललाट में तिल/मस्से का चिंह होता
है, तो यह अत्यंत शुभ होता है। ऐसे लोग धार्मिक प्रवृत्ति वाले तथा उदार
ह्रदय के होते हैं। ऐसे व्यक्ति राजोचित भोग भोगते हैं तथा इनकी आयु भी
अधिक होती है।

19. जिन लोगों की दाहिनी भौंह पर या पास में तिल होता है, उनकी आँखे कमजोर
होती हैं। जिनकी बायें नेत्र की भौंहों के पास तिल का चिंह होता है, वे
व्यक्ति प्रायः एकांतवासी और साधारण ढंग से जीवन यापन करने वाले होते हैं।
लेकिन तिल भौंहों पर होने से व्यक्ति यात्रा अवश्य करता है।

20. जिनकी दाहिनी आँख के नीचे तिल का चिंह होता है, वे सम्रद्ध और सुखी
होते हैं। जिनकी बाईं आँख पर तिल होता है, वे अक्सर चिंताग्रस्त रहते हैं।
जिन लोगों की दाहिनी आँख पर तिल होता है, वे कामुक होते हैं, उनकी
स्त्रियों में काफी आसक्ति रहती है।

(lll) गाल : –

21. जिन लोगों के बाएं गाल पर तिल का निशान होता है, उनके जीवन में प्रायः
धन का अभाव रहता है। लेकिन निर्धन होने पर भी उनका गृहस्थ जीवन आम तौर पर
सुखमय रहता है।

22. जिन व्यक्तियों के दाहिने गाल पर तिल का चिंह होता है, वे व्यक्ति
बुद्धिमान, धनवान और अपने जीवन में उन्नति करने वाले होते हैं।

23. जिनके बायें गाल पर लाल मस्सा होता है, वे मीठे के बहुत शौक़ीन होते
हैं और अक्सर मीठे पदार्थों का भोजन करते है।

(lV) होंठ : –

24. यदि व्यक्ति के चेहरे के दाहिने भाग पर तिल हो, तो वह व्यक्ति धनवान,
सुखी और प्रतिष्ठित होता है।

25. जिस व्यक्ति के होंठों पर (ऊपर या नीचे के होंठ पर) तिल का चिंह
होता है, वह सुखमय जीवन व्यतीत करने वाला होता है। लेकिन अत्यधिक कामुक
तथा विलासी भी होता है। उसमे विपरीत लिंगियों के प्रति आसक्ति इतनी अधिक
हो सकती है कि न तो वह किसी मान-मर्यादा का विचार करेगा और न ही लज्जा
अनुभव करेगा। अवसर पाते ही वह अपनी काम-पिपासा शांत करेगा। ये
व्यक्ति केवल अपने ही बारे में सोचते हैं और स्वार्थसिद्धि के लिये किसी
भी सीमा तक जा सकते हैं।

26. जिस व्यक्ति के होंठ के नीचे तिल होता है, वह निर्धन होता है और जीवन
भर गरीबी में ही दिन व्यतीत करता है।

(V) नासिका व दांत : –

27. यदि नासिका के बाईं ओर तिल हो, तो व्यक्ति बहुत परिश्रम करने के
पश्चात ही सफल हो पाता है।

28. जिस व्यक्ति की नासिका के मध्य भाग में तिल होता है, वह अक्सर यात्रा
करने वाला और दुष्ट स्वभाव वाला होता है। ऐसे लोगों को मातृ कष्ट की भी
प्रबल सम्भावना रहती है।

29. जिनके दांत के नीचे(मसूड़ों पर) तिल का चिंह होता है, उन्हें अक्सर
अपने कामों से लज्जित होना पड़ता है।

C. Moles on Neck
and Chin गर्दंन व ठोड़ी के तिलों का प्रभाव : –

30. जिन लोगों की ठोड़ी पर तिल का चिंह होता है, वे लोग अपने ही काम की धुन
में लगे रहते हैं, अपने ही स्वार्थ को प्रमुखता देते हैं और दूसरों के हित
से उन्हें कोई मतलब नहीं होता। प्रायः उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में पत्नी
से क्लेश सहन करना पड़ता है।

31. जिन लोगों की गर्दन पर तिल का निशान होता है, वे व्यक्ति बुद्धिमान
होते हैं और अपनी स्वयं की मेहनत से धन-संपत्ति व ऐश्वर्य अर्जित करते हैं।

D. Moles on Hand,
Palm and Armpit हाथ, हथेली व काँख के तिलों का प्रभाव : –

32. जिनके दायें हाथ पर तिल का निशान होता है, वे व्यक्ति बहुत बुद्धिमान
होते हैं। लेकिन जिनके बाएं हाथ पर तिल का चिंह होता है, वे कंजूस होते है।

33. जिनकी दाहिनी भुजा पर तिल का चिंह होता है, उन्हें सम्मान प्राप्त
होता है और जिनकी बाईं भुजा पर तिल होता है, उन्हें पुत्र की प्राप्ति
होती है।

34. जिनकी दाहिनी हथेली पर लाल/काले तिल का निशान होता है, वे अवश्य ही
धनवान होते हैं। लेकिन जिनकी बाईं हथेली पर तिल का चिंह होता है, वे अपने
धन को बुद्धिमानी से खर्च करते हैं।

35. जिनकी बगल में तिल का चिंह होता है, उन्हें अक्सर हानि उठानी पड़ती है।

E. Moles on Chest
and Heart छाती व ह्रदय पर होने वाले तिलों का प्रभाव : –

36. छाती के मध्य तिल होने पर व्यक्ति ऐश्वर्य भोगता है।<

37. जिनकी छाती पर दायीं ओर तिल का चिंह होता है, वे अपने पति/पत्नी से
बहुत प्रेम करते हैं, पर अक्सर चिंतित भी रहते हैं।

38. लेकिन जिनकी छाती के बाईं ओर तिल का निशान होता है उनकी अपनी
पत्नी/पति से अनबन रहती है और वे कामुक भी होते हैं।

39. जिनके ह्रदय पर तिल होता है, वे बुद्धिमान और विवेकशील होते हैं और
जीवन में खूब उन्नति करते हैं।

F. Moles on
Stomach and Waist पेट व कमर पर होने वाले तिलों का प्रभाव : –

40. जिनके पसली और पेट पर तिल का चिंह होता है, वे डरपोक और कायर किस्म के
होते हैं।

41. जिनके पेट पर तिल होता है, ऐसे लोग खाने-पीने के बहुत शौक़ीन होते हैं।
ये नित नये भोज्य पदार्थों का भोग लगाते हैं, इनका मुँह अक्सर चलता ही
रहता है। साथ ही इनकी पाचन शक्ति भी अच्छी होती है।

42. जिनकी पीठ पर तिल का चिंह होता है, वे सुखमय जीवन जीते हैं और अक्सर
मुश्किल परिस्थितियों से बच निकलते हैं।

43. जिनकी कमर पर तिल का निशान होता है, उन्हें परेशानी का सामना करना
पड़ता है।

G. Moles on Other
Body Parts अन्य अंगों पर उपस्थित तिल : –

44. जिस पुरुष के लिंग या अंडकोष पर तिल का चिंह होता है, वह
कामुक और रसिक मिजाज होता है; क्योंकि उसमे यौन क्षमता और उत्तेजना भी
अधिक होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाय, तो वह स्त्रियों का प्रेमी होता
है। ऐसा पुरुष हमेशा परस्त्री की ताक में लगा रहता है।

45. जिनके दायें पैर पर तिल का चिंह होता है, वे कुशाग्र बुद्धि के होते
हैं।

46. जिनके बाएं पैर पर तिल होता है, वे खर्चीले होते हैं।


“संपूर्ण जीवन एक प्रयोग है। आप जितने अधिक प्रयोग करते हैं उतना ज्यादा
बेहतर है।”
– राल्फ वाल्डो एमर्सन

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पसंद आया होगा। कृपया अपने Comments देकर हमें बताने का कष्ट करें कि
जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके बहुमूल्य
सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक
होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

भारत के अनोखे राजा-महाराजा और उनका विचित्र जीवन

Secrets
of Indian Royal Families in Hindi

“धरती हर व्यक्ति की
आवश्यकता को पूरा करने के लायक तो पर्याप्त देती है, पर हर व्यक्ति के
लालच को पूरा करने के लिये नहीं।”
– महात्मा गाँधी

Weird Kings of
Bharat भारत के विचित्र शासक : –

सन 1947 में देश के आजाद होने से पहले संपूर्ण भारत
सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था। जिन पर राज करते थे, मुँह में
चाँदी की चम्मच लेकर पैदा हुए, ऐश्वर्य और विलासिता में पले, शाही रौब-दौब
वाले राजा-महाराजा। जिनके लिये हर वस्तु पहले से उपलब्ध थी, जिन्हें अपार
पुण्यों के फलस्वरूप विरासत में ही, ईश्वरीय उपहार के रूप में एक बड़ा
राज्य और एक आलीशान जिंदगी हासिल हुई थी।

आज भले ही उनका अस्तित्व इस धरती से मिट गया हो, लेकिन किस्से-कहानियों के
माध्यम से वह किसी न किसी रूप में अवश्य जीवित रहेंगे। यहाँ न केवल हमें
उनकी शाही जीवनशैली और विचित्र आदतों के विषय में पता चलेगा, बल्कि उनके
ऐश्वर्य और झक्कीपन का नमूना भी देखने को मिलेगा। अगर हम अपने देश के इन
शासकों को “सारे जग से निराला” कहें, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। आखिर ये
तथ्य और सिद्ध भी क्या करते हैं –

1. अलवर के राजा जय
सिंह : –

व्यक्ति के आत्म-सम्मान पर पड़ी चोट उससे क्या कुछ नहीं करवा सकती, यदि इस
बात का कोई ज्वलंत प्रमाण आपको देखना हो, तो अलवर के महाराज जयसिंह
प्रभाकर (1882–1937) से बढ़कर उदाहरण कहीं नहीं मिल सकता। इन्टरनेट पर इस
घटना को कई राजाओं से जोड़कर दिखाया गया है, लेकिन वह ठीक नहीं हैं। यह
महाराज जय सिंह प्रभाकर पुत्र श्री मंगल सिंह प्रभाकर के ही जीवन की
महत्वपूर्ण घटना है। यह 20वीं सदी के शुरुआती दशक के अंतिम दिनों की बात
है, जब अलवर नरेश घूमने के लिये लन्दन गये हुए थे। इसी क्रम में वे एक दिन
बांड स्ट्रीट पर सादे सामान्य वस्त्रों में टहल रहे थे। उसी सड़क पर निकट
ही रॉल्स रॉयस का शोरूम भी था।

महाराज ने जब वहाँ शानदार, चमचमाती, दिलकश गाड़ियों को देखा, तो वह कारों
की कीमत और उसकी खूबियाँ जानने के लिये शोरूम के अंदर चले गये। चूँकि
महाराज साधारण वस्त्र पहने हुए थे, इसलिये शोरूम के सेल्समैन ने भी उन्हें
एक गरीब भारतीय ही समझा और उन्हें अपमानित कर शोरूम से लगभग बाहर ही निकाल
दिया। इस अपमान के पश्चात महाराज जयसिंह वापस अपने होटल के कमरे पर लौट
आये और उन्होंने अपने नौकरों के जरिये शोरूम तक यह सन्देश भिजवाया कि अलवर
के राजा उनकी कुछ कारों को खरीदना चाहते हैं।

कुछ घंटों के पश्चात अलवर नरेश फिर से शोरूम पहुँचे, पर इस बार वह एक राजा
की शानो-शौकत के साथ आये थे और अपने शाही लिबास में थे। उनके आने की सूचना
पर शोरूम के कर्मचारियों ने पहले ही रेड कारपेट(लाल कालीन) बिछा दिया था
और सारा स्टाफ उनकी अगवानी के लिये तैयार खड़ा था। महाराज ने उस समय शोरूम
में खड़ी छहों गाड़ियों को खरीद लिया और पूरी रकम का भुगतान कर दिया। जब वे
महँगी गाड़ियाँ भारत पहुंची, तो अलवर नरेश के आदेश पर छहों रॉल्स रॉयस को
शहर की सफाई के काम में लगा दिया गया।

जहाँ सफाई कर्मचारी उनमे कूड़ा-करकट, कचरा और शहर की तमाम गंदगी लादकर ले
जाते। जल्दी ही यह सनसनीखेज खबर पहले सारे भारत में और फिर सारी दुनिया
में फ़ैल गई कि दुनिया की सबसे महँगी और आलीशान कार को कूड़ा-कचरा ढोने में
इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे रॉल्स रॉयस कंपनी की साख घटने लगी और उसका
मजाक उड़ाया जाने लगा। जब भी यूरोप और अमेरिका में कोई व्यक्ति इस बात की
डींग हाँकता कि उसके पास एक रॉल्स रॉयस कार है, तो लोग उसका मजाक उड़ाते
हुए कहते, “कौन सी कार?”

अच्छा वह, जिससे भारत में शहर का कचरा ढोया जा रहा है। इस तरह कंपनी का
नाम खराब होने से कारों की बिक्री तेजी से घटने लगी और उसका राजस्व कम
होने लग गया। जब कंपनी को असली बात का पता चला, तो उन्होंने अलवर नरेश से
माफ़ी मांगी और उनसे उन आलीशान गाड़ियों में कचरा न ढुलवाने की अपील की।
इतना ही नहीं उन्होंने महाराज को छह नई रॉल्स रॉयस गाड़ियाँ मुफ्त में देने
का प्रस्ताव भी रखा था।

2. जूनागढ़ के नवाब
महाबत खान रसूल खान : –

भारत के सबसे विचित्र शासकों में जूनागढ़ के नवाब को भी प्रमुखता से रखा जा
सकता है, जिन्हें कुत्तों से बेहद प्यार था। कहा जाता है कि उनके पास 800
से भी अधिक कुत्ते थे और हर श्वान के लिये एक व्यक्तिगत अनुचर था। अर्थात
हजारों व्यक्ति केवल कुत्तों की रखवाली करने के लिये तैनात थे, जिन्हें
राजकोष से धन दिया जाता था, पर शायद इतना ही काफी नहीं था। बादशाह न केवल
कुत्तों के विवाह करवाते, बल्कि उनके वैवाहिक समारोह के लिये शानदार जलसे
भी आयोजित करवाते थे। जिनमे लाखों रुपयों का व्यय होता था और जिसमे रियासत
के बड़े-बड़े लोगों के अलावा पडोसी राज्यों के राजा-महाराजा तक आमंत्रित
होते थे।

उस शुभ दिन पर राज्य की ओर से अवकाश घोषित करवा दिया जाता था। हो सकता है
कई लोगों को नवाब का यह शौक एक विचित्र सनक या पागलपन लगे, लेकिन कुछ
लोगों को वह एक आला दर्जे के पशुप्रेमी(पेट लवर) भी प्रतीत हो सकते हैं।
पर इतना तो तय है कि शायद ही इस दुनिया में, कुत्तों या जानवरों से इतना
अधिक प्रेम करने वाला कोई दूसरा व्यक्ति आज तक पैदा हुआ हो और आगे भी शायद
ही कोई हो।

3. मैसूर के महाराज
कृष्णराज वाडियार IV : –

मैसूर के महाराज कृष्णराज वूडियार ने अपने नौकरों को सूरज की तेज धूप से
बचाने के लिए एक विशेष प्रकार की रॉल्स रॉयस कार को बनाने का आदेश दिया
था। सन 1911 में निर्मित यह कार जब लगभग 100 वर्षों के लम्बे अंतराल के
पश्चात एक नीलामी में बिकी, तो इसकी कीमत देखकर सब दंग रह गये। यह कार चार
लाख पौंड यानी 4 करोड़ रूपये से भी अधिक कीमत में बिकी। सन 1940 में जब
महाराज की मृत्यु हुई थी, तो उस समय वे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों
में से एक थे और उनकी कुल संपत्ति 35 बिलियन पौंड से भी अधिक थी।

4. पटियाला के
महाराज भूपेंद्र सिंह : –

पटियाला रियासत के राजा भूपिंदर सिंह भी अपनी शानदार, भड़कीली मेहमाननवाजी
के लिये बहुत मशहूर थे। जब उनके निमंत्रण पर ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम
उनके निवास “मोती बाग महल” पर आये थे, तो राजा ने उनके स्वागत-सत्कार के
लिये जो इंतजाम किया था वह किसी को भी हैरान कर सकता है। विशेष रूप से
निर्मित सोने के थालों में उनके भोजन का प्रबंध किया गया था। शराब आदि को
परोसने के लिये जिन पात्रों का उपयोग किया गया था, वह सब बेशकीमती रत्नों
से जडे हुए थे, वस्त्रों के रूप में महँगे और मखमली रेशमी वस्त्रों का
प्रयोग किया गया था।

राजा भूपिंदर सिंह की पत्नी बख्तावर कौर ने किसी रानी के प्रथम भारत दौरे
के उपलक्ष में रानी मेरी को एक बेशकीमती व भव्य हार भारतीय स्त्रियों की
ओर से तब प्रदान किया था, जब वह सन 1911 में आयोजित हुए जलसे, दिल्ली
दरबार में शरीक हुई थीं, जिसका आयोजन इसलिये किया गया था। क्योंकि इतिहास
में पहली बार ब्रिटेन के राजा और रानी भारत भ्रमण पर आ रहे थे। भारत के
प्रथम राष्ट्रपति डाo राजेंद्र प्रसाद ने भी पटियाला के महाराज के विशेष
चाँदी से निर्मित रथ पर सवार होकर राष्ट्रपति भवन के अंदर प्रवेश किया था।

राजा भूपिंदर सिंह को खाने का भी बहुत शौक था। प्रतिदिन 100 से भी अधिक
व्यंजन जिनमे लगभग हर तरह का भोजन शामिल होता था, राजा की आज्ञा से तैयार
किये जाते थे। प्रत्येक दिन के लिये अलग रेसिपी रहती थी। षडरसों के विषय
में जो वर्णन भारतीय साहित्य में वर्णित है, खान-पान का इंतजाम ठीक वैसा
ही होता था। कहते हैं 30 प्रकार की तो केवल एग करी ही बनती थी और राजा हर
व्यंजन को केवल थोडा-थोडा चखकर ही हट जाता था, बाद में वह भोजन सेवकों को
बाँट दिया जाता था।

5. भरतपुर के राजा
किशन सिंह : –

राजस्थान में ऐसे अनेकों राजा- महाराजा हुए हैं, जो अपनी विचित्र सनकों के
कारण दुनिया भर में विख्यात हुए। भरतपुर के राजा किशन सिंह की गणना भी कुछ
ऐसे ही शासकों में की जा सकती है, जो अपने रंगीन मिजाज और दोषदर्शिता के
लिये पहचाने जाते थे। किशन सिंह की कोई एक, दो नहीं, बल्कि कुल मिलाकर 40
पत्नियाँ थी। इस गुप्त रहस्य का खुलासा भरतपुर के दीवान रहे जरामनी दास ने
अपनी पुस्तक ‘महाराज’ में किया था। किशन सिंह केवल स्त्रियों का ही शौक़ीन
नहीं था, बल्कि उसे तैरने का भी बहुत शौक था और उसका यह शौक जूनून की हद
तक था।

इसलिये उसने अपने उस शौक को पूरा करने के लिये गुलाबी संगमरमर से बने एक
बड़े तालाब का निर्माण करवाया था और उसमे प्रवेश करने के लिये चन्दन की
लकड़ियों से बने एक सीढ़ीदार जीने का भी निर्माण कराया था। जब राजा स्नान
करने के लिये वहां आता, तो प्रत्येक रानी नग्नावस्था में उस सीढ़ीदार जीने
पर खड़ी होकर राजा की अगवानी करती और जब राजा स्नान के लिये तालाब में
प्रवेश कर जाता, तब बारी-बारी से प्रत्येक सीढ़ी पर खड़ी रानियाँ जल की
अठखेलियों से राजा का स्वागत करती।

इस तरह राजा तब तक उनसे जलक्रीडा करता था, जब तक अंतिम 20वीं सीढ़ी पर खड़ी
रानियाँ राजा के साथ स्नान नहीं कर लेती थी। उस समय सभी रानियों को अपने
हाथों में मोमबत्तियाँ थामे रखनी होती थी, क्योंकि महल में जलते सभी दिये
बुझा दिये जाते थे और फिर सभी रानियाँ उन जलती शमाओं को थामे राजा के
सामने नृत्य प्रस्तुत करती थीं। जिस रानी के हाथ में थमी बत्ती अंत तक
प्रज्वलित रहती थी, उसे ही उस रात के समय राजा के साथ सोने का अवसर मिलता
था।

6. सवाई माधोपुर के
राजा सवाई माधो सिंह II : –

सवाई माधोपुर नरेश सवाई माधो सिंह द्वितीय भी अपनी एक विचित्र आदत के कारण
काफी मशहूर हुए थे। बात यह थी कि महाराज गंगाजल को बहुत महत्व देते थे और
उसका नियमित सेवन करते थे। लेकिन जब वह ब्रिटेन की यात्रा पर जा रहे थे,
तो इस कारण एक बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई। क्योंकि वहाँ पर उनका कई दिनों तक
रूकने का कार्यक्रम था और उसके लिये बड़ी मात्रा में गंगाजल की आवश्यकता
पड़नी थी। लेकिन ऐसा कोई बर्तन नहीं था, जिसमे भरकर इतना अधिक गंगाजल लाया
जा सकता, जो उस अवधि के लिये पर्याप्त हो।

इस समस्या के समाधान के लिये दरबारियों से विचार-विमर्श कर राजा ने जयपुर
के कारीगरों को शुद्ध चाँदी से निर्मित, दो ऐसे बहुत बड़े बर्तन बनाने का
आदेश दिया, जिसमे गंगाजल भरकर वे अपने साथ इंग्लैंड की यात्रा पर ले जा
सकें। इन बर्तनों को निर्मित करने के लिये चाँदी के लगभग 14000 सिक्कों को
पिघलाया गया और उन्हें बहुत ही कुशलता से इस तरह बनाया गया कि उनमे कोई
जोड़ न रहे। ये बर्तन गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दुनिया के सबसे
बड़े शुद्ध चाँदी से निर्मित बर्तनों के रूप में आधिकारिक रूप से दर्ज हैं।

7. कपूरथला के
महाराज जगतजीत सिंह : –

कपूरथला रियासत के शासक महाराज जगतजीत सिंह भी भारत के अत्यंत विलासी
शासकों में से एक रहे हैं। उन्हें अत्यंत महँगे, कीमती और विलक्षण वस्त्र
पहनने का विचित्र शौक था। महाराज की सभी पोशाकें उस समय के सबसे महँगे
लक्ज़री मेगा-ब्रांड के रूप में विख्यात लुइस वुईट्टन द्वारा ही तैयार की
जाती थीं, जो जगतजीत सिंह के लिये एक से एक अद्भुत डिजाईन के बेशकीमती
वस्त्र तैयार करता था।

घूमने-फिरने के बहुत शौक़ीन जगतजीत सिंह के पास लुइस वुईट्टन के लगभग 60 से
भी अधिक बड़े बक्से थे, जिनमे उनके कपडे, पगड़ियाँ, तलवारें, सूट, जूते,
पारंपरिक वस्त्र और निजी सामान शामिल थे। महाराज के पास प्रत्येक अवसर पर
पहनने के लिये अलग-अलग तरह की पोशाकें थीं, शायद ही वह किसी पोशाक को
दूसरी बार पहनना पसंद करते थे।

8. उदयपुर के महाराज
: –

उदयपुर का मेवाड़ राजवंश स्फटिक के आकर्षण से इतना अधिक प्रभावित था कि
उन्होंने अपने महल के सिंहासन, कुर्सियाँ, मेज, पलंग और यहाँ तक कि पंखे
भी स्फटिक से जडवा रखे थे।


“परोपकारी बन जाइये इससे पहले कि धन-संपत्ति आपको लोभी बना दे।”
– थॉमस ब्राउन

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कन्या राशि से जानिये अपने व्यक्तित्व के अबूझ रहस्य

Hindi Astrology:
Personality of Zodiac Sign Virgo

“धैर्यवान और समझदार
बनिये जीवन ईर्ष्यालु होने और प्रतिशोधी होने के लिये बहुत छोटा है।”
– फिलिप ब्रुक्स

Nature
of Virgo कन्या राशि का स्वभाव : –

जब जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में हो, तो उस व्यक्ति की
जन्मराशि कन्या होती है। कन्या राशि, राशिचक्र की छठी राशि है। इस राशि का
विस्तार भचक्र के 150° से 180° तक है और इसका स्वामी गृह बुध है। यह वैश्य
जाति की स्त्री लिंग वाली, पृथ्वी तत्व प्रधान राशि है। यह दक्षिण दिशा की
स्वामिनी और सौम्य व शीत प्रकृति की अल्प संतति वाली राशि है। यह रात्रि
के समय बली रहती है और इसका पिंगल (हरा-पीला) वर्ण है।

इसका प्रतीक चिंह, एक कोमल व संकोची कन्या है। इस राशि के जातकों का
स्वभाव भी इसके प्रतीक चिंह की तरह, संकोच, चंचलता, भावुकता और परिपक्वता
से पूर्ण होता है। कन्या राशि के जातक प्रायः अस्थिर बुद्धि वाले, कम
बोलने वाले तथा शंकालु स्वभाव के होते हैं, लेकिन यह जातक नैसर्गिक रूप से
विद्याव्यसनी(खूब पढने-लिखने वाले) और शिल्प-कौशलयुक्त भी होते हैं। अपनी
उन्नति के प्रति कन्या राशि वाले विशेष रूप से जागरूक होते हैं।

कन्या राशि के जातकों को गोचर के फलादेश इसी राशि के आधार पर देखने
चाहियें। यदि व्यक्ति के जन्म के समय लग्न कन्या राशि का हो, तब भी यह
जातकों पर अपना प्रभाव डालती है। यह राशि व्यक्ति के शरीर में उसकी कमर व
उसके निचले उदर (आँतें व गुर्दे) का प्रतिनिधित्व करती है। ग्रहों की
अनुकूलता के अनुसार चंद्रमा, शुक्र और शनि कन्या राशि में शुभ फल प्रदान
करते हैं तथा सूर्य के लिये यह सम राशि है।

मंगल और बृहस्पति इस राशि के स्वामी बुध के शत्रु होने के कारण इसमें अशुभ
फल देते हैं। लेकिन इस राशि में इसका स्वामी गृह बुध उच्च होता है, जबकि
शुक्र नीच होता है। कन्या राशि पर सूर्य 30 दिन 29 घडी और 04 पल रहते हैं।
कन्या राशि के अंतर्गत, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के अंतिम तीन चरण, हस्त
नक्षत्र के चारों चरण और चित्रा नक्षत्र के प्रथम दो चरण आते है। इस राशि
के जातकों के लिये बुधवार का दिन विशेष अनुकूल होता है।

Personality of Virgo
Person कन्या राशि के जातक का व्यक्तित्व : –

कन्या राशि के जातकों का व्यक्तित्व सरल, आकर्षक और सौम्यता से
परिपूर्ण होता है। इस राशि के व्यक्ति चंचल व भावुक तो होते हैं, पर
साथ ही व्यवहारिक, चतुर और समझदार भी होते हैं। ये अपना प्रत्येक कार्य
करने से पहले अच्छी तरह से सोच-विचार करते हैं कि कहीं ये किसी घाटे में न
रह जायें या इनसे कोई भूल न हो जाय। इनके कार्यों में नियमितता और कौशल की
एक सहज झलक मिलती है। ये लोग सादगीपसंद तो हो सकते हैं, लेकिन
फक्कडपन इनके स्वभाव में नहीं होता।

कन्या राशि के जातक शांत प्रवृत्ति के, एकान्तप्रिय और व्यवस्थित ढंग से
कार्य करने वाले होते हैं। यह लोग जल्दी से उग्र नहीं होते और किसी भी
विवाद पर शान्ति और विवेक से विचार करना पसंद करते हैं। कन्या राशि के
जातक बौद्धिक रूप से परिपक्व और विचारशील होते हैं; इसलिये अपने प्रत्येक
कार्य को बहुत योजनाबद्ध ढंग से करते हैं और अपनी कल्पनाशक्ति से पहले ही
समस्त पहलुओं का आंकलन कर लेते हैं।

लेकिन बुध की अस्थिर प्रवृति के कारण विशेष रूप से जल्दी किसी निश्चय पर
नहीं पहुँच पाते। यह विषय की संपूर्ण गहनता पर विचार नहीं कर पाते है,
केवल उसके प्रारंभिक कलेवर की सूक्ष्म स्तर तक जानकारी पाने में रूचि रखते
हैं। यही कारण है कि इन लोगों को जीवन के अधिकांश क्षेत्रों की सामान्य
जानकारी तो होती है, लेकिन गहन ज्ञान किसी क्षेत्र का नहीं होता, क्योंकि
यह जानना इनके स्वभाव में ही शामिल नहीं होता।

यह लोग अपने जीवन में परिवर्तन पसंद करते हैं, क्योंकि ये लम्बे समय तक
एकरसता की स्थिति में नहीं रह सकते। इस राशि के जातक जीवन को सहज ढंग से
जीने में विश्वास करते हैं, इसलिये लड़ाई-झगडे और खतरों से भरे कामों से
दूर रहते हैं। ये लोग अधिकांश समस्याओं और परिस्थितियों की जड़ तक पहुँच
सकते हैं, क्योंकि इनमे आश्चर्यजनक स्मृति और प्रखर बुद्धि होती है।

Life &
Interests of Virgo Person कन्या राशि के जातक का
जीवन और रुचियाँ : –

आजीविका के रूप में भी इन्हें लेखन-अध्यापन और सरल व्यापार का क्षेत्र ही
अधिक भाता है, क्योंकि ये लेखन और पुस्तक पढने के शौक़ीन होते हैं। ये
लोग सफल इंजिनियर और डॉक्टर भी हो सकते हैं। चूँकि इन्हें प्रकृति और
पर्यावरण से भी काफी प्रेम होता है, इसलिये इन्हें अक्सर इनसे सम्बंधित
क्षेत्रों में भी कार्य करते हुए देखा जा सकता है। लेकिन अपने कार्यक्षेत्र में
भी यह जातक कोई खतरा नहीं उठाते, इसलिये कई बार उन्नति के
शिखर पर नहीं पहुँच पाते हैं।

कन्या राशि के जातक श्रृंगार और सौंदर्य के प्रेमी होते हैं और अपनी
वेशभूषा के प्रति हमेशा सजग रहते हैं। ये प्रायः भीड़ से दूर ही रहना पसंद
करते हैं और नये लोगों के साथ संकोच से मिलते हैं; जल्दी से किसी पर
विश्वास नहीं करते। यह लोग अंतर्ज्ञान की क्षमता से संपन्न होते हैं और
इनमे अच्छे-बुरे की पहचान करने की नैसर्गिक क्षमता होती है। ये जल्दी से
भावनाओं में नहीं बहते और कुछ स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं।

स्वभाव में भावुकता और प्रखर बौद्धिक क्षमता शामिल होने के कारण, इनके व्यक्तित्व में
एक बच्चे की मासूमियत, अल्हड़ता और एक वृद्ध की गंभीरता दोनों गुण शामिल
रहते हैं; इसलिये ये कवि, शायर और रचनाकार भी बनते देखे गये हैं। अपने
शरीर और स्वास्थ्य के प्रति कन्या राशि के जातक काफी सजग होते हैं,
इसीलिये प्रायः इनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है। ग्रहों की स्थिति
अनुकूल न होने पर, प्रारब्धवश इन लोगों को पेट के रोगों और तंत्रिका तंत्र
से सम्बंधित समस्याओं का सामना करना पड सकता है।

कन्या राशि के जातक अपने
जीवन के प्रति अत्यधिक रूप से चिंतित रहते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से
यही जताते हैं कि ‘मै तो चिंतामुक्त हूँ’। कन्या राशि द्विस्वभाव राशि है
और इस राशि की तरह यह लोग भी एक दोहरी जिंदगी जीते हैं। वैसे तो यह लोग
सांसारिक बुद्धि वाले दुनियादार लोग होते हैं, जो अपने लाभ पर ही दृष्टि
रखते हैं। लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में इस राशि के जातकों में धर्म व
अध्यात्म के प्रति रुझान बढ़ता देखा गया है।


“जो जानते हैं, वह उसे करते हैं। और वह जो समझते हैं, उसे
सिखाते हैं।”
– अरस्तू

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जानिये कितने आवश्यक हैं विटामिन आपके स्वास्थ्य के लिये

Hindi Health
Article on Essential Vitamins

“जिसके पास स्वास्थ्य
है, उसके पास आशा है; और जिसके पास आशा है, उसके पास जिंदगी में सब कुछ
है।”
– अरब की कहावत

Vitamins
and Our Health विटामिन और हमारा स्वास्थ्य : –

इस धरती पर हर मनुष्य इस शरीर को जीवित और स्वस्थ
रखने के लिए, प्रतिदिन अपनी-अपनी रूचि के अनुसार भोजन लेता है। यह केवल
भोजन का स्वाद और उसकी पौष्टिकता नहीं है, जो इस देह का अस्तित्व बनाये
हुए है, बल्कि उसमे समाहित वह विटामिन और मिनरल्स हैं जो हमारे जीवन के
लिये अनिवार्य हैं। यही कारण है कि क्यों इन तत्वों से युक्त एक संतुलित
आहार लेना प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिये अत्यंत आवश्यक है।

क्यों चिकित्सक सभी रोगियों को अपनी खाने की आदतें सुधारने के लिये कहते
हैं, क्योंकि हमारा शरीर न तो किसी मिनरल को बनाने में समर्थ है और न ही
यह मनुष्य के जीवन के लिये अनिवार्य 11 Vitamins को बना पाने में समर्थ
है। हमारा शरीर 13 अनिवार्य विटामिन में से केवल 2 ही Vitamins अपने स्वयं
के बल पर निर्मित कर सकता है। बाकी की उपलब्धता के लिये यह प्रकृति पर ही
निर्भर है। Vitamins और Minerals को संयुक्त रूप से माइक्रोन्यूट्रिएंटस
यानि सूक्ष्म पुष्टिकर पदार्थ कहा जाता है।

क्योंकि शरीर को उनकी बहुत थोड़ी मात्रा की ही आवश्यकता पड़ती है, लेकिन यदि
उस थोड़ी मात्रा की पूर्ति न हो पाए, तो शरीर को बीमारियों का शिकार होते
देर नहीं लगती। शरीर को किन मिनरल्स की आवश्यकता होती है, इसका वर्णन हम
पहले ही “शरीर को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो लेना मत भूलिये यह 16 मिनरल्स”
इस लेख में कर चुके हैं। ये दोनों तत्व साथ-साथ मिलकर शरीर के सैकड़ों
कार्यों को करते हैं।

शरीर की प्रत्येक कोशिका के निर्माण और मरम्मत से लेकर अस्थि, माँस, रक्त
की उपलब्धता, घावों को ठीक करना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत
बनाये रखना और आहार को उर्जा में बदलने समेत न जाने ऐसे कितने काम हैं,
जिनका पूर्ण होना इनके बिना बिल्कुल संभव नहीं। इसी बात से हर कोई यह
अंदाजा लगा सकता है कि इनकी हमारे जीवन में क्या महत्ता है। अब इस लेख के
जरिये विटामिनों के प्रकार, शरीर में उनके कार्य और उनकी प्राप्ति के
स्रोत के विषय में चर्चा की जायेगी। आशा है यह लेख स्वास्थ्य की जागृति की
दिशा में सहायक होगा!

Difference between
Vitamins and Minerals विटामिन और मिनरल्स में क्या अंतर है : –

विटामिन और मिनरल्स दोनों ही शरीर के लिये अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन इनमे
बहुत अंतर है। Vitamins जहाँ जैविक पदार्थ हैं, वहीँ Minerals अजैविक
पदार्थ हैं; अर्थात इनमे कोई कार्बनिक पदार्थ नहीं है। विटामिन ऊष्मा,
एसिड और वायु के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं, लेकिन मिनरल्स अपनी
रासायनिक संरचना को बरकरार रखते हैं। यही कारण है कि Minerals आसानी से
भोज्य पदार्थों के जरिये हमारी देह में अवशोषित हो जाते हैं।

लेकिन Vitamins भोजन को पकाने, उबालने और भण्डारण की प्रक्रिया में या तो
नष्ट हो जाते हैं या फिर वे अपनी शक्ति खो देते हैं। Vitamins शब्द का
तात्पर्य यह नहीं है कि दूसरे अनिवार्य पुष्टिकर पदार्थ जैसे – आहार में
लिये जाने वाले खनिज, अनिवार्य वसा अम्ल या अनिवार्य
एमिनो एसिड (जिनकी शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है) और अधिकांश
प्रकार के अन्य पुष्टिकर पदार्थ जो स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, वे भी
इसके अंतर्गत आते हैं।

बल्कि यह उनसे पूर्णतया अलग वह यौगिक व अत्यंत
महत्वपूर्ण पुष्टिकर पदार्थ है जिसकी एक जीव को सीमित मात्रा में ही
आवश्यकता होती है। एक बात और ध्यान देने की यह है कि विटामिन और मिनरल्स
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विटामिन के विभिन्न प्रकारों की उचित मात्रा
के बिना हमारा शरीर उनसे सम्बंधित मिनरल्स को शरीर में संचित रखने में
असमर्थ ही रहता है। इसलिये आपको दोनों की उपयुक्त मात्रा को बनाकर रखना
चाहिये।

जैसे Vitamin D की कमी के कारण हमारा शरीर Calcium को अवशोषित नहीं कर
पाता और यह शरीर से वैसे ही बाहर निकल जाता है। Vitamins शरीर की वृद्धि,
विकास और कोशिकाओं की सामान्य प्रक्रियाओं के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं और
यह भी Minerals की ही तरह मेटाबोलिज्म (चयापचय) की प्रक्रिया का अत्यंत
महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा हैं। Metabolism(चयापचय) वह प्रक्रिया है
जिसके जरिये हमारा शरीर हमारे द्वारा खाये गये भोजन को उर्जा के रूप में
रूपांतरित करता है।

जो अंततः हमारे ही शरीर की अनेकों शारीरिक क्रियाओं को पूर्ण करने के लिये
शक्ति उपलब्ध कराती है। सोचने से लेकर दौड़ने तक हम जो कुछ भी इस शरीर से
करते हैं, उसके लिये उर्जा उपलब्ध कराना, और शरीर को हमेशा स्वस्थ बनाये
रखना ही इनका कार्य है। हमारे शरीर को कुल 13 अनिवार्य विटामिनों की
आवश्यकता होती है; जिन्हें उनकी प्रकृति या संरचना के आधार पर नहीं, बल्कि
जैविक और रासायनिक क्रियाओं के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता हैं। जो
इस प्रकार हैं –

Fat-Soluble
Vitamins (वसा में घुलने वाले विटामिन) : –

वसा में घुलने वाले विटामिन वे Vitamins हैं जो केवल वसा में ही घुल सकते
हैं और हमारे उदर के अंदर जाकर वसा से बंध जाते हैं। ये शरीर के
भीतर ही लम्बे समय के लिये संचित हो जाते हैं, ताकि बाद में आवश्यकता पड़ने
पर इनका उपयोग किया जा सके। वसा में घुलने वाले विटामिन सीधे हमारे खून
में नहीं मिलते हैं, बल्कि यह आँतों की दीवारों में स्थित लसीकाओं के
माध्यम से खून में प्रवेश करते हैं।

वसा में घुलने वाले कई विटामिन केवल प्रोटीन के संरक्षण में रहकर ही शरीर
के अन्य भागों तक पहुच पाते हैं, क्योंकि प्रोटीन इनके लिये एक वाहक
(करियर) का कार्य करता है। शरीर में इन Vitamins का अवशोषण कुछ इस तरह से
होता है – जब हम वसा में घुलनशील विटामिनों से युक्त भोजन खाते हैं, तो वह
आमाशय में जाकर वहाँ स्रावित होने वाले पाचक अम्लों से पचाया जाता है।
जहाँ से वह छोटी आंत में आ जाता है। वहां उसका देर तक पाचन और अवशोषण होता
है।

चूँकि वसा में घुलने वाले विटामिनों को अवशोषित करने के लिये पित्त की
आवश्यकता होती है, इसलिये यकृत(लीवर, जहाँ पित्त का निर्माण होता है) से
पित्त आकर छोटी आँत में मिल जाता है। जहाँ यह वसा को तोड़ देता है और समस्त
पोषक तत्व आँतों की दीवारों द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं। यहाँ से यह
विटामिन लसिका नलिकाओं में चले जाते हैं; जहाँ से फिर यह सीधे खून में मिल
जाते हैं। ये Vitamins वैसे तो संपूर्ण शरीर में उपस्थित होते हैं,
क्योंकि शरीर को समय-समय पर इनकी आवश्यकता पड़ती हैं।

लेकिन इनकी बड़ी और अतिरिक्त मात्रा
लीवर में और वसा उतकों में संरक्षित रहती है। लगभग अधिकांश वसा में
घुलनशील विटामिन अपने आप ही शरीर में इधर-उधर जाने के लिये असमर्थ होते
हैं। इसलिये इनके साथ वाहक के रूप में अनिवार्य रूप से प्रोटीन अणुओं की
आवश्यकता पड़ती हैं। रोग या चोट आदि के समय, जब-जब हमें इन Vitamins के
अतिरिक्त भंडार की आवश्यकता होती है, तो हमारा यकृत इन्हें मुक्त कर देता
है।

आप यह जानकार आश्चर्यचकित रह जायेंगे कि यदि हम आज और अभी से Vitamin-A
लेना बंद कर दें, तब भी यह हमारे लीवर में इतनी मात्रा में संचित रहता है
कि अगले 7-8 वर्षों तक हमारे शरीर को विटामिन-A की निर्बाध आपूर्ति कर
सके। चूँकि यह Vitamins हमारे शरीर में लम्बे समय तक संचित रहते हैं,
इसलिये इन विटामिनों को इनकी निर्धारित मात्रा में ही लेना चाहिये।
सप्लीमेंट के रूप में इन्हें अधिक मात्रा में लेना घातक है। Vitamin A,
Vitamin D, Vitamin E और Vitamin K ये चार वसा में घुलनशील विटामिन हैं।

Water-Soluble
Vitamins (जल में घुलने वाले विटामिन) : –

पानी में घुलनशील विटामिन वे Vitamins हैं जो भोजन के जलीय अंश में
उपस्थित रहते हैं और पाचन की प्रक्रिया के दौरान जैसे ही भोजन अन्य घटकों
में टूटता है, यह अवशोषित होकर तुरंत खून में मिल जाते है। चूँकि मनुष्य
शरीर में सबसे बड़ा अंश जल का है, इसीलिये ये Vitamins तुरंत ही सारे शरीर
में आसानी से फ़ैल जाते हैं। हमारे गुर्दे जल में घुलनशील विटामिनों के
स्तर को लगातार नियंत्रित करते रहते हैं। इसीलिये जब भी इन Vitamins का
स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है, तो इन्हें मूत्र के जरिये बाहर निकाल
दिया जाता है।

हाँलाकि जल में घुलनशील विटामिन शरीर में अनेकों कार्य करते हैं,
लेकिन उनमे सबसे महत्वपूर्ण है – उस भोजन से उर्जा को मुक्त करने में
सहायता करना, जिसे आप खा रहे हैं। दूसरे Vitamins हमारे उतकों को स्वस्थ
रहने में मदद करते हैं। सामान्य तौर पर जल में घुलनशील विटामिन शरीर में
केवल कुछ समय तक ही संचित रह पाते हैं, लेकिन Vitamin B12 वर्षों तक हमारे
लीवर में संचित रहता है।

फॉलिक एसिड और विटामिन C कुछ दिन तक हमारे शरीर में संचित रहते हैं, पर
अधिकांश विटामिनों की पूर्ति करने के लिये इनका जल्दी-जल्दी नियमित तौर पर
सेवन करना जरुरी है। लेकिन इन Vitamins को सप्लीमेंट के जरिये
अधिक मात्रा में लेना नुकसानदेह है। Vitamin B के कुल सातों प्रकार और
Vitamin C जल में घुलनशील विटामिन हैं। आइये अब विस्तार से इनके बारे में
जानें –

Proper Dose of
Vitamins विटामिनों को कितनी मात्रा में ग्रहण करना चाहिये : –

RDA – हमारे शरीर को किस विटामिन की कितनी मात्रा की आवश्यकता है, इसके
लिये वैसे तो प्रत्येक देश के अपने अलग-अलग मानक निर्धारित हैं। लेकिन इस
लेख में सभी विटामिनों की मात्रा US RDA (United States Recommended
Dietary allowances) के अनुसार दी जा रही है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के
संगठन FNB के द्वारा व्यापक शोध के आधार पर निर्धारित है।

RDA प्रत्येक विटामिन और मिनरल की आहार के रूप में प्रतिदिन ली जाने वाली
वह औसत मात्रा है, जो एक व्यक्ति को स्वस्थ और उनकी कमी से मुक्त बनाये
रखने के लिये आवश्यक है। यहाँ पर विटामिनों की जो मात्रा दी जा रही है वह
19 से 70 वर्ष तक के पुरुषों के लिये उपयुक्त है। कुछ विशेष परिस्थितियों
को छोड़कर, स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में इनकी कम मात्रा की आवश्यकता
होती है।

UL – UL (Tolerable Upper Intake Level) विटामिनों व मिनरल्स की
प्रतिदिन ली जा सकने वाली वह अधिकतम मात्रा है जो एक औसत व्यक्ति के लिये
सुरक्षित है। इसलिये यदि आप इन तत्वों की अधिक मात्रा के कारण शरीर में
पैदा होने वाली विषाक्तता से बचना चाहते हैं, तो  इनका सेवन इससे
कम मात्रा में ही करें। इन सभी तत्वों को मिलीग्राम (mg), माइक्रोग्राम
(mcg या µg) में मापा जाता है।

चूँकि विटामिनों का विषय न केवल विस्तृत है, बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी
बहुत महत्वपूर्ण है; इसलिये इस लेख में हम केवल वसा में घुलनशील विटामिनों
का ही विस्तृत वर्णन करेंगे। जल में घुलनशील दोनों विटामिनों का वर्णन
अगले लेख में किया जायेगा। अब आगे पढिये-

Fat-Soluble
Vitamins वसा में घुलनशील विटामिन : –

1. विटामिन A : –

Vitamin A का रासायनिक नाम रेटिनौल, रेटिनल है। इसे बीटा केरोटिन के नाम
से भी जाना जाता है। Vitamin A के कुछ प्रकार, कोशिका और उतकों की
वृद्धि के नियंत्रक और उनमे विभेद करने का कार्य देखते हैं। इसे मुख्य रूप
से आँखों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसका कार्य मात्र
इतने तक ही सीमित नहीं है। यह अन्य कई अत्यावश्यक कार्य करता है। जैसे –
यह लाल और श्वेत रक्त कणिकाओं के निर्माण में सहायक होता है, उनकी
क्रियाशीलता बढाता है और शरीर की सामान्य वृद्धि और विकास के लिये
महत्वपूर्ण है।

यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और रक्त वाहिनियों को
स्वस्थ रखता है तथा त्वचा, दांत और कोशिकाओं को स्वस्थ रखने से लेकर
हड्डियों के पुनर्निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाता है। Vitamin A हमारी
कुछ तरह के कैंसर और आँखों के रोगों से भी बचाव करता है तथा रेटिना के
स्वास्थ्य के लिये भी यह बेहद जरुरी है। यह Vitamin कुछ तरह के
त्वचा रोगों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जाता है।

विटामिन A की कमी
और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में Vitamin A की कमी के कारण रतौंधी, हाइपरकेराटोसिस और
केराटोमैलासिया के रोग होते है। रतौंधी का रोग होने पर व्यक्ति कम रौशनी
में कुछ नहीं देख पाता। अधिक बुरी स्थिति में रोगी अंधा भी हो सकता है। इस
विटामिन को अधिक मात्रा में लेना भी खतरनाक है, क्योंकि ऐसा करने से
हाइपरविटामिनोसिस A का रोग होने की प्रबल सम्भावना रहती है।

विटामिन A के स्रोत
व मात्रा –

यकृत, मछली, अंडे, काड लीवर ऑइल, दूध, पके हुए पीले-नारंगी रंग के फल जैसे
– आम, खरबूजा, संतरा, विलायती खरबूजा, केला आदि व गाजर, चुकंदर, कद्दू,
पालक, शकरकंद, सोया दूध और हरी पत्तेदार सब्जियाँ इस विटामिन के प्रमुख
स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में Vitamin A पाया जाता है। हमारे शरीर को
प्रतिदिन 900 µg Vitamin A की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत
आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 3000 µg
निर्धारित है।

2. विटामिन D : –

Vitamin D को कोलकेल्सिफेरोल (विटामिन D3) और एर्गोकेल्सिफेरोल (Vitamin
D2) के रासायनिक नाम से भी जाना जाता है। यह विटामिन हमारी हड्डियों को
स्वस्थ और मजबूत रखने के लिये बहुत आवश्यक है। इसके अभाव में शरीर की
कैल्शियम को अवशोषित करने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जिसके कारण
हड्डियां भंगुर हो जाती है और उनके हल्की सी चोट से भी टूटने का खतरा
उत्पन्न हो जाता है। Vitamin D हमारे शरीर में हार्मोनों की तरह से कार्य
करते हुए, खनिजों के चयापचय के नियंत्रक का कार्य भी करता है।

यह न केवल कैल्शियम के चयापचय के लिये, बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने,
तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने और हड्डियों का घनत्व बढाने के लिये भी
अत्यंत आवश्यक है। सूर्य का प्रकाश इसका सबसे सरल और प्रचुर प्राकृतिक
स्रोत है, जो इस विटामिन को क्रियाशील करने के लिये भी आवश्यक है।
सर्दियों में इस Vitamin को विशेष रूप से लेने की आवश्यकता है। केवल एक
घंटे तक धूप में बैठने से ही शरीर को इसकी पर्याप्त मात्रा मिल जाती है।

विटामिन D की कमी
और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

Vitamin D की कमी के कारण रिकेट्स और ओस्टोमैलासिया के रोग होने की
सम्भावना होती है, जो हड्डियों से संबंधित रोग हैं। इनमे अस्थियाँ मुलायम
और कमजोर होकर मुड जाती हैं, जिससे शरीर में कुबडापन आ जाता है। इसकी अधिक
मात्रा भी शरीर के लिये नुकसानदेह है, ऐसी स्थिति में हाइपरविटामिनोसिस D
का रोग होने की प्रबल सम्भावना होती है। अतः उचित मात्रा में ही इसका सेवन
करना चाहिये।

कुछ समय पहले एक शोध में यह तथ्य सामने आया था कि भारत के
80% से अधिक स्त्री-पुरुषों में Vitamin D की भारी कमी है। शायद यह भी एक
कारण हो सकता है कि प्रौढ़ अवस्था में पहुँचने वाले अधिकांश लोगों में
जोड़ों से संबंधित समस्याएँ बढती ही चली जा रही हैं।

विटामिन D के स्रोत
व मात्रा : –

मछली, अंडे की जर्दी, यकृत, मशरूम, प्रसंस्करित अनाज, प्रसंस्करित दूध,
सूर्य की धूप आदि इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में
विटामिन D पाया जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 10 µg Vitamin D की
आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 50 µg निर्धारित है।

3. विटामिन E : –

Vitamin D का रासायनिक नाम टोकोफेरोल्स, टोकोट्रिनोल्स है। यह विटामिन भी
अन्य विटामिनों की तरह विविध जैवरासायनिक कार्यों को संपन्न करता
हैं। विटामिन E अत्यावश्यक लिपिडो को क्षति से बचाने, मुक्त अणुओं को शरीर
से बाहर निकालने और कोशिका झिल्ली को एकीकृत बनाये रखने में सहायता करता
है। यह एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में भी कार्य करता है और शरीर
को फ्री रेडीकल्स से बचाने के लिये आवश्यक है।

यदि शरीर में संतुलन और उचित समन्वय की कमी महसूस हो या माँसपेशियों में
कमजोरी या हाथ-पैर का सुन्न हो जाना जैसी समस्याएँ होने लगे, तो यह इस बात
का संकेत हैं कि आपके शरीर में Vitamin E की मात्रा बहुत कम हो चुकी है।

विटामिन E की कमी
और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में Vitamin E की कमी की सम्भावना वैसे तो बहुत दुर्लभ है,
लेकिन यदि हो जाय तो पुरुषों में बांझपन और स्त्रियों में गर्भपात के रोग
देखने को मिलते हैं। नवजात शिशुओं के अंदर इस विटामिन की कमी होने से रक्त
की कुछ कमी (हीमोलाय्टिक एनीमिया) हो जाती है। इस विटामिन को अधिक मात्रा
में लेने से ह्रदय की गति रुकने की सम्भावना हो सकती है, ऐसा एक विस्तृत
पर अनियमित अध्ययन में सामने आया है।

विश्व के अधिकांश देशों के निवासियों में Vitamin E की भी काफी कमी है,
जिसके कारण बढती उम्र में थकान, कमजोरी, अनिद्रा आज सभी के लिये एक व्यापक
समस्या बन चुकी है।

विटामिन E के स्रोत
व मात्रा –

फल व सब्जियाँ जैसे एवोकेड़ो, गिरियाँ और बीज जैसे – बादाम, काजू, अखरोट,
चिरौंजी, पहाड़ी बादाम, खरबूजे के बीज, जौ, साबुत अनाज, जैतून का तेल आदि
इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमे भरपूर मात्रा में विटामिन E पाया
जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 15 mg Vitamin E की आवश्यकता होती है, जो
हमें इस आहार से बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये
अधिकतम मात्रा 1000 mg निर्धारित है।

4. विटामिन K : –

Vitamin K का रासायनिक नाम फिलोक्वीनोन, मेनाक्वीनोन है। यह अनिवार्य
विटामिन शरीर के घावों को भरने के लिये और हड्डियों के विकास के लिये बहुत
आवश्यक है। K शब्द का तात्पर्य जर्मन शब्द koagulation से है, जिसका अर्थ
है थक्का जमाना। यह विटामिन कटे-फटे स्थान से बहते हुए रक्त को
थक्कों के रूप में जमाकर, शरीर के घावों को शीघ्र ठीक होने में सहायता
करता है और घातक संक्रमण को फैलने से रोकता है।

जो स्त्रियाँ गर्भ निरोधक गोलियाँ ले रही है, उन्हें इस विटामिन की अधिक
खुराक लेने से बचना चाहिये, क्योंकि यह गोलियाँ और इस Vitamin की अतिरिक्त
मात्रा अनावश्यक थक्के जमाने का खतरा बढ़ा देती हैं।

विटामिन K की कमी
और अधिकता के कारण होने वाली समस्या –

शरीर में इसकी मात्रा कम हो जाने से रक्त बहने, नाक से रक्त निकलने, मासिक
धर्म के दौरान अधिक रक्त निकलने व चोट के प्रति सुग्राहिता बढ़ने की समस्या
हो जाती है। रक्त जल्दी नहीं जमता और संक्रमण फैलने का भय रहता है। इस
Vitamin को अधिक मात्रा में भी नहीं लेना चाहिये। क्योंकि यह रोगियों में,
विशेषकर उनमे जो वारफेरिन ले रहे हैं, खून के थक्के जमने की गति को बढ़ा
देता है, जिसके कारण शरीर के भीतर ही किसी स्थान पर थक्के जमने से व्यक्ति
का जीवन संकट में पड़ सकता है।

विटामिन K का स्रोत
व मात्रा –

यकृत, अंडे की जर्दी, हरी पत्तेदार सब्जियाँ जैसे – पालक, ब्रोकोल्ली,
पत्ता गोभी, सरसों, करमसाग, अजमोद आदि इस विटामिन के प्रमुख स्रोत हैं,
जिनमे भरपूर मात्रा में विटामिन K पाया जाता है। हमारे शरीर को प्रतिदिन
120 µg Vitamin K की आवश्यकता होती है, जो हमें इस आहार से बहुत आसानी से
उपलब्ध हो जाती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा अभी निर्धारित
नहीं की जा सकी है, इसलिये इसे कम ही मात्रा में लें।


“आरोग्य की इच्छा हमेशा ही स्वास्थ्य की आधी रही है।”
– सेनेका

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पसंद आया होगा। कृपया अपने Comments देकर हमें बताने का कष्ट करें कि
जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके बहुमूल्य
सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक
होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

सिंह राशि से जानिये अपने व्यक्तित्व के अबूझ रहस्य

Hindi Astrology:
Personality of Leo Zodiac Sign

“केवल आपके अलावा और कोई
दूसरा आपके लिये शांति नहीं ला सकता।”
– राल्फ वाल्डो एमर्सन

Nature of Leo Zodiac
सिंह राशि का स्वभाव : –

जब जन्म कुंडली में चन्द्रमा सिंह राशि में हो, तो उस व्यक्ति की जन्मराशि
सिंह होती है। सिंह राशि राशिचक्र की पाँचवीं राशि है। इस राशि का विस्तार
भचक्र के 120° से 150° तक है। इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है जो कि
मनुष्य के आत्मा का भी प्रतिनिधि है। यह क्षत्रिय जाति की, पुरुष लिंग
वाली, अग्नि तत्व प्रधान राशि है। यह पूर्व दिशा की स्वामिनी और उग्र
प्रकृति की, अल्प संतति वाली राशि है। यह दिन के समय बली रहती है और इसका
पीत रंग है।

इसका प्रतीक चिंह एक दहाड़ता हुआ शेर है। इस राशि के जातक भी इस जीव की तरह
साहसी, उग्र प्रकृति के और स्वच्छंद होते हैं, वे स्वयं के ऊपर किसी
प्रकार का शासन पसंद नहीं करते। सिंह राशि के जातकों को गोचर के फलादेश
इसी राशि के आधार पर देखने चाहियें। यदि व्यक्ति के जन्म के समय लग्न सिंह
राशि का हो, तब भी यह जातकों पर अपना प्रभाव डालती है। यह राशि व्यक्ति के
शरीर में उसके ह्रदय व उपरी पेट(आमाशय, लीवर आदि) का प्रतिनिधित्व करती है।

ग्रहों की अनुकूलता के अनुसार मंगल, बुध, चंद्रमा और बृहस्पति सिंह राशि
में शुभ फल प्रदान करते हैं। शुक्र और शनि के लिये यह शत्रु राशि होने के
कारण ये गृह प्रायः इसमें अशुभ फल देते हैं, लेकिन इस राशि में इसका
स्वामी गृह सूर्य बहुत बली होता है। इस राशि में कोई भी ग्रह नीच नहीं
होता। सिंह राशि पर सूर्य 31 दिन 2 घडी और 52 पल रहते हैं। सिंह राशि के
अंतर्गत मघा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के चारों चरण और उत्तरा फाल्गुनी
नक्षत्र का प्रथम चरण आता है।

Personality of Leo
Person सिंह राशि के जातक का व्यक्तित्व : –

सिंह राशि के जातकों का व्यक्तित्व आकर्षक और दबंग होता है। ये लोग
जन्मजात आशावादी होते हैं। इनका आत्मविश्वास भी काफी बढा-चढ़ा रहता है,
इसलिये ये कठोर परिस्थितियों में भी जल्दी निराश नहीं होते। लेकिन ये
आडम्बरप्रिय होते हैं और अपनी हर वस्तु को दूसरों के सामने बढा-चढा कर पेश
करते हैं, ताकि लोग इनकी प्रशंसा करें, इनका मान करें। अपने शरीर और
वेशभूषा के प्रति ये विशेष सजग रहते हैं।

इस राशि के जातक हमेशा अन्य राशि वाले जातकों के ऊपर प्रभुत्व डालने का
प्रयास करते हैं। चूँकि सिंह राशि अग्नि तत्व प्रधान है, अतः इन्हें क्रोध
जल्दी आता है और बात न मानने पर ये अत्यंत उग्र हो जाते हैं। उच्च
महत्वाकांक्षाएँ होने के कारण इन जातकों का मन कभी शांत नहीं रह पाता और
ये हमेशा इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि किस तरह हम लोगों के आकर्षण का
केंद्र बनें, कैसे सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करें और इसके लिये यह किसी
भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।

संकटग्रस्त होने पर या अभावों में जीवन जीने पर भी, ये दूसरों से मदद लेना
स्वीकार नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने से इनके ऊँचे आत्मसम्मान को चोट
पहुँचती है। सिंह राशि के जातक दूसरों की सलाह मानना भी पसंद नहीं करते
हैं। इन्हें जो उचित लगता है ये वही करते हैं, फिर चाहे इन्हें कोई नुकसान
ही क्यों न उठाना पड़े। अधिक अभिमान की तरह सिंह राशि के जातकों मे
कामवासना भी प्रबल रहती है।

Physique &
Nature of Leo Person सिंह राशि के जातक का शरीर और स्वभाव : –

सिंह राशि के जातकों का शरीर सुद्रढ़ और स्वस्थ होता है। सामान्यतः
इनका सीना चौड़ा, गर्दन छोटी व पुष्ट और कंधे मजबूत होते हैं। इस राशि के
कई जातकों में यह देखा गया है कि इनका धड इनके पैरों की तुलना में अधिक
लम्बा होता है। इनकी चाल में भी एक विशेष प्रकार की अकड रहती है और ये जब
भी किसी से बातें करते हैं, तो ऊँची और गंभीर आवाज में बात करते हैं।
सामान्य रूप से इनका स्वास्थ्य अच्छा ही रहता है, लेकिन ग्रह स्थिति
अनुकूल न होने पर, इन्हें मुख्य रूप से पित्त के कारण पैदा होने वाले रोग
– जैसे बुखार और उदर से संबंधित अन्य रोगों के होने की सम्भावना रहती है।

ये अपने परिवार से प्रेम तो करते हैं, पर यहाँ भी अपने जीवनसाथी और संतान
से यही अपेक्षा करते हैं कि वह इनकी हर बात माने। इसी कारण से इनका
वैवाहिक जीवन अधिक खुशहाल नहीं होता व संतान से संबंध भी मधुर नहीं रहते।
चूँकि ये किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता स्वीकार नहीं करना चाहते, इसलिये
अगर किसी अन्य साथी से अनैतिक सम्बन्ध बनायें, तो वह इनके लिये अच्छा
नहीं रहता।

ऐसा करने से इनका समस्त मान-सम्मान नष्ट हो सकता है और संपूर्ण जीवन दुखमय
बन सकता है। संसार के प्रति इनका दृष्टिकोण विशुद्ध भौतिकतावादी होता है।
सामान्यतः अध्यात्म विज्ञान, धर्म, दान-पुण्य आदि में इनकी रुचि नहीं होती
है फिर भी इनके नैसर्गिक स्वभाव में दूसरों की सहायता करना, शांत रहना,
भ्रमण करना और आत्मनिर्भर रहना शामिल है। ये धन कमाने और सांसारिक
भोग-विलास करने में यकीन रखते हैं।

सिंह राशि के जातक अत्यंत अभिमानी, अच्छे कपड़ों और आभूषणों
के शौक़ीन होते हैं, इसीलिये ये खर्चीले भी बहुत होते हैं। इस कारण से
कभी-कभी इन्हें आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ सकता है। सिंह राशि के
जातकों को चाहिये कि अगर वे सुखमय जीवन जीना चाहते हैं, तो अपने खर्चीले
स्वभाव पर अंकुश लगायें और दिखावे के जीवन से दूर रहें।


“मन स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है।”
– जॉन मिल्टन

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जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके बहुमूल्य
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शरीर को स्वस्थ रखने के लिये बहुत जरूरी हैं यह 16 मिनरल्स

Hindi Guide:
Mineral & Our Health – Part 3

“स्वास्थ्य की कीमत तब
तक नहीं समझी जाती, जब तक बीमारी नहीं घेर लेती।”
– थॉमस फु्लर

Trace
Minerals अवशेष खनिज पदार्थ : –

ये वह मिनरल्स होते हैं जिनकी हमारे शरीर को कम मात्रा में ही आवश्यकता
होती है, लेकिन इनकी महत्ता किसी भी प्रकार से प्रमुख मिनरल्स से कम नहीं
है। हमारे आहार में प्रतिदिन इनका शामिल होना भी अनिवार्य है। ये भी शरीर
के लिये कई बेहद आवश्यक कार्य करते हैं, जैसे – शरीर की कोशिकाओं को
पहुँची क्षति को रोकना और महत्वपूर्ण एंजाइमों का हिस्सा बनकर उनकी
क्रियाशीलता बढ़ाना आदि।

ये मिनरल एक-दूसरे के साथ भी क्रिया करते हैं, जो कभी-कभी इस तरह भी हो
सकती है कि यह कोई असंतुलन ही पैदा कर दें। किसी एक खनिज की मात्रा बहुत
अधिक होने पर शरीर में दूसरे तत्व की कमी हो सकती है, जिनके बारे में आप
आगे चलकर पढेंगे –

8. Iron आयरन – शरीर
में क्या कार्य करता है : –

आयरन (लौह तत्व) जिसे सबसे महत्वपूर्ण ट्रेस मिनरल में से एक माना जाता
है, हमारे शरीर की अनेकों महत्वपूर्ण क्रियाओं में एक अनिवार्य और सक्रिय
भूमिका निभाता है। आयरन हीमोग्लोबिन नाम के पिग्मेंट का ही एक घटक है, जो
लाल रक्त कणिकाओं में पाया जाता है और इसके निर्माण के लिये एक अनिवार्य
तत्व है। इसके साथ-साथ यह मायग्लोबिन(माँसपेशियों में हीमोग्लोबिन का
प्रतिरूप), जो ऑक्सीजन को सारे शरीर में प्रत्येक कोशिका तक पहुंचाता है,
के लिये भी बेहद आवश्यक है।

आयरन उर्जा के चयापचय के लिये आवश्यक है, अर्थात यह वह मिनरल है जो
ब्लडशुगर(रक्त-शर्करा) को ऊर्जा में बदलने के लिये उत्तरदायी है। आयरन
प्राकृतिक रूप से माँसपेशियों के निर्माण के लिये और शरीर में शुद्ध रक्त
का पर्याप्त स्तर बनाये रखने के लिये बेहद जरुरी है। हमारी प्रतिरक्षा
प्रणाली सही प्रकार से अपना कार्य कर सके, इसके लिये Iron की उपयुक्त
मात्रा का होना बहुत जरुरी है।

इसके अतिरिक्त यह Amino Acids(एमिनो अम्ल), Collagen(कोलाजेन),
Neurotransmitters(न्यूरोट्रांसमीटर) और hormones(हार्मोन) के उत्पादन के
लिये भी एक आवश्यक मिनरल है। हमारे शरीर का 70% आयरन हीमोग्लोबिन में और
बाकी का यकृत, प्लीहा और हड्डियों में अस्थि मज्जा के रूप में संचित रहता
है। यह बचपन में, एनीमिया(खून की कमी) में, रोगावस्था में, और गर्भावस्था
की दशा में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि इन परिस्थितियों
में इसकी मांग सामान्य की अपेक्षा बहुत बढ़ जाती है।

आयरन की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

खून बहने, भूख न लगने और किसी रोग से लम्बे समय तक पीड़ित रहने पर शरीर में
आयरन की कमी हो जाती है। पसीने आदि के निकलने से भी इस तत्व की कुछ कमी हो
जाती है। यदि अधिक समय तक आयरन की कमी बनी रहे, तो एनीमिया की गंभीर
समस्या उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में RBC(लाल रक्त कणिकाओं) की
संख्या तेजी से गिरने लगती है और शुद्ध ऑक्सीजन शरीर के हर अंग तक नही
पहुँच पाती।

शरीर के सभी अंग रक्त से ही अपना भोजन प्राप्त करते हैं और
उसकी आपूर्ति कम होने पर उनकी कार्यक्षमता घटने लगती है। गंभीर स्थितियों
में व्यक्ति चलने-फिरने में भी असमर्थ हो जाता है, थकान
और कमजोरी हमेशा हावी रहती है, शरीर में सूजन आ जाती है और संपूर्ण देह
दर्द से कराहती है। वहीँ दूसरी ओर यदि देह में Iron बहुत अधिक मात्रा में
इकठ्ठा हो जाय तो यह स्थिति भी खतरनाक है।

क्योंकि इससे लीवर और समस्त पाचन संस्थान पर दबाव पड़ता है। इस कारण पेट
में जलन, उल्टी, उबकाई, दस्त और कब्ज की समस्या पैदा हो जाती है, खुलकर
भूख नहीं लगती, क्योंकि खाया हुआ पचता नहीं। ऐसा होने पर लम्बे समय तक
बार-बार काफी रक्त चढ़वाने के लिये विवश होना पडता है।

आयरन से भरपूर भोज्य
पदार्थ : –

Iron की अधिक मात्रा, शरीर के अंगों के माँस, लाल मीट, चिकन, मछली,
शेलफिश, अंडे की जर्दी, झींगे, अनार, चुकंदर, गाजर, शलजम और हरी पत्तेदार
सब्जियों में पायी जाती है। वहीँ इनकी सामान्य मात्रा फलियों, टमाटर,
धनिये, जैतून, शतावर, सूखे मेवे और अनाजों में पायी जाती है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 8 mg Iron की आवश्यकता होती है।
पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को आयरन की अधिक आवश्यकता पड़ती है।
पुरुषों के लिये 8-10 mg, तो स्त्रियों को 20gm तक Iron की आवश्यकता होती
है। आयरन की कमी से होने वाले रोगों में यह मात्रा 25-30mg तक पहुँच सकती
है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 45 mg निर्धारित है।

9. Zinc जिंक – शरीर
में क्या कार्य करता है : –

जिंक भी एक ट्रेस मिनरल है, जो कई एंजाइमों के निर्माण में अहम् भूमिका
निभाता है और जिसकी प्रोटीन और जेनेटिक पदार्थों(आनुवांशिक) के
निर्माण के लिये भी आवश्यकता पड़ती है। इतना ही नहीं यह गंध व स्वाद का बोध
कराने में, घावों को भरने में, भ्रूण के सामान्य विकास में, शुक्राणु की
उत्पत्ति में, शरीर की सामान्य वृद्धि में और यौन रूप से परिपक्व होने में
तथा स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली के निर्माण सहित शरीर की अन्य जैव-रासायनिक
प्रक्रियाओं के लिये बेहद ही महत्वपूर्ण खनिज है।

दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह सबसे अनमोल ट्रेस मिनरल है। यह अपनी
एंजाइमयुक्त गतिविधियों से विटामिन A को उसके भंडारगृह यकृत से मुक्त करता
है और जरूरतमंद अंग तक पहुंचाता है। आज लगभग 80% व्यक्ति इस खनिज की कमी
से जूझ रहे हैं। आये दिन पुरुषों में बढ़ रही नपुंसकता का एक कारण Zinc की
कमी भी है, जिसकी हमारे देश की मिटटी में भारी कमी है।

क्योंकि हमारे शरीर में जितने भी मिनरल्स हैं उन्हें हम पेड़-पौधों और
पशुओं से ही प्राप्त करते हैं और वे यह सब जमीन से प्राप्त करते हैं। यदि
हमारी धरती में खनिजो का स्तर इसी तरह गिरता रहा, तो वह दिन
दूर नहीं जब हम आनुवंशिक रूप से अपने पूर्वजों की तुलना में इतने कमजोर और
अक्षम हो जायेंगे कि थोड़ी प्रबलता के प्राकृतिक आघातों से भी स्वयं को बचा
पाने में असमर्थ पायेंगे।

जिंक की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

Zinc चूँकि प्रकृति में कम मात्रा में ही उपलब्ध है, अतः इसकी अधिकता से
होने वाली कोई समस्या अब तक नहीं पाई गयी है। जिंक से होने वाली विषाक्तता
दुर्लभ है। लेकिन इसकी कमी से होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ जैसे शरीर की
वृद्धि और विकास देर से होना, त्वचा का रूखापन, संज्ञानात्मक दुर्बलता,
आनुवंशिक रोग और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली (जो संक्रमण से फैलने वाली
बीमारियों के प्रति संवेदनशील होती है) सभी विकासशील देशों में आम
है।

पुरुषों और स्त्रियों में बढ़ रही यौन दुर्बलता, नपुंसकता का एक कारण उनके
शरीर में आई जिंक की भारी कमी भी है, क्योंकि जिंक सीधे तौर पर व्यक्ति की
यौन उर्वरता को प्रभावित करता है।

जिंक से भरपूर भोज्य
पदार्थ : –

मीट, मछली, सीप, घोंघे चिकन जैसे माँसाहारी आहार में Zinc प्रचुर मात्रा
में पाया जाता है। लेकिन शाकाहारी आहार जैसे – जडे हुए साबुत अनाज,
सब्जियां, दूध और काजू में यह कम मात्रा में पाया जाता है, क्योंकि यह
शाकाहारी आहार से कम मात्रा में ही अवशोषित हो पाता है। अतः या तो अधिक
मात्रा में जिंकयुक्त शाकाहार ग्रहण करें या फिर कोई सप्लीमेंट ले लें।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

Zinc शरीर के लिये कितना आवश्यक है, यह तो आप जान ही गये होंगे, पर एक
अच्छी बात यह है कि हमारे शरीर को इसकी बहुत कम मात्रा की ही आवश्यकता
पड़ती है। इसलिये यदि अपने खान-पान को थोडा बेहतर रखा जाय, तो इसकी कमी से
होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से दूर रहा जा सकता है। पुरुषों को 11 mg
तो औरतों को 8 mg Zinc की जरुरत प्रतिदिन होती है। जिंक की कमी की
समस्या मुख्य रूप से पुरुषों में ही होती है। ऐसा होने पर जिंक की
अतिरिक्त मात्रा को लेना आवश्यक हो जाता है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम
मात्रा 40 mg निर्धारित है।

10. Iodine आयोडीन –
शरीर में क्या कार्य करता है : –

यह खनिज मनुष्य शरीर में थाइरोइड ग्रंथि से स्रावित होने वाले हार्मोन में
पाया जाता है और इस हार्मोन का मुख्य घटक है, जो हमारे BMR को संतुलित
बनाये रखता है। यह न केवल हमारे शरीर के तापमान और इसकी वृद्धि को ही
नियंत्रित रखने में सहायता करता है, बल्कि चयापचय की दर को भी उचित सीमा
के भीतर रखता है। यह तंत्रिका और माँसपेशी तंत्र से सम्बंधित कई कार्यों
में प्रभावी भूमिका निभाता है। Iodine नामक यह Trace Mineral हमारी
किशोरावस्था और युवावस्था में शारीरिक अंगों के विकास के लिये बहुत
महत्वपूर्ण होता है।

आयोडीन की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

आयोडीन की कमी से थाइरोइड ग्रंथि की सक्रियता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
इससे इस ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन का स्राव कम या बंद भी हो सकता है
और शरीर के विकास में कई तरह की अनियमितताएँ आ सकती हैं। जैसे – शरीर में
आलस्य, वजन का बढना और घेंघा रोग जिसमे थाइरोइड ग्रंथि सूज जाती है और जो
प्रभावित व्यक्ति के गले पर एक बड़े आकार की गिल्टी के रूप में दिखाई देती
है।

स्थिति तब गंभीर हो जाती है, जब शरीर में सेलेनियम की मात्रा भी बहुत
कम हो। Iodine का अधिक मात्रा में सेवन करना भी नुकसानदेह है, क्योंकि ऐसा
करने से हाइपरथाइरोइडिज्म, घेंघा, और अधिक बुरी परिस्थितियों में, जो
अक्सर दुर्लभ ही होती हैं, पाचन तंत्र की समस्याएँ, गले व मुँह की जलन की
समस्या हो सकती है।

आयोडीन से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

समुद्री भोजन विशेषकर झींगा, कॉड और टुना मछली, आयोडीन युक्त खाने का नमक,
ब्रेड, दूध व दुग्ध से बने उत्पाद, भुने-सिके आलू में आयोडीन अच्छी मात्रा
में मिलता है। विशेष परिस्थितियों में सीवीड(एक प्रकार का समुद्री पौधा जो
वहाँ चट्टानों पर उगता है) की बहुत थोड़ी सी मात्रा भी ली जा सकती है,
जिसमे Iodine बहुत उच्च सांद्रता में होता है। इसके अतिरिक्त यह उन भोज्य
पदार्थों में भी मिलता है जो आयोडीन से प्रचुर भूमि में पैदा होते हैं।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ व्यक्ति के लिये 150 mcg Iodine पर्याप्त होता है। जिसकी
बड़ी मात्रा हमें खाने के नमक से ही मिल जाती है और जो कमी रह जाती है वह
संतुलित आहार से पूरी हो जाती है। इसलिये प्रायः इसकी अतिरिक्त खुराक लेने
की कोई आवश्यकता नहीं होती। Iodine की प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा
1100 mcg निर्धारित है।

11. Manganese
मैंगनीज – शरीर में क्या कार्य करता है : –

मैंगनीज भी अत्यंत महत्वपूर्ण ट्रेस मिनरल में से एक है जो हमारे चयापचय
की प्रक्रिया को सुधारने में मदद करते हैं। इसके साथ-साथ यह एक
एंटीऑक्सीडेंट भी है। यह मिनरल विटामिन-B के साथ मिलकर हमारे शरीर में कई
तरह के एंजाइमों के क्रियाशील होने में मदद करता है। विशेषकर वे जो यूरिया
के निर्माण में अहम् भूमिका निभाते है। Manganese को उचित मात्रा में लेते
रहने से हमारा पाचन तंत्र सही ढंग से काम करता है और उच्च रक्तचाप भी घटता
है।

यह शरीर को शक्ति प्रदान करने, हड्डियों का विकास करने और घावों को
भरने के लिये एक उत्प्रेरक की भाँति कार्य करता है। मैंगनीज शरीर के भीतर
Zinc और Copper को संतुलित करने का भी कार्य करता है। यह उन अनिवार्य
खनिजों में से एक है जो डायबिटीज और तंत्रिका तंत्र से सम्बंधित स्वास्थ्य
समस्याओं को ठीक करने के लिये प्रयोग किये जाते है।

मैंगनीज की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

मैंगनीज की कमी कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है, क्योंकि यह
शरीर की उचित वृद्धि के लिये आवश्यक है। इसकी निरंतर कमी बने रहने से
जोड़ों का दर्द, उपयुक्त शारीरिक विकास का न होना और कमजोर पाचन संस्थान
सहित दूसरे रोग भी पनप सकते हैं। Manganese को अधिक मात्रा में लेना भी
उचित नहीं है, क्योंकि तब इस खनिज की विषाक्तता बढ़ने से शरीर में
मैंगनिज्म नाम की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

इस स्थिति में हमारा शरीर आयरन को पहचान कर उसे उपयोग कर पाने में सक्षम
नहीं रहता। इस स्थिति में नस-नाड़ियों से सम्बंधित रोग, पेट के रोग, मन की
अरुचि, बेचैनी, समझने और प्रतिक्रिया में देरी करने जैसी समस्यायें उभर
सकती हैं और ऐसा प्रदूषित जल के कारण हो सकता है।

मैंगनीज से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

Manganese प्राकृतिक रूप से मुख्यतः शाकाहार में पाया जाता है अन्नानास,
स्ट्राबेरी, रसभरी(रास्पबेरी) जैसे फलों में तथा दालचीनी, पालक, हल्दी,
सेम व ब्राउन राइस में मैंगनीज की प्रचुर मात्रा पायी जाती है। जौ का आटा
और ग्रीन टी में भी मैंगनीज की उच्च मात्रा होती है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 2.3 mg Manganese की आवश्यकता होती है।
स्त्रियों के लिये यह मात्रा कुछ कम है, उन्हें 1.8 mg तक पर्याप्त
है। इसकी अधिकतम मात्रा जिससे शरीर पर इसका कोई विषाक्त प्रभाव
द्रष्टिगोचर नहीं होता 11 mg है।

12. Selenium
सेलेनियम – शरीर में क्या कार्य करता है : –

सेलेनियम थाइरोइड ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन को नियंत्रित करने वाला
एक अच्छा संचालक है, जो एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में भी कार्य करता है। यह
एंटीऑक्सीडेंट हमारे शरीर में उत्पन्न होने वाले फ्री रेडिकल्स(बुरी
कोशिकाएँ) को शरीर से बाहर निकाल देते हैं, ताकि ये स्वस्थ कोशिकाओं को
कोई नुकसान न पहुंचा सकें।

सेलेनियम की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

शरीर में Selenium की कमी होने से फ्री रेडिकल्स पैदा होते हैं, जो असमय
ही वृद्धावस्था पैदा करते हैं। इससे शरीर की जीवनी शक्ति का हास होता है,
त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ने लगती है और नयी कोशिकाओं के निर्माण की गति धीमी
पड जाती है। शरीर में लम्बे समय तक इस ट्रेस मिनरल के रहने से, जो अक्सर
अधिक supplement लेने से होता है, उबकाई, पेट की समस्याएँ, बालों का झड़ना,
नाखून भंगुर हो जाना जैसी छोटी समस्याएँ हो सकती हैं।

सेलेनियम से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

समुद्री भोजन, झींगा, केकड़ा, माँस, सालमन मछली आदि में Selenium भरपूर
मात्रा में पाया जाता है। नूडल, अनाज आदि शाकाहार में भी यह मिलता है, पर
इसकी सर्वाधिक मात्रा ब्राजीली गिरी में मिलती है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 55 mcg Selenium की आवश्यकता
होती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 400 mcg निर्धारित है।

13. Copper कॉपर –
शरीर में क्या कार्य करता है : –

अनिवार्य ट्रेस मिनरल की श्रेणी में तांबे को देखकर किसी को कोई हैरानी
नहीं होनी चाहिये। क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण खनिज होने के साथ-साथ एक
एंटीऑक्सीडेंट भी है। Copper न केवल लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि यह उर्जा के सही चयापचय के लिये भी
आवश्यक है। इतना ही नहीं, यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली और केंद्रीय
तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने के लिये भी जिम्मेदार है। यह कई एंजाइमों
की निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा है और आयरन के चयापचय में इसकी विशेष
आवश्यकता पड़ती है।

कॉपर की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

कॉपर की कमी से होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ वैसे मुश्किल ही संज्ञान में
आयी हैं, फिर भी ऐसा होने पर इसके लक्षण एनीमिया जैसे ही प्रतीत होते हैं।
इसमें श्वेत रक्त कणिकाएँ कम होने लगती है और हड्डियों का क्षरण आरम्भ हो
जाता है, जिसे कुछ समय तक copper की अतिरिक्त मात्रा और संतुलित
आहार लेकर दूर किया जा सकता है।

हालाँकि भोजन के कारण पैदा होने वाली कॉपर
की विषाक्तता दुर्लभ है, लेकिन प्रदूषित जल की आपूर्ति के कारण
और तांबे के कन्टेंनरों से लीक हुए द्रव्यों के कारण पैदा हुई कॉपर की
तीव्र विषाक्तता से पेट के गंभीर रोगों के होने की बात सामने आयी है।

कॉपर से भरपूर भोज्य
पदार्थ : –

अंगों का माँस – जैसे पके हुए लीवर में तांबे की अत्यंत उच्च मात्र पाई गई
है। इसके अतिरिक्त घोंघे, केकड़े, गिरियाँ और बीज(जैसे काजू, बादाम
आदि), फलियाँ, साबुत अनाज(जौ, बाजरा), कच्ची मशरूम, हलकी मीठी
चॉकलेट और पीने के शुद्धजल (कुँए का अधिक बेहतर) में भी उच्च मात्रा में
Copper पाया जाता है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 900 mcg Copper की आवश्यकता
होती है, जो आहार में कॉपर से भरपूर भोज्य पदार्थ लेकर आसानी से पूरी हो
सकती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 10000 mcg निर्धारित है।

14. Chromium
क्रोमियम – शरीर में क्या कार्य करता है : –

यह ट्रेस मिनरल जो प्रकृति में थोड़ी ही मात्रा में उपलब्ध है, इन्सुलिन की
सक्रियता को बढाता है और हमारे शरीर में ब्लड शुगर(ग्लूकोस) के स्तर को
नियंत्रित करने में प्रभावी भूमिका निभाता है, ताकि शरीर की प्रत्येक
कोशिका को, जब-जब उर्जा की आवश्यकता पड़े, उसकी अविलम्ब पूर्ति की जा सके।
हमारे शरीर को क्रोमियम की केवल थोड़ी मात्रा की ही आवश्यकता होती है,
इसलिये इसे एक अनिवार्य खनिज नही समझा जाता।

कुछ का यह भी मानना है कि Chromium वजन कम करने और शरीर को सुडौल बनाने के
काम में भी आता है, लेकिन इस तथ्य के पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।
इसलिये सप्लीमेंट्स के बजाय प्राकृतिक आहार पर ही निर्भर रहना उचित है, जो
कि आसानी से इसकी पूर्ति करने में सक्षम हैं।

क्रोमियम की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

क्रोमियम की कमी से होने वाली कोई विशेष समस्या अभी तक नहीं पाई
जा सकी है, क्योंकि शरीर को इसकी केवल कुछ माइक्रोग्राम मात्रा की ही
आवश्यकता पड़ती है। लेकिन इसकी बहुत अधिक मात्रा लेने से गुर्दों की
क्रियाशीलता पर प्रभाव पड सकता है और उन्हें गंभीर नुकसान पहुँच सकता है।
क्योंकि यह एक भारी धातु है, जो अधिक मात्रा में शरीर के लिये विषाक्त है
और कई जैविक समस्याओं को जन्म दे सकती है।

क्रोमियम से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

अपरिष्कृत भोज्य पदार्थ – जैसे लीवर, खमीर, साबुत अनाज, गिरियाँ, ताज़ी
सब्जियाँ फल व शाक जैसे (ब्रोकोली, अंगूर का रस) और पनीर आदि में
काफी मात्रा में Chromium संचित रहता है, जो शरीर को स्वस्थ रखने के लिये
पर्याप्त है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ व्यक्ति के लिये प्रतिदिन 35 mcg Chromium की
मात्रा पर्याप्त है। स्त्रियों के लिये यह मात्रा 25 mcg है, जो क्रोमियम
से भरपूर प्राकृतिक भोज्य भोज्य पदार्थ लेकर आसानी से पूरी हो सकती है।
इसकी अधिकतम मात्रा अभी तक निर्धारित नहीं की जा सकी है।

15. Molybdenum
मौलिब्डेनम – शरीर में क्या कार्य करता है : –

मौलिब्डेनम शरीर के कई एंजाइमों के लिये एक आवश्यक कारक है, जो देह की
कई जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं को शीघ्रता से संपन्न करने के लिये बहुत
महत्वपूर्ण है। यह संचित पौष्टिक पदार्थों को ऊर्जा में परिणत करता है और
समय-समय पर शरीर की बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

मौलिब्लेडीनम की कमी
और अधिकता से होने वाली समस्या : –

Molybdenum की कमी और अधिकता से होने वाली समस्या अभी
तक दृष्टिगोचर नहीं हुई है, क्योंकि यह तत्व भी प्रकृति में मुक्त रूप से
दुर्लभ ही है और शरीर को इसकी न्यून मात्रा में ही आवश्यकता पड़ती है।

मौलिब्लेडीनम से
भरपूर भोज्य पदार्थ : –

फलियाँ जैसे – (काली सेम, मटर, लोभिया आदि), ब्रेड, अनाज, हरी
पत्तेदार सब्जियाँ, दूध, पशुओं का यकृत और सूखे मेवों की गिरियाँ
जैसे – (बादाम, काजू, पिस्ता, चिरौंजी, खरबूजे के बीज, चिलगोजा) आदि
में molybdenum प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 45 mcg Molybdenum की
आवश्यकता होती है, जो आहार में मौलिब्लेडीनम से भरपूर भोज्य पदार्थ लेकर
आसानी से पूरी हो सकती है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 2000 mcg
निर्धारित है।

16. Fluoride
फ्लोराइड – शरीर में क्या कार्य करता है : –

यह खनिज जो अनिवार्य ट्रेस मिनरल में शामिल नहीं है, कुछ मात्रा में
इसलिये आवश्यक है, क्योंकि यह भी हड्डियों और दांतों के निर्माण में
प्रमुख खनिजों और अनिवार्य ट्रेस मिनरल के साथ एक सहयोगी है। यह
हड्डियों को मजबूत बनाता है व दांतों को स्वस्थ, मजबूत व सुन्दर बनाये
रखने में मदद करता है, ताकि उनका असमय क्षरण रोका जा सके। बड़े-छोटे शहरों
में नगरपालिका जिस पानी की आपूर्ति अपने नागरिकों को करती है, वह पहले से
ही Fluoride से युक्त होता है।

फ्लोराइड की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

इस खनिज की कमी से दांत कमजोर होते हैं, पर सामान्यतः Fluoride मिटटी व
पानी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, इसलिये इसे अलग से लेने की
आवश्यकता कभी नहीं पड़ती। लेकिन इसकी अधिक मात्रा निश्चय ही दांतों के लिये
घातक है। जिन स्थानों का जल प्रदूषित होने से वहां फ्लोराइड की सांद्रता
बहुत अधिक बढ़ गयी है, वहां के निवासियों के लिये अस्थि और दाँतों के रोग
उग्र रूप धारण कर सकते हैं।

उनमे हड्डियों और दाँतों का क्षरण बहुत तेजी
से होता है। भारत के मध्य प्रदेश राज्य में एक ऐसा गाँव है जिसकी भूमि और
जल फ्लोराइड से इतने प्रदूषित हो चुके हैं कि वहां के निवासी हँसने से भी
डरते हैं कि कहीं उनके दांत न गिर जायें। उस गाँव में कोई लड़की विवाह नहीं
करना चाहती, क्योंकि वहां अधिकतर लोग अस्थि और दंत रोगों से जूझ रहे हैं।

फ्लोराइड से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

पीने का जल (जिसमे फ्लोराइड या तो प्राकृतिक रूप से हो या उसमे अलग से
मिलाया गया हो), मछली(सारडाइन आदि में), चिकन और अधिकांश प्रकार की चाय
में यह आसानी से मिल जाता है। फलों के जूस(अंगूर का रस) में भी यह उचित
मात्रा में मिलता है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

Fluoride की 3-4 mg मात्रा ही मनुष्यों के लिये पर्याप्त है। इसकी
प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 10 mg निर्धारित है।

17. Other Minerals
अन्य खनिज : –

ऊपर बताये गये 16 खनिजों के अतिरिक्त हमारे शरीर को निकिल, सिलिकॉन,
वेनेडियम, बोरोन, कोबाल्ट, जर्मेनियम, रुबिडियम, आदि खनिजों की भी अत्यंत
न्यून मात्रा की आवश्यकता होती है, जो आहार में प्रतिदिन लिये
जाने वाले भोज्य पदार्थों से आसानी से पूरी हो जाती है। इनके लिये किसी भी
तरह के सप्लीमेंट्स को लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप किसी कारण लम्बे
समय तक बीमार रहे हों, तो ऐसी स्थिति में किसी विशेष खनिज तत्व की
कमी होने पर चिकित्सक की सलाह अनुसार कोई सप्लीमेंट्स अवश्य ले
सकते है।

अन्यथा यदि आप खनिज तत्वों से भरे प्राकृतिक आहार, जैसे – ताजे रसीले फल,
हरी व पत्तेदार सब्जियाँ, दूध और इससे बने पदार्थ जैसे – मक्खन, मट्ठा,
पनीर, सूखे मेंवों की गिरियाँ, साबुत अनाज आदि नियमित रूप से कई दिनों तक
लेते रहें, तो समस्त शारीरिक क्षति की पूर्ति संभव है। जिन्हें लम्बे समय
तक या जीवन भर स्वस्थ रहने की इच्छा हो, वे पोषक तत्वों से भरपूर
प्राकृतिक पदार्थों को प्रतिदिन अपने आहार में शामिल करना एक नियम बना
लें।

याद रखिये दवाइयाँ जीवन और स्वास्थ्य को बचाने का बस एक माध्यम भर
हैं। वे कभी भी पौष्टिक आहार का विकल्प नहीं बन सकती। इसलिये बचाव को ही
उपचार का सर्वश्रेष्ठ साधन समझते हुए स्वस्थ होने की दिशा में अग्रसर
होइये।


“तंदुरुस्ती हमारी सबसे बेशकीमती संपत्ति है।”
– अरविन्द सिंह

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पसंद आया होगा। कृपया अपने Comments देकर हमें बताने का कष्ट करें कि
जीवनसूत्र को और भी ज्यादा बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? आपके बहुमूल्य
सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में सहायक
होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

जीवन में सुख चाहते हैं तो ऐसे लोगों व स्थानों से बचकर रहिये

Chanakya Niti
Secrets behind Happiness & Pain

“सुख हम पर ही निर्भर
है, और इसे हासिल करने का सबसे अच्छा रास्ता उन चीज़ों की चिंता छोड़ने से
है जो हमारी इच्छाशक्ति से बाहर की बात हैं।”
– एपिक्टेटस

Want Happiness, Stay
Away from These People सुख चाहने वाले व्यक्ति इनसे बचकर रहें : –

सुख पाने की इच्छा हर व्यक्ति के मन में समायी है,
कोई भी इंसान दुःख नहीं पाना चाहता, लेकिन ये एक चक्र के रूप में हर
व्यक्ति के जीवन में बारम्बार आते हैं। आचार्य चाणक्य ने चाणक्यनीति में
अनेकों स्थानों पर ऐसे श्लोकों का वर्णन किया है, जिनमे बताया गया है कि
जिन व्यक्तियों को सुख पाने की इच्छा हो उन्हें क्या करना चाहिये? वैसे तो
सुख पाने के लिये कई चीज़ों की आवश्यकता होती है, जिनमे एक बात यह भी शामिल
है कि आप उन लोगों से दूर रहें जो आपका अहित कर सकते हैं।

जो आपके शत्रु हैं और शत्रु ऐसे भी हो सकते हैं जो संबंधियों के रूप में
आपके निकट ही रहते हों। इसके अलावा आचार्य ने और भी कई अन्य महत्वपूर्ण
बातों पर प्रकाश डाला है जिन्हें आप नीचे दिए जा रहे सूत्रों के माध्यम से
जान सकते हैं। आशा है चाणक्य नीति के यह गूढ सूत्र आपके ज्ञान में निश्चित
ही वृद्धि करेंगे –

1. यस्मिन्देशे न
सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमः कश्चित् वासं तत्र न कारयेत्॥

अर्थ – जिस देश में व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता; जहाँ आजीविका
के साधन भी उपलब्ध न हों; और जहाँ उसके बंधु-बांधव(घर-परिवार के लोग व
मित्र) भी नहीं रहते हों; उस देश में व्यक्ति का रहना उचित नहीं है; लेकिन
यदि उस देश में विद्या-प्राप्ति के साधन भी नहीं हों, तो फिर वहाँ उस
व्यक्ति को किसी भी कारण से नहीं रुकना चाहिये। उसे अविलम्ब उस देश को
छोड़कर चले जाना चाहिये। इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने यह बताया है कि
व्यक्ति को किस स्थान पर निवास करना चाहिये।

कोई भी व्यक्ति ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहता, जहाँ उसे आदर-सम्मान
प्राप्त नहीं होता। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने आत्मसम्मान को खोकर नहीं
जीना चाहेगा। यह प्रत्येक मनुष्य की सहज अभिलाषा है। हर व्यक्ति को जीने
के लिये आजीविका की आवश्यकता होती है और जिस स्थान पर यह उपलब्ध न होगी
वहां कौन रहना चाहेगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और जन्म से लेकर
मृत्यु तक वह अनेकों व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध जोड़ता है।

कोई भी इंसान अपने मित्रों और प्रियजनों के बिना अधिक समय तक अकेला नहीं
रहना चाहता। मनुष्य केवल रोटी के लिये ही जीवित नहीं रहता, ज्ञान-प्राप्ति
की लालसा उसके नैसर्गिक स्वभाव में है। और जहाँ विद्या की प्राप्ति का कोई
भी साधन नहीं है, ऐसे स्थान पर किसी भी व्यक्ति को निवास नहीं करना चाहिये।

2. धनिकः श्रोत्रियो
राजा नदी वैद्य्स्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥

अर्थ – जिस देश में न तो कोई धनवान व्यक्ति हो; न ही कोई श्रोत्रिय
ब्राहमण(विद्वान् व कर्मकांडी पुरोहित) हो; न ही कोई न्यायप्रिय राजा हो;
न ही कोई नदी हो; और न ही कोई वैद्य हो; जहाँ पर ये पाँचों सुविधाएँ
प्राप्त न हों, उस स्थान पर व्यक्ति को एक दिन भी निवास करना उचित नहीं
है। आचार्य चाणक्य के ऐसा कहने का कारण यह है, क्योंकि जिस स्थान पर धनवान
व्यक्ति ही नहीं होंगे, वहाँ पर धन आयेगा कहाँ से।

जीने के लिये व्यक्ति को आजीविका के रूप में धन की आवश्यकता होती है, जो
केवल धनियों से ही मिल सकता है। देव पूजन, विवाह, संतान-जन्म और मृत्यु
जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर तथा व्यक्ति को संस्कारवान और चरित्रवान बनाने
के लिये जीवन में समय-समय पर अनेकों संस्कारों की आवश्यकता रहती है। इसके
अलावा मनुष्य को शिष्ट और शिक्षित बनाने के लिये एक विद्वान् की आवश्यकता
भी होती है। जिसके लिये एक श्रोत्रिय की अनिवार्य रूप से जरुरत होती है।

राज्य की शासन व्यवस्था के लिये और प्रजा की रक्षा के लिये एक
न्यायप्रिय राजा का होना बहुत जरुरी है। इसी तरह नदी सभी के पीने के लिये,
साफ-सफाई व सिंचाई करने के लिये जल की आपूर्ति करती है और जब भी किसी
व्यक्ति को रोग आ घेरता है, तो उस समय चिकित्सा से उसके प्राण बचाने
केलिये वैद्य की आवश्यकता भी अनिवार्य रूप से होती है। इसीलिये व्यक्ति को
सिर्फ उसी स्थान पर निवास करना चाहिये, जहाँ पर यह पाँचों उपलब्ध हों।

3. लोकयात्रा भय
लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितम्॥

अर्थ – जहाँ के निवासियों में लोक-परलोक के प्रति कोई विश्वास न हो;
जिन्हें ईश्वर और सामाजिक लोक-लाज का भी भय न हो; जिन्हें किसी प्रकार के
कर्म करने में कोई लज्जा न आती हो; जहाँ के लोग चतुर न हों और न ही जिनमे
त्याग की भावना हो, जहाँ ये पाँचों बातें हों, ऐसे स्थान पर मनुष्य को
बिल्कुल निवास नहीं करना चाहिये। इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते है कि
मनुष्य को वहीँ पर निवास करना उचित है, जहाँ के निवासियों की लोक-परलोक
में आस्था हो।

जिन्हें गलत कर्म करने से भय लगता हो, जिनमे लज्जा व संकोच
हो तथा जहाँ के व्यक्ति मूर्खतापूर्ण आचरण नहीं करते, बल्कि बुद्धिमानी से
विचार करते हुए एक-दूसरे के हित के लिये त्याग करने को तैयार रहते हैं।
क्योंकि केवल ऐसे ही स्थान पर रहने से व्यक्ति सुखपूर्वक जीवन बिता सकता
है। लज्जाहीन, भयहीन, मूर्ख और स्वार्थी व्यक्ति सदा दूसरों के लिये दुःख
व कष्ट का ही कारण बनेगा, इसीलिये आचार्य ने उनसे बचने के लिये कहा है।

4.
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च।
दु:खितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोअप्यवसीदति॥

अर्थ – आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट और
दुराचारिणी स्त्री का भरण-पोषण करने से तथा दुखी व्यक्तियों के साथ रहने
से बुद्धिमान(पंडित) व्यक्ति को भी कष्ट हो सकता है। मनुष्य
के लिये मूर्खता किसी अभिशाप से कम नहीं है। क्योंकि मूर्ख शिष्य किसी बात
को न तो सही प्रकार से समझ सकता है और न ही उसका लाभ उठा सकता है, बल्कि
अपने अविवेकपूर्ण कार्यों से अपने परिवार, गुरु आदि के लिये अपमान और दुःख
का कारण बनता है।

इसी प्रकार से जिसकी भार्या दुष्ट प्रकृति की हो, उस
व्यक्ति को गृहस्थ जीवन का कोई सुख नहीं मिल सकता। क्योंकि वह अपने
कुत्सित कार्यों से न केवल अपने पति को बारंबार दुःख देती है, बल्कि उसके
सामाजिक सम्मान को भी नष्ट कर देती है। वह कृतघ्न की भांति पति से अपनी
प्रत्येक इच्छा की पूर्ति तो कराती है, लेकिन न तो अपने किसी दायित्व का
सही प्रकार से निर्वहन करती है और न ही उसे विवाहित जीवन का कोई सुखभोग
देती है।

दुखी व्यक्तियों के साथ निरंतर रहने से व्यक्ति का अपना स्वयं का जीवन
दुःख से भर जाता है। क्योंकि दुःख में मदद करने के लिए आपको उसके साथ रहना
होगा, उसे ढाढस बँधाना होगा, समय-समय पर आपको अपने आवश्यक कार्य छोड़कर
उसकी मदद करनी होगी, अपने परिश्रम से उपार्जित धन-संपत्ति को उस पर खर्च
करना होगा, जिससे आपका अपना जीवन भी दुःख से भर जायेगा। अतः सुख चाहने
वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस तरह के लोगों के साथ रहने से अवश्य ही बचना
चाहिये।

5. दुराचारी च
दुर्दृष्टिर्दुराअवासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥

अर्थ – दुराचारी, दुष्ट स्वभाव वाला, बिना किसी उचित कारण के दूसरों को
हानि पहुंचाने वाला और दुष्ट व्यक्ति से मित्रता रखने वाला, ऐसा व्यक्ति
चाहे कोई श्रेष्ठ पुरुष ही क्यों न हो, वह भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
यह कहावत तो हम सभी ने सुनी ही है कि “एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर
देती है।” ठीक इसी प्रकार से दुष्ट व्यक्ति अपने और स्वयं से सम्बन्ध रखने
वाले सभी लोगों का जीवन मुश्किल में डाल देता है।

क्योंकि अपने बुरे कर्मों के कारण उसका नष्ट होना तो निश्चित ही है, लेकिन
जैसे गेहूँ के साथ रहने से घुन भी पिस जाता है उसी तरह उससे घनिष्टता रखने
वाला व्यक्ति, चाहे वह उत्तम चरित्र का क्यों न हो अवश्य ही विपत्ति में
फंस जाता है। इसलिये सुख के आकांक्षी व्यक्ति को इनसे हमेशा बचकर रहना
चाहिये।

6. दुर्जनस्य च
सर्पस्य वरं सर्पों न दुर्जनः।
सर्पों दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे-पदे॥

अर्थ – इस श्लोक में आचार्य चाणक्य दुष्ट व्यक्तियों से बचने के लिये यह
कहते हैं कि यदि दुर्जन और साँप में से किसी एक को चुनना पड़े, तो साँप को
ही चुनना चाहिये। अगर कभी दुष्ट व्यक्ति और साँप में से किसी एक के साथ
रहने का चुनाव करना पड़े, तो साँप के साथ रहना ज्यादा अच्छा है। लेकिन
दुर्जन के साथ रहना एक पल भी अच्छा नहीं है। क्योंकि साँप तो तभी काटेगा
जब मृत्युकाल आयेगा, उससे पहले वह कुछ नहीं कहेगा।

लेकिन दुष्ट व्यक्ति तो अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु पल-पल दुःख देगा।
उसके साथ रहने से तो नित्य ही जीवन को खतरा है। इसीलिये आचार्य चाणक्य ने
उसे सर्प से भी अधिक भयंकर मानते हुए उसे सर्वदा त्याज्य ही माना है। अतः
जो सुख से रहना चाहते हों उन्हें दुष्टों के साथ कभी नहीं रहना चाहिये।

7. मूर्खस्तु
परिहर्त्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिद्यते वाक्यशल्येन अदृष्टः कंटकम यथा॥

अर्थ – मनुष्य की तरह दो पैरों से युक्त होने पर भी मूर्ख व्यक्ति एक पशु
के समान ही होता है। क्योंकि जिस प्रकार पशु बुद्धिहीन होता है, उसे उचित
और अनुचित बातों के संबंध में कोई ज्ञान नहीं होता; उसी प्रकार मूर्ख को
भी इस बात का ज्ञान नहीं होता कि उसे क्या कहना चाहिये और क्या करना
चाहिये।

जिस तरह पैर के भीतर धंसा हुआ शूल(काँटा) बाहर से दिखाई न देने पर
भी अंदर ही अंदर पीड़ा देता रहता है, उसी प्रकार से मूर्ख व्यक्ति भी अपने
वचनों से और कार्यों से दूसरों को दुःख और पीड़ा ही देता रहता है। इसलिये
जिन्हें सुख से रहने की इच्छा हो, उन्हें मूर्ख व्यक्तियों से सदा बचकर ही
रहना चाहिये।

8. कुग्रामवासः
कुलहीन सेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥

अर्थ – ऐसे ग्राम या स्थान पर निवास करना जहाँ न आजीविका का प्रबंध हो, न
लोगों में सामाजिक समरसता की भावना हों और जहाँ दुष्ट, दुराचारी लोगों का
निवास हो; किसी कुलहीन, आचारहीन नीच व्यक्ति की सेवा करना; केवल उच्छिष्ट,
बासी और अरुचिकर भोजन का ही उपलब्ध होना; झगडालू और दुष्ट प्रकृति की
पत्नी का मिलना; एक मूर्ख पुत्र का होना और घर में विधवा कन्या का निवास
करना, ये छह चीज़ें मनुष्य के शरीर को बिना किसी अग्नि के हर समय जलाते
रहते हैं।

न तो वह चैन से खा-पी सकता है और न ही चैन से सो सकता है। उसका
जीवन एक दुखद यंत्रणा के समान हो जाता है। क्योंकि जहाँ आस-पास दुष्ट
व्यक्तियों का निवास हो, कोई सहयोग करने को तैयार न हो, वहां रहना खतरे से
खाली नहीं। यदि किसी व्यक्ति को मजबूरी में ऐसे आदमी की चाकरी करनी पड़ती
हो जो दुष्ट, असभ्य और आततायी हो, तो उसके लिये इससे बढ़कर दुःख की बात कोई
नहीं है, क्योंकि वहां सम्मान खोकर काम करना पड़ता है।

व्यक्ति भोजन के कारण ही जीवन धारण कर पाता है, यदि किसी
व्यक्ति को परिश्रम करने के पश्चात भी खाने को पौष्टिक और शुद्ध भोजन न
मिल सके, तो उसके लिये जीवन में इससे अधिक बुरा और क्या हो सकता है। जिस
व्यक्ति की स्त्री अत्यंत क्रोधी स्वभाव की है, वह हमेशा अपने पति का
सुख-चैन छीने रहती है, उसकी सेवा-सहायता को भूल सदा उस पर प्रभुत्व जमाकर
रखती है। ऐसे पुरुष को न तो कहीं सुख-शांति मिल सकती है और न ही वह चैन से
जी सकता है।

ऐसे ही जिस व्यक्ति का पुत्र मूर्ख हो और जिस व्यक्ति की पुत्री विधवा
होकर घर में निवास करती हो, उसके लिये भी जीवन में समस्या और अपमान के
अवसर बार-बार आते हैं। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। वह समाज
में सिर उठाकर नहीं चल पाता। क्योंकि लोग उसकी संतान व उसकी हालत पर पीठ
पीछे ख़ुशी मनाते हैं, मजाक उड़ाते हैं; जो उस व्यक्ति के लिये बहुत
कष्टदायी होता है। अतः जिस व्यक्ति को सुख की कामना हो वह
प्रयत्न करके इन दुखदायक परिस्थितियों से बचने का प्रयत्न करे।

9. नराणां नापितो
धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुश्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

अर्थ – मनुष्यों में नाई, पक्षियों में कौआ, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों
में मालिन को धूर्त माना गया है। क्योंकि ये सभी बिना किसी उचित कारण के
ही दूसरों का कार्य बिगाड़ते हैं, सर्वदा अपने ही स्वार्थ की सिद्धि में
लगे रहते हैं और दूसरों से ईर्ष्या करते हैं। इसलिये जो व्यक्ति सुख-शांति
से रहना चाहता हो, उसे इन लोगों के साथ रहने से बचना चाहिये। इस श्लोक के
विषय में कुछ लोगों को शंका हो सकती है, विशेषकर प्रथम और अंतिम पद में।

क्योंकि बाकी बीच के दोनों पदों के विषय में तो सभी जानते हैं कि कौवे और
गीदड़ कितने धूर्त होते हैं। जब आचार्य के परीक्षा करने पर यह सत्य सिद्ध
हुआ है, तो निश्चय ही प्रथम और अंतिम पद के विषय में उन्होंने जो कहा है,
उस पर भी सभी व्यक्तियों को अवश्य विश्वास करना चाहिये।

10. पक्षिणां
काक्श्चांडालः पशूनां चैव कुक्कुरः।
मुनीनां पाप्श्चांडालःसर्वेषां चैव निन्दकः॥

अर्थ – पक्षियों में सबसे अधिक दुष्ट और चांडाल(नीच) कौआ होता है। इसी
प्रकार पशुओं में सबसे नीच कुत्ता होता है। मुनियों और साधुओं में सबसे
अधिक चांडाल(नीच) वह होता है जो पाप कर्म करता है और सबसे बढ़कर चांडाल वह
होता है जो दूसरों की निंदा करता है। आचार्य चाणक्य ने निंदक को सबसे बड़ा
चांडाल इसलिये बताया है, क्योंकि वह पीठ पीछे उस व्यक्ति की बुराई करता है
जो वहाँ पर अपना पक्ष रखने के लिये उपस्थित ही नहीं होता।

निंदा के पीछे एकमात्र उद्देश्य दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाकर उसकी
प्रतिष्ठा का नाश करना होता है और इस पाप कर्म को करने के पीछे निंदक का
व्यक्तिगत संतुष्टि का भाव रहता है। जिस व्यक्ति की बुराई हो रही है वह
चाहे निंदा का पात्र क्यों न हो, लेकिन फिर भी उसकी पीठ पीछे निंदा नहीं होनी
चाहिये। क्योंकि धर्म की दृष्टि से ऐसा करना महान पाप है। हाँ, उसकी
आलोचना अवश्य की जा सकती है, क्योंकि आलोचना सुधारात्मक होती है और
उसमे व्यक्ति की कल्याण कामना निहित होती है।


“सुख बाह्य परिस्थितियों पर नहीं बल्कि अपने मन पर निर्भर है। सुखी रहने
का मतलब है अपने आप को ऐसी चीज़ में डुबो देना जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार
करता है।”
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्ये

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बहुमूल्य सुझाव इस वेबसाईट को और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण और सफल बनाने में
सहायक होंगे। एक उज्जवल भविष्य और सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

जानिये क्या कहती है आपकी Body Language आपके व्यक्तित्व के बारे में

Hindi Article on
Science of Body Language

“अच्छा सोचना अक्लमंदी
है, अच्छी योजना बनाना और बड़ी बुद्धिमानी है, पर अच्छा करना सबसे
बुद्धिमानी का काम है और सर्वश्रेष्ठ है।”
– अज्ञात

Science
of Body Language (SBL) क्या है : –

Body Language या शरीर की भाषा एक ऐसी अद्भुत कला है, जिसके जरिये इस विधा
में पारंगत कोई भी व्यक्ति किसी अन्य पुरुष या स्त्री के व्यक्तित्व, आदत,
व्यवहार व चरित्र का गंभीर आँकलन उनके शरीर के अंगों, मुद्राओं व चिन्हों
के आधार पर स्वयं ही कर सकता है, या फिर यह कहें कि यह वह विज्ञान है,
जिससे बिना उनसे कुछ पूछे उनके जीवन के गुप्त रहस्यों को भली-भांति जान व
समझ सकता है। क्योंकि हमारा यह जैविक शरीर हमारे उस सूक्ष्म शरीर का ही
मूर्त रूप है, जो इच्छाओं, विचारों, भाव-संवेदनाओं और सुद्रढ़ आदतों से
निर्मित हुआ है।

पाश्चात्य सभ्यता और उसके समर्थक देशों ने Body Language
के जो सूत्र और सिद्धांत निर्मित किये हैं, वह प्राचीन भारतीय ऋषियों
द्वारा गहन अनुसंधान के पश्चात और मनुष्य के शारीरिक लक्षणों, मानसिक
चेष्टाओं और भावनात्मक आवेगों की अत्यंत दीर्घ काल तक की गयी परीक्षा के
उपरान्त निर्मित हुए सामुद्रिक शास्त्र की तुलना में अत्यंत संकुचित और
अस्पष्ट हैं, क्योंकि भारत का यह प्राचीन, गहन विज्ञान किसी एक व्यक्ति
द्वारा प्रतिपादित नहीं है, बल्कि न जाने कितने ऋषियों, योगियों,
विद्वानों और अन्वेषणकर्ताओं के सम्मिलित प्रयासों का परिणाम है।

जहाँ सामुद्रिक शास्त्र शरीर के समस्त लक्षणों व मानसिक चेष्टाओं को आधार
बनाकर व्यक्ति के स्वभाव की विस्तृत, वास्तविक और गहन व्याख्या करता है,
वहीँ आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् शरीर की केवल कुछ विशेष मुद्राओं और
भाव-भंगिमाओं के आधार पर ही किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का समग्र
मूल्यांकन करते है। इसलिये यदि आपको किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सटीक
विश्लेषण करना है, तो अपने पूर्वजों, उन महान ऋषियों द्वारा प्रणीत उसी
सामुद्रिक शास्त्र की शरण में जाना ही श्रेयस्कर है, जो किसी प्रकार का
संदेह नहीं छोड़ता और मनुष्य के छुपाये गये वास्तविक स्वरुप को प्रकट कर
देता है।

Body Language (SBL)
के विषय में जानने की आवश्यकता क्यों है : –

नंबरों और नौकरी की दौड़ में व्यस्त आपमें से अधिकांश लोग शायद नहीं जानते
होंगे कि जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ इस महान विधा की जानकारी
आपके लिये फायदेमंद नहीं होगी। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और जब तक कोई
भी व्यक्ति सामाजिक संबंधों में बंधकर जिंदगी गुजारने के लिये तैयार है,
तब तक उसे मनुष्यों के साथ अनिवार्य रूप से रहना ही होगा, उनसे मेल-जोल
रखना ही होगा और जब-जब आपके जीवन में कोई नया व्यक्ति आपके साथ जुड़ेगा
तब-तब Body Language के इस अनूठे ज्ञान की आवश्यकता आपको हमेशा
रहेगी।

क्योंकि यही वह एकमात्र साधन है जिसके जरिये आप किसी व्यक्ति के
व्यक्तित्व का, उसकी आदतों का, उसके विचारों का, उसकी समझ का वास्तविक
परिचय पा सकते हैं। इस दुनिया में 95% से भी अधिक लोग एक दोहरा व्यक्तित्व
लेकर जीते हैं, जो अपने सामान्य जीवन में एक सतही और लोगों की नज़रों में
अच्छा लगने वाला व्यक्तित्व प्रकट करते हैं, पर जो वास्तविक जीवन में
बिल्कुल बनावटी व आभासी होता है और सिर्फ उनके अपने एकांत के क्षणों और
कुछ प्रियजनों के सामने ही प्रकट होता है।

लेकिन कोई दूसरा उनके इस रूप को न तो जान पाता है और न ही पहचान पाता है।
छदम व्यक्तित्व के आधार पर बने रिश्तों का परिणाम होता है, यातनाओं, दुखों
और विक्षुब्धताओं से भरे वह सम्बन्ध जो संपूर्ण जीवन की मधुरता और उसके
सौंदर्य को नष्ट कर देते हैं और इस परिणाम को भुगतना पड़ता हैं, उन सरल व
निर्दोष लोगों को जिन्होंने उनके उस आभासी रूप का विश्वास कर उन्हें अपने
जीवन में स्थान दिया, अपना विश्वास सौंपा। इसके उदाहरण के रूप में शायद
किसी को कुछ बताने की आवश्यकता न पड़े।

क्योंकि समाज में दिन-रात फैलती बुराइयाँ, षड़यंत्र, छल-कपट, विश्वासघात और
उनके कारण होने वाले अपराध, जिन्होंने न जाने-कितने नर-नारियों के जीवन की
ऊँची अभिलाषाओं को असमय ही कुचल दिया, बल्कि संसार को भी एक ऐसा स्थान बना
दिया, जहाँ सच्चे व सरल व्यक्तियों पर भी कोई विश्वास नहीं करना चाहता, इस
बात का ज्वलंत प्रमाण हैं। यह निर्विवाद तथ्य है कि किसी दूसरे व्यक्ति को
सुधारना, उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन लाना संसार में सबसे मुश्किल काम
है और यदि वह तैयार न हो तो नितांत असंभव।

यह कार्य तो खैर हमारे वश में नहीं है, लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं
कि अपने जीवन में प्रवेश करने वाले दूसरे व्यक्ति के स्वभाव की कुछ तो
परीक्षा कर सके। विशेषकर तब जब हम उन्हें अपना विश्वास सौंपने जा रहे हों,
क्योंकि अगर उन्होंने हमें धोखा दिया, तो यह उनकी धूर्तता होगी, लेकिन यदि
हमने अपने अज्ञान के कारण स्वयं ही नुकसान उठाया, तो यह हमारी मूर्खता
होगी।

आप लोगों में से कुछ लोग शायद इस बात का विश्वास नहीं करेंगे कि Body
Language से न केवल इंसानों की, बल्कि पशुओं के स्वभाव व गुणों की भी जांच
की जाती है। जो लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं, वे जानते होंगे कि जिन
गाय-भैसों के थन व दुग्ध क्षेत्र बडा व विशाल होता है, वह छोटी नस्लों की
तुलना में अधिक दूध देती हैं। जो बैल व घोड़े पूँछ की जड़ पर हाथ रखते ही
उछल पड़ते हैं, वे दौड़ने व काम करने में सबसे आगे रहते हैं, यही बात
मनुष्यों के सन्दर्भ में है।

Body Language (SBL)
का ज्ञान हमारे लिये किस तरह उपयोगी है : –

दिखने में तो सभी व्यक्ति एक-जैसे ही लगते हैं, हड्डियों और माँस से बने
हुए पुतले की तरह। लेकिन उनके व्यक्तित्व, चरित्र और स्वभाव में
जमीन-आसमान का अंतर होता है। जो उनके शारीरिक अंगों की माप, स्वरुप, उनकी
मानसिक चेष्टाओं, मुद्राओं, वाक्शैली आदि से प्रकट होता है, जिसके बारे
में आप आगे चलकर पढेंगे। आपने ध्यान दिया होगा कि जब आप एक स्कूल या कॉलेज
के छात्र थे, तो प्रैक्टिकल के लिये आने वाला Examiner छात्रों से सवाल
पूछने के साथ-साथ उनके शरीर की भाव-भंगिमाओं पर भी ध्यान देता
था।

जब कोई छात्र उत्तर देते समय अटकता था, तो वह जान रहा होता था कि इस छात्र को
अपने उपर पूर्ण विश्वास नहीं है और न ही इसे प्रश्न का समुचित उत्तर पता
है। लेकिन जो छात्र बिल्कुल निडर और स्वाभाविक रूप से उसके प्रश्नों का
सही उत्तर देते थे, वह उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें सबसे अच्छे अंक देकर
जाता था। उनके अच्छे प्रदर्शन में केवल उनकी जानकारी का ही योगदान नहीं
होता था, बल्कि उनकी प्रभावशाली Body Language की भी अहम् भूमिका रहती
थी।

इस स्थिति का सामना हर व्यक्ति को उस समय भी करना पड़ता है, जब वह किसी
नौकरी के लिये Interview में बैठता है। विशेषकर तब जब आप किसी प्रतिष्ठित
पद के लिये अपनी योग्यता का दावा पेश करते हुए एक Panel Interview का सामना
करते हैं। वहां बोर्ड का एक सदस्य केवल आपकी Body Language पर ही ध्यान
रखता है। वह अन्य सदस्यों की तरह आपसे कोई प्रश्न नहीं पूछता, बल्कि सिर्फ यह
देखता है आपके उत्तर देते समय, बोलते समय, बैठते समय आपका शरीर कैसे
प्रतिक्रिया करता है।

चूँकि यह विषय बहुत बड़ा है, इसलिये एक ही लेख में इसे पूर्ण कर पाना असंभव है। आप अपनी उत्कंठा बनाये रखिये, हम इसे कई
लेखों की श्रंखला में पूर्ण करने का प्रयास करेंगे। Body Language से हम
केवल दूसरों के ही नहीं, बल्कि अपने स्वयं के व्यक्तित्व व स्वभाव की
परीक्षा कर अपनी कमजोरियों को भी दूर कर सकते हैं और अपनी शक्तियों को
पहचान सकते हैं, जो हमारे लिये जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम आयेंगी।

चाहे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को उत्तम व श्रेष्ठ बनाना हो या फिर दूसरे
के व्यक्तित्व की वास्तविकता को जानना हो, चाहे एक अव्वल विद्यार्थी बनना
हो या फिर नौकरी या career में बहुत आगे बढ़ना हो, चाहे अच्छे मित्रों को
चुनना हो या एक अच्छे जीवनसाथी की खोज करनी हो, चाहे भविष्य के अनागत की
झलक पानी हो या अशुभ परिस्थितियों और दुखों से बचाव करना हो, Body
Language का यह विशेष ज्ञान आपकी हमेशा सहायता करेगा। चाहे इस धरती पर हम
रहे न रहें, लेकिन इस महान विज्ञान की प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी।

Body Language (SBL)
से व्यक्ति के व्यक्तित्व व स्वभाव की पहचान कैसे की जाती है : –

प्रत्येक शरीर की अपनी स्वयं की एक भाषा होती है, जो हमारे बिना जाने
स्वाभाविक रूप से चेतन-अवचेतन मन के अनुरूप कार्य करती है। हम चाहे उसे
अपनी वाणी से कैसे भी व्यक्त करें, लेकिन शरीर के क्रिया-कलाप हमारी
यथार्थ भावना के अनुरूप ही होंगे। हमारे शरीर के अंग, शरीर पर जन्मजात बने
चिंह, दाग, तिल, अंगों की माप, मानसिक भावनाओं के अनुरूप होने वाली
शारीरिक चेष्टाएँ आदि सभी हमारे जीवन के गुप्त रहस्यों को जानने के साधन
हैं।

जो हमारे व्यक्तित्व, मानसिक गठन, नैसर्गिक स्वभाव और चरित्र को
प्रकट करते हैं। जिन्हें झूठ बोलकर या छिपाकर नकारा नहीं जा सकता, यथार्थ
सत्य को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। इनसे हम न केवल अपने व दूसरों के
जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी पा सकते हैं, बल्कि सुदूर भविष्य की आवश्यक
जानकारी भी मिलती है। शरीर की भाषा के इस विज्ञान में इन गूढ़ बातों पर
ध्यान केन्द्रित कर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की जांच की जाती है –

1. शरीर पर जन्म से बने चिन्हों द्वारा – जैसे, तिल, मस्से, रेखाओं, दाग व
निशानो से।

2. शरीर के अंगों के स्फुरण से – हाथ-पैर, कान, नाक, आँख आदि अंगों के
फड़कने से।

3. शरीर के अंगों की माप और स्वरुप से – जैसे बाल, नाखून, मस्तक, नाक,
हाथ, पैर, कमर, छाती, होंठ आदि से।

4. शरीर की मुद्राओं द्वारा – चलने-फिरने, बैठने, बोलने, सोचने,
खाने-पीने, हँसने, इशारा करने आदि क्रिया-कलापों से।

अगले लेखों से आप क्रमवार शरीर की भाषा से व्यक्तित्व को प्रकट करने वाले
इन साधनों के बारे में विस्तार से पढेंगे, जो न केवल आपको आश्चर्यचकित कर
देंगे, बल्कि यह भी प्रमाणित कर देंगे कि विदेशियों की तुलना में अपने देश
का विज्ञान कितना ऊँचा, प्रामाणिक और सटीक है। हमें पूर्ण आशा है कि यदि
आप संशयरहित मानसिकता से एक सच्चे जिज्ञासु की भांति इस अनमोल ज्ञान को
ग्रहण करने की दिशा में अग्रसर होंगे, तो किसी भी बात पर संदेह करने के
लिये कोई स्थान नहीं रहेगा।


“अगर आप पैसे से आजादी की उम्मीद करते हैं, तो आप इसे कभी हासिल नहीं कर
सकेंगें। इस दुनिया में सच्ची सुरक्षा केवल ज्ञान, अनुभव और योग्यता की उपलब्धि में है।”
– हेनरी फोर्ड

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कर्क राशि से जानिये अपने व्यक्तित्व के अबूझ रहस्य

Hindi Astrology:
Personality of Cancer Zodiac Sign

“रुकावटें और पीड़ाएँ
जीवन में आवश्यक हैं। क्योंकि वे हमें धैर्य, प्रेम, कौशल और संघर्ष की
महत्ता सिखाती हैं।”
– अरविन्द सिंह

Nature of Cancer
Zodiac कर्क राशि का स्वभाव : –

जब जन्म कुंडली में चन्द्रमा कर्क राशि में हो, तो उस व्यक्ति की जन्मराशि
कर्क होती है। कर्क राशि राशिचक्र की चौथी राशि है। इस राशि का विस्तार
भचक्र के 90° से 120° तक है। इस राशि का स्वामी गृह चंद्रमा है, जो मनुष्य
के मन का भी प्रतिनिधि है। यह ब्राहाण जाति की, स्त्री लिंग वाली, जल तत्व
प्रधान राशि है। यह पश्चिम दिशा की स्वामिनी और सौम्य प्रकृति की, बहु
संतति वाली राशि है।

इसका प्रतीक चिंह एक स्थिर व शांत केकड़ा है। इस राशि के जातक भी इस जीव की
तरह सामान्यतः शांत स्वभाव वाले, भावुक और संवेदनशील होते हैं। ये
मस्तिष्क से कम और ह्रदय से अधिक निर्णय लेते हैं। कर्क राशि के जातकों को
गोचर के फलादेश इसी राशि के आधार पर देखने चाहियें। यदि व्यक्ति के जन्म
के समय लग्न कर्क राशि का हो, तब भी यह जातकों पर अपना प्रभाव डालती है।

यह राशि व्यक्ति के शरीर में उसकी छाती/स्तन व फेफड़ों का प्रतिनिधित्व
करती है। ग्रहों की अनुकूलता के अनुसार सूर्य, मंगल और बृहस्पति कर्क राशि
में शुभ फल प्रदान करते हैं। बुध, शुक्र और शनि के लिये यह शत्रु राशि
होने के कारण ये गृह प्रायः इसमें अशुभ फल देते हैं। कर्क राशि पर सूर्य
31 दिन 22 घडी और 35 पल रहते हैं। कर्क राशि के अंतर्गत पुष्य और आश्लेषा
नक्षत्र के चारों चरण और पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम चरण आता है।

Personality of Cancer
Person कर्क राशि के जातक का व्यक्तित्व –

कर्क राशि जल तत्व प्रधान है और जल शीतलता, निर्मलता व सौम्यता का स्रोत
है; यही गुण कर्क राशि के जातकों में भी मिलते हैं। यह लोग भी शांत और
संकोची प्रवृत्ति के, निर्मल और भावनाशील ह्रदय वाले होते हैं, दूसरों की
पीड़ा को देखकर जल्दी ही द्रवित हो जाते हैं। यह जातक शांत मस्तिष्क से
कार्य करते हैं। चूँकि यह लगन से परिश्रम करते हुए, धैर्यपूर्वक अपने
कार्य में जुटे रहते हैं, इसलिये जीवन में सफलता की सीढियाँ चढते चले जाते
हैं।

यदि चंद्रमा कमजोर न हो, तो इनका मनोबल भी बहुत उच्च होता हैं, अपनी
इच्छाशक्ति के बल पर यह बड़े से बड़े कार्य कर सकते हैं। कर्क राशि के जातक
नैसर्गिक रूप से बुद्धिमान, विवेकशील, विनम्र और लज्जालु होते हैं, पर साथ
ही रसिकमिजाज, मूडी और अस्थिर स्वभाव वाले भी होते हैं। यह लोग
शांतिप्रिय, उदार और परोपकारी होते हैं, किसी भी जीव को कष्ट देना इनके
स्वभाव में शामिल नही होता।

सामर्थ्य होने पर यह प्रत्येक दुखी जीव की मदद करने का प्रयास करते हैं।
यह प्रायः शांत ही रहते है और अनावश्यक बोलना पसंद नहीं करते। चूँकि ये
धैर्यवान होते हैं और सहनशीलता भी इनमे अधिक होती है, इसलिये इन्हें जल्दी
से क्रोध नहीं आता। न ही यह किसी व्यक्ति की गलती को दिल में बसाकर रखते
हैं, अपने कोमल स्वभाव के कारण यह जल्दी ही दूसरों को क्षमा कर देते हैं।

कर्क राशि के जातक संवेदनशील होने के साथ-साथ अत्यंत कल्पनाशील भी होते
हैं। इसलिये ये छोटी-छोटी बातों पर भी काफी विचार करते हैं, इनसे संबंध
जोड़ते समय यह तथ्य अवश्य ध्यान में रखना चाहिये। इनकी स्मरणशक्ति
बहुत अच्छी होती है, इसी वजह से यह बहुत पुरानी घटनाओं या तथ्यों को आसानी
से याद रख पाते हैं। ये शीघ्र ही उत्तेजित और जल्दी ही शांत भी हो जाते
हैं, इस कारण से इनमे व्यवहारकुशलता का कुछ अभाव पाया जाता है।

यह जातक आदर्शवादी सोच के होते हैं, पर ये विचारों से कम और भावनाओं से
अधिक प्रेरित होते हैं। जिस तरह चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, उसी तरह इनकी
मनोवृत्तियाँ भी तेजी से बदलती रहती हैं। यह सरल स्वभाव के और कार्यकुशल
तो होते हैं, लेकिन अधिक भावुक होने के कारण, दूसरे लोग कभी-कभी
इनसे अनुचित लाभ भी उठा लेते हैं।

Physique &
Nature of Cancer Person कर्कराशि के जातक का शरीर और स्वभाव : –

कर्क राशि के जातकों का स्वास्थ्य आम तौर पर अच्छा ही रहता है, पर यदि
ग्रह स्थिति प्रतिकूल हो, तो इन्हें उदर, फेफड़ों और ह्रदय से संबंधित
रोगों के होने की सम्भावना रहती है। अधिक भावुकता व संवेदनशीलता के कारण
यदि इनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाय, तो इन्हें डिप्रेशन और दूसरे मनोरोगों
के होने की भी प्रबल सम्भावना रहती है। कर्क राशि के जातक जिस क्षेत्र में
भी होते हैं, वहीँ अपनी उन्नति के लिये प्रयासरत रहते हैं।

इनमे प्रबल जिज्ञासा, बुद्धिमत्ता, धैर्य, अध्यवसाय
जैसे गुण होते हैं, जिनके बल पर यह उच्च पद, प्रतिष्ठा, यश, मान-बड़ाई
प्राप्त करते देखे जाते हैं। यह लोग सोच-विचारकर ही कोई निर्णय लेते हैं
और फिर उस पर पूर्ण मनोयोग से कार्य आरम्भ कर देते हैं। आजीविका के रूप
में यह जातक चंद्रमा से संबंधित क्षेत्रों का चयन करते हैं, जिनमे
चिकित्सा, अध्यापन-लेखन, संगीत और कला के दूसरे क्षेत्र शामिल हैं। इसके
अतिरिक्त ये जातक दुग्ध, रत्न व श्रृंगार के व्यवसाय में भी सफल हो सकते
है।

कर्क राशि के जातकों को प्रकृति, कला, सौंदर्य और श्रृंगार से विशेष प्रेम
होता हैं। इनके मन में विपरीत लिंगियों के प्रति विशेष आकर्षण रहता है,
परन्तु संकोची होने के कारण यह पहल नहीं कर पाते। प्रेम संबंधों में
प्रायः असफल ही रहते हैं। इन्हें शीतल प्रकृति के स्थान व ऐसी वस्तुओं का
सेवन करना स्वाभाविक रूप से प्रिय होता है, जैसे – नदियाँ, झरने, वन,
पर्वत और समुद्र।

इन्हें ऐसा एकांत भी काफी प्रिय होता है, जहाँ ये घंटों अपनी कल्पनाओं में
खोये रह सकें। यह चंचल और घूमने-फिरने के शौक़ीन होते हैं, सजने-संवरने और
नाच-गाने में भी इनकी काफी रूचि रहती है। यह जातक अपने परिवार और जीवनसाथी
के प्रति बहुत समर्पित होते हैं और उनका विशेष ध्यान रखते हैं। दूसरे
अर्थों में कहें तो इन्हें अपने प्रियजनों से बहुत मोह रहता है।

“कोई भी मूर्ख जान सकता है असली बात समझना है।”
– अल्बर्ट आइंस्टीन

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स्वस्थ जीवन जीने के लिये अनिवार्य हैं यह 16 मिनरल्स

Hindi
Guide: Mineral & Our Health – Part 2

“वे लोग जो मनोरंजन के
लिये समय नहीं निकाल सकते, चाहे जल्दी हो या देर से बीमारी के लिये समय
निकाल ही लेते हैं।”
– जॉन वानमेकर

Important Major
Minerals for Health स्वास्थ्य के लिये आवश्यक प्रमुख खनिज : –

अपने शरीर को स्वस्थ रखना प्रत्येक व्यक्ति के जीवन
का पहला उत्तरदायित्व है और साथ ही जीवन का प्रथम लक्ष्य भी। क्योंकि यदि
इसकी देखभाल आप स्वयं ही नहीं करेंगे, तो फिर और कौन करेगा। और यदि यह
किसी कारण से अस्वस्थ या अक्षम हो जाय, तो फिर आपके जीवन के दूसरे
लक्ष्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता। क्योंकि उन्हें पूरा करने के लिये
आपके पास सबसे बड़ा और सबसे सशक्त साधन बस यही है।

इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को अपने सबसे अच्छे मित्र, इस शरीर के लिये भी
वैसे ही समर्पित बनना चाहिये जैसे कि यह हमारे प्रति रहता है। पिछले लेख
में आप पढ़ चुके हैं कि मिनरल्स हमारे शरीर के लिये क्यों आवश्यक हैं। साथ
ही साथ आप प्रमुख मिनरल्स के कार्य और शरीर के लिये उनकी महत्ता के विषय
में भी पढ़ चुके हैं। अब इसी श्रंखला में पढिये बाकी बचे हुए खनिजों के
विषय में –

3. Sodium सोडियम –
शरीर में क्या कार्य करता है : –

सोडियम मनुष्य शरीर के लिये आवश्यक सबसे अनिवार्य मिनरल्स में से एक है,
परन्तु हमें इसे अलग से लेने की प्रायः कोई आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि
प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाले नमक, अनाज और दूध से ही इसकी पूर्ति हो जाती
है। इनके अतिरिक्त हम जो कुछ भी खाते हैं उससे शरीर में इसकी मात्रा और
ज्यादा ही बढती है। Sodium हमारे शरीर का ph स्तर और पानी की मात्रा दोनों
को नियंत्रित करता है।

इसके अतिरिक्त यह शरीर के कई अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यों जैसे माँसपेशियों
के संकुचन, पाचन और स्नायविक संदेशों के प्रसारण (nerve signal
transmission) के लिये भी एक अनिवार्य तत्व है। Sodium हमारे ब्लडप्रेशर
को नियंत्रित रखता है। इसे घर में खाए जाने वाले नमक के नाम से भी जाना
जाता है, जो सोडियम और क्लोराइड दो तत्वों का मिश्रण है। यह एक विद्युत
अपघट्य भी है।

सोडियम की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

Sodium की उचित मात्रा न लेने से हाइपोनाट्रेमिया की समस्या पैदा हो सकती
है। यह अक्सर तभी पैदा होती है, जब जरुरत से ज्यादा पानी हमारे शरीर में
इकट्ठा हो जाता है और पसीने और मूत्र के कारण इस लवण का स्तर गिर जाता है।
इससे माँसपेशियों की ऐंठन, थकान, सिरदर्द और निर्जलीकरण(पानी की कमी) की
समस्या उत्पन्न हो सकती है। सोडियम को अधिक मात्रा में लेने से
हाइपरनाट्रेमिया का खतरा बढ़ जाता है, जिससे शरीर में आलस्य और चिडचिडापन
होने के साथ-साथ दूसरी स्वास्थ्य समस्याएँ भी उभर सकती हैं।

सोडियम को हमें न्यूनतम मात्रा में ही लेना चाहिये, क्योंकि शरीर इसकी
पूर्ति आसानी से कर लेता है। अधिक मात्रा में Sodium को लेने से रक्तचाप
तेजी से बढ़ता है, जिससे हाइपरटेंशन यानि उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ जाता है।
जो आगे चलकर ह्रदय की कई गंभीर बीमारियों को जन्म देता है और लम्बे समय तक
लेते रहने से यकृत भी कई रोगों में जकड सकता है। इसके अलावा Sodium की
मात्रा अधिक होने पर कैल्शियम शरीर में इसके साथ बंध जाता है।

इससे नुकसान यह होता है कि जब शरीर को प्रतीत होता है कि सोडियम की मात्रा
को निश्चय ही कम होना चाहिये, तो इसके स्थान पर कैल्शियम को बाहर निकाल
दिया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि आप नमक और प्रसंस्करित भोजन के
रूप में बहुत ज्यादा सोडियम खाते हैं, तो आपके शरीर में आवश्यक कैल्शियम
की मात्रा धीरे-धीरे कम होती चली जायेगी। क्योंकि तब आपका शरीर Sodium की
अतिरिक्त मात्रा को कम करने के लिये यही करेगा।

सोडियम से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

नमक, सोया सॉस, तला-भुना भोजन, दूध, शीतल पेय(कोल्ड ड्रिंक्स), अंडे,
माँस, अचार, ब्रेड-बिस्कुट, अनाज, सब्जियां आदि।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

हमारे शरीर को प्रतिदिन 700 mg से 1200 mg Sodium की आवश्यकता होती है जो
हमें बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इस कारण हमारे शरीर में इस
तत्व की कमी शायद ही होती है। औसत रूप से देखें तो लगभग हर व्यक्ति Sodium
को इसकी आवश्यक मात्रा से अधिक सीमा में ही ग्रहण करता है, इसलिये
हमें जंक फूड, शीतल पेय, और मसालेदार भोजन से बचना चाहिये।

कोशिश करें कि नमक कम से कम खाएं और खूब पानी पीयें। विशेषकर जब आप कोई
मेहनत का कार्य करें, क्योंकि पसीने के निकलने से सोडियम का स्तर भी गिरता
है। इसकी प्रतिदिन के लिये अधिकतम मात्रा 2300 mg निर्धारित है।

4. Phosphorous
फॉस्फोरस – शरीर में क्या कार्य करता है : –

फॉस्फोरस हमारे स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखने के लिये अनिवार्य प्रमुख
मिनरल्स में से एक है, जो हमारे दाँतों और स्वस्थ हड्डियों के लिये
महत्वपूर्ण हैं। लगभग 75-80% Phosphorous हमारी हड्डियों और दांतों में
जमा रहता है। कैल्शियम और फॉस्फोरस दोनों मिनरल्स मिलकर हमारी हड्डियों का
निर्माण करते हैं, उन्हें मजबूती देते हैं और हमारे अस्थिपंजर की सुरक्षा
करते हैं। Phosphorous चयापचय की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका
निभाता है और शरीर के कुल भार का एक प्रतिशत भाग होता है।

Phosphorous हमारे DNA और RNA का भी एक महत्वपूर्ण घटक है, जो
भोजन को उर्जा में बदलता है और पोषक तत्वों को उन अंगो तक पहुँचाने में
मदद करता है, जिन्हें उनकी आवश्यकता है। वह भोजन जिसे हम प्रतिदिन खाते
हैं, एंजाइम उत्पन्न करता है और फॉस्फोरस की मदद से इन एंजाइम को ऊर्जा
में बदला जाता है। अधिक फॉस्फोरस से गुर्दों की कार्यक्षमता पर विपरीत
प्रभाव पड़ता है, लेकिन इसके कारण होने वाले तीव्र जहरीलेपन का कोई प्रमाण
नहीं है।

वहीँ दूसरी ओर फॉस्फोरस की कमी से होने वाली दुर्लभ घटनाओं में एनीमिया
(खून की कमी का रोग), माँसपेशियों की कमजोरी, भूख में कमी, बच्चों में
फैलने वाली रिकेट्स की बीमारी और टाँगों में होने वाली झनझनाहट और सुन्न
हो जाना जैसे रोग पनप सकते हैं। Phosphorous हमारे शरीर की प्रत्येक
कोशिका में पाया जाता है और यह उस प्रणाली का हिस्सा है, जो शरीर में अम्ल
और क्षार का संतुलन बनाये रखती है।

फॉस्फोरस की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

जब शरीर में Phosphorous की काफी कमी हो जाती है, तो हमारी हड्डियां भंगुर
हो जाती हैं और हड्डियों के जोड़ लचीले न होकर सख्त हो जाते हैं, जिससे
चलने-फिरने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इससे हड्डियां कभी भी
बहुत आसानी से टूट सकती हैं। Phosphorous की इस कमी को हाइपोफॉस्फेटेमिया
कहते हैं। रक्त में फॉस्फेट का स्तर गिरने का अर्थ है, पेशाब में फॉस्फेट
का स्तर बढ़ जाना। इस कमी के मुख्य संकेत हैं – मानसिक स्थिति में
परिवर्तन, थकान व कमजोरी का बने रहना और माँसपेशियों का सही तरह से कार्य
न करना।

इसके विपरीत यदि शरीर में Phosphorous का स्तर बढ़ जाये, तो इस
बीमारी को हाइपरफॉस्फेटेमिया कहते हैं। मुँह से लिये जाने वाले फॉस्फेट के
तरल घोल से यह समस्या पैदा हो सकती है। जब फॉस्फेट उच्च मात्रा में हमारे
शरीर में इकठ्ठा हो जाता है, तो शरीर में कैल्शियम का स्तर गिर जाता है।
इस स्थिति में बस एक यही उपाय रह जाता है कि फॉस्फोरस की मात्रा को सीमित
कर दिया जाय। इसके अलावा बहुत ज्यादा फॉस्फोरस हमारी मैगनीशियम को अवशोषित
करने की क्षमता में कमी ला सकता है।

फॉस्फोरस से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

फॉस्फोरस हमें पेड़-पौधों और पशुओं दोनों से प्राप्त होता है, इसलिये अपनी
रूचि के अनुसार भोजन का चुनाव किया जा सकता है। यह दूध और दूध से बने
पदार्थो दही, पनीर आदि में, अंडे, बीयर, चिकन, प्रसंस्करित भोजन और सामन
मछली में भी पर्याप्त रूप से पाया जाता है। शीतल पेय में भी यह आसानी से
उपलब्ध हो जाता है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

हमारे शरीर को प्रतिदिन 700 mg Phosphorous की आवश्यकता होती है।
क्योंकि शरीर की कई महत्वपूर्ण क्रियाओं में इसकी आवश्यकता पड़ती है, जो
प्राकृतिक आहार में ऊपर दी गयी चीजों से आसानी से प्राप्त हो जाती है।
लेकिन ओस्टियोपोरोसिस, क्षय रोग या अन्य किसी रोग के कारण जब शरीर में
फॉस्फोरस की अधिक कमी हो जाती है और हड्डियों का क्षरण, रक्त की निरंतर
कमी, जैसी समस्यायें होने लगें, तो Phosphorous की पूर्ति के लिये
सप्लीमेंट की जरुरत पड़ सकती है। Phosphorous की अधिकतम 4000 mg मात्रा
प्रतिदिन ली जा सकती है।

5. Magnesium
मैगनीशियम – शरीर में क्या कार्य करता है : –

कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैगनीशियम, ये तीनो खनिज हमारे शरीर की
हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिये बहुत ही आवश्यक खनिज हैं। हमारे शरीर का
लगभग 50% Magnesium हड्डियों में जमा रहता है और बाकी का आधा शरीर की
कोशिकाओं में इकठ्ठा रहता है। यह कैल्शियम के साथ मिलकर माँसपेशियों का
उचित सञ्चालन करने, खून को जमाने, कोशिकाओं तक सन्देश पहुंचाने, और दाँतों
तथा हड्डियों को स्वस्थ बनाये रखने जैसे अत्यंत आवश्यक कार्य करने में
महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

इसके अतिरिक्त Magnesium रक्तदाब को नियंत्रित रखने, ऊर्जा के चयापचय में
और शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त बनाने में भी सहायता करता है।
मैगनीशियम, शरीर को स्वस्थ रखने के लिये आवश्यक सबसे अनमोल और प्रचुर
मात्रा में उपलब्ध मिनरल्स में से एक है। यह हमारे शरीर के भीतर उत्पन्न
होने वाले एंजाइमों को सक्रिय होने में सहायता करता है और वैद्युत अपघट्य
पदार्थों (इलेक्ट्रोलाइट) के संतुलन को नियंत्रित रखता है।

Magnesium न केवल हाइपरटेंशन और रक्त की शर्करा को समय-समय पर नियंत्रित
करता रहता है, बल्कि ह्रदय की उसके सामान्य कार्य को पूरा करने में भी मदद
करता है। यह शरीर के भीतर प्रोटीन के निर्माण के लिये तथा नाडी मंडल के
स्वस्थ रहने के लिये आवश्यक है। यह न केवल डायबिटीज को नियंत्रित रखता
है, बल्कि किडनी में पथरी को बनने से भी रोकता है।

मैगनीशियम की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

जब लम्बे समय तक Magnesium की कमी शरीर में बनी रहे, तो हाइपोमैग्नेसेमिया
की समस्या उत्पन्न हो जाती है और मैगनीशियम की कमी शरीर के प्रत्येक अंग
को प्रभावित करती है। हमारे शरीर की हड्डियां, दांत, मांसपेशियां, नाडी
तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र सब प्रभावित होते हैं और इसकी परिणति तनाव,
सिरदर्द, कमरदर्द और जोड़ों के दर्द के रूप में होती है।

लेकिन चिंता मत करिये, हमारे शरीर में मैगनीशियम की कमी और इसके
दुष्प्रभाव कुछ दुर्लभ स्थितियों में ही होते है। Magnesium को बहुत अधिक
मात्रा में लेना भी स्वास्थ्य के लिये फायदेमंद नहीं है। इससे आपको
हाइपरमैग्नेसेमिया हो सकता है। यह इसलिये होता है, क्योंकि जब मैगनीशियम
शरीर में ज्यादा इकठ्ठा हो जाता है, तो हमारे गुर्दे इस अतिरिक्त मात्रा
को मूत्र के जरिये बाहर निकाल देते है।

ऐसी स्थिति में माँसपेशियों की कमजोरी, निम्न रक्तचाप, ह्रदय की अनियमित
धड़कन, आलस्य, डायरिया, खुलकर साँस न आना जैसी समस्याएँ हो सकती हैं, पर
ऐसा तब ही होता है, जब आप मैगनीशियम की कोई अतिरिक्त खुराक ले रहे हों।

मैगनीशियम से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

मैगनीशियम प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह न केवल दूध,
चॉकलेट, फल और पत्तेदार हरी सब्जियों में पाया जाता है, बल्कि समुद्री
भोजन, कठोर जल, माँस और सोयाबीन में भी पाया जाता है। हाथीचक, अदरक, लौंग,
शीरे, चावल, बीज और सूखे मेवे में भी यह अच्छी मात्रा में पाया जाता है।
अधिक देर तक व्यायाम करने से हमारे शरीर में इस खनिज का स्तर
निरंतर गिरता चला जाता है, इसलिये क्षमता से अधिक परिश्रम न करें।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

हमारे शरीर को प्रतिदिन 300 mg से 450 mg Magnesium की आवश्यकता होती है,
जो प्राकृतिक आहार से आसानी से प्राप्त हो सकती है। स्त्रियों को प्रायः
प्रतिदिन 320-350 mg और पुरुषों को 400-450 mg Magnesium की आवश्यकता होती
है। भोजन के रूप में लिये जाने वाले मैगनीशियम की प्रतिदिन की कोई अधिकतम
मात्रा निर्धारित नहीं है। लेकिन यदि इसे अलग से औषधि के रूप में लिया जा
रहा है, तो यह 350 mg से अधिक नहीं होनी चाहिये।

6. Sulfur सल्फर –
शरीर में क्या कार्य करता है : –

सल्फर यानि गंधक, कैल्शियम और फ़ॉसफोरस के पश्चात हमारे शरीर में पाया जाने
वाला तीसरा सबसे प्रमुख मिनरल है। यह एक महत्वपूर्ण खनिज है जो प्रोटीन के
अणुओं में पाया जाता है। शरीर का लगभग 50 प्रतिशत Sulfur हमारी
माँसपेशियों, त्वचा और हड्डियों में पाया जाता है। गंधक प्रोटीन की
संरचनाओं को स्थिर होने में सहायता करता है और प्रोटीन की जैविक क्रियाओं
का निर्धारण भी यही करता है, जिनमे वे भी शामिल हैं जो बाल, त्वचा, और
नाखूनों का निर्माण करते हैं।

प्रोटीन को बांधने के अलावा सल्फर एंजाइमों की उपयुक्त संरचना और जैविक
क्रियाओं के लिये भी आवश्यक है। Sulfur एक प्रभावशाली जीवाणुनाशक है और
शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त रखने के लिये आवश्यक है। यह कैंसर,
एलर्जी, पुरानी सूजन, पुराने दर्द, तनाव अदि को दूर करने में एक बेहद
असरदार तत्व है। यदि आपके शरीर में Sulfur पर्याप्त मात्रा में नहीं है,
तो एंजाइम अपना कार्य सही प्रकार से नहीं कर पाते हैं, जिससे चयापचय की
प्रक्रिया में अवरोध समेत अनेक स्वास्थ्य समस्याएँ पनप सकती है।

Sulfur शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान
करता है और इन्सुलिन को सही प्रकार से अपना कार्य करने में मदद करता है।
सल्फर के बिना इन्सुलिन अपनी जैविक क्रियाओं को सही तरह से नहीं कर सकता।
यह विटामिन B के घटक बायोटिन और थायमिन का रूपांतरण करता है, जो
कार्बोहायड्रेट को ऊर्जा में बदलने के लिये अनिवार्य हैं। इसके अतिरिक्त
यह चयापचय की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले पदार्थों जैसे –
ग्लूटाथियोन को संश्लेषित करता है और शरीर से कई प्रकार के विषैले
पदार्थों को बाहर निकालता है।

सल्फर की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

शरीर में Sulfur की कमी होने पर प्रोटीन के संश्लेषण में बाधा पैदा होती
है। गंधक एमिनो एसिड्स कोशिका तंत्र की मरम्मत और उन्हें एकीकृत रखने के
लिये आवश्यक हैं। यह फ्री रेडिकल्स को दूर करने और विषैले पदार्थों को
विषहीन कर शरीर को स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं। Sulfur वसा अम्लों और
कई अन्य मिनरल्स के साथ मिलकर शरीर की कई महत्वपूर्ण जैवरासायनिक क्रियाओं
में भाग लेता है।

यदि शरीर में इसकी बहुत कमी हो जाती है, तो इन सभी कार्यों में बाधा पड़ती
है और आपके बालों, पाचन तंत्र, त्वचा, माँसपेशियों और अस्थि तंत्र पर बुरा
प्रभाव पड़ता है। यह आपके सौंदर्य व यौवन को बरकरार रखने के लिये भी जरुरी
है।

सल्फर से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

सल्फर उन भोज्य पदार्थों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो हमारे
लिये प्रोटीन की पूर्ति करते हैं। जैसे – मीट, चिकन, अंडे, मछली, कच्चा
दूध। मेथिलसल्फोनिलमीथेन (MSM) प्रकृति में उपलब्ध जैव सल्फर का सबसे
प्रचुर स्रोत है, जिसमे गंधक की मात्रा 34% तक होती है। यह कोई दवाई नहीं
है, बल्कि कई पौधों में पाया जाने वाल एक तत्व है और एक
शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट भी है। एलोवेरा में यह उच्च सांद्रता में मिलता
है। इसके अलावा बादाम, शतावर, फलियाँ, करमसाग, अखरोट, काजू, जैसे सूखे
मेवे, फलियाँ, लहसुन व प्याज आदि में भी यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता
है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

हमें अपने शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिये सल्फर की उच्च मात्रा की
आवश्यकता होती है। औसतन हमारे शरीर को प्रतिदिन 1500 mg से 2500 mg Sulfur
की जरुरत होती है। इसकी अधिकतम मात्रा 7000 mg प्रतिदिन निर्धारित है।

7. Chloride
क्लोराइड – शरीर में क्या कार्य करता है : –

क्लोराइड भी मनुष्य के लिये अनिवार्य प्रमुख मिनरल्स में से एक है।
Chloride मुख्य खनिज पोषक तत्वों में से एक है, जो शरीर में विभिन्न तरल
पदार्थों का उचित संतुलन बनाने के लिये बहुत आवश्यक है। यह रक्त का एक
विशिष्ट ऋणात्मक आवेशित आयन है, इसी कारण से यह शरीर के मुख्य वैद्युत
अपघट्यों में से एक है। औसत रूप से एक व्यस्क मानव शरीर में कुल 115 gm
क्लोराइड होता है। Chloride पेट में हाइड्रोजन के साथ मिलकर
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाता है।

जो भोजन को पचाने के लिये एक शक्तिशाली पाचक एंजाइम का कार्य करता है और
प्रोटीन को तोड़ने के लिये और दूसरे धात्विक खनिजों के अवशोषण के लिये
आवश्यक होता है। बाद में यह अम्ल Chloride के रूप में आँतों में जाकर पुनः
अवशोषित हो जाता है और फिर वहां से रक्त में मिल जाता है। इस तरह यह आमाशय
से स्रावित होने वाले अम्ल की मात्रा को नियंत्रित करता है। यह सोडियम और
पोटैशियम के साथ मिलकर शरीर के ph संतुलन को बनाये रखता है और शरीर से
कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालने में मदद करता है।

ये तीनों खनिज साथ मिलकर वैद्युत आवेशों को संपूर्ण शरीर में फैलाने में
तंत्रिका तंत्र की मदद करते हैं। यह हमारे गुर्दों के सही प्रकार से कार्य
करने के लिये, रक्त नलिकाओं में तरल की उचित मात्रा बनाये रखने के लिये और
माँसपेशियों को गतिशील बनाने के लिये भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल
मनुष्यों के ही लिये नहीं, बल्कि यह जानवरों के लिये भी एक अत्यंत
महत्वपूर्ण और जीवन के लिये आवश्यक खनिज है।

क्लोराइड की कमी और
अधिकता से होने वाली समस्या : –

Chloride की कमी वैसे तो दुर्लभ ही है, लेकिन यदि ऐसा हो जाय तो यह जीवन
को संकट में डालने वाली परिस्थिति को जन्म देती है, जिसे अल्कालोसिस कहते
हैं। जिसमे रक्त बहुत क्षारीय हो जाता है और हमारे शरीर में उपस्थित तरल
पदार्थों का संतुलन बिगड़ जाता है। शरीर से सोडियम की अत्यधिक मात्रा
निकलने से यह समस्या हो सकती है, जो शरीर से बहुत ज्यादा पसीना निकलने और
लगातार उल्टी और दस्त लगे रहने के कारण खड़ी होती है। इसके लक्षणों में
माँसपेशियों की कमजोरी, भूख न लगना, चिडचिडापन, निर्जलीकरण और बहुत अधिक
थकान शामिल हो सकते हैं।

शरीर के स्वस्थ रहने के लिये हर समय अम्ल और क्षार एक निश्चित संतुलन बना
रहना बहुत आवश्यक है। हाइपोक्लोरेमिया जल के अधिक भार, अपव्ययी दशाओं और
शरीर के अधिक जल जाने से हो सकता है, क्योंकि ऐसे में extracellular
fluids शरीर से अलग हो जाते हैं। Chloride को अधिक मात्रा में लेने से,
रक्तचाप बढ़ जाता है और शरीर में अतिरिक्त तरल पदार्थ रूक जाते हैं, जो
अक्सर अधिक नमक और पोटैशियम क्लोराइड लेने से होता है।

लेकिन फिर भी शरीर पर इसकी अधिक मात्रा का कोई विषाक्त प्रभाव अभी तक देखा
नहीं गया है। Chloride की अधिक मात्रा को आसानी से अधिक मात्रा में पानी
पीकर कम किया जा सकता है। लेकिन यदि इसे लम्बे समय तक बहुत अधिक मात्रा
में लिया जाय और शरीर को पर्याप्त तरल न मिलने के कारण ph असंतुलन बना
रहे, तो इसका बुरा प्रभाव गुर्दों पर देखने को मिल सकता है। सामान्य
स्थिति में ऐसा होने पर, शरीर में अम्ल की मात्रा बढ़ सकती है और एसिडिटी,
कब्ज, पेट दर्द आदि समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

क्लोराइड से भरपूर
भोज्य पदार्थ : –

घर में इस्तेमाल होने वाले सफ़ेद नमक, खमीर सत्व, पनीर, सोया सौस और
प्रसंस्करित भोज्य पदार्थ में यह अधिक मात्रा में पाया जाता है। नमक से
हमें सोडियम और क्लोराइड दोनों खनिज पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाते
हैं। दूध, ब्रेड, राइ, जैतून, टमाटर, सलाद, अजमोद और सब्जियों में यह कम
मात्रा में पाया जाता है, जो कि शरीर के लिये स्वास्थ्यप्रद भी है।

शरीर के लिए कितनी
मात्रा में आवश्यक है : –

हमारे शरीर को प्रतिदिन 750 mg से 950 mg Chloride की आवश्यकता होती है,
जो प्राकृतिक आहार से आसानी से प्राप्त हो सकती है। प्राकृतिक भोजन के रूप
में लिये जाने वाले क्लोराइड की प्रतिदिन की कोई अधिकतम मात्रा निर्धारित
नहीं है,क्योंकि यह फलों व सब्जियों में कम मात्रा में ही पाया जाता है।
लेकिन यदि इसे अलग से लिया जा रहा है, जैसे – नमक तो इसकी अधिकतम मात्रा
2500 mg से अधिक नहीं होनी चाहिये।

“कुछ उपचार दवाइयों से भी ज्यादा बुरे होते हैं।”
– पब्लिलिअस साइरस

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