How to Become Good Parents in Hindi

 

“वह माता शत्रु है और वह पिता बैरी है जो अपनी संतान को शिक्षित नहीं करना चाहते। अशिक्षित संतान बुद्धिमान मनुष्यों के बीच में ठीक वैसे ही शोभित नहीं होती, जैसे हंसों के समुदाय में बगुला अच्छा नहीं लगता।”
– चाणक्य

 

How to Become Good Parents in Hindi
अपने बच्चों की जिंदगियों को आसान बनाकर उन्हें अक्षम मत बनाइये

Desire of Parents in Hindi माता-पिता की इच्छा

Good Parents in Hindi में आज हम आपको आचार्य चाणक्य के अनमोल वचनों के जरिये अच्छे माता-पिता के कर्तव्य और गुणों के बारे में बतायेंगे ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो विवाहित है, अपनी वंश-परंपरा की रक्षा के लिये और अपने विवाहित जीवन (Married Life) के आनंद को बढाने के लिये एक संतान अवश्य चाहता है और भारत में तो संतान, विशेषकर एक पुत्र के लिये कितने यत्न किये जाते हैं, यह सभी को मालूम है।

यह चाहे मोह का प्रभाव हो या अपने जीवन में हर्षोल्लास की वृद्धि की इच्छा; संतान की कामना प्रत्येक दंपत्ति के मन में होती है। ज्यादातर लोगों के अनुसार स्त्री और पुरुष के जीवन की पूर्णता, उनके माता-पिता (Parents) बनने के पश्चात ही संभव होती है।

यह कितना सत्य है, यह तो हम नहीं जानते, लेकिन आचार्य चाणक्य समेत समस्त विद्वान् इस बात पर एकमत हैं कि धरती पर उसी जीव का जन्म लेना सार्थक है, जिसने न केवल अपने व्यक्तित्व (Personality) को ऊँचा उठाया हो, उसे श्रेष्ठ बनाया हो, बल्कि अपने सत्कर्मों से अपने माता-पिता और कुल का भी गौरव बढाया हो, तथा संसार के दूसरे प्राणियों ने भी उसकी योग्यता का लाभ उठाया हो।

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Good Parents in Hindi अच्छे पैरेंट कैसे होते हैं

केवल एक मानुष तनधारी जीव को जन्म दे देने मात्र से ही किसी को माता-पिता (Parents) का उच्च गौरव प्राप्त नहीं हो जाता। वह तो संतान के सुयोग्य व शीलवान सिद्ध होने पर ही प्राप्त होता है। यदि केवल एक शिशु पैदा करने मात्र से ही माता-पिता (Parents) का वह उच्च, महिमामय व गौरवशाली दर्जा हर किसी को मिल जाता, जिसकी सभी धर्मग्रंथों में प्रशंसा की गयी है, तो फिर केवल इन्सान ही क्यों, बल्कि पशु-पक्षी भी उस सम्मान के हक़दार हो गये होते।

क्योंकि देह के निर्माण हेतु दो जीवों के संयोग की जो आवश्यकता है, वह तो वासनात्मक आकर्षण के रूप में प्रत्येक जीव के भीतर नैसर्गिक रूप से उपस्थित है। सच्चे अर्थों में तो वही व्यक्ति माता-पिता (Parents) कहलाने के अधिकारी हैं, जिनके अपने व्यक्तित्व उत्कृष्ट कोटि के हैं और जो अपनी संतान को भी श्रेष्ठ चारित्रिक सद्गुण प्रदान करने के लिये, आरंभ से ही पूर्ण उत्तरदायित्व स्वीकार करने को तैयार हैं।

एक अच्छे माता-पिता कैसे बनें इसका विस्तार से वर्णन हमने Parents Meaning in Hindi में किया है, इसीलिये इसे जरुर पढ़ें। हमें आशा है चाणक्य नीति के यह अनमोल सूत्र आपके ज्ञान में तो बढ़ोत्तरी करेंगी ही, साथ ही यह आपको एक अच्छे माता-पिता (Parents) बनने के लिये भी प्रेरित करेंगे –

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Who is A Good Parent in Hindi

Duty of Parents in Hindi पेरेंट्स बच्चों का चरित्र बनायें

1. पुत्राश्च विविधैः शीलैनिर्योज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसंपन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

अर्थ – बुद्धिमान व्यक्तियों को अपने पुत्रों को सदैव श्रेष्ठ शील का निर्माण करने वाले कार्यों में लगाना चाहिये। क्योंकि नीतिवान, श्रद्धालु और शील से संपन्न व्यक्ति ही संपूर्ण कुल (देश) में पूज्य समझे जाते हैं।

इस श्लोक के माध्यम से आचार्य चाणक्य, प्रत्येक माता-पिता (Parents) को यह सन्देश देते हैं कि उन्हें आरम्भ से ही अपनी संतानों को ऐसे कार्यों में नियोजित करना चाहिये, जिससे उनमे कर्तव्यबोध, कुशलता, उदारता, ईमानदारी, समयनिष्ठा, बुद्धिमत्ता आदि श्रेष्ठ गुणों का विकास हो। क्योंकि शैशवकाल में बालकों का संवेदनशील मस्तिष्क जिन बातों को सूक्ष्मता से ग्रहण कर लेता है, उन्ही सूत्रों पर उसका संपूर्ण जीवन संचालित होता है।

बच्चे कच्ची मिटटी के बर्तन की तरह हैं, उन्हें जो चाहे वह आकार दिया जा सकता है और माता-पिता (Parents) उस कुम्हार की तरह है, जो उस बर्तन को आकार देते हैं। यदि वह इस दायित्व के निर्वाह में सफल हो जाते हैं, तो उनकी संतान कल अपने शील और बुद्धिमत्ता के बल पर ऐसा कार्य करने में सफल होगी, जो उनके मस्तक को पूरे समाज में गौरव से ऊँचा उठा सके।

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Duty of Parents in Hindi पेरेंट्स बच्चों को शिक्षित करें

2. माता शत्रुः पिता बैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

अर्थ – वह माता शत्रु है और वह पिता बैरी है जो अपनी संतान को शिक्षित नहीं करना चाहते। अशिक्षित संतान बुद्धिमान मनुष्यों के बीच में ठीक वैसे ही शोभित नहीं होती, जैसे हंसों के समुदाय में बगुला अच्छा नहीं लगता।

आचार्य चाणक्य के अनुसार प्रत्येक माता-पिता (Parents) को अपनी संतान को अवश्य ही शिक्षित करना चाहिये। जीवन में सफल होने के लिये शिक्षा (Education) की कितनी महत्ता है, इसे आज हर व्यक्ति समझता है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो धन के लोभ और गलत सोच (Bad Thinking) के कारण अपनी संतानों, विशेषकर लड़कियों को शिक्षित नहीं करना चाहते हैं। ऐसा जो भी स्त्री-पुरुष है, वह निःसंदेह अपनी संतान का सबसे बड़ा दुश्मन है।

उन्हें समझना चाहिये कि शास्त्रों में एक अशिक्षित व्यक्ति की तुलना बिना सींग और पूँछ के पशु से की गयी है और उसे इस धरती पर एक बोझ के समान बताया गया है। यह शिक्षा ही है जो उसे मनुष्यता का गौरव दिलाती है; उसे सभ्य, सुसंस्कृत और समाज में जीने लायक बनाती है।

यदि कोई अनपढ़ व्यक्ति बुद्धिमान लोगों के समाज में जाकर बैठ जाये, तो वह बेचारा न केवल स्वयं को अपमानित अनुभव करेगा, बल्कि उसका आत्म-विश्वास (Self-confidence) भी नष्ट हो जायेगा।

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Duty of Parents in Hindi पेरेंट्स बच्चों को योग्य बनायें

3. किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्धी न गर्भिणी।
कोअर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान न भक्तिमान्॥

अर्थ – जिस तरह उस गाय से कोई लाभ नहीं होता जो न तो दूध देती हैं और न ही गर्भ धारण करती है; उसी तरह उस पुत्र को उत्पन्न करने का क्या अर्थ है जो न तो विद्वान् है और न ही ईश्वर का भक्त।

आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सत्पुत्र की महत्ता पर प्रकाश डाला है। जिस तरह दूध न देने वाली और बच्चा न जनने वाली गाय अपने स्वामी पर बोझ है और किसी काम की नहीं होती, ठीक उसी प्रकार से उस पुत्र को जन्म देना माता-पिता (Parents) के लिये बिल्कुल निरर्थक है जो न तो विद्वान् है और न ही ईश्वर, गुरुजनों और माता-पिता का भक्त है।

अर्थात जो न उनकी सेवा करने वाला और न उनमे श्रद्धा रखने वाला है। ऐसी संतान तो माता-पिता के उच्च गौरव को नष्ट करने वाली मानी गयी है। इसीलिये Parents को खुद को योग्य, शीलवान और संस्कारी बनाना चाहिये ताकि उनकी संतान भी योग्य ही निकले।

 

Chanakya Formulas for Parents in Hindi

Parenting Sutra in Hindi बच्चों की ताड़ना करें

4. लालनाद बहवो दोषास्ताडनाद बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताड़येन्न तु लालयेत॥

अर्थ – अधिक लाड-प्यार करने से पुत्र और शिष्य में दोष उत्पन्न हो जाते हैं; जबकि उनकी ताड़ना करने (डाँटने-फटकारने) से उनमे गुणों का विकास होता है। इसलिये पुत्र और शिष्य को लाड-प्यार करने के स्थान पर उनकी ताड़ना करनी चाहिये।

यह तो सभी को ज्ञात है कि जिन बच्चों की हर इच्छा पूरी की जाती है, वे धीरे-धीरे जिद्दी, अड़ियल, और गुस्सैल स्वभाव के होते जाते हैं और फिर एक समय ऐसा भी आता है, जब इच्छित वस्तु न मिलने पर वे बहुत उग्र हो उठते हैं। यहाँ तक कि कई बार वे हाथापाई पर उतारू हो जाते हैं। जो माता-पिता (Parents) व गुरु अपनी संतान व शिष्य को चरित्रवान, सुयोग्य और बुद्धिमान बनते देखना चाहते हैं, उन्हें हमेशा यह कोशिश करनी चाहिये कि बच्चों की अनुचित इच्छा को कभी पूरा न किया जाय।

अक्सर यही देखा गया है कि पहले माता-पिता (Parents) ही संतान मोह में अपने बच्चों (Children) की हर इच्छा को पूरा करते हैं और फिर पछताते है। यदि माँ-बाप ही उचित और अनुचित का सोच-विचार करने में समर्थ नहीं हैं, तो फिर बालकों से क्या आशा की जा सकती है?

इसलिये उन्हें अपने बालकों को आरम्भ से ही प्रेम व धैर्य (Patience) से समझाना चाहिये और समयानुसार ताड़ना भी करनी चाहिये। ताड़ना का अर्थ सिर्फ बच्चों को मारना-पीटना ही नहीं है, बल्कि उन्हें प्यार से या बनावटी क्रोध दिखाकर उचित मार्ग पर लाना है।

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Parenting Sutra in Hindi बच्चों के मित्र बनकर रहे

5. लालयेत पञ्च वर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥

अर्थ – प्रत्येक पिता को अपने पुत्र को पाँच वर्ष तक खूब लाड-प्यार से रखना चाहिये; फिर दस वर्ष तक, अर्थात छ वर्ष की आयु से पंद्रह वर्ष का होने तक उसकी ताड़ना करनी चाहिये और जब वह सोलह वर्ष का हो जाय; तो पिता को अपने पुत्र के साथ एक मित्र (Friend) की तरह व्यवहार करना चाहिये।

इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि कैसे कोई व्यक्ति अपनी संतान को एक श्रेष्ठ और शीलवान नागरिक बना सकता है। पाँच वर्ष तक के बालक शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर बहुत ही सुकोमल होते हैं। उनके प्रति दिखायी गयी थोड़ी सी भी कठोरता उनके मन में गहरी गांठ बनकर उनके व्यक्तित्व के विकास को अवरुद्ध कर सकती है, इसीलिये उन्हें खूब लाड-प्यार करना चाहिये।

छ वर्ष से पंद्रह वर्ष की आयु के बालक चंचल और अस्थिर प्रवृत्ति के होते हैं। यही वह अवस्था है, जब बालकों पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरुरत होती है, अन्यथा वे गलत राह पर चल सकते हैं। इसीलिये पेरेंट्स को उनके प्रति अपना व्यवहार कठोर रखना चाहिये, विशेषकर तब जब वह कोई गलत काम करें।

लेकिन जब संतान सोलह वर्ष की हो जाय तो फिर पिता को पुत्र के साथ एक मित्र की तरह व्यवहार करना चाहिये। क्योंकि उस समय वह मानवीय भावनाओं को अच्छी तरह से समझने लगता है और देखा गया है कि इस उम्र के बच्चे मारने-पीटने से विद्रोही रुख अख्तियार कर लेते हैं और कई बार तोसारी सीमा ही लांघ जाते हैं।

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Parenting Sutra in Hindi बच्चे माता-पिता का अक्स हैं

6. दीपो भक्ष्यते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

अर्थ – दीपक अँधेरा खाता है और उससे काजल पैदा होता है; इसी तरह मनुष्य जैसा अन्न खाता है उसके वैसी ही संतान उत्पन्न होती है।

इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने आहार की शुद्धि पर विशेष बल दिया है। क्योंकि लोक में भी यही उक्ति प्रसिद्द है – “जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन।” चूँकि अन्धकार में कुछ नहीं दीखता और सब कुछ काला नजर आता है तथा दीपक उसे खाकर काले ही रंग का काजल उत्पन्न करता है।

ठीक इसी तरह मनुष्य जिस प्रकार का अन्न (ईमानदारी से परिश्रम करके हासिल हुआ सात्विक अन्न या बेईमानी व छल-कपट करके पाया तामसिक अन्न) खाता है, उसकी संतान वैसी ही पैदा होती है। इसलिये उत्तम संतान को जन्म देने के लिये हर माँ-बाप (Parents) को ईमानदारी से कमाया हुआ शुद्ध और सात्विक अन्न ही खाना चाहिये, क्योंकि उससे मन पर वैसा ही संस्कार पड़ता है।

इस लेख में हमने आपको बताया है कि कैसे एक ऐसी संतान का निर्माण किया जाय जिस पर माता-पिता, देश और समाज गौरव कर सकें। प्रत्येक माँ-बाप (Parents) की यही इच्छा होती है कि उनकी संतान गुणवान हो और वह अपने अच्छे कार्यों से माता-पिता और कुल का नाम उज्जवल करें। आचार्य ने अत्यंत बुद्धिमत्ता से ऐसे जटिल सवालों का जवाब दिया है जिनके बारे में हर इन्सान जानना चाहता है।

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“जो संतान पर कर्जा छोड़ गया है वह पिता दुश्मन के समान है, जो चरित्रहीन है वह माँ दुश्मन के समान है, जो बहुत सुन्दर है वह पत्नी दुश्मन के समान है, और जो मूर्ख है वह पुत्र दुश्मन के समान है।”
– चाणक्य

 

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